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जार की जुबान हिटलर का भूत

शरद यादव माननीय अध्यक्ष महोदय, लोकसभा। महानुभाव, मैं जबलपुर संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से लोकनायक जयप्रकाश के अनुयायी व जनता प्रत्याशी के रूप में लोकसभा हेतु निर्वाचित हुआ था। संविधान के उपबंधकों के अनुसार लोकसभा की अवधि पांच वर्ष होती है। वर्तमान लोकसभा की अवधि 18 मार्च 1976 को समाप्त होने जा रही है, और इस […]

Author June 24, 2015 5:21 PM

शरद यादव

माननीय अध्यक्ष महोदय, लोकसभा। महानुभाव, मैं जबलपुर संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से लोकनायक जयप्रकाश के अनुयायी व जनता प्रत्याशी के रूप में लोकसभा हेतु निर्वाचित हुआ था। संविधान के उपबंधकों के अनुसार लोकसभा की अवधि पांच वर्ष होती है। वर्तमान लोकसभा की अवधि 18 मार्च 1976 को समाप्त होने जा रही है, और इस तरह 18 मार्च को लोकसभा भंग कर दिया जाना चाहिए और नए चुनाव कराए जाने चाहिए थे क्योंकि जनता ने इस लोकसभा के लिए 18 मार्च 76 तक ही अपना आदेश प्रदान किया है।

इसके बावजूद भी श्रीमती इंदिरा गांधी की तानाशाह सरकार ने अपने क्रूर बहुमत के आधार पर संसद की अवधि एक वर्ष के लिए बढ़ाए जाने का प्रस्ताव पारित कर लिया। अल्पमतीय विरोध पक्ष के अधिकांश सदस्य गत नौ माह से जेल के सींखचों के अंदर हैं, वे इस घोर अप्रजातांत्रिक प्रस्ताव का विरोध तक नहीं कर सके या विरोध में मत नहीं दे सके। यह सब पाप आपातकाल के संवैधानिक उपबंध तथा संसद की अवधि बढ़ाए जाने के संवैधानिक उपबंध के नाम पर किया गया।

निसंदेह संविधान में आपातकाल लागू किए जाने का और आपातकाल में लोकसभा की अवधि बढ़ाए जाने का उपबंध है, पर क्या संविधान के अनुच्छेदों का पालन या क्रियान्वयन संविधान की मंशा के अनुकूल हो, खिलाफ न हो, यह संविधान के अनुसार जरूरी नहीं है। भारतीय दंड संहिता में भी किसी ऐसे व्यक्ति पर धारा 302 के अंतर्गत अभियोजन का प्रावधान है, जिसने हत्या का अपराध किया हो। पर क्या इस कानून या प्रावधान का अर्थ यह है कि सरकार किसी भी निर्दोष व्यक्ति पर धारा 302 के अंतर्गत मुकदमा चलाए। मेरे खयाल से नहीं, और अगर ऐसा मुकदमा चलाया जाए तो न्यायालय उसे असंवैधानिक और झूठा करार देकर रद््द कर सकता है। ठीक इसी तरह देश में जो आपातकाल लगा है, वह संविधान के उपबंधों तथा संविधान प्रदत्त शक्ति का क्रूर, असंवैधानिक, अनुचित, नीतिविहीन, अमानवीय दुरुपयोग है। अत: यह घोर असंवैधानिक भी है।

यह सब असंवैधानिक कार्य सरकार अपने क्रूर बहुमत के आधार पर कर रही है। देश न तो कोई युद्ध लड़ रहा है और न ही देश में गृहयुद्ध हो रहा है, न अशांति है, तो फिर यह आपातकाल और लोकसभा की अवधि क्यों बढ़ाई जाए? इसलिए कि सरकार महात्मा गांधी के विचार तथा अहिंसक अस्त्र सत्याग्रह को सदा-सदा के लिए दफनाना चाहती है, जिससे देश को आजादी मिली, जो देश के नवनिर्माण का, प्रजातंत्र का एकमात्र उपाय है और इंदिराजी आजीवन देश की रानी तथा राजाओं की तरह आनुवंशिक आधार पर राजगद््दी चलाना चाहती हैं। विरोध का गला घोंट कर शांत कर दिया गया है। यह प्रजातंत्र नहीं है और न ही अब जनतंत्र की संसद शेष बची है, बल्कि तानाशाह इंदिरा गांधी की गुलाम संसद है जो जनता का आदेश प्राप्त तारीख समाप्त होने के बाद भी केवल इसलिए चलाई जा रही है कि इंदिरा गांधी को अब जमानत का भरोसा नहीं रहा।

अत: वे इस संसद की अवधि बढ़ा कर जनता को प्रजातंत्र की लाश दिखाना चाहती हैं, तथा यह धोखा देना चाहती हैं कि देश में प्रजातंत्र अभी शेष है। जबकि वे प्रजातंत्र की हत्या कर चुकी हैं, प्रजातंत्र का अब क्या शेष बचा है? यह सवाल अब आपसे मैं और देश की जनता करती है। लाखों लोग जिनमें बहुतेरे विपक्ष के लोकसभा-राज्यसभा के सदस्य शामिल हैं, जेल में हैं। लोकसभा की कार्यवाही छापना अपराध बना दिया गया है, जो कि दंडनीय है, यानी अब लोकसभा जनता के लिए नहीं वरन इंदिरा गांधी का रसोईघर बन गई है, जहां केवल उनकी खिचड़ी पकेगी।

किसी भी निर्वाचित प्रतिनिधि से उसके क्षेत्र की जनता यह अपेक्षा करती है कि वह लोकसभा के माध्यम से जनभावनाएं सरकार तथा जनता के बीच पहुंचाए, देश के गरीब की पुकार संसद में गुंजाए, देश के शोषितों-पीड़ितों की चीख देश की जनता के बीच पहुंचाए, मजदूर के बोनस के हक की आवाज सरकार के बहरे कानों को सुनाए। पर क्या यह कर्तव्यपूर्ति अब संभव है? जो देशहित के सवाल हैं, उनके जवाब देना भी सरकार पसंद नहीं करती।

संसद जनता के लिए गूंगी, बहरी और अंधी बन गई है, जो सर्वोच्च न रह कर केवल इंदिराजी की सलाहकार की भूमिका अदा कर रही है और आपकी स्थिति भी दयनीय नजर आती है, जो सबल से बाध्य होकर कमजोर पर कोड़े बरसाते हैं। संसद में देश की जनता के हित के लिए काम नहीं हो रहा, वरन श्रीमती इंदिरा गांधी की कुर्सी बचाए रखने का या विरोधी सरकारें गिराने का या निर्दोष लोगों को गिरफ्तार रखने, तथा न्यायालयों के अधिकार सीमित करते हुए समाप्ति तक पहुंचाने का कार्य हो रहा है।

एक ओर सरकार कहती है कि देश में कोई भी अशांति या हिंसक घटना नहीं हुई है, दूसरी ओर आपातकाल जारी रखती है और इसी नाम पर एक वर्ष के लिए अवधि वृद्धि करती है। आज देश की जनता यह जानना चाहती है कि क्या यह आपातकाल लगाए जाने का या लोकसभा की अवधि बढ़ाए जाने का इंदिरा गांधी की कुर्सी बचाए रखने के अलावा कोई कारण है?

जब देश में सर्वत्र शांति है, तो फिर क्यों इसे हटा कर चुनाव नहीं कराए जाते? और फिर सरकार कहती है कि जनता का समर्थन सरकार के साथ है, तो बेहतर तो यह होता कि सरकार चुनाव करा कर यह जानने का प्रयास करती कि जनसमर्थन उसके साथ है या नहीं। जनता इस आपातकाल की नीति को पसंद करती है या नहीं। जनता समाचारपत्रों की आजादी समाप्त करने और वह आजादी जो संविधान के निर्माताओं ने, हमारे पुरखों ने, आंबेडकर, नेहरू, डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद, श्यामाप्रसाद मुखर्जी व फिरोज गांधी ने हमें निश्चित की थी, लाखों निर्दोषों को बंद करने, उनके साथ क्रूर व्यवहार करने, सेना और पुलिस द्वारा सशस्त्र दमन, श्रीमती गांधी के सरकारी तंत्र के दुरुपयोग, किसान, छोटे व्यापारी, छात्र, मजदूर, बेरोजगार, नौजवान के हाथ-मुंह बांधने के विरोध में है या नहीं? पर सरकार यह नहीं करेगी क्योंकि सरकार अब अपना भविष्य जान चुकी है।

तो इन परिस्थितियों में मुझ सरीखे विरोधी संसद सदस्य, जिसे जनता ने नब्बे हजार के बहुमत से कांग्रेस की गत पचास वर्षों की परंपरागत सीट से निर्वाचित कर जनभावनाओं का सच्चा प्रतिनिधित्व करने भेजा था, का यह कर्तव्य है कि मैं संसद से इस्तीफा दूं, तथा आपातकाल व संसद की अवधि-वृद्धि का विरोध न केवल अपनी वाणी या लेखनी के द्वारा बल्कि अपने कर्म के द्वारा भी करूं ताकि देश की जनता के प्रति जो मेरी जवाबदारी और कर्तव्य है उसे पूरा कर सकूं और इंदिरा गांधी के लोकतंत्र की हत्या के पाप से बच सकूं।

मुझे तो दुख व आश्चर्य होता है जब अखबार में पढ़ता हूं कि एक ओर तो ब्रिटेन की वह लोकतांत्रिक संसद है जहां श्रमिक दल के सदस्य अपने ही दल की गलत नीतियों का विरोध करने का साहस करते हैं, और दूसरी ओर यह संसद है, जहां लोग मात्र तनख्वाह और चंद सुविधाओं की खातिर गांधी, लोहिया, जयप्रकाश के देश के प्रजातंत्र की हत्या में शामिल हो रहे हैं। मुझे खयाल आता है कि हिटलर जर्मनी की संसद को इसलिए मिटा सका, इसलिए तानाशाह बन सका कि उसने अपने दल के भीतर ही पहले तानाशाही स्थापित कर ली थी। तो ठीक वही खेल आज चालीस वर्ष बाद यह इंदिरा गांधी की सरकार फिर भारत में खेल रही है। कांग्रेस के संसद सदस्य अब अपनी जवाबदारी, जनता या देश या लोकसभा के प्रति नहीं वरन इंदिरा गांधी के प्रति मान रहे हैं। बंसीलालजी सरीखे मंत्री कहते हैं कि मैं व्यक्तिगत रूप से इंदिरा गांधी के प्रति जवाबदार हूं। और कांग्रेस में होड़ मची है कि कौन इंदिरा गांधी के काले कारनामों की सबसे ज्यादा बेशर्मी से प्रशंसा कर सकता है।

सरकार यानी कार्यकारणी अब लोकसभा जो कि जनता द्वारा निर्वाचित सर्वोच्च संस्था के प्रति जवाबदार नहीं रही, वरन लोकसभा को सरकार और इंदिरा गांधी के प्रति जवाबदार होने को विवश कर दिया गया है। सत्ता का इतना केंद्रीयकरण गांधी-विचार की हत्या है। देश के सबसे बड़े देशभक्त लोकनायक जयप्रकाश नारायण, मजदूरों के सबसे बड़े हमदर्द जॉर्ज फर्नांडीज पर सरकार झूठे और घिनौने आरोप लगा रही है और वह भी इस संसद के माध्यम से उन्हें जवाब देने का भी अधिकार नहीं है।

उनका जवाब छप नहीं सकता। हम अगर उनकी सफाई पेश करना चाहें तो नहीं कर सकते। क्या यह सब प्रजातंत्र है? क्या उस लोकनायक जयप्रकाश को जिसकी जबान से सारा देश बोलता है, गरीब, छात्र, किसान, मजदूर, पीड़ित नारी और पूरी मानवता बोलती है, को गिरफ्तार कर अमानवीय हालात में रखना प्रजातांत्रिक है, नहीं-नहीं।

खैर, दुनिया के किसी भी देश में तानाशाही ज्यादा दिन नहीं टिकी है और भारत सरीखे देश में, जिसके प्रजातंत्र की जड़ों को गांधी, लोहिया, जयप्रकाश ने अपने खून से सींचा है, अधिक समय तक नहीं टिक सकेगी, ऐसा मेरा विश्वास है तथा जनता शीघ्र ही यह समझ जाएगी कि श्रीमती इंदिरा गांधी संविधान के नाम पर संविधान के ऊपर बैठ गई हैं। उनकी कुर्सी के पीछे से हिटलर का भूत झांक रहा है, उनकी जबान से जार बोल रहा है। उनके हाथ देश तथा प्रजातंत्र की हत्या के खून से रंगे हुए हैं। और वे गरीबों तथा बीस सूत्री के नाम पर गरीबों तथा गरीबों के सच्चे हमदर्दों को मार कर, देश के चंद पूंजीपतियों के महलों में नक्काशी कर रही हैं।

मेरे खयाल से यह दुनिया के आज तक के फासिस्टों यहां तक कि हिटलर, मुसोलिनी जैसे फासिस्टों से भी घृणित, गंदा, कुरूप फासिज्म है, जिसकी नेता इंदिरा गांधी हैं और जो इस फासिज्म के गंदे नाले को लोकसभा में बहा रही हैं। जिस लोकसभा का लक्ष्य शोषणमुक्त, समतावादी समाज रचना की गंगा बहाना था। तो याद रखिए कि इतिहास इन प्रजातंत्र के हत्यारों को कभी माफ नहीं करेगा और इन प्रजातंत्र के हत्यारों, आदरणीय जयप्रकाशजी के हमलावरों, गांधी के अहिंसा व सत्याग्रह को दफनाने वालों के पृष्ठ काले होंगे।

अत: मैं उपरोक्त सब कारणों से लोकसभा की सदस्यता से अवधि समाप्त होने के दिन से यानी कि 18 मार्च 76 से इस्तीफा दे रहा हूं। कृपया इस इस्तीफे को स्वीकार कर अनुग्रहित करें।
मैं संपूर्ण क्रांति का सत्याग्रही हूं और मृत्यु पर्यंत बना रहूंगा, चाहे जेल में रहूं या बाहर।
आशा है इस्तीफे की स्वीकृति की सूचना देंगे।
आपको आखिरी और क्रांतिकारी अभिवादन।
विनीत, शरद यादव, 14 मार्च 1976

(लेखक जनता दल (एकीकृत) के अध्यक्ष हैं। वे 1974 में जयप्रकाश नारायण के कहने पर उपचुनाव में पहली बार लोकसभा में पहुंचे थे। 1975 में इमरजेंसी लगी और गिरफ्तार होकर वे इंदौर जेल में रहे। इमरजेंसी कायम रखने के लिए श्रीमती गांधी द्वारा लोकसभा की अवधि बढ़ाने पर उन्होंने लोकसभा की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया था। उस वक्त लिखा गया उपर्युक्त पत्र अब इमरजेंसी के इतिहास का दस्तावेज है। -सं.)

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