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आयकर की चोरी पर नजर

आरके सिन्हा क्यों हमारे देश की आम जनता आयकर जमा कराना अपना कर्तव्य नहीं समझती? यहां ‘कर चोरों’ की तादाद अनगिनत होगी। बहरहाल, अब आयकर के दायरे में ज्यादा से ज्यादा लोगों को लाने के लिए आयकर विभाग ने अपना नया अभियान शुरू किया है। इस अभियान के तहत उसने मौजूदा वित्तवर्ष में एक करोड़ […]

Author August 5, 2015 02:01 am

आरके सिन्हा

क्यों हमारे देश की आम जनता आयकर जमा कराना अपना कर्तव्य नहीं समझती? यहां ‘कर चोरों’ की तादाद अनगिनत होगी। बहरहाल, अब आयकर के दायरे में ज्यादा से ज्यादा लोगों को लाने के लिए आयकर विभाग ने अपना नया अभियान शुरू किया है।
इस अभियान के तहत उसने मौजूदा वित्तवर्ष में एक करोड़ नए लोगों से कर वसूलने का क्षेत्रवार लक्ष्य तय किया है। मसलन, पुणे को दस लाख नए लोगों को कर के दायरे में लाने का लक्ष्य दिया गया है। इसी तरह जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब और हरियाणा को 9.30 लाख तो आंध्र प्रदेश और तेलंगाना को 7.93 लाख नए आयकरदाता जोड़ने का लक्ष्य दिया गया है। ऐसे ही लक्ष्य अन्य क्षेत्रों को दिए गए हैं।

आयकर विभाग को यह अभियान छेड़ने की जरूरत इसलिए पड़ी कि देश में ऐसे लोगों की तादाद काफी है, जो अच्छी-खासी कमाई के बावजूद कर नहीं चुकाते। अब विभाग ऐसे लोगों की न सिर्फ पहचान करेगा, बल्कि उनसे जुर्माने समेत कर वसूलेगा भी। इसलिए कि लोगों की बढ़ती आमदनी के बावजूद देश में आयकर चुकाने वालों की संख्या उस अनुपात में नहीं बढ़ रही है। यह जान कर ताज्जुब होता है कि सवा सौ करोड़ की आबादी वाले देश में आयकरदाताओं की संख्या सिर्फ चार करोड़ के आसपास है।

केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ‘कर चोरों’ के खिलाफ अभियान की बात कई बार कह चुके हैं। पिछले वित्तवर्ष में आयकर विभाग द्वारा एक हजार से ज्यादा जगहों पर छापेमारी की गई और कर चोरी करने वालों के खिलाफ सौ से ज्यादा शिकायतें दर्ज की गर्इं। इससे साफ है कि आमदनी छिपाने और कर चुराने वाले अब ज्यादा दिन बच नहीं पाएंगे। आयकर विभाग अब उन छोटे शहरों पर भी ध्यान केंद्रित करेगा, जहां हाल के बरसों में हुई तरक्की के साथ-साथ समृद्धि भी आई है, लेकिन उस अनुपात में उन शहरों से उतना कर नहीं आया या नए करदाता नहीं जुड़े।

भारत में करीब तीन फीसद लोग ही आयकर जमा करते हैं। विकसित देशों की तुलना में यह आंकड़ा कहीं नहीं ठहरता। कई विकासशील देशों की तुलना में भी हमारे यहां आयकर अदा करने वाले काफी कम हैं।

यह सही है कि हमारी आबादी का एक बड़ा हिस्सा इतना भी नहीं कमा पाता कि वह करदाताओं की श्रेणी में आ पाए। तमाम तरक्की और बढ़ते शहरीकरण के बावजूद हमारी आबादी का एक बड़ा हिस्सा विकास से कोसों दूर, ग्रामीण क्षेत्रों में रहता है। यहां लोगों के पास इतना पैसा नहीं होता है कि वे कर दे सकें। पर यह तस्वीर का सिर्फ एक पहलू है।

नब्बे के दशक में देश में आर्थिक उदारीकरण के बाद नौकरी से लेकर अपने व्यवसाय से अच्छी-खासी कमाई करने वालों की संख्या में बड़ा इजाफा हुआ है। सिर्फ महानगरों नहीं, छोटे शहरों में नए बनते आलीशान मकान, शॉपिंग मॉल से लेकर सड़कों पर दौड़ने वाली कारें खुद बयान कर देती हैं कि पिछले बीस-पच्चीस सालों में अच्छा-खासा कमाने वालों की तादाद कई गुना बढ़ी है। डेढ़-दो दशक पहले कितने लोगों के पास अपनी कारें थीं? कितने लोगों के पास अपना मकान था? कितने लोग हवाई यात्रा करते और छुट््टी मनाने विदेश जाते थे? पर जब आयकर भरने वालों का आंकड़ा सामने आता है, तो बड़ा फर्क नजर आता है।

साफ है कि ऐसे लोगों की बड़ी तादाद है, जिनकी खर्च करने की क्षमता बढ़ी है, समृद्धि बढ़ी है, लेकिन जो अपनी आमदनी की घोषणा करने में कोताही बरतते हैं, कर भरने से बचते हैं। पिछले डेढ़-दो दशक में देश में मध्यम और उच्च मध्यवर्ग का तेजी से विस्तार हुआ है, लेकिन आयकरदाताओं की संख्या उस अनुपात में नहीं बढ़ी है।

देश में हर साल करोड़पतियों की संख्या बढ़ रही है। लेकिन, कर संग्रह के मोर्चे पर यह नजर नहीं आता। कुछ दिनों पहले जारी एक रिपोर्ट के अनुसार भारत करोड़पतियों के मामले में दुनिया में दसवें स्थान पर पहुंच चुका है। दुनिया भर के अमीरों पर शोध करने वाली संस्था न्यू वर्ल्ड वेल्थ और एलआइओ ग्लोबल द्वारा जारी एक संयुक्त रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल तक भारत में दो लाख छब्बीस हजार आठ सौ करोड़पति थे। लेकिन हैरानी की बात है कि 2013 में देश में सिर्फ बयालीस हजार आठ सौ लोगों ने स्वीकार किया था कि उनकी वार्षिक आय एक करोड़ से ज्यादा है। दो आंकड़ों के बीच इतना बड़ा फर्क समझ नहीं आता।

भारत के करोड़पतियों के बारे में यह पहली रिपोर्ट नहीं है। ऐसी रिपोर्ट पिछले कई सालों से आ रही है। हाल के वर्षों में आलीशान मकानों और गाड़ियों की बिक्री में आया उछाल भी बताता है कि देश में मोटा पैसा कमाने वालों की संख्या में खासी बढ़ोतरी हुई है। लेकिन कर के मोर्चे पर यह नहीं दिखता तो कहीं न कहीं खामी है। साफ है कि ऐसे बहुत सारे लोग हैं, जो अपनी सही आमदनी नहीं बताना चाहते।

आयकर अदा करने के मामले में सिर्फ नौकरी-पेशा लोग ईमानदारी दिखाते हैं। दरअसल, टीडीएस की अनिवार्यता की वजह से उनके नियोक्ता ही उनके लिए यह काम कर देते हैं। व्यक्तिगत आयकरदाताओं में आधे से ज्यादा वेतनभोगी कर्मचारी हैं, लेकिन इनमें से ज्यादातर की आमदनी पांच लाख तक है।

दरअसल, कर न देने वाले तबके में ज्यादातर वे लोग हैं जो नगद व्यापार करते हैं। इसमें वे रेस्तरां चलाने वाले, किराना स्टोर के मालिक और सेवाएं मुहैया कराने वाले भी हैं, जिनकी रोजाना अच्छी बिक्री है, लेकिन कोई हिसाब नहीं रखते। आयकर विभाग के पास अब ऐसे कई तरीके हैं, जिनके जरिए वह कर चोरों तक पहुंच सकता है। अच्छी बात यह है कि पिछले कुछ समय में उसकी कवायद के अच्छे नतीजे आने भी शुरू हो गए हैं।

जब भी आयकर की बात उठती है, किसानों पर भी कर लगाने का सुझाव आता है। पार्थसारथी शोम की अध्यक्षता वाले कर प्रशासन और सुधार आयोग ने कुछ माह पहले वित्त मंत्रालय को सौंपी अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की थी कि बड़े किसानों को भी कर के दायरे में शामिल किया जाना चाहिए। अगर सरकार आयोग की सिफारिशों पर अमल करती है, तो बड़े किसान कर के दायरे में आ जाएंगे। अभी ग्रामीण इलाकों में बहुत कम परिवार आयकर देते हैं और इनमें से दस फीसद वेतनभोगी हैं।

शोम समिति के अनुसार जिन किसानों के पास जमीन के बड़े पट्टे हैं और जिनकी वार्षिक आय पचास लाख रुपए से अधिक है, उन पर कर लगाया जाना चाहिए। इससे करदाता आधार विस्तृत होगा। दरअसल, किसानों से जुड़ा मसला काफी संवेदनशील है। खेती-बाड़ी कोई बड़े लाभ का सौदा नहीं है। वैसे भी बड़े किसान हैं ही कितने। और दिल्ली या बड़े शहरों के आसपास जो किसान समृद्ध दिखाई दे रहे हैं, या तो उनकी जमीन अधिग्रहीत हो चुकी है या फिर वे खुद उसे बेच चुके हैं। उनकी समृद्धि खेती से नहीं, अन्य कारणों से है। अन्य कारणों में व्यवसाय से लेकर मकान, गोदाम का किराया तक शामिल है। इस मसले पर बेहतर यही होगा कि स्वस्थ बहस हो जाए।

कर चोरी से देश को हर साल करोड़ों रुपए का नुकसान होता है। दरअसल, कर चोरी करने वालों के खिलाफ पकड़े जाने पर जुर्माने की राशि कम होना, कठोर दंड न होना आदि वजहों से बहुत से लोगों में यह धारणा घर कर गई है कि अभी कर क्यों भरें, जब मामला पकड़ में आएगा तब देखेंगे। पकड़ में आने पर ले-देकर मामला निपटाने से भी इस प्रवृत्ति ने जोर पकड़ा है।

कर दायरे में ज्यादा से ज्यादा लोग तभी आ पाएंगे, जब उन्हें भारी जुर्माने या कठोर दंड का डर होगा। बेशक कर न भरने वालों को इस बात का डर होना चाहिए कि कर नहीं देंगे तो फंस जाएंगे। पर ईमानदारी से कर देने वालों को प्रोत्साहन देने, सम्मान देने की भी जरूरत है। लोगों को यह बताने की जरूरत है कि उनका दिया कर किस तरह देश के विकास में मददगार बनता है। जब लाखों लोग गैस सबसिडी छोड़ सकते हैं, तो कोई वजह नहीं बनती कि ईमानदारी से कर देने के लिए आगे न आएं। जरूरत सिर्फ उन्हें प्रेरित करने और यह समझाने की है कि जो पैसा वे कर के रूप में दे रहे हैं वह उनके इलाके, प्रदेश और देश के विकास यानी उन्हीं पर खर्च हो रहा है।
(लेखक राज्यसभा सांसद हैं)

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