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कृषि निर्यात की चुनौतियां

दुनिया के जो देश विभिन्न आधारों पर भारत के कृषि निर्यात की राह में अवरोध खड़े कर रहे हैं, उन्हें दूर करने के लिए संबंधित देशों के साथ द्विपक्षीय और बहुपक्षीय मंचों के माध्यम से वार्ताएं तेज करनी होंगी।

गेहूं का निर्यात सालभर पहले के चार सौ पच्चीस करोड़ रुपए से बढ़ कर तीन हजार दो सौ तिरासी करोड़ रुपए के स्तर पर पहुंच गया।

जयंतीलाल भंडारी
महामारी की चुनौतियों के बीच ही कृषि क्षेत्र के लिए अच्छी खबर यह है कि कृषि उत्पादों का निर्यात बढ़ रहा है। लेकिन इसके साथ ही दुनिया के कई देश भारत के कृषि निर्यात को लेकर घबराए हुए हैं और अवरोध खड़े कर रहे हैं। खासतौर से पशुधन के मामले में कुछ आयातक देशों ने मांस और दूध से बने उत्पादों के लिए इनके विषाणु और रोग मुक्त होने की शर्त लगा दी है। इतना ही नहीं, कुछ देशों की शर्त यह भी है कि निर्यात की जाने वाली उपज कीट मुक्त क्षेत्रों से होनी चाहिए। ऐसे में जरूरी है कि सरकार इन अवरोधों को रणनीतिक रूप से जल्द दूर करे, ताकि कृषि उत्पादों के लिए बड़े पैमाने पर निर्यात बढ़ने की संभावनाओं को धक्का न लगे।

गौरतलब है कि पिछले महीने कृषि मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2020-21 के अप्रैल से फरवरी के ग्यारह महीनों के दौरान देश से दो लाख चौहत्तर हजार करोड़ रुपए के कृषि उत्पादों का निर्यात किया गया। साल भर पहले की इसी अवधि में यह दो लाख इकतीस हजार करोड़ रुपए रहा था। यानी एक साल में इसमें 16.88 फीसद की वृद्धि दर्ज की गई। हालांकि इसी अवधि में कृषि एवं संबंधित वस्तुओं का आयात भी तीन फीसदी बढ़ कर एक लाख इकतालीस हजार करोड़ रुपए पर पहुंच गया। इसके बावजूद भारत के पक्ष में कृषि व्यापार संतुलन बढ़ कर एक लाख बत्तीस हजार करोड़ रुपए पर पहुंच गया है।
अगर कृषि निर्यात के आंकड़ों पर गौर करें तो पाते हैं कि इस साल अप्रैल से फरवरी के दौरान चावल, गेहूं, मोटे अनाज के निर्यात में तेज वृद्धि हुई। चूंकि दुनिया के कई खाद्य निर्यातक देश महामारी की वजह से चावल, गेहूं, मक्का और अन्य कृषि पदार्थों का निर्यात करने में पिछड़ गए। ऐसे में भारत ने इस अवसर का फायदा उठाया और कृषि निर्यात बढ़ा लिया। भारत से गेहूं के निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है।

गेहूं का निर्यात सालभर पहले के चार सौ पच्चीस करोड़ रुपए से बढ़ कर तीन हजार दो सौ तिरासी करोड़ रुपए के स्तर पर पहुंच गया। खासतौर से अफगानिस्तान को पचास हजार टन और लेबनान को चालीस हजार टन गेहूं निर्यात किया गया। गैर बासमती चावल का निर्यात तेरह हजार तीस करोड़ रुपए से बढ़ कर तीस हजार दो सतहत्तर करोड़ रुपए पर पहुंच गया। भारत ने ब्राजील, चिली जैसे कई नए बाजारों पर पकड़ बनाई है। खास बात यह भी है कि चीन ने भी भारत से बासमती चावल खरीदना शुरू किया है। खाद्यान्न के अलावा अन्य कृषि उत्पादों के निर्यात में भी डॉलर मूल्यों के आधार पर अच्छी वृद्धि हुई है। इनमें खासतौर से प्रसंस्कृत सब्जियां, दुग्ध उत्पाद, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ, दलहन, ताजा सब्जियां और बीज व ताजे फलों का निर्यात प्रमुख है।

महामारी के कारण दुनिया के तमाम देशों में बंदी और प्रतिबंधों के कारण खाद्य पदार्थों के वैश्विक खरीदारों के साथ जुड़ना मुश्किल काम था। ऐसे में कृषि निर्यात संबंधी विभिन्न चुनौतियों से निपटने के लिए कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) ने विशिष्ट आभासी वैश्विक कृषि व्यापार मेलों के माध्यम से देश के कृषि उत्पाद निर्यातकों की वैश्विक खरीदारों की अलग-अलग बैठकें और मुलाकातें करवाईं। इतना ही नहीं, एपीडा ने कृषि निर्यात से विभिन्न विभागों के साथ तालमेल बनाया और निर्यात को बढ़ाने के लिए रोजाना के आधार पर कृषि निर्यातकों के साथ संपर्क बनाए रखा। साथ ही केला, अंगूर, प्याज, आम, अनार, पुष्प आदि के लिए निर्यात संवर्धन मंच (ईपीएफ) की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण रही।

यह भी उल्लेखनीय है कि कृषि उत्पादों का निर्यात बढ़ाने में भारत के कृषि अनुसंधान और कृषि मानकों की वैश्विक मान्यता ने भी अहम भूमिका निभाई है। भारत के पास खाद्यान्न, ताजे फल और सब्जियां, प्रसंस्कृत उत्पाद आदि से संबंधित करीब एक सौ तीस भौगोलिक पहचान (जीआइ) हैं। ज्ञातव्य है कि भौगोलिक संकेत उत्पाद की विशेषताओं को दशार्ता है। इससे उत्पाद का बाजार मूल्य बढ़ता है और उपभोक्ता उत्पाद की गुणवत्ता और विशेषता से खरीदी के लिए आकर्षित होते हैं।

कृषि निर्यात बढ़ने के और भी कारण हैं। सरकार ने नई कृषि निर्यात नीति के तहत ज्यादा मूल्य और मूल्यवर्धित कृषि निर्यात को बढ़ावा दिया है। निर्यात किए जाने वाले कृषि जिंसों के उत्पादन व घरेलू दाम में उतार-चढ़ाव पर लगाम लगाने के लिए रणनीतिक कदम उठाए गए हैं। कृषि निर्यात की प्रक्रिया के दौरान खराब होने वाले सामान और उत्पादों की साफ-सफाई के मसले पर विशेष ध्यान केंद्रित किया है। साथ ही, कृषि निर्यात में राज्यों की ज्यादा भागीदारी, बुनियादी ढांचे और आपूर्ति व्यवस्था में सुधार, नए कृषि उत्पादों के विकास में शोध एवं विकास गतिविधियों को बढ़ावा दिया गया है।

वर्ष 2020 में शुरू हुई किसान ट्रेनों ने भी कृषि निर्यात बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि हाल में केंद्र सरकार ने उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआइ) योजना के तहत खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए दस हजार नौ सौ करोड़ रुपए की मंजूरी दी है। कहा गया है कि इस पीएलआइ योजना से देश में मूल्यवर्धित खाद्य उत्पादों को बढ़ावा मिलेगा। इससे प्रसंस्कृत कृषि उत्पादों के निर्यात में बढ़ोतरी होगी। किसानों को उनकी पैदावार के बेहतर दाम मिलने के साथ ही कृषि उपज की बबार्दी भी कम की जा सकेगी। इससे 2026-27 तक करीब ढाई लाख रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे।

भारत के पास विभिन्न खाद्य उत्पादों से संबंधित बहुत अच्छे कृषि आधार हैं। लेकिन इनमें खाद्य प्रसंस्करण के मामले में भारत बहुत पीछे है। विश्व स्तर पर भारत गेहूं, फलों, सब्जियों, केला, आम, अमरूद, पपीता, अदरक, भिंडी, चावल, चाय, गन्ना, काजू, नारियल, इलायची और काली मिर्च आदि के प्रमुख उत्पादक के रूप में जाना जाता है। साथ ही भारत सबसे बड़ा दूध उत्पादक भी है। विभिन्न रिपोर्टों के मुताबिक भारत में कुल खाद्य उत्पादन का दस फीसद से भी कम हिस्सा प्रसंस्कृत होता है। जबकि फिलीपींस, अमेरिका, चीन सहित दुनिया के कई देशों में खाद्य प्रसंस्करण भारत की तुलना में कई गुना अधिक है। ऐसे में खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र की पीएलआइ योजना से खाद्य प्रसंस्करण उत्पादों के निर्यात को तेजी से बढ़ाया जा सकेगा।

चालू वित्त वर्ष (2021-22) में कृषि उत्पादन के ऊंचाई पर पहुंचने की संभावनाओं के साथ ही कृषि निर्यात को भी रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचाने के लिए कृषि निर्यात अवरोधों को दूर करना जरूरी है। दुनिया के जो देश विभिन्न आधारों पर भारत के कृषि निर्यात की राह में अवरोध खड़े कर रहे हैं, उन्हें दूर करने के लिए संबंधित देशों के साथ द्विपक्षीय और बहुपक्षीय मंचों के माध्यम से वातार्एं तेज करनी होंगी। कृषि निर्यात बढ़ाने के लिए निर्यातकों के हितों के अनुरूप मानकों में उपयुक्त बदलाव करना होगा, ताकि कृषि निर्यातकों को कार्यशील पूंजी आसानी से मिल सके। सरकार को अन्य देशों की मुद्रा के उतार-चढ़ाव, सीमा शुल्क में मुश्किलें जैसे कई मुद्दों का भी समाधान करना होगा। देश के चिह्नित खाद्य क्षेत्रों में विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचा, शोध सुविधाओं और परीक्षण प्रयोगशालाओं को मजबूत बनाना होगा। पंद्रहवें वित्त आयोग द्वारा गठित कृषि निर्यात पर उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समूह ने जो सिफारिशें सरकार को सौंपी हैं, उनका क्रियान्वयन भी लाभप्रद होगा। तभी कृषि निर्यात बढ़ने के रास्ते आसान बन सकेंगे। इससे किसानों की आदमनी व ग्रामीण क्षेत्र की समृद्धि बढ़ने के साथ-साथ रोजगार अवसरों में भी वृद्धि होगी।

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