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दिल्ली से आ रहे संकेत

अरुण माहेश्वरी क्या दिल्ली विधानसभा चुनाव नरेंद्र मोदी का वाटरलू साबित होने जा रहा है? आइबी की रिपोर्ट भी कुछ ऐसा ही संकेत देती है। इस बात के ठोस कारण और लक्षण भी दिखाई देने लगे हैं।संबंधित खबरेंCOVID-19LockdownPHOTOSसंपादकीयः प्रदूषण की चादरसंपादकीय: चुनौती भरा अभियान पहला, भाजपा के लिए दिल्ली के ग्रामीण इलाकों में कोई भविष्य नहीं […]

अरुण माहेश्वरी

क्या दिल्ली विधानसभा चुनाव नरेंद्र मोदी का वाटरलू साबित होने जा रहा है? आइबी की रिपोर्ट भी कुछ ऐसा ही संकेत देती है। इस बात के ठोस कारण और लक्षण भी दिखाई देने लगे हैं।

पहला, भाजपा के लिए दिल्ली के ग्रामीण इलाकों में कोई भविष्य नहीं बचा है। केंद्र सरकार ने भूमि अधिग्रहण संबंधी जो अध्यादेश जारी किया, वह शहरी क्षेत्रों के निकट की ग्रामीण जनता के खिलाफ युद्ध की घोषणा से कम नहीं है।

दूसरा, दिल्ली के कच्ची बस्ती इलाकों में भाजपा की स्थिति पहले से कमजोर रही है और अभी तक उसमें कोई सुधार नहीं आया है। कॉलोनियों को नियमित करने की सिर्फ घोषणा की गई है, जिसकी कोई कानूनी वैधता नहीं है। इस मामले में भाजपा के इरादे आज भी हमेशा की तरह संदेह के घेरे में हैं।

तीसरा, दिल्ली के अल्पसंख्यकों में अब कोई दुविधा नहीं है। भाजपा और संघ परिवार के नेताओं की धर्म-परिवर्तन और नफरत फैलाने की हरकतों और गिरजाघरों में आगजनी की घटनाओं ने अल्पसंख्यकों के सभी समुदायों को भाजपा के खिलाफ पहले से कहीं ज्यादा एकजुट कर दिया है। संघ परिवार के लोगों की दंगा भड़काने की साजिशों का आम आदमी पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ताओं ने जिस बहादुरी से मुकाबला किया, उसने इन समुदायों को और जागृत किया है।

चौथा, पेट्रोलियम पदार्थों की अंतरराष्ट्रीय दरों में भारी गिरावट के बावजूद रोजमर्रा की जरूरी चीजों के दामों को कम करने में भाजपा सरकार की पूर्ण विफलता ने मध्यवर्ग का भाजपा के प्रति मोहभंग किया है।

पांचवां, भ्रष्टाचार के मामले में भाजपा पर पहले भी किसी को कोई भरोसा नहीं था। अब किरण बेदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ने का फैसला करके खुद भाजपा के सर्वोच्च नेतृत्व ने भी खुलेआम दिल्ली भाजपा के प्रति अविश्वास जाहिर कर दिया है।
छठा, किरण बेदी के पुलिस सेवा में अराजक व्यवहार की वजह से किसी भी उच्च पदस्थ अधिकारी को स्वाभाविक तौर पर मिलने वाले पदक भी नहीं मिल पाए। इसके अलावा, आम आदमी पार्टी के पूरे आंदोलन में उनकी भूमिका एक तोड़क की रही। ऐसे विफल व्यक्ति को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश करना भाजपा के परंपरागत मतदाताओं के विश्वास को हिला देने के लिए काफी है।

इसके अलावा, प्रधानमंत्री और उनके पूरे मंत्रिमंडल, पूरी केंद्र सरकार का दिल्ली के चुनाव में इस प्रकार भारी आडंबर के साथ कूद पड़ना जनता की नजरों में भाजपा की जीत को संदिग्ध बनाने और उसकी धार को कुंद कर देने का करतब साबित होगा। हम देख चुके हैं कि जब अरविंद केजरीवाल ने जन-लोकपाल के मुद्दे पर कांग्रेस का मोलभाव न स्वीकार करते हुए मुख्यमंत्री पद को त्याग दिया था, उस समय भगोड़ा-भगोड़ा का शोर मचा कर भाजपा ने दिल्ली के लोगों को एक नकली लड़ाई में उलझाने की कोशिश की थी। आज जब चुनाव आ चुका है तब वह उन्हें जनतंत्र के असली मुद्दों की लड़ाई में उतरने से रोकने की कोशिश कर रही है। वह असली बहस से कन्नी काट रही है। अपने को विचारों के ऊपर बता कर जनमत पर आरोपित करना चाहती है।

मोदी सरकार ने अभी आठ महीने पूरे किए हैं। इस बीच उसकी कूटनीति विफलताओं का जैसे एक संपूर्ण वृत्त पूरा हो गया है।

सबसे पहले, अपनी ताजपोशी के समय मोदी ने सार्क को छुआ था। छह महीने बीतते न बीतते, उनका उत्साह इतने चरम पर चला गया कि नवंबर 2014 में सार्क के अठारहवें सम्मेलन में उन्होंने उसका दम ही निकाल दिया। पाकिस्तान के साथ तो बातचीत के रिश्ते भी नहीं बचे।

जुलाई 2014 में ब्राजील के फोर्टालेजा और ब्रासीलिया में भारी जोशो-खरोश के साथ वे ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के) सम्मेलन में गए। चारों देशों के नेताओं से गलबहियों में वैसा ही उत्साह था जैसा अभी ओबामा के मामले में दिखाई दिया। ब्रिक्स देशों के सुर में सुर मिलाते हुए सौ अरब डॉलर के कोष के साथ न्यू डेवलपमेंट बैंक (एनबीडी) के गठन की घोषणा से आइएमएफ और वर्ल्ड बैंक को चुनौती दी। उसका सदर दफ्तर शंघाई में होगा और पहला अध्यक्ष भारत का। सभी क्षेत्रों में आपसी सहयोग बढ़ाने की औपचारिकता के साथ बात खत्म हो गई।

ब्रिक्स सम्मेलन के दो महीने बाद सितंबर में चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग भारत आए। बंगलुरु और गुजरात गए, कुछ वाणिज्यिक संधियां कीं। लेकिन जब वे भारत में थे, उसी समय लद्दाख की सीमा पर भारतीय और चीनी फौज के बीच तनातनी चल रही थी। अब स्थिति यह है कि चीन साफ कह रहा है कि वह पाकिस्तान का दामन नहीं छोड़ सकता। ब्रिक्स सम्मेलन में प्रधानमंत्री के साथ शी चिनफिंग की गलबहियों से जुड़े विशेष तार टूट गए। चीन ने ओबामा की भारत यात्रा पर छींटाकशी में कोई कोताही नहीं की।

अब तक की सारी कूटनीतिक कसरतों के शीर्ष पर आई ओबामा की भारत यात्रा। इसके पहले नवंबर 2014 में मोदी अमेरिका घूम आए थे और न्यूयार्क के मैडिसन स्क्वायर पर जो तमाशा किया, उसे याद करते हुए ओबामा ने अपने भाषण में हॉलीवुड के नायकों से उनकी तुलना की। ओबामा की भारत यात्रा ही तो वह अंतिम मुकाम था, जहां मोदी के अब तक के सारे कूटनीतिक कर्मों को फलीभूत होना था। अब तक अच्छा-बुरा जो भी क्यों न हुआ हो, अमेरिका अगर मान गया तो फिर भवसागर पार समझो। इसीलिए हर प्रोटोकोल और औपचारिकता को ताक रख कर उन्होंने खुद अपने हाथों से ओबामा को चाय पिलाई, उन्हें नाम से पुकारा और उनसे अपनी पक्की दोस्ती की बाकायदा घोषणा भी कर दी। तथाकथित आणविक संधि, जिसे भूलवश भारतवासियों ने भारत-अमेरिका संबंधों की कुंजी मान लिया है, उस पर अमल की सारी बाधाएं दूर कर दी गर्इं।

इन सबके बाद भी यह सवाल रह गया है- आगे क्या? एक बात साफ हो चुकी है कि परमाणु ऊर्जा संयत्रों की स्थापना एक शुद्ध मृग-मरीचिका है। आज के पूरी तरह से बदल चुके ऊर्जा के विश्व-परिदृश्य में भला भारत की ऐसी कौन-सी निजी कंपनी होगी, जो अपनी बलि चढ़ा कर ऐसे भारी नुकसानदेह प्रकल्पों में अपना हाथ जलाएगी?

रही बात, भारत-अमेरिका आर्थिक संबंधों को सुधारने की, तो यह सिलसिला अपने खुद के तर्कों पर सारी दुनिया के देशों के बीच चल रहा है और चलता रहेगा। इसके लिए शायद राष्ट्राध्यक्षों की आपस में गहरी दोस्ती की जरूरत नहीं है।

भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों में भी, हथियारों के उत्पादन और व्यापार को लेकर जो बातें हुई हैं, उनमें ऐसा नया कुछ नहीं है, जिससे खासकर भारत का हित साधता हो। उल्टे, भारत आने के पहले, पाकिस्तान को ओबामा ने जिस प्रकार आश्वस्त-सा किया था, उस मनोभाव में किसी प्रकार के परिवर्तन के कोई आसार नहीं दिखाई दिए हैं।

इसमें गौर करने लायक एक बात यह भी है कि ओबामा की भारत यात्रा की खबर मिलते ही रूस के राष्ट्रपति पुतिन भारत का एक तूफानी दौरा (13-14 दिसंबर को) कर गए और एक झटके में रक्षा और ऊर्जा को लेकर वे सारे समझौते करा ले गए कि आगे ओबामा के साथ करने के लिए बहुत कुछ बचा नहीं रह गया। भारत की धरती से ओबामा का पुतिन के खिलाफ विष वमन, उन्हें दादागीरी न करने की सलाह देना अकारण नहीं था।

इन आठ महीनों में मोदी की सारी कूटनीतिक पहलकदमियां उनकी राष्ट्रीय नीतियों की तरह ही दिखावे की ज्यादा रही हैं। राष्ट्रीय क्षेत्र में ऐसा दिखावा प्रचार माध्यमों की कृपा से कुछ दिनों तक चल जाता है, भ्रम बना रहता है, लेकिन कूटनीति के क्षेत्र में विफलताओं की गूंज तत्काल और बड़ी तेजी से सुनाई देने लगती है।

इसीलिए, नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय नीतियों की अवहेलना करते हुए कूटनीतिक सफलताओं के बल पर राष्ट्रीय राजनीति में अपने महत्त्व को बनाए रखने की उल्टी चाल चली है। विदेशमंत्री सुषमा स्वराज को बैठा कर अकेले बाजी मार लेने की जो हड़बड़ी दिखाई है, उसके दुष्परिणामों को उन्हें जल्द भुगतना पड़ेगा।

हाल में, विदेश सचिव पद से जिस ढंग से सुजाता सिंह को एक झटके में विदा किया गया, यह बताने के लिए काफी है कि अब तक की सारी कूटनीतिक कसरतों के बाद मोदी पर विफलता का अवसाद हावी होना शुरू हो गया है। ठीकरा फोड़ा गया है नौकरशाही पर। सुजाता सिंह का कार्यकाल पूरा नहीं हुआ था। वे अभी जाने की इच्छुक भी नहीं थीं। खबरों के अनुसार विदेशमंत्री सुषमा स्वराज से उनकी संगति बैठ गई थी। उनके काल में विश्व देवता ओबामा का मोदी को पांच बार दर्शन का मौका मिला। चीन, रूस और सारी दुनिया के न जाने कितने देशों के राष्ट्राध्यक्षों से मोदी की सीधी दोस्ती हुई। लेकिन जिस ओबामा यात्रा का झंडा उठा कर मोदी दिल्ली का चुनाव जीतने उतरे हैं, उसी के पूरा होते न होते, इस यज्ञ के प्रमुख होता का ही पत्ता साफ कर दिया गया। ओबामा गए उसके दो दिन बाद विदेश सचिव भी गर्इं।

सुजाता सिंह ने जाते-जाते एक छोटा-सा नोट लिखा है, जिसके बारे में कहते हैं- देखन में छोटन लगे, घाव करे गंभीर। उन्होंने लिखा है कि विदेश मंत्रालय एक संस्थान है, जिसमें व्यक्ति की नहीं, संस्थान की भूमिका प्रमुख होती है। पिछले दिनों इस संस्थान को जो भी काम सौंपे गए, उनका पूरी मुस्तैदी से पालन किया गया। सुजाता सिंह के इस कथन से साफ है कि नौकरशाही की जिम्मेदारी नीतियों पर अमल की होती है, नीतियां बनाने की नहीं। नीतियों की सफलता-विफलता का दायित्व राजनीतिक नेतृत्व का है। उन्हें जो करने के लिए कहा गया, उन कामों को उन्होंने सफलता से किया।

जाहिर है कि मोदी ने विदेश नीति के जरिए स्वदेश को साधने का जो उल्टा रास्ता पकड़ा, उसके औंधे मुंह गिरने की जिम्मेदारी विदेश मंत्रालय क्यों लेगा। सुजाता सिंह का नोट यही कहता है। भारतीय राजनीति का यह एक बड़ा सबक है कि जिसने भी विदेश नीति को केंद्र में रख कर राष्ट्रीय राजनीति पर निर्णय किया, उसे सिवाय मुंह के बल गिरने के कुछ हासिल नहीं हुआ। खासकर अमेरिका के साथ संबंधों के मसले पर और भी नहीं।

जो चीज आसानी से हाथ आती है, वह उतनी ही आसानी से चली भी जाती है। दिल्ली से अब उस तूफान के खत्म होने का सिलसिला शुरू हुआ है, जिसने आठ महीने पहले बेखबरी की स्थिति में इस देश को जकड़ लिया था। अब सांप्रदायिक राजनीति, भूमि अधिग्रहण अध्यादेश और कॉरपोरेट को सब कुछ सौंप देने की बदहवासी ने मात्र आठ महीनों में इनके सारे उल्लास को अवसाद में बदलना शुरू कर दिया है। दिल्ली चुनाव में इनकी भाव-भंगिमाओं से ऐसा ही प्रतीत होता है।

 

 

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