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कास्त्रो का क्यूबा और अमेरिका

‘क्या सचमुच, बरसात के बाद घास फिर से उग आएगी?/ सचमुच, बसंत के बाद फूल फिर से खिल उठेंगे?/ क्या सचमुच, सलमन मछलियां लहरों पर फिर से मचलती मिलेंगी?/ सही है। सच है। सबकुछ चमत्कार है। /लेकिन क्या सचमुच हम ग्वांतानामो बे से रिहा हो जाएंगे?’ जार्डन के नागरिक उसामा अबू कबीर ने जेल में […]

Author July 28, 2015 11:03 AM

‘क्या सचमुच, बरसात के बाद घास फिर से उग आएगी?/ सचमुच, बसंत के बाद फूल फिर से खिल उठेंगे?/ क्या सचमुच, सलमन मछलियां लहरों पर फिर से मचलती मिलेंगी?/ सही है। सच है। सबकुछ चमत्कार है। /लेकिन क्या सचमुच हम ग्वांतानामो बे से रिहा हो जाएंगे?’ जार्डन के नागरिक उसामा अबू कबीर ने जेल में रहते ‘क्या यह सच है?’ कविता लिखी थी।

उसामा अबू कबीर अकेला कैदी नहीं था जिसने ग्वांतानामो में यातना सहते हुए कविताएं लिखी थीं। जुमा अल दोसारी, एमाद अब्दुल्ला हसन जैसे चंद और कैदियों ने भी ग्वांतानामो में सितम सहते हुए कविताएं लिखी थीं, जो दुनिया भर में पढ़ी गर्इं। बाईस जुलाई को वाइट हाउस के प्रवक्ता जोश अर्नेस्ट ने कहा कि ओबामा प्रशासन ग्वांतानामो जेल को बंद करने की प्रक्रिया के अंतिम दौर में है। इसका मतलब यह निकालें कि अमेरिका, ग्वांतानामो को क्यूबा के हवाले कर देगा?

चौवन साल बाद अमेरिका-क्यूबा ने कूटनीति के बंद दरवाजे खोले हैं। क्यूबा ऐसा तब कर रहा है, जब अमेरिका के विरुद्ध कैरेबियाई देशों की सबसे सशक्त आवाज रह चुके फिदेल कास्त्रो अभी जीवित हैं। पूरी दुनिया में कास्त्रो का अक्स इस तरह नुमाया रहा है, जैसे वह आखिरी सांस तक दबंग अमेरिका को नाकों चने चबवाते रहेंगे। सवा करोड़ की आबादी वाले क्यूबा का कद इस वास्ते बहुत बड़ा था। एक सौ बीस सदस्यीय गुटनिरपेक्ष आंदोलन के देशों को भी यही भ्रम था कि मरते दम तक कास्त्रो कुनबा अमेरिका के आगे मत्था नहीं टेकेगा।

नेहरू, नासिर, सुकर्णो, मार्शल टीटो गर्व से फूले नहीं समाए थे जब 1979 में फिदेल कास्त्रो ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन के मंच पर ऐतिहासिक भाषण दिया था। उसे हवाना घोषणापत्र नाम दिया गया। अब उसी हवाना घोषणापत्र की हवा निकली जा रही है। गुटनिरपेक्ष आंदोलन का ‘कोआर्डिनेटिंग ब्यूरो’ न्यूयार्क में है, और वहीं से एक सौ बीस देशों से संपर्क साधा जाता है। अब इसी से अंदाजा लगा सकते हैं कि निर्गुट आंदोलन कितना निर्गुट रह गया है।

सोमवार, 20 जुलाई 2015 को वाशिंगटन में जब क्यूबा दूतावास का कामकाज आरंभ हुआ, तो दुनिया भर के वामपंथी सोच रहे थे कि राउल कास्त्रो ने जो फैसला लिया है, उसका जवाब शेष दुनिया को कैसे देना है। यह दूसरा मौका है, जब दुनिया भर के वामपंथियों को राउल कास्त्रो ने किंकर्तव्यविमूढ़ किया है। वामपंथ में परिवारवाद का जीता-जागता उदाहरण राउल कास्त्रो तब बने जब फरवरी 2008 में फिदेल कास्त्रो ने उन्हें सत्ता सौंप दी थी। फिदेल कास्त्रो गंभीर रूप से बीमार पड़े, तो राउल कास्त्रो को विरासत संभालने का अवसर मिला। अमेरिका को यह ‘वामपंथी परिवारवाद’ तब क्यों पसंद आ रहा था, वह सात साल बाद अब समझ में आ रहा है।

यों हवाना स्थित अमेरिकी दूतावास, कामकाज आरंभ कर चुका है, फिर भी 14 अगस्त 2015 को अमेरिकी विदेशमंत्री जॉन कैरी हवाना में अमेरिकी दूतावास का औपचारिक उद्घाटन करेंगे। अगस्त की चौदह या पंद्रह तारीख शायद दुनिया भर में औपनिवेशिक देशों को रास आती है। बीते सत्रह दिसंबर को राउल कास्त्रो और राष्ट्रपति ओबामा ने इसकी औपचारिक घोषणा कर दी थी। राउल कास्त्रो ने रूस के साथ ‘कूटनीतिक फ्लर्ट’ किया है। ऐसा इसलिए लगता है कि ठीक एक साल पहले क्यूबा ने रूस के वास्ते ‘लाडर््स मिलिट्री बेस’ खोला था, जो कैरेबियाई द्वीप में सोवियत काल का महत्त्वपूर्ण खुफिया ठिकाना रहा।

शीतयुद्ध के दौर में सोवियत खुफिया के लोग लॉडर्स मिलिट्री बेस से अमेरिकी रेडियो और फोन द्वारा बातचीत को मॉनिटर करते थे। कोलंबिया विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के प्रोफेसर रॉबर्ट जेरविस की धारणा है कि रूस लॉडर्स मिलिट्री बेस का इस्तेमाल औद्योगिक खुफियागिरी करने के साथ-साथ बोलीविया और वेनेजुएला पर नजर रखने के वास्ते भी करना चाहता था, जो उसके पुराने कम्युनिस्ट सहयोगी थे।

पिछले साल अगस्त में रूसी राष्ट्रपति पुतिन क्यूबा गए थे। उस यात्रा में पुतिन ने सोवियत संघ के समय का नब्बे प्रतिशत कर्ज माफ कर दिया, जो करीब बत्तीस अरब डॉलर था। फरवरी 2013 में रूसी प्रधानमंत्री दिमित्री मेद्वेदेव ने क्यूबा को आठ रूसी जेट लीज पर दिए जाने के वास्ते हस्ताक्षर किए थे। अप्रैल 2013 में रूसी सेना प्रमुख जनरल वालेरी ने क्यूबा के कई खुफिया ठिकानों का सर्वेक्षण किया था।

फरवरी 2015 में रूसी युद्धपोत विक्टर लियोनोव सीसीबी-175 का क्यूबा के तट पर आना यही दर्शा रहा था कि रूस और क्यूबा की नजदीकियों में कोई कमी नहीं आएगी। सवाल यह है कि राउल कास्त्रो ने जिस तरह से राष्ट्रपति पुतिन को कूटनीतिक झटका दिया है, उससे क्यूबा को क्या ग्वांतानामो बे मिल जाना है?

ग्वांतानामो बे, पिछले एक सौ सत्रह सालों से अमेरिकी कब्जे में है। गहरे जल वाला बंदरगाह, शानदार सैनिक हवाई अड्डा, और प्रशस्त भूमि से समृद्ध ग्वांतानामो बे को अमेरिका क्यों और कैसे क्यूबा के हवाले कर दे? और क्या अमेरिकी संसद में ओबामा के विरोधी रिपब्लिकन इसके लिए तैयार हैं? अमेरिका ने जून 1898 के युद्ध में स्पेन से ग्वांतानामो बे को छीन लिया था। स्पेन से युद्ध में क्यूबा के गुरिल्लों ने अमेरिका का साथ दिया था। इस भरोसे के साथ कि अमेरिका, ग्वांतानामो बे को क्यूबा के हवाले कर देगा। लेकिन बहला-फुसला कर अमेरिका ने 1903 में ग्वांतानामो बे को क्यूबा से लीज पर ले लिया था।

फिदेल कास्त्रो 1959 में सत्ता में आए तो अमेरिका से ग्वांतानामो बे की वापसी को मुद्दा बना लिया। 1934 से पहले ग्वांतानामो बे दो हजार डॉलर सालाना की लीज पर था, उसे बढ़ा कर 4085 डॉलर सालाना कर दिया गया। पपेर्चुअल (सर्वकालिक) लीज समाप्त करने के वास्ते दोनों पक्षों की सहमति आवश्यक है। अमेरिका इसी बात का फायदा उठा रहा है। कास्त्रो के सत्ता में आने के बाद हर साल अमेरिका से ग्वांतानामो बे के लीज का चेक आता रहा। फिदेल कास्त्रो उस चेक को मेज की दराज में रख दिया करते थे। अमेरिकी चेक के आने, और उसे क्यूबाई राष्ट्रपति के दराज में रखने का अंतहीन सिलसिला जारी है।

ग्वांतानामो बे के बारे में पूरी दुनिया में एक ही तस्वीर बनी है कि अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान और मध्य-पूर्व से उठाए कैदी यहां रखे जाते हैं। एक सौ सोलह वर्ग किलोमीटर भूभाग वाला ग्वांतानामो कैरेबियाई इलाके का सबसे बड़ा अमेरिकी नौसैनिक अड््डा है। यहां पर अमेरिकी नौसेना का संचार, मौसम विज्ञान केंद्र और समुद्री सुरक्षा से जुड़ी अनगिनत इकाइयां हैं। इस समय कोई साढ़े सात हजार लोग ग्वांतानामो बे पर बसे हुए हैं।

ग्वांतानामो के पूर्वी सिरे पर सड़क से जुड़े बाराकोवा में कोई दो लाख लोग आबाद हैं। 1930 में ग्वांतानामो शहर कैरेबियन इलाके का सबसे बड़ा देह-व्यापार का केंद्र माना जाता था। अमेरिकी नौसैनिक यहां मौज-मस्ती के लिए बड़ी संख्या में उतरते थे। क्यूबा के कोई पैंतीस सौ कामगारों को यहां रोजगार का अवसर मिला हुआ था। जब फिदेल कास्त्रो की अमेरिकी राष्ट्रपति जॉनसन से ठन गई, तो क्यूबा के कामगारों का ग्वांतानामो द्वीप पर आना रुक गया। अब शायद क्यूबा के कामगारों का आना आरंभ हो जाए।

यों क्यूबा से अमेरिकी प्रतिबंध हटने का इंतजार राउल कास्त्रो को ही नहीं, वहां की नई पीढ़ी को भी है। सबसिडी और दान पर जीने वाले क्यूबा की घरेलू विकास दर 2014 में सिर्फ 1.2 फीसद रही। शायद इस साल के आखिर में क्यूबा का जीडीपी चार प्रतिशत पर पहुंच जाए। सवा करोड़ की आबादी वाले क्यूबा में चौंतीस हजार भारतवंशी हैं, जिनका कायाकल्प अमेरिकी प्रतिबंध के हटने और आर्थिक सुधार से होना है। 1992 में जब क्यूबा में अन्न संकट आया था, भारत से बीस हजार टन चावल और गेहूं भेजा गया था। फिदेल कास्त्रो ने उस सहयोग को ‘ब्रेड आॅफ इंडिया’ नाम दिया था।

अहम यह है कि अमेरिका से कूटनीतिक संबंध के बाद क्या क्यूबा में सत्तारूढ़ पीसीसी (पार्तिदो कम्युनिस्ता दे क्यूबा) का मिजाज बदलेगा? नई पीढ़ी एक पार्टी की तानाशाही और एक परिवार के शासन से ऊब चुकी है। 26 जुलाई 1959 की क्रांति के बाद फिदेल कास्त्रो सत्ता में आए। तब से 1980 तक क्यूबा से पलायन किए राजनीतिक शरणार्थी, साहित्यकार अमेरिका, मैक्सिको, कनाडा, स्वीडन, इटली जैसे देशों में आशियाना और आबोदाना के लिए बस गए।

यही फिदेल कास्त्रो और राउल कास्त्रो 1959 से पहले डेढ़ साल तक मैक्सिको में शरणार्थी रहे थे। मैक्सिको में ही कास्त्रो भाइयों की मुलाकात चे गेवारा से हुई थी। क्यूबा क्रांति में सहयोग जुटाने के लिए फिदेल कास्त्रो कुछ दिन अमेरिका में भी रहे। लेकिन उसी कास्त्रो कुनबे के कारण आज दस लाख से अधिक क्यूबाई नागरिक दूसरे देशों में शरणार्थी हैं। क्या वामपंथी मित्रों ने कभी इसे मुद््दा बनाया? विश्वविख्यात कवि खोसे मार्ती क्यूबा क्रांति के प्रतीक थे, लेकिन कला-साहित्य के प्रति कास्त्रो कुनबे की संवेदनहीनता उनके सत्ता में आने के बाद दिखने लगी।

इस पलायन का दूसरा पहलू यह है कि पूरी दुनिया की कला, संस्कृति और साहित्य को क्यूबा से निकले शरणार्थियों ने समृद्ध किया है। शायद इतनी बड़ी संख्या में साहित्यकार, रंगकर्मी स्पेन ने भी नहीं दिए। निकोलस गुइलन, फर्नान्डो आॅर्टिज, खोसे लेजामा लीमा, मार्लिन बॉब्स, आइदा बहर, अबीलियो एस्तावेज, मार्गरीटा एंजल जैसे साहित्य जगत के अनगिनत नाम हैं। शिल्पकार योआन कापोते, आर्मान्दो मारिनो, पेंटर रोबेर्तो फेबेलो, अलीसिया लील के लिए क्यूबा-वापसी सपना बन कर रह गया था। राजनीतिक कविताएं रचने वाली मार्गरेट रांडेल कुछ दिनों तक हवाना में रहीं। न्यूयार्क लौटीं, तो एक छोटी-सी कविता लिखी-‘मेरे हाथ मुफ्त का एक नरमुंड मिल गया। बिना जिल्द की कविताओं वाली पतली किताब की तरह!’

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