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कानून किसका हथियार है

 विनोद कुमार ‘स्मार्ट रेगुलेशन’ जैसे शब्दों का प्रचलन अंगरेजी पत्रकारिता में हो सकता है पहले से रहा हो, लेकिन हमारा उससे पहला परिचय उस दिन हुआ, जब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने राष्ट्रपति भवन में एक भोज के बाद या उसके आगे-पीछे एक प्रेस वक्तव्य में कहा- ‘‘मोदी और हम ‘स्मार्ट रेगुलेशन’ के पक्षधर हैं।’’ […]
Author March 10, 2015 16:41 pm

 विनोद कुमार

‘स्मार्ट रेगुलेशन’ जैसे शब्दों का प्रचलन अंगरेजी पत्रकारिता में हो सकता है पहले से रहा हो, लेकिन हमारा उससे पहला परिचय उस दिन हुआ, जब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने राष्ट्रपति भवन में एक भोज के बाद या उसके आगे-पीछे एक प्रेस वक्तव्य में कहा- ‘‘मोदी और हम ‘स्मार्ट रेगुलेशन’ के पक्षधर हैं।’’

क्या है यह ‘स्मार्ट रेगुलेशन’? हमने स्मार्ट किचन के बारे में सुना है, बराक ओबामा के दौरे के दौरान मोदी के पहने बहुचर्चित डिजाइनर कोट के बारे में भी सुना है, स्मार्ट सिटी के बारे में भी, लेकिन ‘स्मार्ट रेगुलेशन’ का मतलब क्या हुआ? अगर इसका मतलब कानून को भारी-भरकम शब्दावली से निकाल कर सहज और सरल बनाना है या फिर उन्हें बंधों-उपबंधों की उन जटिलताओं से मुक्त करना है, जिनकी वजह से कभी-कभी उसकी मनमाफिक व्याख्या होने लगती है, तब तो उसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन अगर इसे कांट-छांट कर शोभा की वस्तु बना देना है, तो यह देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण होगा। व्यावहारिक रूप में इसका जो आशय निकाला जा रहा है, या उस पर जिस तरह से अमल हो रहा है, वह बेहद खतरनाक है।

खतरा इस बात का है कि कानून देश की स्वायत्तता, संप्रभुता और परिसंपत्ति की सुरक्षा करने के बजाय उसके अपहरण का औजार न बन जाए। उद्यमियों के लिए इसका अर्थ इतना ही है कि पर्यावरण संबंधी कानूनों को इस तरह कांटा-छांटा जाए कि उनकी योजनाएं बिना किसी अवरोध के स्वीकृत हो जाएं, श्रम कानूनों को इस कदर बदला जाए कि वे जिस कीमत पर चाहें, कामगारों से काम ले सकें और जब चाहें उन्हें नौकरी से निकाल बाहर कर सकें। अभी तक स्थायी प्रकृति के काम में स्थायी कर्मचारियों की बहाली का प्रावधान है, लेकिन उद्योगपतियों को यह पसंद नहीं। वे यह भी चाहते हैं कि औद्योगिक विवाद कानून को कचरे में फेंक दिया जाए।

विडंबना यह कि हमारे देश के बहुत सारे प्रगतिशील अर्थशास्त्री भी इन श्रम कानूनों की प्रासंगिकता को नकार चुके हैं। नवगठित नीति आयोग के प्रमुख ही मानते हैं कि हमारे यहां ‘हाइली रिजिड लेबर लॉ’ (बहुत कठोर श्रम कानून) है। फिर उद्यमियों और बराक ओबामा को क्या दोष दिया जाए?

पर्यावरण संबंधी कानूनों के क्षेत्र में इस ‘स्मार्ट रेगुलेशन’ का क्या निहितार्थ हो सकता है यह मोदी सरकार द्वारा पर्यावरण संबंधी कानूनों के पुनरीक्षण के लिए गठित समिति की रिपोर्ट में देख सकते हैं। मसला यह था कि नामी-गिरामी उद्यमियों के कई प्रस्तावों को यूपीए सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल रखा था।

इनमें से कई मोदी के प्रिय पात्रों में से हैं। पहले तो आलोचना-प्रत्यालोचना का दौर शुरू हुआ जिस क्रम में मोदी ने संसदीय चुनाव प्रचार के दौरान तत्कालीन पर्यावरणमंत्री जयंती नटराजन पर आक्रमण करते हुए ‘जयंती टैक्स’ का हवाला दिया और सत्ता में आने के बाद पर्यावरण संबंधी कानूनों के पुनरीक्षण के लिए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन कर दिया। यानी मामला यह था कि वर्तमान कानून के दायरे में ही प्रस्तावित योजनाओं की स्वीकृति में विलंब के कारणों की जांच समिति करे, लेकिन समिति ने विलंब के वस्तुगत कारणों की पड़ताल के बजाय इस बात की ही पड़ताल शुरू कर दी कि हमारा पर्यावरण संबंधी कानून तो योजनाओं की स्वीकृति में बाधक नहीं?

देश के वर्तमान नेतृत्व के सामने यह पहले से ही स्पष्ट है कि हमारा पर्यावरण संबधी कानून, श्रम कानूनों की तरह ‘रिजिड’ है, सख्त है और उनके रहते अदानी, वेदांता और अन्य उद्यमियों की योजनाओं को स्वीकृति नहीं मिल सकती।
अपने आकाओं के इशारे को समझते हुए उच्चस्तरीय समिति ने बिना राज्य सरकारों और इस क्षेत्र के विशेषज्ञों से परामर्श किए आनन-फानन पर्यावरण संबंधी कानूनों की न सिर्फ समीक्षा शुरू कर दी, बल्कि दो-ढाई महीने के अल्प समय में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी। उस रिपोर्ट में ‘स्मार्ट रेगुलेशन’ का जलवा हर जगह अपना रंग दिखा रहा है।

कोई भी प्रबुद्ध व्यक्ति समझ सकता है कि पर्यावरण कितना अहम मसला बनता जा रहा है। हम भूमिगत जल-स्तर के नीचे भागते जाने से परेशान हैं। नवगठित राज्य तेलंगाना की ग्रामीण जनता बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रही है तो वजह है हैदराबाद शहर में खड़ा होता कंकरीट का जंगल और पसरते शहर के लिए भूमिगत जल का भीषण दोहन। इलाके बंजर बनते जा रहे हैं। और उसकी एक प्रमुख वजह वनों का निरंतर विनाश है।

पर्यावरणविद स्वस्थ पर्यावरण के लिए एक तिहाई भूभाग पर वनों का होना जरूरी मानते हैं, जबकि अब देश में वनक्षेत्र सत्रह-अठारह फीसद के आसपास रह गए हैं। हमारा पर्यावरण संबंधी कानून कहता है कि आप वनक्षेत्र में गैर-वानिकी कार्य नहीं कर सकते। ‘नो गो’ के रूप में उन वनक्षेत्रों को चिह्नित किया गया है, जहां उद्योग-धंधे या उत्खनन कार्य नहीं हो सकते।

इस वर्गीकरण को अस्वीकार करते हुए समिति ने एक नई परिभाषा यह दी है कि जहां सत्तर फीसद सघन वन (सत्तर फीसद कैनोपी) हों, वे ही उद्योगों के लिए या गैर-वानिकी कार्य के लिए प्रतिबंधित होने चाहिए। मसलन, झारखंड का सारंडा वनक्षेत्र पहले उद्योगों के लिए प्रतिबंधित था। लेकिन अब किसी भी कारण से उसकी सघनता कम हो गई और वहां सघन वन नहीं बचे, तो वहां उद्योगों के लिए भूमि आबंटित की जा सकती है। जबकि जरूरत इस बात की है कि प्राकृतिक वनक्षेत्रों को, अगर उनकी सघनता हाल के वर्षों में किन्हीं कारणों से घटी हो तो, फिर से विकसित करने का प्रयास होना चाहिए, न कि इस बात को बहाना बना कर उन्हें उजाड़ने की और तैयारी?

समिति की यह भी सिफारिश है कि महत्त्वपूर्ण योजनाओं के लिए ग्रामसभाओं की रजामंदी जरूरी नहीं। हमें उद्यमियों की बुद्धिमत्ता और नेकनीयती पर भरोसा करना चाहिए। उद्योगों से कितनी क्षति होगी, कितना लाभ होगा, जनजीवन पर कितना अच्छा या बुरा प्रभाव पड़ेगा, इसके लिए हमें उन आंकड़ों, घोषणाओं, रिपोर्टों आदि पर विश्वास करना चाहिए जो वे अपने प्रस्ताव के साथ प्रस्तुत करते हैं। उनके दावे, उनके द्वारा प्रस्तुत आंकड़े आदि अगर भविष्य में गलत प्रमाणित हों तो उन्हें सजा का प्रावधान होना चाहिए, लेकिन प्रथमदृष्टया तो हमें उन पर भरोसा करना चाहिए।

‘स्मार्ट रेगुलेशन’ के नाम पर कानून की जगह ‘भरोसे’ का यह तत्त्व किस साजिश की हद तक फैल रहा है, इसकी नजीर पिछले दिनों आंध्र विधानसभा में ‘लैंड पूलिंग’ के प्रस्ताव को पारित करवा कर मोदी के पगचिह्नों पर चलने वाले नायडू ने पेश की। बल्कि उन्होंने तो मोदी से ज्यादा बड़ा सब्जबाग किसानों को दिखाया है। सभी को पता है कि विजयवाड़ा और गुंटूर के बीच आंध्र प्रदेश की नई राजधानी बनाने की योजना है। इसके लिए कुल पचास हजार एकड़ जमीन की जरूरत है। सरकार ने नई राजधानी बनाने के लिए सिंगापुर की रियल स्टेट कंपनियों से अनुंबध किया है। अब सरकार उस इलाके के किसानों को यह समझा रही है कि वे अपनी बहुफसली जमीन इस काम के लिए दें। तत्काल उन्हें जमीन की कोई कीमत नहीं मिलेगी, लेकिन जब शहर विकसित हो जाएगा तो उन्हें अपनी जमीन के बदले एक शानदार भूखंड ‘स्मार्ट न्यू सिटी’ में बिल्डर देगा, जो करोड़ों का होगा।

खेती से बेजार हो चुके लोग जमीन देने के लिए वैसे ही तैयार हो रहे हैं, जो नहीं देना चाहते हैं उन्हें यह धमकी भी कि सरकार जमीन जबरन छीन लेगी या उसे ग्रीन जोन में डाल देगी। यह समझ से परे है कि दो बड़े शहरों के बीच राजधानी के लिए इतने विशाल भूखंड की जरूरत क्यों है आंध्र सरकार को। चंडीगढ़ जैसे शहर के लिए कुल पंद्रह हजार एकड़ जमीन की जरूरत पड़ी थी, जबकि इन्हें चाहिए पचास हजार एकड़ जमीन! कृष्णा नदी के करीब की इस विशाल उपजाऊ और बहुफसली जमीन को खोकर लोग कहां जाएंगे, क्या करेंगे? किसी को इस बात की चिंता नहीं। वे देश को अमेरिका और सिंगापुर बनाने में जुटे हैं!

मोदी सरकार ‘स्मार्ट रेगुलेशन’ के नाम पर जो भी अपने देशवासियों के साथ कर रही है वह आणविक समझौते वाले मामले में खुल कर सामने आ गया है। वैसे, इस मामले में बदनीयती तो यूपीए सरकार के समय से ही चली आ रही है। 2008 में आणविक समझौता करते वक्त मनमोहन सिंह की सरकार इस बात के लिए रजामंद हो गई थी कि वह दस हजार मेगावाट क्षमता के एटमी रिएक्टर अमेरिकी कंपनियों से ही खरीदेगी।

वह तो इस बात के लिए भी तैयार थी कि संभावित दुर्घटना के वक्त आपूर्ति करने वाली कंपनियों को रिएक्टर लग जाने के बाद हर तरह की जिम्मेवारी से मुक्त कर दिया जाए। लेकिन संसद में विरोध हुआ और दबाव में संसद में नागरिक परमाणु उत्तरदायित्व विधेयक (सिविल न्यूक्लियर लायबिलिटी बिल) लाया गया और निर्माण-कार्य पूरा हो जाने के बाद भी किसी तरह की संभावित दुर्घटना की जवाबदेही-भरपाई आपूर्तिकर्ता कंपनी पर सुनिश्चित की गई।

मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के सामने घुटने टेक दिए और एक झटके से इस प्रावधान को निरस्त कर दिया। उसकी जगह सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनी और सरकार ने मिल कर पंद्रह सौ करोड़ के एक कोष के निर्माण का फैसला किया है, जिससे दुर्घटना की क्षतिपूर्ति की जाएगी। यूनियन कारबाइड/भोपाल गैसकांड के मद्देनजर यह राशि बेहद कम है। उसके बाद ही अमेरिकी कंपनियां जनरल इलेक्ट्रिकल्स और वेस्टिंगहाउस आंध्र प्रदेश और गुजरात में आणविक संयंत्र लगाने के लिए तैयार हुर्इं। लेकिन अगर वे इसके लिए तैयार नहीं भी होतीं तो क्या आसमान टूट पड़ता? आणविक ऊर्जा से बिजली उत्पादन की प्रक्रिया को सभी बेहद खर्चीली बता रहे हैं। इस तरह के संयंत्र और उनसे निकला कचरा तो खतरनाक है ही।

कभी-कभी यह सवाल शिद्दत से सामने आकर खड़ा हो जाता है कि जनता के वोट और स्नेह से देश के शीर्ष पदों पर बैठने वाले लोग किन आंतरिक प्रेरणाओं से इस तरह का काम करते हैं? यह बौद्धिक दिवालियापन है या सत्ता का वर्ग-चरित्र?

 

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