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क्या हम धर्म के बिना नहीं रह सकते

राजकिशोर कुछ चीजों को अपना काम करके हट जाना चाहिए। प्रकृति भी यही चाहती है। इसीलिए सुमित्रानंदन पंत ने आह्वान किया था: द्रुत झरो जगत के शीर्ण पत्र। हर चीज की एक उम्र होती है। उससे अधिक जीना अपने हाथों अपनी बेइज्जती कराना है। जो अपनी उम्र जी चुके हैं, फिर भी बने रहने का […]
Author January 7, 2015 11:55 am

राजकिशोर

कुछ चीजों को अपना काम करके हट जाना चाहिए। प्रकृति भी यही चाहती है। इसीलिए सुमित्रानंदन पंत ने आह्वान किया था: द्रुत झरो जगत के शीर्ण पत्र। हर चीज की एक उम्र होती है। उससे अधिक जीना अपने हाथों अपनी बेइज्जती कराना है। जो अपनी उम्र जी चुके हैं, फिर भी बने रहने का हठ करते हैं, प्रकृति उन्हें झाड़ू से बुहार देती है।

यही बात सिद्धांतों के बारे में भी कही जा सकती है। कोई सिद्धांत या विचारधारा जन्म ही तब लेती है जब वातावरण उसके अनुकूल होता है। परिस्थिति बदलने पर जो विचारधारा नई चुनौतियों का सामना करती है, अपने को संशोधित कर लेती है, वह बचती है। बाकी सब इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दी जाती हैं। यह कूड़ेदान उतना ही लंबा और बड़ा है जितना कि स्वयं इतिहास। कहने की जरूरत नहीं कि परिस्थिति और विचार में एक द्वंद्वात्मक संबंध होता है। दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। प्रभावित करने में मेल और संघर्ष, दोनों शामिल हैं। अनुकूल परिस्थिति न आने के कारण बहुत-से विचार असमय ही मर जाते हैं, जबकि अनुकूल परिस्थिति होने पर साधारण-सी विचारधारा भी शेर की तरह दहाड़ने लगती है। टॉमस पेन का यह वाक्य मशहूर है कि जिस विचार का समय आ गया है, उसे कोई भी शक्ति रोक नहीं सकती। क्या इस तर्ज पर यह भी कहा जा सकता है कि जिस विचारधारा का समय बीत चुका है, उसे कोई भी शक्ति बचा नहीं सकती?

धर्म भले विश्वास पर टिका हो, लेकिन यह भी एक विचारधारा है। इस विचारधारा में तमाम तरह की ऊंटपटांग चीजों के लिए गुंजाइश रहती है। पेड़ की पूजा करो या पत्थर की, यह तुम्हारा निजी मामला है। लेकिन जब एक पूरा समुदाय श्रद्धा और भक्ति के साथ ऐसा करने लगता है, तब वह धर्म बन जाता और अपने समाज पर चोट करने लगता है। सभी विचारधाराओं में धर्म सबसे ज्यादा पुराना है और आदमी पर उसकी पकड़ भी सबसे जबरदस्त है। जब आदमी ने चंद्रमा पर पैर रखा, तो वह विज्ञान की एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। लेकिन कई धर्मों के लोगों ने इसे मानने से इनकार कर दिया, क्योंकि आदमी चंद्रमा पर पैर रख सकता है, यह उनके शास्त्र के अनुसार असंभव है। कइयों ने तो यहां तक कह डाला कि यूरी गागरिन के पैर किसी और जगह पड़े होंगे, जिसे वैज्ञानिक भ्रमवश चंद्रमा बता रहे हैं।

जब धर्म था, तब विज्ञान नहीं था। जब विज्ञान आया तो धर्म को चले जाना चाहिए था। जैसे रात और दिन एक साथ नहीं रह सकते, वैसे ही धर्म और विज्ञान, जो ज्ञान का ही एक प्रकार है, परस्पर विरोधी चीजें हैं। धर्म आंख मूंद कर मान लेता है कि स्वर्ग और नरक का भौगोलिक अस्तित्व है। विज्ञान को इस पर संदेह होता है और वह उनकी खोज में निकल पड़ता है। सैकड़ों वर्षों के प्रयास के बाद भी उसे न तो कहीं स्वर्ग नजर आता है न नरक। तब वह स्वर्ग और नरक दोनों को काल्पनिक घोषित कर देता है। इससे धार्मिक लोग नाराज होते हैं, पर वे क्रुद्ध होने के सिवाय कुछ और नहीं कर सकते, क्योंकि उनके पास अपनी बात के समर्थन में कोई तथ्य नहीं है। इसलिए उनकी इस मान्यता पर समझदार लोग शक करने लगते हैं कि अच्छे लोग स्वर्ग जाते हैं और बुरे लोगों को नरक भोगना पड़ता है। लेकिन इससे धर्म का बहुत ज्यादा नुकसान नहीं होता। उसकी एक बात चली गई तो क्या, दूसरी बातें चलती रहती हैं। अब भी माना जाता है कि वाराणसी शंकर के त्रिशूल पर टिका हुआ है।

धर्म ने दुनिया का बहुत नुकसान किया है, इसमें कोई शक नहीं। धर्म का सबसे बड़ा अत्याचार सोचने की प्रक्रिया को तर्कपूर्ण और सत्यनिष्ठ होने से रोकना है। मैं देख रहा हूं कि यह निर्जीव पत्थर की मूर्ति है, फिर भी धर्म हमसे यह मान लेने की उम्मीद करता है कि इस मूर्ति में कोई देवता निवास करता है। भारत दयानंद सरस्वती का ऋणी है, जिन्होंने मूर्तिपूजा के खिलाफ एक प्रभावशाली आंदोलन चलाया था। लेकिन उन्होंने आर्य समाज के रूप में एक नए धर्म की स्थापना कर दी, जो आज के भारतीय मनुष्य को सिखाता है कि वह आर्य है और उसे वैदिक संस्कृति का पालन करना चाहिए। ऐसा लगता है कि धर्म की दुनिया में एक अंधविश्वास ही दूसरे अंधविश्वास को नष्ट कर सकता है।

चूंकि धर्म हमें स्वयं, अपनी बुद्धि से सोचने पर प्रतिबंध लगा देता है, इसलिए वह हमेशा तरह-तरह के अंधविश्वासों से पीड़ित रहेगा। आज भी बहुत-से इलाकों में कई रोगों को ईश्वर का प्रकोप माना जाता है और उनसे निजात पाने के लिए किसी देवी या देवता की पूजा की जाती है। जब तक हम चेचक को मां शीतला का वरदान मानते रहे, चेचक की दवा नहीं खोज सके। आज भारत चेचक-मुक्त देश है, क्योंकि विज्ञान ने उसके टीके का आविष्कार कर लिया है। जो देवता पहले चेचक पैदा करते थे, अब पता नहीं क्या कर रहे हैं।

धर्म अतीतमुखी होता है। लगभग सभी धर्म मानते हैं कि दुनिया का सर्वश्रेष्ठ समय किसी सुदूर समय में था। उसके बाद मानवता का पतन होता गया। वैज्ञानिक चिंतन कहता है कि हमारा सर्वश्रेष्ठ समय भविष्य में होगा जब हम सभी तरह के भेदभाव से मुक्त हो जाएंगे और इतनी संपत्ति पैदा कर सकेंगे, जिससे दुनिया के सभी लोग शालीन ढंग से जीवन बिता सकें। इसलिए विज्ञान प्रगति में सहायक होता है, जबकि धर्म प्रगति को रोकना चाहता है। पिछले तीन सौ साल से धर्म एक हारती हुई लड़ाई लड़ रहा है, लेकिन मामला इतना बुनियादी है, जीवन से उसका संबंध इतना नजदीकी है कि आज भी दुनिया भर में धार्मिक लोगों की संख्या धर्म-मुक्त लोगों से ज्यादा है। विज्ञान बहस में जीत जाता है, पर व्यवहार में हार जाता है।

जब मैं युवक था, मैंने एक युवा साधु से पूछा था कि क्या वजह है कि एक बच्चा गरीब परिवार में पैदा होता है और दूसरा अमीर परिवार में। साधु का उत्तर था- यह पूर्व जन्म के कर्मों की वजह से है। इसके बाद मेरा यह पूछना लाजिमी था कि सारे गरीब लोग दक्षिण एशिया में पैदा होते हैं और संपन्न लोग यूरोप और अमेरिका में, इसका कारण क्या है? युवा साधु के पास कोई जवाब नहीं था, उसने सिर्फ यह कहा कि मैं इस पर सोचूंगा। फिर मैंने पूछा कि ऐसा क्यों है कि कोई आत्मा पुरुष के रूप में जन्म लेती है और कोई स्त्री के रूप में। उसने कहा कि जो आत्माएं अच्छा कर्म करती हैं, उनका जन्म पुरुष के रूप में होता है, दूसरी आत्माएं स्त्री के रूप में जन्म लेती हैं। सवाल: आपके यहां माना जाता है कि स्त्री को मोक्ष नहीं मिलता है। तब क्या स्त्रियां सदा के लिए मोक्ष से वंचित रह जाएंगी? उत्तर: नहीं, अच्छे कर्म करने पर वे अगले जन्म में पुरुष के रूप में पैदा होंगी। तब वे मोक्ष के लिए साधना कर सकती हैं।

यह विकृत चिंतन किसी एक धर्म में नहीं है। सभी धर्मों में स्त्री को पुरुष से हीन माना जाता है। कहना पड़ेगा कि धर्म पितृसत्ता की ही एक अभिव्यक्ति है। अगर स्त्रियों ने कोई धर्म चलाया होता, तो वे प्रतिपादित करतीं कि पुरुष हीनतर प्राणी है और उसे कभी मोक्ष नहीं मिलेगा। यानी जब तक धर्म है, स्त्री-पुरुष समानता हो ही नहीं सकती। सच तो यह है कि धर्म का जन्म सिर्फ अज्ञान से नहीं हुआ है, बल्कि विभिन्न प्रकार की विषमताओं को बनाए रखने के लिए भी हुआ है।

ईसा मसीह ने कहा कि ऊंट भी सुई की नोक में से निकल सकता है, पर धन-संपत्ति वाला कभी ईश्वर के पास नहीं जा सकता। लेकिन ईसाई संघों ने कभी किसी राजा को सलाह नहीं दी कि सारा राजपाट त्याग दो और सादगी के साथ जियो, नहीं तो नरक में जाओगे। इस्लाम में हजरत मुहम्मद ने बहुत-सी अच्छी बातें कही हैं, पर कम लोग ही उनका पालन करते हैं। हिंदू धर्म में कहा गया है कि पर द्रव्य को तृणवत और पर दारा को मातृवत समझो। काश, कोई इसे व्यवहार में सिद्ध करके दिखाता। स्वयं ऋषि-मुनि और देवता भी इसका पालन नहीं कर पाए।

इसका मतलब यह नहीं है कि आदमी उस ऊंचाई तक नहीं पहुंच सकता, जिसकी कल्पना धर्म में की गई है। लेकिन पूर्वग्रहों से मुक्त आदमी के लिए इसका रास्ता धर्म से नहीं, विचार और आचरण से होकर जाता है। धर्म भले मानता हो कि जो लोग धर्म में विश्वास नहीं करते, वे अनैतिक होते हैं, लेकिन धर्म-मुक्तों को यह स्वीकार करने में संकोच नहीं होता कि धर्म और आस्था के रास्ते पर चलते हुए गुरु नानक, रामकृष्ण परमहंस और मदर टेरेसा जैसे बड़े व्यक्तित्व भी पैदा हो सकते हैं।

अगर हम विश्व के महान लोगों की सूची बनाएं तो उसमें धार्मिक लोग कम आएंगे। क्योंकि धर्म का लक्ष्य व्यक्तिगत मुक्ति हासिल करना है, जबकि सच यह है कि सबकी मुक्ति में ही व्यक्ति की मुक्ति है। जैसे स्त्रियों को मुक्त किए बिना पुरुष मुक्त नहीं हो सकते, वैसे ही दलितों को मुक्त किए बिना सवर्ण हिंदू की मुक्ति भी संभव नहीं है। इसी आधार पर मार्क्स ने कहा था कि सर्वहारा वर्ग समाजवादी क्रांति के द्वारा न केवल अपने को मुक्त करेगा, बल्कि पूंजीपति वर्ग को भी मुक्त कराएगा।

एक जमाने के लेखक और दार्शनिक कहा करते थे कि ईश्वर नहीं है, तो हमें उसका निर्माण करना होगा। आज की सूक्ति यह है कि ईश्वर मरने में समय ले रहा है, तो हमें ढेले मार-मार कर उसकी सहायता करनी चाहिए। दरअसल, आदमी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि क्या वह धर्म के बिना जी सकता है? क्या ईश्वर की छाया जरूरी है?

मेरा पक्ष यह है कि धर्म दुनिया भर में शोषण और अन्याय को दूर करने में विफल रहा है। वह व्यक्तिगत नैतिकता को फैलाने में भी विफल रहा है। वह अज्ञान में जीता है और लोगों को ज्ञान से दूर रखता है। यह जरूर है कि जिन सेक्युलर लोगों और संगठनों ने ज्ञान-विज्ञान के आधार पर मनुष्य को अच्छा बनाना चाहा, वे भी विफल रहे। लेकिन धर्म में इसकी संभावना ही नहीं है, जबकि सेक्युलर विचारधारा में इसकी पूरी संभावना है। सब कुछ इस पर निर्भर है कि प्रयास कितना सघन है। धर्म की रक्षा में जितने संसाधनों का इस्तेमाल हो रहा है, उसका आधा क्या, एक-चौथाई भी तार्किक और नैतिक को स्थापित करने के लिए काफी होगा।

 

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