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ईरान और अमेरिका

बनवारी विश्व की सबसे बड़ी सामरिक शक्ति होने के कारण अमेरिका सदा रणनीतिक पहल करने की स्थिति में रहता है। अपने राजनीतिक लक्ष्यों को वह इस तरह प्रस्तुत करता है कि विश्व के हित और सुरक्षा की दिशा में वे एकमात्र विकल्प दिखाई दें। अमेरिकी आक्रामकता के कारण सारी बहस उसके सुझाए विकल्प पर सीमित […]

Author Updated: July 24, 2015 1:59 PM

बनवारी

विश्व की सबसे बड़ी सामरिक शक्ति होने के कारण अमेरिका सदा रणनीतिक पहल करने की स्थिति में रहता है। अपने राजनीतिक लक्ष्यों को वह इस तरह प्रस्तुत करता है कि विश्व के हित और सुरक्षा की दिशा में वे एकमात्र विकल्प दिखाई दें। अमेरिकी आक्रामकता के कारण सारी बहस उसके सुझाए विकल्प पर सीमित हो जाती है। इसके पीछे अमेरिका के दूरगामी रणनीतिक लक्ष्य क्या हैं इस पर बहस नहीं होती।

हमारा सारा शैक्षिक और संचार माध्यमों का तंत्र अमेरिकी विकल्प के पक्ष या विपक्ष में ढोल पीटता रहता है। इससे अंतत: अमेरिकी लक्ष्य ही सिद्ध होता है। पर वास्तव में अमेरिकी राजतंत्र के रणनीतिक लक्ष्य ठीक उसी तरह फलित हों जैसा उसने सोचा है और उसका हित साधन ही करें, यह आवश्यक नहीं है। लेकिन हर महाशक्ति को यह विश्वास रहता है कि उसका दांव उलटा पड़ा तो भी वह कोई मार्ग निकाल लेगी।

इसका ताजा उदाहरण ईरान के साथ किया गया नाभिकीय समझौता है। 1979 में अयातुल्ला खुमैनी के नेतृत्व में हुई ईरानी क्रांति ने ईरान को अमेरिका और दूसरी यूरोपीय शक्तियों के विरुद्ध खड़ा कर दिया था। अमेरिका ने इसे पूरे विश्व को दी गई चुनौती के रूप में चित्रित किया और उस पर अनेक तरह के प्रतिबंध लगा दिए। उसके बाद यह प्रचार आरंभ हुआ कि ईरान एटम बम बनाने का प्रयत्न कर रहा है और उसमें सफल हुआ तो मध्य एशिया की स्थिति विकट हो जाएगी। इस सब प्रचार के बाद 1995 में ईरान पर और कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए और उसकी अर्थव्यवस्था को चौपट करने का प्रयत्न किया गया। ईरान को घेरने की इस रणनीति में संयुक्त राष्ट्र का भी पूरी निर्लज्जता से उपयोग हुआ।

लेकिन 11 सितंबर 2001 को अमेरिका पर हुए आतंकवादी आक्रमण ने सारी स्थिति बदल दी। इस आतंकवादी हमले से अमेरिका को यह दिखाई दे गया कि उसे मुख्य चुनौती अरब सुन्नियों से मिल रही है, शियाओं से नहीं। इस परिवर्तित दृष्टिकोण ने सुन्नी सद््दाम हुसैन को विश्व शांति का मुख्य शत्रु बना दिया और दो वर्ष बाद इराक पर आक्रमण करके सद््दाम हुसैन को निर्दयतापूर्वक मार दिया गया। उसके साथ ही ईरान से बातचीत का क्रम आरंभ हुआ। अमेरिका-विरोधी सुन्नी शक्ति को संतुलित करने के लिए शियाओं को आगे बढ़ाना आवश्यक था। शिया-बहुल इराक से सुन्नियों के नेतृत्व वाली बाथ पार्टी के शासन की विदाई के बाद शिया शक्ति बढ़ी थी।

लेकिन इससे सुन्नियों में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। उसके परिणामस्वरूप अलकायदा की एक शाखा के रूप में पैदा हुए सलाफी जेहादी आतंकवादी गुट ने एक सेना का रूप ले लिया। आज वह इस्लामिक स्टेट के रूप में इराक और सीरिया के एक बड़े क्षेत्र पर नियंत्रण कर चुका है और उसके नेता अबू बक्र अल बगदादी ने अपने आप को नया खलीफा घोषित करके खिलाफत फिर स्थापित करने की घोषणा की है।

अमेरिका भी सीधे इस नई चुनौती से नहीं उलझना चाहता। उसे यह अधिक व्यावहारिक लगता है कि शिया ईरान इस चुनौती का उत्तर दे। इसलिए ईरान को प्रतिबंधों से मुक्त करके शक्तिशाली बनाना उसे आवश्यक दिखाई दिया। उसके जिस नाभिकीय कार्यक्रम को बहाना बना कर उस पर सभी तरह के प्रतिबंध लादे गए थे उन्हें हटाने के लिए एक समझौता आवश्यक था। ईरान को भी इस समझौते की आवश्यकता थी। क्योंकि सुन्नियों की बढ़ती चुनौती उसके लिए भी खतरा है। इसलिए रास्ता निकाला गया और ईरान के नाभिकीय कार्यक्रम पर फौरी निगरानी बैठा कर उस पर लगेप्रतिबंध हटाने का रास्ता खोला जा रहा है।

अमेरिका का हित किस तरह पूरी दुनिया का हित बना दिया जाता है इसे देखने के लिए यही तथ्य पर्याप्त है कि जिस तरह ईरान के नाभिकीय कार्यक्रम पर हल्ला मचाया गया उस तरह इजराइल या दक्षिण अफ्रीका के नाभिकीय कार्यक्रम पर कभी नहीं मचाया गया। दक्षिण अफ्रीका ने नाभिकीय अप्रसार संधि (एनपीटी) पर हस्ताक्षर करने से पहले अपने नाभिकीय हथियार समेट लिए थे। लेकिन इजराइल के पास अनुमानत: अस्सी परमाणु बम हैं।

भारत, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया भी नाभिकीय शक्ति बन चुके हैं। अमेरिका से शत्रुता के कारण उत्तर कोरिया प्रतिबंध और गरीबी झेल रहा है। पर सबसे बड़ा खतरा तो पाकिस्तान के एटम बम हैं। उन्हें ठीक ही इस्लामी या सुन्नी बम कहा जाता है और वे आतंकवादियों के हाथ नहीं पड़ जाएंगे इसकी कोई गारंटी नहीं है। फिर भी पाकिस्तान को अमेरिकी सहयोग पर आंच नहीं आई।

इसलिए ईरान का नाभिकीय कार्यक्रम अमेरिका की चिंता का मुख्य कारण नहीं, मुख्य बहाना था। ईरान का नाभिकीय कार्यक्रम अमेरिका के सहयोग से अमेरिकी राष्ट्रपति आइजनहावर के समय मार्च 1957 में आरंभ हुआ था और उसका नाम दिया गया था ‘एटम्स फॉर पीस प्रोग्राम’। 1967 में ईरान नाभिकीय केंद्र स्थापित हुआ जिसमें अमेरिका का दिया पांच मेगावाट का न्यूक्लियर रिसर्च रिएक्टर लगा हुआ था और वह उच्च परिशोधित यूरेनियम से चलता था। 1967 में ईरान ने नाभिकीय अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर किए।

ईरान के शाह ने 2000 तक तेईस परमाणु बिजलीघर स्थापित करने का निर्णय लिया। अमेरिका के बाद ईरान के नाभिकीय कार्यक्रम को सबसे अधिक सहयोग जर्मनी से मिल रहा था। 1979 की ईरानी क्रांति के बाद अमेरिका और दूसरी पश्चिमी शक्तियों ने यह नाभिकीय सहयोग समाप्त कर दिया और ईरान को विश्व शांति का खलनायक घोषित कर दिया गया।

अमेरिका के रणनीतिक लक्ष्य को समझने के लिए एक सरसरी दृष्टि यूरोप-अरब द्वंद्व पर डाल लेनी चाहिए। दोनों की भौगोलिक समीपता और द्वंद्व से शक्ति अर्जित करने के स्वभाव ने उन्हें सदा एक दूसरे का प्रतिद्वंद्वी बनाए रखा है। 1800 तक अरब बड़ी क्षेत्रीय शक्ति थे, लेकिन 1800 के बाद यूरोपीय देश विश्व की मुख्य शक्ति के रूप में उभर आए और अन्य क्षेत्रों की तरह अरब क्षेत्र भी उनके दवाब में आ गए।

अपने भौगोलिक विस्तार के प्रयत्न में रूस ने ईरान पर 1804-13 में और 1826-28 में दो बार आक्रमण किया और उसके कुछ क्षेत्रों पर नियंत्रण कर लिया। 1918 में उस्मानी राज्य की समाप्ति ने अरबों को यूरोपीय शक्तियों का अखाड़ा बना दिया। अरब लोगों की शिकायत है कि आज की अरब सत्ताएं यूरोपीय कूटनीति की देन हैं और इसलिए अरबों में यूरोप-अमेरिका के लिए विद्वेष भरा रहता है। इजराइल की स्थापना से वह और गहरा हो गया है। 1900 के आसपास तेल की खोज ने अरब क्षेत्रों पर यूरोप-अमेरिकी नियंत्रण को और अनिवार्य बना दिया।

अमेरिका जानता है कि मध्य एशिया में ईरान का क्या महत्त्व है। मिस्र के बाद ईरान इस क्षेत्र का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है। मध्य एशिया में उसने सदा अपनी अलग पहचान बनाए रखी है। इस पूरे क्षेत्र के इस्लामीकरण और अरबीकरण के बावजूद ईरान ने अपने आप को अलग पहचान दिए रखी। उसने इस्लाम की एक अलग शाखा बारह इमामों को मानने वाले शिया के रूप में खड़ी की।

आज मिस्र और उत्तरी अफ्रीका के दूसरे देशों को छोड़ दें तो अरब जनसंख्या में शियाओं की संख्या सुन्नियों से थोड़ी ही कम है। ईरान और अजरबैजान में शिया राजकीय मजहब है। इराक और बहरीन में साठ प्रतिशत से अधिक जनंसख्या शिया है, यमन में सैंतालीस प्रतिशत, लेबनान में इकतालीस प्रतिशत, कुवैत में तीस प्रतिशत और सीरिया में पंद्रह प्रतिशत। इस तरह इस पूरे क्षेत्र में वे सुन्नी शक्ति को संतुलित करने की स्थिति में हैं।

यूरोपीय-अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती देने के लिए शिया-सुन्नी अपना मतभेद भुला देते हैं। इजराइल के विरुद्ध संघर्ष में वे एक हैं और इजराइल-विरोधी गुटों को बारी-बारी से सऊदी अरब और ईरान दोनों से सहायता मिलती रही है। लेकिन प्रधान क्षेत्रीय शक्ति बनने की होड़ दोनों में बनी रहती है। उस्मानी खिलाफत और राज्य के पराभव के बाद पश्चिमी शक्तियों को लगा था कि नई अरब सत्ताएं उनके कहे में चलेंगी। इसलिए इजराइल की स्थापना के समय जब अरब लोगों की तीव्र प्रतिक्रिया हुई तो पश्चिमी शक्तियां अचरज में पड़ गर्इं। आरंभ में ईरान और सऊदी अरब में अपनी समर्थक सरकारें बैठा कर वे कुछ निश्चिंत हुए थे। लेकिन अरब क्षेत्र से विसंवादी शक्तियां निरंतर उभरती रहीं।

फरवरी 1979 में अयातुल्ला खुमैनी के नेतृत्व में हुई ईरानी क्रांति, जुलाई में इराक में सद््दाम हुसैन के सत्तारोहण और दिसंबर में अफगानिस्तान पर रूस के आक्रमण ने पूरी अरब राजनीति को बदल दिया। अफगानिस्तान पर रूस का नियंत्रण समाप्त करने के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान की मदद से तालिबान खड़े किए। अफगानिस्तान के रूस-अमेरिकी द्वंद्व का अखाड़ा बनने की तीव्र प्रतिक्रिया हुई और उसी से अलकायदा का जन्म हुआ। दूसरी तरफ अयातुल्ला खुमैनी के उदय ने अरबों के बीच वर्चस्व का नया संघर्ष छेड़ दिया। 1980-88 के बीच लंबा ईरान-इराक युद्ध हुआ जो अनिर्णीत रहा। ईरान पर नियंत्रण करने में विफल रहने पर सद््दाम हुसैन ने कुवैत पर आक्रमण किया और वहीं से वह अमेरिकी आंख की किरकिरी हो गया।

अमेरिका जानता था कि सद्दाम हुसैन की विजय का अर्थ है पश्चिमी शक्तियों को अरबों की एकजुट चुनौती। उन्होंने सद््दाम हुसैन को समाप्त किया लेकिन इस्लामिक स्टेट की नई चुनौती खड़ी हो गई। इस चुनौती को क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई में बदलने के लिए ईरान की आर्थिक बेड़ियां हटाना आवश्यक था। यही किया गया है। कालांतर में ईरान परमाणु बम बना सकता है। पर उससे इजराइल और सऊदी अरब निपटेंगे। अमेरिका अभी से उसकी चिंता क्यों करे!

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