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परमाणु समझौते का गुब्बारा

सत्येंद्र रंजन दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजों का विश्लेषण करते हुए जिस एक पहलू की तरफ खूब ध्यान खींचा गया, वह आम लोगों में गहराती यह धारणा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बातें तो बड़ी-बड़ी करते हैं, लेकिन असलियत में कुछ हासिल नहीं होता। वे भव्य नजारे और ध्यानाकर्षक माहौल बनाने में तो कुशल हैं, […]

Author February 23, 2015 11:41 AM

सत्येंद्र रंजन

दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजों का विश्लेषण करते हुए जिस एक पहलू की तरफ खूब ध्यान खींचा गया, वह आम लोगों में गहराती यह धारणा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बातें तो बड़ी-बड़ी करते हैं, लेकिन असलियत में कुछ हासिल नहीं होता। वे भव्य नजारे और ध्यानाकर्षक माहौल बनाने में तो कुशल हैं, लेकिन बात इसके आगे नहीं बढ़ती। गणतंत्र दिवस के मौके पर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा भी इस राय को मजबूत करने में मददगार बनी। उस दरम्यान ‘मोदी-ओबामा दोस्ती’ की छवि गढ़ने की सायास कोशिशें हुर्इं। दरअसल, ओबामा की यात्रा को बिना कामयाब बताए भारतीय प्रधानमंत्री को विश्व के प्रभावशाली नेता के रूप में पेश नहीं किया जा सकता था। तो बिना ब्योरा दिए ओबामा की यात्रा को सफल घोषित कर दिया गया। इसके केंद्र में था, असैनिक परमाणु सहयोग समझौता। बताया गया कि व्यापारिक रूप से इस करार को लागू करने का रास्ता साफ हो गया है। और यह कुछ ऐसे जादुई अंदाज में हुआ है कि परमाणु दुर्घटना क्षतिपूर्ति कानून-2010 को बदले बगैर ही अमेरिकी कंपनियां भारत को रिएक्टर बेचने को तैयार हो जाएंगी!

इस दावे पर देश के कथित रक्षा विशेषज्ञों और सरकार के पैरोकारों के अलावा किसी ने यकीन नहीं किया। रिएक्टर बनाने वाली अमेरिकी कंपनियां भी अभी तक यही कह रही हैं कि वे मोदी-ओबामा के बीच बनी सहमति के बिंदुओं का अध्ययन कर रही हैं। भारतीय उद्योग जगत की स्थिति भी इससे अलग नहीं है। ओबामा के भारत से जाने के तकरीबन दस दिन बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने मोदी-ओबामा के बीच सहमति के बारे में स्पष्टीकरण जारी किया। इसमें बताया गया कि कैसे एटमी क्षतिपूर्ति कानून में बदलाव नहीं होगा, जबकि अमेरिकी कंपनियां चिंता-मुक्त हो जाएंगी। मगर इसके बाद भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग परिसंघ (फिक्की) ने एक बयान जारी कर कहा, ‘मौजूदा परमाणु उत्तरदायित्व कानून के कारण देश में एटमी ऊर्जा कारोबार के भविष्य को बाधित करने वाले कुछ मुद्दों पर विदेश मंत्रालय के स्पष्टीकरण का उद्योग जगत स्वागत करता है। इसके बावजूद अनुत्तरित रह गए कुछ और सवालों के जवाब दिए जाने की जरूरत है, जिन पर उद्योग जगत पूरी तरह आश्वस्त होना चाहता है।’

अब तक भारत को परमाणु रिएक्टर बेचने वाले अकेले देश रूस की भी यही राय है कि मोदी-ओबामा की सहमति को ‘सफलता’ कहना जल्दबाजी होगी। भारत में रूस के राजदूत अलेक्सांद्र कादाकिन ने एक अंगरेजी अखबार को दिए इंटरव्यू में कहा- ‘सफलता की बात करना अभी बहुत जल्दबाजी होगी, क्योंकि स्पष्टता का पूरा अभाव है और (अमेरिकी रिएक्टर वाले) निर्माण -स्थलों पर काम की कोई शुरुआत नहीं हुई है। अभी तक यह बात सिर्फ वचन देने और वादों तक सीमित है और इनके साथ सुखबोध फैलाया गया है, लेकिन यह कूटनीति या वास्तविक राजनीति में बहुत अच्छी बात नहीं है।’

आखिर भारतीय विदेश मंत्रालय के स्पष्टीकरण से भी स्थिति साफ क्यों नहीं हुई? इसलिए कि मोदी सरकार ने यथार्थ को ढंकने या उसकी मनमानी व्याख्या करने की कोशिश की है। लेकिन इससे ओबामा कैसे प्रभावित हो गए? दरअसल, पच्चीस जनवरी को ओबामा और मोदी की हुई साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस्तेमाल किए गए शब्दों पर ध्यान दें तो साफ होता है कि परमाणु करार पर हुई सहमति उतनी बड़ी सफलता नहीं थी, जितना भारत में दिखाने की कोशिश की गई। मोदी ने कहा कि ‘हम परमाणु करार पर व्यापारिक रूप से अमल करने की दिशा में आगे बढ़े हैं।’ ओबामा ने कहा कि ‘सहमति बनाने में सफलता’ मिली है। बाद में तत्कालीन विदेश सचिव सुजाता सिंह ने कहा कि ‘डील इज डन’ यानी समझौता हो गया है। कूटनीतिक लिहाज से ये उलझाऊ बातें हैं।

गौरतलब है कि आखिरकार रिएक्टर और एटमी कल-पुर्जों को बेचने का करार वेस्टिंगहाउस इलेक्ट्रिक और जेरनल इलेक्ट्रिक हिटाची जैसी कंपनियों को करना है। सप्लायर कंपनियां ये हैं, जिन पर क्षतिपूर्ति कानून की धाराएं लागू होंगी। ये कंपनियां मोदी-ओबामा सहमति के तमाम बिंदुओं का गहन अध्ययन कर रही हैं और यह देख रही हैं कि अगर भविष्य में उनके बेचे रिएक्टरों से कोई हादसा हुआ तो क्या सचमुच उन पर मुआवजे की कोई देनदारी नहीं बनेगी?

इन्हीं कंपनियों का दबाव था, जिसकी वजह से क्षतिपूर्ति कानून के मुद्दे पर भारत को झुकाना ओबामा प्रशासन की प्राथमिकता बनी रही है। इस बारे में बिना कोई भ्रम बनाए सिर्फ गणतंत्र दिवस परेड देख कर ओबामा लौट जाते तो अमेरिका में उनसे इस यात्रा के औचित्य को लेकर कठिन प्रश्न पूछे जाते। आखिर जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर वे नई दिल्ली में कोई वैसा समझौता करने में विफल रहे, जैसा कुछ महीने पहले अपनी बेजिंग यात्रा के दौरान करने में वे सफल रहे थे। ऐसे में, इस बारे में सहमति का भ्रम बनाना उन्हें भी अपने माफिक लगा होगा।

सहमति या समझौते की सिर्फ दो सूरत हो सकती थी। पहला, यह कि अमेरिका अपनी जनता को सुरक्षा देने के भारतीय संसद के संप्रभु निर्णय को स्वीकार करते हुए क्षतिपूर्ति कानून को मानने पर तैयार हो जाता। दूसरी स्थिति यह हो सकती थी कि भारत सरकार इस कानून की दो धाराओं 17बी और 46 को बदलने पर राजी हो जाती। अमेरिकी कंपनियों को ये धाराएं मंजूर नहीं हैं, तो ओबामा के लिए इस अधिनियम को मान लेना मुमकिन नहीं था। मोदी के सामने मुश्किल राज्यसभा में बहुमत का अभाव है। फिर यह मसला नाजुक है। दिसंबर 1984 के भोपाल गैस कांड, 2011 के फुकुशिमा हादसे और तमाम दूसरी औद्योगिक दुर्घटनाओं के बाद आमतौर पर सारी दुनिया और खासकर भारत में संभावित हादसों को लेकर विशेष संवेदनीशलता पैदा हुई है। इसके बीच मोदी सरकार अपने लिए भारी अलोकप्रियता को न्योता देकर ही 2010 के उस कानून को बदलने का जोखिम उठा सकती है, जिसकी धाराओं को सख्त बनवाने में खुद भारतीय जनता पार्टी की बड़ी भूमिका थी। इसीलिए मोदी सरकार ने पिछले दरवाजे से रास्ता निकालने की कोशिश की।

दरअसल, विदेश मंत्रालय ने मोदी-ओबामा समझौते का जो ब्योरा जारी किया, वह पहले लगाए गए अनुमानों के मुताबिक ही है। उससे पुष्टि हुई कि भारत सरकार ने रिएक्टर बेचने वाली अमेरिकी कंपनियों को हादसे की जवाबदेही से मुक्त करने के यथासंभव प्रयास किए हैं। इसके लिए क्षतिपूर्ति कानून की उन दो धाराओं की आम समझ से अलग व्याख्या की गई, जिन पर अमेरिकी कंपनियों को आपत्ति है। इनमें पहली धारा 17(बी) है, जिसके तहत परमाणु संयंत्र की आॅपरेटर (संचालक) कंपनी को सप्लायर कंपनी से मुआवजा मांगने का हक है, बशर्ते दुर्घटना सप्लायर के कल-पुर्जों या सेवा में खामी के कारण हुई हो। नरेंद्र मोदी सरकार ने इसका समाधान यह निकाला कि भारत में परमाणु संयंत्रों की आॅपरेटर- सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एनपीसीआइएल (न्यूक्लीयर पॉवर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड) खरीद-समझौते में सारा दायित्व खुद पर ले लेगी। फिर हादसे की स्थिति में मुआवजा देने के लिए भारत सरकार सात सौ पचास करोड़ रुपए देकर एक कोष बनाएगी और इसमें सार्वजनिक क्षेत्र की पांच बीमा कंपनियां इतनी ही रकम डालेंगी।

इस तरह सारा मुआवजा भारतीय करदाताओं की जेब से जाएगा। इसके बाद धारा 46 का मुद्दा है, जिसके तहत दुर्घटना के पीड़ितों को भी सप्लायर कंपनी पर मुकदमा करने का अधिकार है। इस बारे में संसद में हुई बहस का हवाला देकर मोदी सरकार ने कहा कि पीड़ितों को सप्लायर कंपनी के खिलाफ और विदेशी अदालतों में मुकदमा करने का हक नहीं होगा। इस तर्क के मुताबिक इस अधिनियम से संबंधित विधेयक पर राज्यसभा में बहस के दौरान कथित तौर पर तत्कालीन सरकार ने ऐसी सफाई दी थी। इसके अलावा महाधिवक्ता एक स्पष्टीकरण देंगे, जो खरीद-समझौतों में जोड़ा जाएगा।

मगर धारा 46 की भाषा ऐसी नहीं है। यह धारा स्पष्ट शब्दों में कहती है कि हादसे की स्थिति में सप्लायर की जवाबदेही असीमित होगी। जाहिर है, इससेउलट किसी व्याख्या को अदालत में चुनौती दी जाएगी। सर्वोच्च न्यायालय अपने पहले के फैसलों में व्यवस्था दे चुका है कि किसी कानून को लागू करने के लिए तय किए जाने वाले नियम या उनकी व्याख्या कानून की मूल भावना से अलग नहीं हो सकती। इसलिए यह सवाल कायम है कि क्या क्षतिपूर्ति कानून की मोदी सरकार की व्याख्या से अमेरिकी कंपनियां आश्वस्त होंगी? गौरतलब है कि यह व्याख्या कानूनन वाजिब पाई गई, तो फिर इसका लाभ अमेरिकी कंपनियों तक सीमित नहीं रहेगा। बल्कि फ्रांस, रूस या परमाणु उपकरण बेचने वाली किसी अन्य देश की कंपनियां अपने सौदों में भी इस फायदे की मांग करेंगी।

असली मुद्दा यह है कि मोदी सरकार उन विदेशी कंपनियों को इस तरह का लाभ देना क्यों चाहती है? भारत को बेशक बिजली की जरूरत है। उसके विभिन्न स्रोतों में परमाणु ऊर्जा भी एक विकल्प है। मगर स्रोत जो भी हो, उससे बिजली पाने के लिए अपने नागरिकों की हिफाजत की ऐसी अनदेखी क्यों होनी चाहिए?

अगर क्षतिपूर्ति की जबावदेही तय रहती है तो कंपनियां सुरक्षा इंतजामों को लेकर अधिक सतर्क रहती हैं। वैसे हादसा कभी भी और कहीं भी हो सकता है, लेकिन क्या वैसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति के लिए एहतियात नहीं बरती जानी चाहिए? क्षतिपूर्ति का सारा बोझ भारत और यहां के करतादाताओं पर डालने की कोशिश कर आखिर मोदी सरकार देश की कैसी सेवा कर रही है?

इस संदर्भ में यह उल्लेख अप्रासंगिक नहीं होगा कि पिछले वर्ष नरेंद्र मोदी जब अमेरिका गए थे तो उन्होंने न सिर्फ भारतीय, बल्कि दुनिया भर के गरीब मरीजों के लिए बड़ी चिंता पैदा कर दी। वे भारत की पेटेंट नीति के पुनर्मूल्यांकन के लिए कार्य-दल बनाने पर सहमत हो गए थे। जबकि भारतीय पेटेंट कानून विश्व व्यापार संगठन के बौद्धिक संपदा संरक्षण नियमों के तहत भी खरे उतरे हैं। इस बारे में नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री जोसेफ स्टिगलिट्ज ने हाल में लिखे एक लेख में कहा कि अगर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को अपने बहुचर्चित हेल्थकेयर प्रोग्राम की सफलता सुनिश्चित रखनी है, तो ओबामा प्रशासन को भारतीय दवा उद्योग पर नकेल कसने की कोशिशों से बाज आना चाहिए।

वैसे भारतीय दवा उद्योग और मरीजों के हितों की रक्षा का दायित्व ओबामा का नहीं, बल्कि भारत सरकार का है। मगर संकेत हैं कि वह अपना सर्वोपरि कर्तव्य बड़े देशी उद्योगपतियों और बहुराष्ट्रीय निवेशकों के हितों की सेवा करना मानती है। यही सिलसिला परमाणु दुर्घटना क्षतिपूर्ति कानून के संदर्भ में आगे बढ़ाया जा रहा है। अब यह दायित्व भारत की सिविल जमात और नागरिकों पर है कि वे आम जन के हितों की रक्षा करें। इसका आरंभ शब्दाडंबरों, समारोही भव्यता और माहौल के गुब्बारे की हवा निकालते हुए किया जा सकता है, जो वर्तमान सरकार की पहचान बने हुए हैं। समझने की बात यह है कि इन गुब्बारों की आड़ में देश के दीर्घकालिक हितों को खतरे में डाला जा रहा है।

 

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