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बाढ़ पर लगाम की जरूरत

निरंकार सिंह गुजरात, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश, ओड़ीशा सहित देश के कुछ हिस्से जहां भारी वर्षा और बाढ़ से तस्त्र हैं, वहीं कुछ राज्य पर्याप्त वर्षा न होने से परेशान हैं। बाढ़ आज किसानों के लिए बड़ी समस्या है। बिहार, बंगाल, उत्तर प्रदेश और पूर्वोत्तर के राज्यों में भी बाढ़ की समस्या हर साल पैदा […]

Author August 4, 2015 1:53 AM

निरंकार सिंह

गुजरात, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश, ओड़ीशा सहित देश के कुछ हिस्से जहां भारी वर्षा और बाढ़ से तस्त्र हैं, वहीं कुछ राज्य पर्याप्त वर्षा न होने से परेशान हैं। बाढ़ आज किसानों के लिए बड़ी समस्या है। बिहार, बंगाल, उत्तर प्रदेश और पूर्वोत्तर के राज्यों में भी बाढ़ की समस्या हर साल पैदा होती है, पर अब तक बाढ़ को नियंत्रित करने की कोई कारगर योजना नहीं बन पाई है।

इसलिए जब वर्षा कम होती है, तो सूखा पड़ जाता है और जब अधिक होती तो बाढ़ आ जाती है। गंगा और उसकी अन्य सहायक नदियां ऐसे क्षेत्रों में बहती हैं, जहां वर्षा मुख्यतया दक्षिण-पश्चिम मानसून में जून से सितंबर तक होती है। बाढ़ और नदी तट के कटाव का सबसे अधिक प्रभाव ओड़ीशा, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल पर पड़ता है। बिहार में बाढ़ का प्रकोप हर वर्ष होता है।

उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्र और हरियाणा के कुछ भागों में जल निकासी बाधित होने के कारण बाढ़ आ जाती है। महानदी में ज्वार-भाटा की लहरों और भागीरथी, दामोदर में तट के कटाव के कारण बड़े-बड़े क्षेत्र जलमग्न हो जाते हैं। सतलुज, व्यास, चेनाब और झेलम में जल की अत्यधिक मात्रा से मानसून के समय तलछट बह निकलता है। ये नदियां अक्सर अपना रास्ता बदल देती हैं, जो नए क्षेत्रों में बाढ़ और तबाही का कारण बनता है।

अब रेगिस्तानी प्रदेश राजस्थान और गुजरात में भी बाढ़ आने लगी है। यह नई विकास नीतियों और बड़े-बड़े बांधों का नतीजा है। इसका सबसे अधिक खमियाजा किसानों और ग्रामीणों को भुगतना पड़ता है। बाढ़ के प्राकृतिक कारण तो हमेशा से रहे हैं, लेकिन विकास की विसंगतियों से यह समस्या गहराई है। अब तक बाढ़ रोकने के जितने उपाय किए गए, उनसे यह समस्या और जटिल हो गई है। आधे-अधूरे संकल्पों और न्यस्त स्वार्थों के कारण हम बाढ़ों के विस्तार और उससे होने वाली क्षति को कम करने में विफल रहे हैं।

समस्यायुक्त नदियों के तटों को बांधने या बनाने का काम नहीं हो पा रहा है। शासन ने लगभग चार हजार किलोमीटर का तटबंध बनाया था। शुरू में उसका अच्छा परिणाम रहा, लेकिन बाद में बांग्लादेश से शरणार्थी भाग कर नदियों के क्षेत्र में आ गए। उन्होंने वहां के हरे-भरे क्षेत्रों से पेड़-पौधे काट कर साफ कर दिए। इसके चलते भारी वर्षा से मिट्टी के कटाव को रोकना मुश्किल हो गया। इससे नदियों के किनारे कटने-टूटने लगे और आसपास का क्षेत्र फिर बाढ़ की समस्या से जूझ रहा है। ब्रह्मपुत्र की बाढ़ से असम के कई जिलों में भीषण क्षति पहुंची है।

बांग्लादेश के बाद भारत दुनिया का सबसे ज्यादा बाढ़ प्रभावित देश है। यहां की लगभग चार करोड़ हेक्टेयर जमीन बाढ़ प्रभावित है। एक अध्ययन के अनुसार हर साल बाढ़ से औसतन साढ़े बारह सौ लोग मरते और पचहत्तर हजार से ज्यादा मकान गिरते हैं। ये आंकड़े जहां लगातार बिगड़ती स्थिति का संकेत देते हैं, वहीं प्रकृति से छेड़छाड़ के भयावह परिणामों से निपटने की दिशा में सही तैयारी का अभाव भी उजागर करते हैं।

दरअसल, बाढ़ और सूखे की समस्याएं एक-दूसरे से जुड़ी हैं। इसलिए इनका समाधान जल प्रबंधन की कारगर और बेहतर योजनाएं बना कर किया जा सकता है। राष्ट्रीय बाढ़ नियंत्रण कार्यक्रम के अंर्तगत डेढ़ सौ लाख हेक्टेयर क्षेत्र को एक सीमा तक बाढ़ से सुरक्षित बनाने की व्यवस्था की जा चुकी है। इसके लिए 12,905 किमी लंबे तटबंध 25,331 किमी लंबी नालियां और 4,694 गांवों को ऊंचा उठाने का कार्य किया गया है। इस पर 1,442 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। पिछले पचास वर्षों में कुल मिला कर बाढ़ पर सत्तर हजार करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं। पर हमारे देश में जिस बड़े पैमाने पर बाढ़ आती है, उस हिसाब से अभी बहुत काम बाकी है।

बाढ़ नियंत्रण के उपायों की अधिकतर जिम्मेदारी राज्यों पर है। केंद्र सरकार विभिन्न योजनाओं के जरिए राज्य को सहयोग करता है। भारत में बाढ़ की रोकथाम को लेकर सबसे अधिक कार्य वैज्ञानिक मेघनाद साहा ने किया। उन्होंने भारतीय नदियों की समस्या की व्याख्या की और बताया कि जर्मनी, अमेरिका और रूस में कैसे नदियों को नियंत्रित किया जाता है।

बाढ़ पर लगाम लगाने के लिए जल संसाधन मंत्रालय से संबद्ध केंद्रीय जल आयोग है। इसके उत्तरदायित्वों में बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और जल विद्युत विकास के उद्देश्यों के लिए संबद्ध राज्य सरकारों के सहयोग से देश भर में जल संसाधनों के नियंत्रण, संरक्षण और आयोग के लिए योजनाएं बनाना, समन्वय करना और उन्हें आगे बढ़ाना शामिल है।

आयोग आवश्यकता पड़ने पर ऐसी किसी भी योजना की जांच, निर्माण और क्रियान्वयन करता है। इसका प्रमुख कार्य राज्य सरकारों द्वारा प्रस्तावित सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण और बहुउद्देशीय परियोजनाओं का तकनीकी-आर्थिक मूल्यांकन करना है। इसके साथ ही एक सौ पचहत्तर बाढ़ पूर्व सूचना केंद्रों के नेटवर्क के जरिए भारत की सभी प्रमुख बाढ़ आशंका वाली अंतरराज्यीय नदी घाटियों के लिए बाढ़ पूर्व सूचना सेवाएं उपलब्ध कराना है। देश में बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है। गंगा घाटी का उत्तरी हिस्सा सर्वाधिक प्रभावित होता है। इसके लिए उत्तरी सहायक नदियां जिम्मेदार हैं। इस घाटी के सर्वाधिक प्रभावित राज्य उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल हैं।

गंगा के अलावा शारदा, राप्ती, गंडक और घाघरा की वजह से पूर्वी उत्तर प्रदेश में बाढ़ आती है। यमुना की वजह से हरियाणा, दिल्ली प्रभावित होता है। बढ़ी, बागमती, गंडक और कमला अन्य छोटी नदियों के साथ मिल कर हर साल बिहार में बाढ़ का खौफनाक मंजर पेश करती हैं। बंगाल की तबाही के लिए महानंदा, भागीरथी, दामोदर और अजय जैसी नदियां जिम्मेदार हैं। ब्रह्मपुत्र और बराक घाटियों में पानी की अधिक मात्रा होने से इन नदियों के आसपास के क्षेत्रों में बाढ़ आती है। ये अपनी सहायक नदियों के साथ पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों- असम और सिक्किम को प्रभावित करती हैं।

मध्य भारत और दक्षिण नदी बेसिन ओड़ीशा में महानदी, वैतरणी और ब्राह्मणी बाढ़ का संकट पैदा करती हैं। इन तीनों की वजह से बना डेल्टा क्षेत्र बेहद घनी आबादी का है। इस कारण अधिक तबाही होती है। दक्षिण और मध्य भारत में नर्मदा, गोदावरी, ताप्ती, कृष्णा और महानदी में भारी बारिश के कारण बाढ़ आती है। गोदावरी, महानदी और कृष्णा नदी के डेल्टा क्षेत्र में चक्रवाती तूफानों के कारण आंध्र प्रदेश, ओड़ीशा और तमिलनाडु में कभी-कभी बाढ़ आ जाती है।

बाढ़ संबंधी समस्याएं प्राय: बाढ़ के समय या उसके तत्काल बाद उग्र रूप में सामने आती हैं। जहां बाढ़ द्वारा जान-माल की क्षति प्रति वर्ष होती रहती है, वहां की समस्याओं का समाधान क्षेत्रीय आयोग और बाढ़ नियंत्रण बोर्डों की देखरेख में ही होना चाहिए। अक्सर यह कहा जाता है कि भूमि संरक्षण अगर उचित रूप से किया जाए, तो बाढ़ की मात्रा और प्रवेश में कमी हो सकती है। ऐसा कहना साधारण बाढ़ के बारे में उपयुक्त हो सकता है, पर जहां बड़ी बाढ़ आती है वहां छोटी-मोटी भूमि संरक्षण योजनाएं काम नहीं आतीं। इस दिशा में ऐसा नियम बनाना चाहिए, जिससे भूमि संरक्षण योजनाओं का सहयोग बाढ़ निवारण योजनाओं को मिल सके। बाढ़ संबंधी योजनाओं के सिलसिले में सिंचाई और पनबिजली योजनाएं भी आती हैं।

इसी कारण बाढ़ निवारण और नियंत्रण योजनाएं बहुधा बहुमुखी होती हैं और उनमें बड़ी मात्रा में धन व्यय होता है। इन योजनाओं में समय लगता है और जल्दबाजी करने से कभी-कभी लाभ के बजाय हानि हो जाती है। इसलिए बाढ़ नियंत्रण की योजनाएं गहन छानबीन के बाद शुरू की जानी चाहिए। इससे हमारे देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था जुड़ी हुई है, इसलिए बाढ़ नियंत्रण योजनाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

बाढ़ के खतरे वाले क्षेत्रों में पानी की निकासी की व्यवस्था का प्रबंध समय रहते करने में कितना भी खर्च हो, वह स्थानीय लोगों की सुरक्षा, जान-माल की क्षति रोकने के लिए बाढ़ में किए गए खर्चीले आपात प्रयासों से ज्यादा प्रभावी होगा। इसके अलावा छोटी-मोटी परियोजनाएं भी अधिक और मध्यम वर्षा वाले क्षेत्रों में शुरू की जानी चाहिए। इन क्षेत्रों में अगर हम प्राकृतिक ढलाव को ध्यान में रख कर नहरें बनाएं तो वह ज्यादा उपयोगी होगा और खर्च भी कम आएगा।

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