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न्याय की सूनी डगर

बलात्कारी के प्रति नरमी दिखा महिला को समझौते के लिए कहना उसकी मर्यादा व आत्मसम्मान के प्रति संवेदनहीनता को दर्शाता है। यह न्याय की भावना को छिन्न-भिन्न करता है और आपराधिक न्याय प्रक्रिया को ध्वस्त करने जैसा है। सर्वोच्च अदालत का यह भी कहना था कि अगर समझौता हो भी जाता है तब भी अपराध खत्म नहीं होता।

Author February 2, 2016 2:55 AM
तमिलनाड़ू हाइ कोर्ट की एक तस्वीर

कुड्डालुर जिले के विरुदाचलम गांव की बलात्कार का शिकार महिला के संदर्भ में तमिलनाडु हाईकोर्ट का फैसला न केवल हैरान करने वाला है, वह सुप्रीम कोर्ट के जुलाई 2015 में दिए गए दो फैसलों का उल्लंघन भी करता है। यह फैसला इस बात को पुष्ट करता है कि बलात्कार संबंधी कानूनों में चाहे जितने भी बदलाव हो चुके हों, हमारी राज्यों की अदालतें आज भी 1970-80 के कानून व मानसिकता से बाहर नहीं आ पाई हैं और उसी आधार पर आरोपियों को मुक्त कर देती हैं जिस आधार पर उस समय मथुरा के आरोपी को मथुरा के बालिग होने तथा सहमति से संबंध स्थापित किए जाने के नाम पर छोड़ दिया गया था। यह वह फैसला था जिसके खिलाफ देश भर में महिलाओं ने विरोध-प्रर्दशन किए थे। यह कोई संगठित या प्रायोजित नहीं, बल्कि स्वत:स्फूर्त था।

आजादी के बाद पहली बार इतनी बड़ी संख्या में महिलाएं सड़कों पर उतरी थीं। और अगले दस साल तक बलात्कार व दहेज-हत्या उनके मुख्य मुद््दे थे। वस्तुत: वह आजादी के बाद उभरा ऐसा महिला आंदोलन था जिसे सरकारें भी लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं कर पाई थीं और बलात्कार व दहेज-हत्या संबंधी अपराधों को लेकर उन्हें कानूनों में संशोधन करना पड़ा। कुड््डालुर जिले के विरुदाचलम गांव की महिला के संदर्भ में मद्रास हाईकोर्ट के दो फैसलों ने उन संशोधनों को और उसके बाद 2013 में वर्मा समिति के आधार पर हुए संशोधनों को नाकाम कर दिया है और महिलाओं को एक बार फिर 1975 के दौर में ला खड़ा किया है।

इस महिला से 2008 में वी मोहन नाम के युवक ने बलात्कार किया था। उससे उसके एक बच्ची हुई। महिला अदालत ने 2014 में उसे सात साल की सजा व दो लाख का जुर्माना किया। यह पैसा महिला को दिया जाना था। युवक जेल तो चला गया, पर जमानत की अर्जी भी लगा दी। 26 जून, 2015 को मद्रास हाईकोर्ट के जज डी देवदास ने उसे यह कह कर जमानत दे दी कि वह उस महिला से शादी कर ले। पर तभी एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट का आदेश आया कि किसी महिला को बलात्कारी से शादी करने या उसके साथ रहने के लिए नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह उसके मान-सम्मान व अस्मिता के विरुद्ध है।

न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा व न्यायमूर्ति पीसी पंत के खंडपीठ ने एक जुलाई को दिए अपने फैसले में कहा कि बलात्कार या बलात्कार की कोशिश के किसी भी मामले में समझौते की अवधारणा के बारे में नहीं सोचा जा सकता। महिला की अस्मिता उसके स्वत्व का नित्य व अविनाशी हिस्सा है, किसी को भी उसे कभी भी मलिन करने के बारे में नहीं सोचना चाहिए। ऐसे मामले में किसी भी तरह का समझौता या सौदेबाजी नहीं हो सकती, क्योंकि यह उसके सम्मान, जो सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है, के खिलाफ होगा। हम जोर देकर कहना चाहते हैं कि अदालतों को इस मामले में नरम रवैया बिल्कुल नहीं अपनाना है क्योंकि यह एक बहुत भारी भूल होगी। बलात्कार महिला के शरीर, जो उसका मंदिर है, के प्रति अपराध है। यौन हमला, पीड़ित महिला की प्रतिष्ठा को हमेशा-हमेशा के लिए खत्म कर देता है। किसी को भी इसे मिटाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। ऐसे में बलात्कारी के प्रति नरमी दिखा महिला को समझौते के लिए कहना उसकी मर्यादा व आत्मसम्मान के प्रति संवेदनहीनता को दर्शाता है। यह न्याय की भावना को छिन्न-भिन्न करता है और आपराधिक न्याय प्रक्रिया को ध्वस्त करने जैसा है। सर्वोच्च अदालत का यह भी कहना था कि अगर समझौता हो भी जाता है तब भी अपराध खत्म नहीं होता।

इस फैसले के कुछ दिन बाद ही न्यायमूर्ति डी देवदास ने अपना फैसला वापस ले लिया और दोषी को फिर से जेल भेजने का आदेश दिया। इस पर वी मोहन ने दुबारा हाईकोर्ट में याचिका लगाई। इस बार उसका कहना था कि उसने बलात्कार नहीं किया। महिला बालिग थी और दोनों के बीच सहमति से संबंध स्थापित हुए। निचली अदालत में पहले तो वह माना ही नहीं था कि उसने बलात्कार किया है और बच्ची उसकी है। जब डीएनए टेस्ट से साबित हो गया तो उसने सहमति को आधार बना कर बचना चाहा, पर अदालत ने उसे नहीं माना। नाबालिग से बलात्कार के जुर्म में उसे सात साल की सजा दी गई।

वर्ष 1980 में हुए कानूनों में संशोधन के आधार पर होना तो यह चाहिए था कि आरोपी ही यह सिद्ध करे कि वारदात के समय महिला बालिग थी। पर यहां हाईकोर्ट के जज ए सेल्वम ने अक्तूबर 2015 में इस बात का जिम्मा महिला पर डाल दिया। उससे नाबालिग होने का प्रमाण मांगा गया और जब उसने स्कूल का प्रमाणपत्र दिया तो उसकी प्रामाणिकता की जांच के लिए निचली अदालत के पास भेज दिया। यही नहीं, उसने निचली अदालत के फैसले को रद््द करते हुए उसे रिहा कर दिया और जुर्माने के दो लाख रुपए वापस करने के लिए भी कहा।

यहां यह बात समझ से परे है कि जब उम्र का निर्धारण अभी हुआ ही नहीं तो दोषी को रिहा कैसे कर दिया गया। प्रमाणपत्रों की जांच कर आयु का निर्धारण करने का अधिकार तो हाईकोर्ट के जज के पास भी है। अगर न्यायमूर्ति सेल्वम चाहते तो अपने स्तर पर भी यह कर सकते थे। पर ऐसा न कर उन्होंने निचली अदालत को आदेश दिया और उसके आदेश को रद्द कर सारे मामले पर नए सिरे से विचार करने का आदेश दिया। इसका अर्थ था युवती को एक बार फिर उसी जिल्लत में से गुजरना होगा, जिसे वह इतने सालों से भुगत रही थी। और नतीजा? जनवरी में निचली अदालत में जब मामला फिर से आया तो युवती ने कोर्ट में पेश हो बता दिया कि उसने युवक से शादी कर ली है और अब वह बतौर पत्नी उसके साथ रह रही है।

यही तो युवक चाहता था और हाईकोर्ट के दोनों जज भी। दोनों में से किसी ने एक बार भी नहीं सोचा कि जिस व्यक्ति ने पीड़ित युवती की अस्मिता को तार तार किया है, उसके शरीर ही नहीं, आत्मा को भी छलनी किया है, उसके साथ वह युवती सिर उठा कर कैसे रह सकेगी। पहले जज डी देवदास ने जब अपने फैसले में कहा था कि इस शादी से महिला को संरक्षक और बच्ची को पिता मिल जाएगा, तो इस पर युवती की प्रतिक्रिया थी- जब उससे इस फैसले के बारे में पूछा गया तो उसका जवाब था- ‘क्या जज ने एक बार भी सोचा कि इन सालों में मैं किन-किन मुसीबतों से गुजरी हूं।…मैं यह आदेश कभी भी नहीं मानूंगी। मैं वक्त आने पर अपनी बच्ची को बताऊंगी कि उसका पिता बलात्कारी था। और यह भी कि उसकी वजह से कैसे उसके परिवार, संबंधियों व समाज ने उससे किनारा कर लिया और अकेले ही उसे सब मुसीबतों का सामना करना पड़ा।’

उसके अनुसार, ‘आज वी मोहन नाम का यह बलात्कारी मुझसे शादी की बात कर रहा है तो इसलिए नहीं कि वह मुझ से शादी करना चाहता है; इसलिए कि इससे वह हमेशा के लिए जेल से बाहर आ जाएगा। यह उसकी चाल है। फैसला देने से पहले एक बार जज साहब को मुझसे भी पूछना चाहिए था कि मैं क्या चाहती हूं। अन्याय मेरे साथ हुआ है। पैसा कमाने के बहुत-से रास्ते हैं, पर आप आत्म-सम्मान या अपनी अस्मिता खरीद नहीं सकते। मुझसे पूछे बिना ही दिए गए इस आदेश का अर्थ तो यही है कि मैं अपना मान-सम्मान एक बार फिर उस व्यक्ति के हाथों में सौंप दूं जो पहले ही मुझे बर्बाद कर चुका है। ऐसे व्यक्ति के साथ मैं कैसे रह सकती हूं? मेरा मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध है कि वे इस फैसले को रद्द कर दें।’

इसके बावजूद अगर उसने उससे शादी कर ली तो इसकी दो वजह रही होगी। एक, अब अदालतों के चक्कर काटने की हिम्मत उसमें नहीं बची थी। और दूसरे, शायद उसे यह दिखने लगा था कि कोर्ट से उसे अब न्याय नहीं मिलने वाला। थक-हार कर उसने वह रास्ता चुना जो उसकी अस्मिता के साथ सौदा था। कहने को तो निचली अदालत के सामने अब कोई मामला नहीं रह गया, पर अगर वह चाहे तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मद्देनजर पूरे मामले पर फिर से विचार कर सकती है कि ‘समझौता अपराध को खत्म नहीं कर सकता। ऐसे में समझौते के बाद भी आरोपी दोषमुक्त नहीं हो जाता।’ इससे पहले उसे महिला को विश्वास में लेकर उसका आत्म-विश्वास लौटाना होगा। मामले को लंबा न खींच कर जल्द निपटाना होगा। बेहतर तो यह होगा कि सुप्रीम कोर्ट ही इस मामले का स्वत: संज्ञान ले, अन्यथा ऊपरी अदालतों के चक्कर खत्म नहीं होंगे।

इस महिला के पास आजीविका का अपना कोई साधन नहीं है। छोटा भाई ही उसका सहारा है। यूपीए सरकार द्वारा निर्भया कोष का गठन ऐसी ही महिलाओं के पुनर्वास के लिए किया गया था। कोष स्थापित होने के बाद उसके प्रयोग की कोई सरल व्यवस्था बनी होती तो शायद इस महिला को अपनी अस्मिता का ऐसा सौदा न करना पड़ता। उसे न्याय दिलाने के लिए कौन आगे आएगा? उसकी बच्ची के सुरक्षित भविष्य को कैसे सुनिश्चित किया जाएगा?

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