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इस नाजुक दौर में

कृष्णदत्त पालीवाल थोड़े ही समय में मोदी सरकार तमाम असुविधाजनक प्रश्नों से घिर गई है। इस सरकार के ‘विकास’ का एजेंडा आज जनता के मोहभंग की ओर झुक गया है। इसका कारण है आर्थिक नीतियों के क्षेत्र में मनमोहनोमिक्स का अनुकरण और नवउदारवाद के अमेरिकी झंडे के नीचे शरणस्थली खोजने का आग्रह। हम उसी राह […]

Author January 26, 2015 16:21 pm

कृष्णदत्त पालीवाल

थोड़े ही समय में मोदी सरकार तमाम असुविधाजनक प्रश्नों से घिर गई है। इस सरकार के ‘विकास’ का एजेंडा आज जनता के मोहभंग की ओर झुक गया है। इसका कारण है आर्थिक नीतियों के क्षेत्र में मनमोहनोमिक्स का अनुकरण और नवउदारवाद के अमेरिकी झंडे के नीचे शरणस्थली खोजने का आग्रह। हम उसी राह पर चल पड़े, जिससे उपनिवेशवादी आधुनिकता का भूत हमें पकड़ता-जकड़ता रहा है। प्रश्न है कि जन-मन में खिला आशा का राजकमल मुरझाने की व्यंजना क्यों दे रहा है? क्या गुजरात के विकास का मॉडल पूरे देश पर बिना किसी पुनर्विचार के रखने की तैयारी हो रही है? धर्म और संस्कृति, शिक्षा और भाषा की राजनीति का चेहरा विकृत क्यों हो रहा है? सांप्रदायिक बयानबाजी, मंदिर मुद्दे से जुड़ी तोगड़ियावादी राजनीति, धर्मांतरण की तुच्छ हरकतें देश को किधर धकेलने की तैयारी कर रही हैं?

उस अनुभव से संघ ने क्या नसीहत ली कि अटल बिहारी वाजपेयी सरकार बुलबुलों की तरह उठ कर बिखर गई थी। उसके पीछे चौबीस पार्टियों की रस्साकशी और संघ राजनीति के सांप्रदायिक एजेंडे थे, जिन्हें जल्दबाजी में मन का चैन खोकर उठाया जा रहा था। शाइनिंग इंडिया का मुखौटा उतर कर धूल में ध्वस्त हो गया। इस बार कांग्रेसवाद के निराशा भरे दिनों से थक कर जनता ने करवट ली। उम्मीदों से बने आसमान ने भाजपा का पूरा साथ दिया। मोदी के भाषणों का चमत्कारवाद-प्रदर्शनवाद रंग लाया। जन-अपेक्षा यही है कि यह विश्वास अटूट रहना चाहिए।

पता नहीं संघ को अपने एजेंडे आगे लाने की जल्दी क्यों है? अधिक जल्दबाजी से पद स्खलन का हमेशा खतरा रहता है। संविधान-विरोधी और सांप्रदायिक एजेंडे रोज-रोज सामने आ रहे हैं। इनसे देश का क्या भला होगा- यह ठंडे मन से सोचने की बात है। सरकार को बेरोजगारी, जातिवाद, ढहती शिक्षा-व्यवस्था और निरंतर पनपती अपसंस्कृति से जूझने को कमर कसनी चाहिए। किसानों की समस्याओं पर कई कोणों से विचार करके उनमें सुधार लाने की जरूरत है। आलू, कपास, गन्ना और चना-मटर-अरहर पैदा करने वाले किसान त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। चारों ओर भ्रष्टाचार के अंधकार से घिरा देश नया प्रकाश चाहता है।

‘हिंदुत्ववाद’ को पीछे धकेल कर आगे बढ़ना होगा और उस राजनीति को बदलना होगा, जो ‘हिंदुत्व’ को एक गलत दिशा में ले जा रही है। इसलिए हिंदुत्ववाद के साथ अल्पसंख्यकवाद के सपनों को मिला-जुला कर सोचना होगा। देश को गांधी-लोहिया का ‘हिंदू’ चाहिए, जो सर्वधर्म समभाव के सिद्धांत पर जीता हो। हमें वह हिंदू नहीं चाहिए जो अन्य धर्म वालों को पछाड़ कर चलना चाहता है। हमें शरद यादव के इस कथन पर कई कोणों से सोचना होगा कि देश में अघोषित आपातकाल चल रहा है। प्रश्न है- कैसा आपातकाल? ऐसा आपातकाल, जो देश में फासीवादी राजनीति को तंत्र में स्थान देता है- हमें नहीं चाहिए।

इक्कीसवीं शताब्दी का युग घटनाओं-विकृतियों और नवपूंजीवादी माफियाओं का युग बन कर न रह जाए यह चिंता खटका पैदा करती है। खटका इसलिए कि इस शताब्दी की शुरुआत अनेक विध्वंसक लीलाओं से हुई है। सोवियत समाजवाद, बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद छद्म धर्मनिरपेक्षता का नाटक सबसे बड़ी हिंदुत्ववादी पार्टी कांग्रेस खेलती रही। हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और रहे जिसमें रघुवीर सहाय की कविता का ‘रामदास’ चौराहे पर मरता रहा। मारने वालों के सामने कोई टस से मस नहीं हुआ। सब तमाशा देखते रहे। इसी छद्म करुणावाद ने समाजवाद को जातिवाद का रंग देकर लील लिया।

माया-मुलायम की लीला का पाठ आज न जाने कितने अर्थ मीमांसापरक भाष्य चाहता है। सभी जन-संदर्भों के सत्य को फांसी देकर जातिवाद, वंशवाद, परिवारवाद, कुलीनतावाद को पाला-पोसा गया। भारतीय राजनीति की इक्कीसवीं शताब्दी का यह राग ‘सोच-सोच कर मर जाने का गीत’ है। जनता के सिंहासन पर खूंखार जातिवादी चढ़ बैठे। विकास की राष्ट्रीय योजनाओं से धन दुहा गया। क्रांतिकारी रचनाकार-कलाकार, समाज सुधारक, बौद्धिक सबके सब जमघटों के हाथ आ गए। फिर से एक अंधा, युग नए नारों के साथ आ गया। इस चक्रवात में हुआ यह कि भारतीय अर्थतंत्र-नवसांस्कृतिक साम्राज्यवादी भूमंडलीकरण के चक्र में फंसता गया।

इक्कीसवीं शताब्दी की राजनीति में आमूलचूल परिवर्तनवाद के दर्शन हुए। एक पढ़ा-लिखा मतदाता बहसता-गरजता उदित हुआ और उसने ऐसा ढोंगवाद-तर्कवाद फैलाया कि हाशिये पर पड़ी हिंदू फासीवादी ताकतें रामनामी चादर ओढ़ कर केंद्र में आ गर्इं। फिर शुरू हुआ पूर्णकालिक वह नाटक, जिसमें अर्थतंत्र और समाजतंत्र के ढांचे को ढहाने की शरारत शुरू हुई। भाषा और क्षेत्र की एकता खतरे में पड़ गई। कोई भोजपुरी, कोई ब्रजभाषा, कोई राजस्थानी, कोई बुंदेली को भाषा बनाने की राजनीति करने लगा। कहा जाने लगा कि हमारी तीन भाषाएं हैं- एक भाषा कन्नौजी-ब्रजी या भोजपुरी मातृभाषा है और दूसरी भाषा राष्ट्रभाषा हिंदी और तीसरी भाषा अंगरेजी-संस्कृत।

इस तोड़-फोड़ के कारण यह पूरा दौर भयंकर संकट से गुजर रहा है- जो हिंदी के इतिहास में अपूर्व तो है ही, गहरे नाश पर आमादा है। इस विनाश के दौर को क्षेत्रवादी नवनिर्माण के दौर का नाम दे रहे हैं। कोई नहीं बता पा रहा है कि धर्मनिरपेक्षवादी संस्कृति की परंपरा भारतीय है या अभारतीय। यह मीडिया का क्रांतिकारी ‘मायावी यथार्थ’ या हाइपर रियलिटी है। चारों ओर सांप्रदायिकता का कुहराम मचा हुआ है। राजनीति के इस कोलाहल में हम सब बहरे हो रहे हैं। मोदी की विकास-चर्चा में उन्हें अपार संभावनाएं दिखाई दे रही हैं और भाजपा के नेतृत्व में स्थापित छोटे-छोटे विचार-शिविरों में खिचड़ी पक रही है, जिसमें लोकतांत्रिक गाय का शुद्ध घी डाला जा रहा है।

आखिर कौन हैं वे श्री और श्रीमान लोग, जो मस्जिद के मलबे पर रामलला का भव्य मंदिर बनाना चाहते हैं? यह एक नए ढंग का भक्ति-दर्शन है, भक्तिशास्त्र है, जिसमें कमाऊ नवधा भक्ति की अपार शक्तियां मौजूद हैं। तोगड़ियावादी एक नया रामानंदी भक्ति आंदोलन चलाने की राजनीति कर रहे हैं। भारतीयता की अधूरी-अपर्याप्त समझ के कारण राम, कृष्ण और शिव की अवधारणाएं संकटग्रस्त हैं। विचारधारा से भाजपा को परहेज नहीं है- लेकिन संघ परिवार की छद्म धर्म-निरपेक्षता बीच-बीच में बिल्ली बन कर राह काट जाती है।

पश्चिमी उपभोक्तावाद इन सभी को भाता रहा है। इसी भावभूमि में ये सभी राष्ट्र-प्रेम, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, राष्ट्रभाषा, राजभाषा के गीत हिंदू धर्म की शैली में गाते रहे हैं। इनका सबसे ज्यादा गुस्सा कांग्रेस के ‘सेक्युलरवाद’ की झूठी राजनीति पर है। इस तरह संघ परिवार के शत्रु तमाम वामपंथी विचारों के व्यक्ति हैं और यही वह नाभि-नाल संबंध है, जो संघ परिवार को उनके साथ खड़ा होने को विवश करता है।

यह भी विडंबना है कि विमर्श तो सभ्यता-संस्कृति-परंपरा पर करेंगे, लेकिन केंद्र में संस्कृति का पर्याय ‘धर्म’ होगा और वह भी ‘हिंदुत्व’। इस स्थिति के कारण चाहे धर्मांतरण का जटिल प्रश्न हो, लेकिन इस संकट के केंद्र में धर्म ही रहता है, जिसे नव बुद्धिजीवी वर्ग संघ परिवार का उलझा हिंदुत्व नाम देता रहा है। इसका लक्ष्य कभी हिंदू राष्ट्र की स्थापना था, लेकिन आज यह लक्ष्य किनारे चला गया है। इसलिए इस समस्या को नए संदर्भों के साथ समझना-समझाना चाहिए।

इतिहास साक्षी है कि इस समस्या का श्रीगणेश स्वाधीनता-प्राप्ति के बाद ही हो गया था। बीस-तीस के दशक में हमारा अंगरेजी साम्राज्यवाद से संघर्ष जब चरम शिखर पर था तो हिंदुत्ववादी भीड़ उस संघर्ष से अलग हिंदू राष्ट्र की स्थापना का जाप कर रही थी। इस जाप से वामपंथियों की बन आई। इन्होंने संघ परिवार की हिंदुत्ववादी नीतियों को सांप्रदायिकता का नाम देकर खूब भुनाया। यह दलबद्ध राजनीति का चक्र अंगरेजी राज से असहयोग के स्थान पर उनके साथ थाली का बैंगन बन कर सहयोग कर रहा था। क्योंकि ये सभी गांधी और गांधी विचार-दर्शन का विरोध कर रहे थे।

भारत-विभाजन के बाद जब पाकिस्तान इस्लामी राष्ट्र बना तो फिर भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के प्रयत्न ने जोर पकड़ा। ध्यान में रखना होगा कि यह शुरुआत सबसे ज्यादा हिंदुत्ववादी पार्टी कांग्रेस में ही हुई थी। उस समय हवा ऐसी थी कि स्वाधीनता प्राप्त होते ही 1947 को दीपावली के दिन सोमनाथ में स्वयं सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की घोषणा की। इस घोषणा से तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू प्रसन्न नहीं थे- वे प्रतिमा-पूजन प्रतिष्ठा के अवसर पर बुलाने पर भी नहीं गए। वहां गए राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद और उन्होंने सरदार पटेल की प्रशंसा की और मंदिर को भारतीय संस्कृति का मंगल प्रतीक घोषित किया।

बुरा काम उसके बाद यह हुआ कि 22-23 दिसंबर 1949 की रात को चुपचाप रामलला की मूर्ति प्रकट होने का सांस्कृतिक रूपक रचा गया और मस्जिद के अंदर रामलला की मूर्तियां रख दी गर्इं। यह खेल तब रंग लाया जब 1991 में लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक की राम रथयात्रा का लंबा-चौड़ा कार्यक्रम घोषित किया। यह अलग बात है कि आडवाणी का रथ बीच में ही रोक दिया गया। इस तरह आगे के प्रसंग प्रकरण हरे-भरे हुए और भारतीय राजनीति आज भी उन घावों को भर नहीं पाई है। भाष्य यह किया गया कि आडवाणी ने अपने काम में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का लिहाज नहीं किया और उनके सामने बजरंगी कूद मार दी। भारतीय संविधान का लोकतांत्रिक औचित्य तभी से शीर्षासन कर रहा है।

इन प्रसंगों-प्रकरणों-घटनाओं का सच इतना ही नहीं था। इनकी अर्थमीमांसा हिंदू-मुसलमान अलग-अलग तरीके से आज भी कर रहे हैं। कभी दर्द गोहत्या के बहाने उभर आता है, कभी ताजियों को निशाना बना कर। कभी-कभार तो भाई लोग ताजमहल को हिंदू महल सिद्ध करने में अपनी प्रतिभा को खर्च करते हैं। ‘गीता’ को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने का शोर भी उठा। जबकि इन्हें पता नहीं है कि भारतीय परंपरा की प्रस्थानत्रयी में ब्रह्मसूत्र, उपनिषद और गीता भारतीय संस्कृति के मूलाधारों में रही है। इन ग्रंथों के बिना भारत और भारतीयता की बात करना असंभव है। धर्म के नाम पर संघ की राजनीति से प्रधानमंत्री चकरा रहे हैं। हमें सेक्युलरवाद और हिंदुत्ववाद दोनों से मुक्त रहने की जरूरत है, क्योंकि देश अनेक समस्याओं से जूझ रहा है।

आज मुसलिम और हिंदुत्वपरक शक्तियों को कंधे से कंधा मिला कर चलने की जरूरत है। क्योंकि देश नाजुक दौर से गुजर रहा है। हमारे पड़ोस में सभी तरफ से आग जल रही है, जिससे देश को बचाना होगा। हमें अमेरिकावाद और पश्चिमवाद की नीतियों को कई तरह से समझना होगा, ताकि देश को दूसरी औपनिवेशिक गुलामी से बचाया जा सके।

 

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