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फ्रांस की क्रांति और पश्चिमी सभ्यता

बनवारी पश्चिमी सभ्यता के वर्तमान स्वरूप को समझने के लिए फ्रांस और उसकी 1789 से 1799 के बीच हुई क्रांति पर दृष्टि डालनी चाहिए। पश्चिम के लिए यह युगांतरकारी घटना थी, जिसने उसके फ्यूडल ढांचे को बिल्कुल नया स्वरूप दे दिया। आज पश्चिम में जो भी राज्य व्यवस्थाएं हैं उनका मूल उन क्रांतिकारी दस वर्षों […]

Author April 21, 2015 10:20 PM

बनवारी

पश्चिमी सभ्यता के वर्तमान स्वरूप को समझने के लिए फ्रांस और उसकी 1789 से 1799 के बीच हुई क्रांति पर दृष्टि डालनी चाहिए। पश्चिम के लिए यह युगांतरकारी घटना थी, जिसने उसके फ्यूडल ढांचे को बिल्कुल नया स्वरूप दे दिया। आज पश्चिम में जो भी राज्य व्यवस्थाएं हैं उनका मूल उन क्रांतिकारी दस वर्षों की उथल-पुथल और वैचारिक आलोड़न में पाया जा सकता है। उस क्रांति ने केवल आज के पश्चिमी प्रजातंत्रों का मार्ग ही प्रशस्त नहीं किया, साम्यवादी राज्य व्यवस्थाओं की मूल प्रेरणाएं भी उसी क्रांति से निकली हैं।

कार्ल मार्क्स ने तो केवल उन्हें एक शास्त्रीय स्वरूप दिया था। अगर हम पश्चिम के पिछली दो शताब्दियों के राजनीतिक रूपांतरण को समझना चाहते हैं तो हमें फ्रांस की इस क्रांति और उसके बाद की घटनाओं पर अपने सौ-दो सौ गंभीर अध्येताओं को लगाना चाहिए। इस क्रांति ने यूरोप में पहली बार स्वतंत्रता, कानून के सामने समानता और बंधुत्व को राजनीतिक मूल्य के रूप में स्थापित किया। इनमें से पहले दो पूंजीवादी देशों और अंतिम साम्यवादी देशों का आधार बना।

उस समय फ्रांस यूरोप का सबसे महत्त्वपूर्ण राज्य था। जनसंख्या में केवल रूस उससे बड़ा था और उस समय ब्रिटेन की जनसंख्या उसकी चौथाई ही थी। लेकिन ब्रिटेन के हाथों उसे 1763 के बाद यूरोप से बाहर सैनिक विस्तार में कुछ पराजय झेलनी पड़ी थी। फिर भी फ्रांस ही यूरोप की आंतरिक व्यवस्थाओं की वास्तविक झलक प्रदान करता था। फ्रांस में चर्च और अभिजात वर्ग का नियंत्रण जितना रूढ़ था उतनी ही उग्रता से उसके विरुद्ध विचार व्यक्त किए जा रहे थे। राज्य की लगभग चालीस प्रतिशत भूमि का स्वामी चर्च था और शेष अधिकांश भूमि का स्वामी अभिजात्य वर्ग था। भारत में इस फ्यूडल तंत्र को समझने में एक तरह की नादानी दिखाई जाती रही है, क्योंकि हमको कभी उसका अनुभव नहीं हुआ। भारत में परंपरा से किसान सदा स्वतंत्र रहे हैं और अपनी भूमि के स्वामी भी। वे राजतंत्र को उसकी सेवाओं के बदले अपनी उपज का एक भाग देते रहे हैं, लेकिन राजतंत्र उनका उपकरण था, वे राजतंत्र के उपकरण नहीं थे।

यूरोप के मध्ययुग को समझने के लिए हमें उसके सामाजिक इतिहास की झलक देने वाली पुस्तकों को पढ़ना चाहिए, जिनमें वहां की व्यवस्थाओं की अधिक बारीक जानकारी होती है। ऐसी ही एक पुस्तक पीटर मैक्फी की ‘ए सोशल हिस्ट्री आॅफ फ्रांस, 1789-1914’ है। उसका पहला अध्याय एक सेन्योर अर्थात भू-स्वामी और एक किसान के बीच के अनुबंध को अदालत का ठप्पा लगवाने के वर्णन से आरंभ होता है। किसान सेन्योर से तीस हेक्टेयर भूमि और उससे जुड़े पशुओं और मुर्गी आदि से संबंधित बटाई के लिए अनुबंध करता है। यह भूमि पांच परिवारों के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त अनाज पैदा करने वाली थी। सेन्योर किसान से बीस प्रतिशत अग्रिम ले लेता है और शेष जो भी उपज हो उसका आधा उसे मिलना है। किसान अपने भाग से अगले वर्ष के लिए बीज निकाल कर पंद्रह प्रतिशत ही बचा पाने की स्थिति में था, जो उसके परिवार के भरण-पोषण के लिए अपर्याप्त था। यूरोप के अधिकतर किसान या तो सर्फ (भूदास) थे या उन जैसी गरीबी में रहने वाले इसी तरह के बटाईदार।

फ्रांस में शेष यूरोप की तरह राजा की स्थिति सर्वोपरि थी। फ्रांस के सभी लोग तीन वर्गों, तीन एस्टेट में परिगणित थे। पहले वर्ग में चर्च के बड़े और छोटे अधिकारी आते थे, जो जनसंख्या का लगभग आधा प्रतिशत बैठते थे। उनकी आय में भी विशाल अंतर था। स्टॉसबर्ग के आर्कबिशप की आय साढ़े चार लाख तब की फ्रांसीसी मुद्रा थी तो चर्च के स्थानीय अधिकारी की साढ़े सात सौ और विकार की तीन सौ। दूसरे वर्ग में राजसत्ता का आधार अभिजात्य वर्ग था, जो जनसंख्या के दो प्रतिशत जितना था।

बाकी लगभग 97 प्रतिशत लोग या तो ग्रामीण किसान थे या नगर के व्यवसायी और मजदूर। लगभग तीस प्रतिशत आबादी भूमिहीन मजदूर थी और उनमें से ही शहरी मजदूर निकलते थे। इसके बाद फ्रांस के नियंत्रण में आई कॉलोनियों के दास थे, जिनकी स्थिति फ्रांस के भूदासों से भी बदतर थी। चर्च और अभिजात्य वर्ग को राजकीय करों से छूट थी और सभी करों का बोझ शेष लोगों पर ही था।

इन्हीं अमानवीय परिस्थितियों की प्रतिक्रियास्वरूप वॉल्तेयर (1694-1778) जैसे विचारक पैदा हुए। फ्रांस में ही नहीं, पूरे यूरोप में अब तक जितना उन पर लिखा गया है, कम ही लोगों पर लिखा गया है। उन्होंने चर्च, ईसाई धर्म और यूरोप के राजतंत्र की जमकर निंदा की है और उनके विचारों में इतनी उग्रता थी कि उनसे चर्च और राजतंत्र को उखाड़ फेंकने की प्रेरणा मिलती थी, लेकिन हिंदू धर्म में उन्हें बंधुता के साथ-साथ अनेक दूसरी अच्छाइयां दिखाई दीं। वे शाकाहारी थे और पशुओं के प्रति संवेदनशील। राजधर्म के संदर्भ में उन्होंने कन्फ्यूशियस की प्रशंसा की है। उन्होंने लिखा है कि सभ्यता के मामले में यूरोप को पूर्व से सीखने की आवश्यकता है।

फ्रांस की क्रांति जब आरंभ हुई तब तक वॉल्तेयर और रूसो दोनों दिवंगत हो चुके थे। इस क्रांति के कारणों की ठीक-ठीक व्याख्या तो अब भी नहीं हो पाई, लेकिन उसके तात्कालिक कारणों की मीमांसा हुई है। ब्रिटेन से सतत स्पर्धा के कारण फ्रांस ने ब्रिटेन से स्वतंत्र होने के अमेरिकी युद्ध में सब तरह से सहयोग दिया था और उससे फ्रांस के राजकोष पर काफी दबाव बना था। उस पर विचार करने के लिए लगभग पौने दो सौ वर्ष बाद एस्टेट जनरल की बैठक बुलाई गई थी, जिसमें चर्च, राजतंत्रीय अभिजात्य और सर्वसाधारण के एक-एक तिहाई सदस्य थे। इसका मतलब यह कि उसमें ढाई प्रतिशत लोगों का दो तिहाई प्रतिनिधित्व था और साढ़े 97 प्रतिशत लोगों का एक तिहाई। करों का बोझ भी तीसरी एस्टेट पर ही पड़ता था इसलिए उन्होंने अधिक प्रतिनिधित्व और अधिक अधिकारों की मांग की और इसी पर गतिरोध पैदा हो गया। इसी क्रम में तीसरी एस्टेट के प्रतिनिधियों ने अपनी अलग बैठक करके उसे राष्ट्रीय सभा घोषित कर दिया और क्रांति का बिगुल फूंक दिया। उसी समय फ्रांस के लोगों के भोजन के आधार- ब्रेड- की भारी किल्लत हुई और उसकी छीन-झपट में पेरिस के साधारण लोगों का विद्रोह फूट पड़ा।

इस क्रांति की उग्रता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि यूरोप के इतिहास में पहली बार चर्च और राजतंत्र का नियंत्रण उखाड़ फेंका गया, जनता के शासन की घोषणा की गई। आरंभ में क्रांतिकारियों की मांग संवैधानिक राजतंत्र की ही थी, पर कालांतर में राजा को फांसी दे गई। क्रांति की एक के बाद एक उठती लहर ने पिछली लहर के नेताओं तक को प्रतिक्रांति के आरोप में गिलोटिन के सुपुर्द कर दिया। यह मृत्युदंड देने की नई पद्धति थी। उसे यातना कम करने के लिए उपयोग में लाया गया था, पर क्रांति के आवेश में सैकड़ों क्रांतिकारियों और हजारों दूसरे लोगों के सिर गिलोटिन की भेंट चढ़ गए। इसी से यह मुहावरा निकला है कि फ्रांस की क्रांति अंतत: अपने ही नायकों को खा गई।

फ्रांस की इस क्रांति में आप बूर्जुआ राजसत्ता के उदय की ही झलक नहीं पाते, स्टालिन के द्वारा प्रतिक्रांतिकारी बता कर अपने विरोधियों के सफाए और माओ त्से तुंग की सांस्कृतिक क्रांति का पूर्व-रूप भी पा सकते हैं। चर्च के विरुद्ध आक्रोश ने ईसाई कैलेंडर तक निरस्त करवा दिया था। उसकी जगह जो कैलेंडर घोषित हुआ उसमें वर्षक्रम ऋतुओं पर आधारित था और महीने को दस-दस दिन के तीन खानों में बांटा गया था ताकि सबाथ के दिन के रूप में संडे की झंझट ही न रहे और लोग चर्च न जाएं।

क्रांति की रौ में संबोधन के पुराने तरीके और मानक वेशभूषा को भी प्रतिक्रांतिकारी घोषित कर दिया गया था। चर्च और राजतंत्र ही नहीं, गिल्ड का नियंत्रण भी समाप्त कर दिया गया। यहां यह ध्यान देने की बात है कि अभिजात्य वर्ग के विशेषाधिकार समाप्त हुए, मगर भूमि पर स्वामित्व नहीं। लेकिन चर्च के स्वामित्व वाली भूमि छीन ली गई।

अराजकता का यह दौर दस वर्ष तक चला और फिर उसी से नेपोलियन का उदय हुआ, जिसने कालांतर में अपने-आपको सम्राट घोषित करके राजतंत्र लौटा दिया। उसके बाद प्रजातंत्र और राजतंत्र के अनेक दौर आए और गए। 1871 में स्थापित पेरिस कम्यून को समाप्त करने के लिए सेना ने तीस हजार लोगों को मौत के घाट उतार दिया। उसके बाद लगभग पचास हजार लोग या तो मार दिए गए या जेल में ठूंस दिए गए। यह उथल-पुथल का दौर डेढ़ सौ वर्ष तक चलता रहा और 1940 के बाद ही फ्रांस की राजनीतिक व्यवस्था स्थिर हुई।
फ्रांस की यह क्रांति जिस जनता के शासन की घोषणा से शुरू हुई थी, उसकी प्राप्ति छोटे-छोटे नार्डिक देशों को छोड़ कर न कहीं हुई और न कहीं होना संभव थी।

यूरोपीय राजनीतिक बुद्धि में शक्तितंत्र ऊपर से नीचे की ओर आता है, नीचे से ऊपर की ओर नहीं उठता। इसलिए इस क्रांति ने राजा का विशेषाधिकार समाप्त किया, पर राज्य की सर्वोपरिता और अधिक दृढ़ता से स्थापित कर दी। यह सर्वोपरिता पूंजीवादी देशों और साम्यवादी देशों सभी में एक जैसी है। अभिजात्य वर्ग की जगह बुर्जुआजी ने ले ली, जो आज उच्च-मध्य वर्ग के रूप में हर देश में फल-फूल रहा है। फ्रांस में उस समय नगरवासियों की जनसंख्या बीस प्रतिशत थी, जिनमें एक तिहाई मजदूर थे। आज भी औद्योगिक देशों में ऊपर के एक प्रतिशत के हाथों में राजनीतिक शक्ति और व्यावसायिक संपत्ति दोनों का नियंत्रण है, ऊपर के बीस प्रतिशत उच्च मध्य-वर्ग में आते हैं और उनका जीवन सुगम है, बाकी सबको संघर्ष ही करना पड़ता है। औद्योगिक वस्तुओं की कीमत सामान्यत: लागत का पांच गुना होती है, जिसका अर्थ यह है कि मजदूरों का भाग आज भी पांचवां हिस्सा ही है।

आज औद्योगिक देशों में स्लेवरी या सर्फडम नहीं है। लेकिन अधिकतर लोग दूसरे के कारोबार में वेतनभोगी हैं और उनका भाग्य अर्थव्यवस्था के ऊपर-नीचे होने से जुड़ा है। स्पेन की अर्थव्यवस्था में गिरावट आई तो उसके पच्चीस प्रतिशत युवा बेरोजगार हो गए। 1929 की मंदी के समय अमेरिका के आधे शहरी लोगों के रोजगार छिन गए थे। शक्ति केंद्र जब भी यूरोप-अमेरिका धुरी से बाहर जाएगा, ऊपर के एक प्रतिशत को छोड़ कर किसी का भाग्य सुनिश्चित नहीं रहेगा। उनके आर्थिक जीवन से ही उनका राजनीतिक जीवन भी जुड़ा है। यूरोपीय लोगों की राजनीतिक शक्ति गई तो वहां के सामान्य लोगों के नागरिक अधिकार की याद किसी को नहीं आएगी। इतिहास में आरोहण ही नहीं, अवरोहण भी होता है। हम इस ढांचे की नकल करके अपनी जनता को क्यों पराधीनता में डालना चाहते हैं।

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