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इस बिगड़ते हालात में

लाल्टू इस लेखक जैसे कई लोगों ने पिछले साल संसद के चुनावों के पहले अलग-अलग माध्यमों से यह चिंता जाहिर की थी कि देश में सांप्रदायिक सोच बड़ी तेजी से फैल रहा है। हर समुदाय में सांप्रदायिकता बढ़ती दिख रही थी और सबसे अधिक चिंता की बात थी कि बहुसंख्यक समुदाय में बढ़ती सांप्रदायिकता का […]

Author July 23, 2015 1:53 PM

लाल्टू

इस लेखक जैसे कई लोगों ने पिछले साल संसद के चुनावों के पहले अलग-अलग माध्यमों से यह चिंता जाहिर की थी कि देश में सांप्रदायिक सोच बड़ी तेजी से फैल रहा है। हर समुदाय में सांप्रदायिकता बढ़ती दिख रही थी और सबसे अधिक चिंता की बात थी कि बहुसंख्यक समुदाय में बढ़ती सांप्रदायिकता का फायदा उठा कर स्थानीय और विदेशी सरमाएदार तैयार हो रहे थे कि खुली लूट का मौसम आने को है। इसके लिए उन्होंने विपुल परिमाण में धन देश की सबसे संगठित, संघ परिवार के छत्र तले फल-फूल रही राजनीतिक ताकतों पर निवेश किया, जिनकी दृष्टि और सोच उन्नीसवीं सदी के यूरोपीय कौमी राष्ट्रवाद की संकीर्णता में सीमित है। इन ताकतों ने बड़े पैमाने पर नफरत फैलाते हुए भाजपा के झंडे तले सत्ता हासिल की और उम्मीद से ज्यादा रफ्तार से अपने एजेंडे पर काम करना शुरू किया।

चुनावों के पहले भाजपा के हिंदुत्ववादी रुझान से हर कोई वाकिफ था, पर जैसे खुद को भरमाने के लिए कई लोग विकास का बहाना ढंूढ़ते रहे। कइयों ने यह कहना शुरू किया कि कांग्रेस की भ्रष्ट सरकार को गिराने के लिए और कोेई विकल्प नहीं है। बड़े सुनियोजित ढंग से मीडिया में यह बात बार-बार कही गई कि वाम खत्म हो चुका है, हालांकि हर तरह के बिखराव के बावजूद देश भर में बराबरी के आधार पर समाज रचने की जद्दोजहद वामपंथी ताकतों के ही नेतृत्व में चलती रही है। जमीनी स्तर पर अधिकारों के लिए लड़ाई कहीं साम्यवादी तो कहीं समाजवादी नेतृत्व में ही लड़ी जा रही है।

आज स्थिति यह है कि लोकतांत्रिक ढांचे को रौंदते हुए हर तरह के ऐसे पोंगापंथी लोग हावी होते जा रहे हैं, जिनको दस-पंद्रह साल पहले कोई सुनने को तैयार नहीं था। कहीं किसी का कत्ल हो रहा है, जैसे पानसरे की हत्या हुई, कहीं स्त्रियों पर सोशल मीडिया में संघ के समर्थक अश्लील भाषा में हमला करते हैं; उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी पर जिस असभ्य तरीके से हमला हुआ- स्वाभाविक हालात में अव्वल तो ऐसी बातें खबरें बनती ही नहीं, इनको प्रलाप मान लिया जाता है। अगर बात फैलती भी है तो लोग पूछते हैं कि यह कैसे हो सकता है, इन्हें पुलिस क्यों नहीं पकड़ती?

पर ऐसा हर रोज हो रहा है कि कोई संघी ऐसी ऊल-जलूल हरकत करता है और उस पर राष्ट्रीय स्तर पर बातचीत होती है जैसे कि देश और समाज के पास इन सिरफिरों पर ध्यान देने के अलावा कुछ और जरूरी विषय नहीं है। एक ओर संघ और गुजरात से जुड़े नागरिकों पर हिंसा करने वाले अभियुक्तों की सजा माफी हो रही है तो दूसरी ओर तीस्ता सीतलवाड़ को ऐसे परेशान किया जा रहा है जैसे पहले कभी आजाद भारत के इतिहास में नहीं हुआ।

अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से जुड़े मानवाधिकार और पर्यावरण की सुरक्षा से जुड़े कार्यकर्ताओं को परेशान किया जा रहा है। जरा-सा भी सरकार या संघ परिवार की ज्यादतियों के खिलाफ कोई कुछ कह रहा है तो उसे परेशान किया जा रहा है। धौंस जमाने और हिंसा की संस्कृति को बढ़ाया जा रहा है। राष्ट्रीय संस्थानों में सारी की सारी निदेशक मंडली को हटा कर अयोग्य और संकीर्ण सोच के लोगों को लाया जा रहा है, जैसे पूना के फिल्म इंस्टीट्यूट, भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद, एनसीइआरटी और कई विश्वविद्यालयों में हो रहा है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश के सबसे प्रतिष्ठित फिल्म प्रशिक्षण संस्थान में सलाहकार मंडली में ऐसे लोगों को डालना, जिन्होंने फिल्म को कला की तरह जाना ही नहीं है, किसी ने अश्लील फिल्मों में काम किया है तो कोई प्रोपेगैंडा फिल्में बनाता रहा है, यह किस दर्जे का घटियापन है! संघ के लोग जब जो मर्जी कह रहे हैं- सारे आइआइटी संस्थान हिंदू-विरोधी घोषित किए गए हैं, आइआइएम संस्थानों के प्रबंधन में वाम समर्थकों का प्रभाव है- सुन कर एकबारगी लगता है कि ऐसी हास्यास्पद बात खबर बनती कैसे है! जिन बातों पर पचास साल पहले लोग हंसते थे- गणेश और सर्जरी, वैमानिकी शास्त्र, ऐसी तमाम कपोल कल्पनाएं इक्कीसवीं सदी के भारत की मुख्य खबरें होती हैं। राष्ट्र के नेता ऐसे हों जो सीना चौड़ा कर अपने अज्ञान और अंधविश्वासों को बखानते हों तो देश का क्या होगा?

प्रधानमंत्री कभी साक्षात्कारों में कह चुके हैं कि उन्होंने कॉलेज का दरवाजा खटखटाया नहीं है। सारी शिक्षा दूर संचार से पाई है। इस घमंड का ही नतीजा है कि पूना फिल्म संस्थान में छात्रों की हड़ताल खिंचती चली जा रही है। ऐसा लगता है कि अधकचरी पढ़ाई किए कुछ लोग पढ़े-लिखे लोगों से खार खाए बैठे हैं और अपनी ताकत दिखाने लगे हैं। हर दिन कोई ऐसी ऊटपटांग बात सामने आती है, जिसे समझ पाना मुश्किल है। आज इन बातों को गंभीरता से लेने की वजह सिर्फ यह नहीं है कि बड़ी तेजी से भगवाकरण हो रहा है, बल्कि गंभीर समस्या यह है कि इतना कुछ होने के बावजूद देश का पढ़ा-लिखा मध्यवर्ग शांत है, संभवत: मध्यवर्ग का बड़ा हिस्सा पूरी तरह सांप्रदायिक सोच में दबा है।

एक अजीब-सी बीमारी चारों ओर फैली दिखती है, जिसमें पता नहीं किन हीन भावनाओं की अभिव्यक्ति आक्रामक पोंगापंथी प्रवृत्तियों के रूप में आ रही है। क्या यह दुनिया के स्तर पर कुछ बातों में पिछड़े होने की वजह से है या कि यह नवउदारवादी बहुराष्ट्रीय षड्यंत्र है, जिसमें देशी पूंजीपति खुल कर साझेदारी कर रहे हैं। ऐसे कई सवाल हमारे सामने हैं। लब्बोलुआब यह कि ऐसी ताकतों से हमारा पाला पड़ा है, जो देश को तबाह करने पर आमादा हैं और इन्हें रोकने के लिए वाम के अलावा और कोई विकल्प नहीं दिख रहा है।

सबको मालूम है कि मौजूदा सरकार एक सामूहिक उन्माद के कंधे पर चढ़ कर नवउदारवादी आर्थिक शोषण के लिए काम कर रही है। आम लोगों के हित के लिए यह सरकार कुछ नहीं करेगी, उल्टा हर क्षेत्र में आम लोगों का अहित हो रहा है। स्वास्थ्य बजट में कटौती की गई है। सरकारी स्कूल बड़ी तादाद में बंद किए जा रहे हैं। उच्च शिक्षा को भी गेट्स के समझौतों के अंतर्गत विदेशी संस्थानों के लिए खोल दिया जा रहा है। और जिस तरह सुनियोजित ढंग से सरकारी स्कूलों को तबाह किया गया है, उसी तरह विश्वविद्यालयों को तबाह किया जाएगा। बिना सोचे-समझे, बहस विमर्श को धता बताते हुए नई शिक्षा नीतियां लागू की जा रही हैं। पिछली सरकार ने ग्रामीण गरीबों के लिए मनरेगा कार्यक्रम चलाया था, उसमें बड़ी कटौती कर दी गई है।

बिहार में विधानसभा चुनावों के पहले क्या कुछ होने वाला है, उसकी आशंका चारों ओर है- कितने दंगे करवाए जाएंगे, क्या पाकिस्तान के साथ कोई जंग शुरू हो जाएगी, कुछ भी हो सकता है! लोगों को किसी तरह बुनियादी हकों की लड़ाई से हटा कर फिरकापरस्त और जातिवादी सोच में जकड़ने की पूरी कोशिश की जाएगी

इस सरकार के लिए कुछ भी संभव है! संघ परिवार को तो बिहार में जी-जान से लड़ाई लड़नी है। आखिर राज्यसभा में बहुमत के लिए अभी एक-दो राज्य हाथ में आने जरूरी हैं। लोकसभा और राज्यसभा दोनों में बहुमत मिलने पर संविधान बदलने की प्रक्रिया शुरू होगी। भारत के संविधान में बराबरी और न्याय के जो दूरगामी प्रावधान हैं, ये लोग उनको हटा कर कठमुल्लापंथी और मनुवादी व्यवस्था लाने के लिए पूरी ताकत से जुट गए हैं। हो सकता है कि मध्यवर्ग में ऐसा उदासीन तबका है, जिसे इस बात की समझ हो तो वह जाग उठे।

आज देश के हर नागरिक को यह खतरा समझाने की जिम्मेदारी लोकतांत्रिक ताकतों की है। यह हंसी-मजाक का मामला नहीं रह गया है। जहां तक आम लोगों की बात है, वे गरीब हैं, पर नासमझ नहीं। यह झूठ कि भ्रष्ट और सांप्रदायिक ताकतों का विकल्प नहीं है, इसके खिलाफ उन्हें लामबंद करना होगा। अगर कहीं तरक्कीपसंद ताकतें कमजोर भी हों तो लोगों को संगठित होकर अपने में से किसी भले आदमी को चुनना चाहिए, न कि लुटेरों और हत्यारों को।

इसलिए यह बात महत्त्वपूर्ण हो गई है कि बिक चुके मीडिया और देशी-विदेशी पूंजी की भयावह ताकतों के आगे लोकतांत्रिक ताकतें किस तरह खड़ी होती हैं। आम लोग देख रहे हैं कि क्या वाम ताकतें इतिहास को सामने न रख कर वर्तमान की लड़ाई लड़ेंगी? अतीत को भूलना नहीं चाहिए, सही-गलत ऐतिहासिक घटनाओं पर बहस और विमर्श होता रहना चाहिए, पर पचास साल पहले के विवादों में उलझे रह कर वाम ताकतें अपनी ऐतिहासिक भूमिका को बार-बार नकारती रही हैं। देश भर में जहां भी संगठित विरोध होता है, वहां जनता वाम के नेतृत्व में भरोसा करती है, पर चुनावों में सांगठनिक मतभेदों से ऊपर उठ कर जनता की आशाओं को सफल बनाने में वाम ताकतें विफल रह जाती हैं।

विडंबना है कि बड़े वामपंथी दल भ्रष्ट राजनीतिक ताकतों के साथ तो समझौता करते रहे हैं, पर कम ताकत वाले वाम संगठनों के प्रति नकारात्मक रवैया अख्तियार किए रखते हैं। ऐसी स्थिति में बिहार में वाम दलों के गठबंधन ने लोकतांत्रिक ताकतों में आशा जगाई है कि बेहतर भविष्य का सपना सार्थक हो सकता है। इस गठबंधन को और व्यापक और लोकतांत्रिक होना होगा। थोड़े ही समय में देश भर में, खासकर उत्तर भारत के राजनीतिक परिदृश्य में अंधकार युग आ चुका है। अंधेरे की इस परत को चीर कर रोशनी लाने के लिए हर सचेत नागरिक को सक्रिय होना होगा।

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