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जॉर्ज की कुछ यादें

के. विक्रम राव आज (तीन जून) बागी लोहियावादी जॉर्ज मैथ्यू फर्नांडीज पचासी के हो गए हैं। पर उन्हें पता नहीं है। स्मृति-लोप के कारण। जिस युवा समाजवादी द्वारा बंद के एक एलान पर सदा गतिमान, करोड़ की आबादी वाली मुंबई सुन्न पड़ जाती थी। जिस मजदूर पुरोधा के एक संकेत पर देश में रेल का […]

Author June 3, 2015 5:54 PM

के. विक्रम राव

आज (तीन जून) बागी लोहियावादी जॉर्ज मैथ्यू फर्नांडीज पचासी के हो गए हैं। पर उन्हें पता नहीं है। स्मृति-लोप के कारण। जिस युवा समाजवादी द्वारा बंद के एक एलान पर सदा गतिमान, करोड़ की आबादी वाली मुंबई सुन्न पड़ जाती थी। जिस मजदूर पुरोधा के एक संकेत पर देश में रेल का चक्का जाम हो जाता था। जिस सत्तर वर्षीय पलटन मंत्री ने करगिल की अठारह बार यात्रा कर पाक सेनाध्यक्ष परवेज मुर्शरफ को पटकनी दी थी। सरकारें बनाने-उलटने का दंभ भरने वाले कॉरपोरेट बांकों को उनके सम्मेलन में ही जिस उद्योगमंत्री ने तानाशाह (इमरजेंसी में) के सामने हड़बड़ाते हुए चूहों की संज्ञा दी, आज वही पुरुष सुधबुध खोए, दक्षिण दिल्ली के पंचशील पार्क में क्लांत जीवन बसर कर रहा है। आस-पड़ोस वाले पता भी नहीं बता पाते।

लेकिन जॉर्ज के देश भर में फैले मित्र याद करते हैं, नम आंखों से। विशेषकर श्रमिक नेता विजय नारायण (काशीवासी) और साहित्यकार कमलेश शुक्ल जो मेरे साथ तिहाड़ जेल में बड़ौदा डायनामाइट केस में जॉर्ज के चौबीस सहअभियुक्तों में रहे। अपने बावन वर्षों के सामीप्य पर आधारित स्मृतियां लिए एक सुहृद को याद करते मेरे इस लेख का मकसद यही है कि कुछ उन घटनाओं और बातों की चर्चा हो, जो अनजानी रहीं। काफी अचरज भरी रहीं।

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मसलन यही जून का महीना था। चालीस साल बीते। दौर इमरजेंसी का था। दो लाख विरोधी सीखचों के पीछे ढकेल दिए गए थे। कुछ ही जननेता कैद से बचे थे। नानाजी देशमुख, कर्पूरी ठाकुर आदि। जॉर्ज की खोज सरगर्मी से हो रही थी। उस दिन (10 जून 1976) की शाम को बड़ौदा जेल में हमें जेल अधीक्षक ने बताया कि कलकत्ता में जॉर्ज को पकड़ लिया गया है। तब तक मैं अभियुक्त नंबर एक था। मुकदमों का शीर्षक भारत सरकार बनाम मुलजिम विक्रम राव तथा अन्य था। फिर क्रम बदल गया। जॉर्ज का नाम मेरे ऊपर आ गया। तिहाड़ जेल में पहुंचने पर साथी विजय नारायण से जॉर्ज की गिरफ्तारी का सारा किस्सा पता चला।

कोलकाता के चौरंगी के पास संत पॉल कैथिड्रल है। बड़ौदा, फिर दिल्ली से भागते हुए जॉर्ज ने कोलकाता के चर्च में पनाह पाई। कभी तरुणाई में बंगलोर में पादरी का प्रशिक्षण ठुकराने वाले, धर्म को बकवास कहने वाले जॉर्ज ने अपने राजनेता मित्र रूडोल्फ राड्रिक्स की मदद से चर्च में कमरा पाया। रूडोल्फ को 1977 में जनता पार्टी सरकार ने राज्यसभा में एंग्लो-इंडियन प्रतिनिधि के तौर पर मनोनीत किया था। सभी राज्यों की पुलिस और सीबीआइ के टोहीजन शिकार को सूंघने में जुटे रहे। शिकंजा कसता गया। चर्च पर छापा पड़ा। पादरी विजयन ने जॉर्ज को छिपा रखा था। पुलिस को बताया कि उनका ईसाई अतिथि रह रहा है। पर पुलिसिया तहकीकात चालू रही।

कमरे में ही एक छोटे-से बक्से में एक रेलवे कार्ड मिला। वह ऑल इंडिया रेलवेमेंस फेडरेशन के अध्यक्ष का प्रथम एसी वाला कार्ड पास था। नाम लिखा था जॉर्ज फर्नांडीज। बस पुलिस टीम उछल पड़ी, मानो लॉटरी खुल गई हो। तुरंत प्रधानमंत्री कार्यालय से संपर्क साधा गया। बेशकीमती कैदी का क्या किया जाए? उस रात जॉर्ज को गुपचुप रूसी फौजी जहाज इल्यूशिन से दिल्ली ले जाया गया। इंदिरा गांधी तब मास्को के दौरे पर थीं। उनसे फोन पर निर्देश लेने में समय लगा।

इस बीच पादरी विजयन ने कोलकाता में ब्रिटिश और जर्मन उपराजदूतावास को बता दिया कि जॉर्ज कैद हो गए हैं। खबर लंदन और बॉन पहुंची। ब्रिटिश प्रधानमंत्री जेम्स कैलघन, जर्मन चांसलर विली ब्रांट और नार्वे के प्रधानमंत्री ओडवार नोर्डी जो सोशलिस्ट इंटरनेशनल के नेता थे, ने एक साथ इंदिरा गांधी को मास्को में फोन पर गंभीर परिणामों से आगाह किया, अगर जॉर्ज का एनकाउंटर कर दिया गया तो। वरना जॉर्ज की लाश तक न मिलती। गुमशुदा दिखा दिया जाता। वे बच गए और तिहाड़ जेल में रखे गए।

जॉर्ज की राजनेता वाली ओजस्विता तिहाड़ जेल में हमारे बड़े काम आई। दशहरे का पर्व आया (अक्तूबर 1976)। तय हुआ कि अखंड मानस पाठ किया जाए। पूर्वी रेल यूनियन के नेता महेंद्र नारायण वाजपेयी ने संचालन संभाला। मानस की प्रतियां भी आ गर्इं। आसन साधा गया। मुश्किल आई कि हम हिंदू जन केवल आधे-पौन घंटे की क्षमता वाले ही थे। कम से कम दो-तीन घंटे का माद्दा केवल जॉर्ज में था। आखिर श्रमिक रैली, चुनावी सभाओं और लोकसभा में भाषण की आदत तो थी ही।

तय हुआ कि जॉर्ज को पाठ के लिए चौबीस में से बारह घंटे चार दौर में आबंटित किए जाएं। शेष हम बारह लोग एक-एक घंटे तक दो किस्तों में पाठ करें। इनमें थे सर्वोदयी प्रभुदास पटवारी जो तमिलनाडु के राज्यपाल बने, और प्रधानमंत्री फिर बनते ही इंदिरा गांधी ने उन्हें बर्खास्त कर दिया था। (स्वर्गीय) वीरेन शाह थे। नामी-गिरामी उद्योगपति और भाजपाई सांसद, जो पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रहे। दोहों के उच्चारण, लय और शुद्धता में कमलेश शुक्ल माहिर रहे।

आखिर पूर्वी उत्तर प्रदेश के विप्रशिरोमणि हैं। विजय नारायण, महेंद्र नारायण वाजपेयी, वकील जसवंत चौहान बड़े सहायक रहे। तभी भारतीय जनसंघ (तब भाजपा जनमी नहीं थी) के विजय मल्होत्रा, मदनलाल खुराना और प्राणनाथ लेखी, अकाली दल के प्रकाश सिंह बादल आदि भी हमारे सत्रह नंबर वार्ड में यदा-कदा आते थे। एक बार हम सबको भोजन करते समय ये राजनेता ‘त्वदीयं वस्तु गोविन्दं’ उच्चारते देख कर अचरज में पड़ गए। वे समझते थे कि लोहिया के सब अनुयायी अनीश्वरवादी होते हैं।

लोहिया का चेला हो और विवादित व्यक्तित्व वाला न हो? नामुमकिन। भ्रष्टाचार के तीन भयंकर आरोप लगे थे जॉर्ज पर। करगिल के शहीदों की लाशें लाने के लिए विदेश से अल्यूमिनियम के ताबूत का आयात किया गया। आरोप था कि इनकी खरीद में लूट हुई है। जॉर्ज को सोनिया गांधी ने ‘कफन चोर’ कहा था। ‘तहलका’ ने एक स्टिंग ऑपरेशन में शस्त्रों की खरीद में दलाली का आरोप दिखाया। इजराइल से शस्त्र खरीदने में भी रिश्वत का आरोप लगाया गया।

सबकी सीबीआइ ने जांच की। रक्षा विशेषज्ञ एपीजे अब्दुल कलाम, जो बाद में राष्ट्रपति बने, ने गवाही दी थी। सोनिया-नीत यूपीए सरकार ने चार वर्ष तक जांच को टाला। अंतत: सीबीआइ ने तीनों मामलों में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बता दिया कि जॉर्ज फर्नांडीज निरपराध हैं। जॉर्ज दोषमुक्त करार दिए गए।

मुंबई की चौपाटी के बेंच पर खुले आसमान तले जवानी बिता देने वाले विपन्न जॉर्ज फर्नांडीज का मुंबई महानगर पालिका के पार्षद से लोकसभा पहुंचने का किस्सा भी इतिहास का दस्तावेज है।

मुंबई में चौथे लोकसभा चुनावों (1967) में सबसे ज्यादा दिलचस्प मुकाबला था दक्षिण मुंबई में। बेताज के बादशाह, केंद्र सरकार के वरिष्ठ मंत्री एसके पाटील का सामना था नगर पार्षद और श्रमिक पुरोधा जॉर्ज फर्नांडीज से।
तीन लोकसभा चुनावों में अपार बहुमत से जीतने वाले सदाशिव कान्होजी (सदोबा) पाटील चौथी बार दक्षिण मुंबई क्षेत्र से कांग्रेस के प्रत्याशी थे। इंदिरा गांधी मंत्रिमंडल में वे दमदार मंत्री थे।

बात दिसंबर 1966 की है। सदोबा पाटिल से मिलने हम संवाददाता प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में खबर की खोज में गए। उन्होंने विदेश नीति से लेकर खाद्य नीति तक अपने पांडित्यपूर्ण विचार बेलौस व्यक्त किए, हालांकि ये विषय उनके मंत्रालय से नहीं जुड़े थे। बयान तब भाषणनुमा हो रहा था। तभी मैंने उनसे पूछा कि लोकसभा चुनाव की घोषणा चंद हफ्तों में होने वाली है। आप क्या फिर दक्षिण मुंबई से ही उम्मीदवारी करेंगे। कुछ अचंभे के साथ वे बोले- ‘और कहां से फिर?’ मैंने पूछा कि ‘यों तो आप अजेय हैं, पर इस बार लोहियावादी जॉर्ज फर्नांडीज आपको टक्कर देने वाले हैं।’ तनिक भौं सिकोड़ कर पाटील बोले, ‘कौन है यह फर्नांडीज? वही म्यूनिसिपल पार्षद?’ मेरा अगला वाक्य था, ‘आप तो महाबली हैं। आपको तो बस आपसे भी बड़ा महाबली ही हरा सकता है।’ कुछ मुदित मुद्रा में वे बोले, ‘मुझे तो भगवान भी नहीं हरा सकते हैं।’

उस जमाने में रिपोर्टरों के पास टेप रिकॉर्डर नहीं होता था। अत: जैसे ही बयान पर विवाद उठा कि राजनेता साफ मुकर जाते थे और हम रिपोर्टरों की शामत आ जाती थी। इसीलिए बाहर निकल कर मैंने अपने संवाददाता साथियों से नोट्स मिलाए। तय हुआ कि हम सबकी रपट का इंट्रो (प्रथम पैराग्राफ) होगा कि सादोबा पाटील ने कहा कि ‘भगवान भी उन्हें नहीं हरा सकता है।’ अगली सुबह मुंबई के सभी दैनिकों में यही सुर्खी थी। जॉर्ज, जिनका पार्षद कार्यालय मेरे आफिस टाइम्स ऑफ इंडिया भवन से लगा हुआ था, से मैं मिला और उन्हें हिंदू भगवानों के अवतारों के किस्से बताए। फिर कहा कि वे वामनावतार ले और विरोचनपुत्र दैत्यराज महाबली बलि (पाटिल) से भिड़ें। जॉर्ज तब सैंतीस वर्ष के थे। श्रमिक पुरोधा थे। तय कर लिया सब साथियों ने कि पाटील को टक्कर दी जाए।

यह कहानी थी दीये की और तूफान की। अभियान सूत्र मात्र एक वाक्य था: ‘पाटिल कहते हैं कि उन्हें भगवान भी नहीं हरा सकता है।’ फिर इसके बाद सात किस्तों में पोस्टर निकले। पहला था, ‘क्या पाटील को साक्षात परमेश्वर भी नहीं हरा सकते?’ और अंतिम पोस्टर था, ‘अब मुकाबला पाटील बनाम आमजन है।’ फिर मतदान के परिणाम आए। जॉर्ज को 48.5 प्रतिशत वोट मिले। महाबलवान अहंकारी अजेय एसके पाटील चालीस हजार वोटों से हारे।

एक बात जॉर्ज के बारे में और। समाजवादी हो और आतिशी न हो? यह तो उनकी फितरत है। जॉर्ज के रक्षामंत्री के आवास (तीन कृष्ण मेनन मार्ग) में बर्मा के विद्रोहियों का दफ्तर खुल गया। ये लोग फौजी तानाशाहों के विरुद्ध मोर्चा खोले थे। तिब्बत में दलाई लामा की घर वापसी का समर्थन और उनके आप्रवासियों को धन-मन से जॉर्ज मदद करते रहे।

अंडमान के समीप भारतीय नौसेना ने शस्त्रों से लदे जहाज पकड़े, जो अराकान पर्वत के मुसलिम विद्रोहियों के लिए लाए जा रहे थे। जॉर्ज ने जलसेना कमांडर को आदेश दिया कि ये जहाज रोके न जाएं। श्रीलंका के तमिल विद्रोहियों ने अपने दिवंगत नेता वी प्रभाकरण के बाद जॉर्ज को अपना सबसे निकट का हमदर्द माना था। सच्चा समाजवादी दुनिया के हर कोने में हो रहे प्रत्येक विप्लव, विद्रोह, क्रांति, उथल-पुथल, संघर्ष और गदर का समर्थक होता है। क्योंकि उससे व्यवस्था बदलती है, सुधरती है। जॉर्ज सदा बदलाव के पक्षधर रहे। इसलिए आज भी आम जन के वे मनपसंद राजनेता हैं।

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