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स्त्री के भय की कड़ियां

हाल ही में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने बलात्कार की घटनाओं को लेकर एक बयान दिया। उन्होंने कहा कि चार लोग एक महिला के साथ बलात्कार नहीं कर सकते हैं..

Author नई दिल्ली | August 31, 2015 3:06 PM
प. बंगाल के पास केवल 21 महिला सुरक्षा अधिकारी हैं जो अनुबंध पर कार्यरत हैं और उनके पास कोई सहायक स्टाफ या आधारभूत ढांचा भी नहीं है। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

हाल ही में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने बलात्कार की घटनाओं को लेकर एक बयान दिया। उन्होंने कहा कि चार लोग एक महिला के साथ बलात्कार नहीं कर सकते हैं। उनके इस बयान के बाद ही उनके ही गढ़ कन्नौज में एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार का मामला सामने आ गया। कन्नौज से उनकी पुत्रवधू डिंपल यादव सांसद हैं। नाबालिग लड़की के साथ उसके घर में घुस कर उसके परिवार के सामने बलात्कार किया गया। नाबालिग लड़की को गंभीर हालत में कानपुर के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया। इस अपराध के पीछे जो लोग हों, पूर्व मुख्यमंत्री और राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी के मुखिया के खास प्रभाव वाले इलाके में उनके बयान के कुछ ही देर बाद हुई इस जघन्य घटना ने बता दिया कि हकीकत क्या है। साथ ही यह संदेश भी दिया कि राजनेताओं को ऐसे मामलों में कुछ कहते हुए सावधानी बरतनी चाहिए। वरना अपराधियों का हौसला बढ़ने का खतरा रहता है।

इसी तरह की एक और घटना लखनऊ में घटी, जिसमें एक नाबालिग को शहर के बीच से अपहरण कर उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। हालांकि दोनों मामलों में पुलिस ने त्वरित कार्रवाई की। आरोपी गिरफ्तार किए गए। लेकिन लगता है सख्त कानून होने के बावजूद बदमाशों में शासन और कानून का भय नहीं है। उत्तर प्रदेश की एक घटना में तो अपराधियों ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। हरदोई जिले में एक नाबालिग के साथ बलात्कार करने के बाद अपराधियों ने उसकी हत्या कर दी, हत्या के बाद चाकू से उसकी आंखों को गोद दिया। हालांकि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक मध्यप्रदेश बलात्कार की घटनाओं में सबसे आगे है, लेकिन उत्तर प्रदेश पिछले कुछ दिनों से सुर्खियों में है। चाहे इसके लिए नेताओं की बयानबाजी को जिम्मेवार मानें या पंचायतों के तुगलकी फरमानों को।

आंकड़े बताते हैं कि भारत में रोजाना औसतन तिरानबे महिलाएं बलात्कार का शिकार हो रही हैं। एनसीआरबी के मुताबिक 2012 के मुकाबले 2013 और 2014 में बलात्कार की घटनाएं बढ़ीं। 2012 में जहां 24,923 बलात्कार की घटनाएं सामने आर्इं, वहीं 2013 में बढ़ कर यह संख्या 33,707 हो गई। पिछले साल देश में कुल 37413 बलात्कार के मामले सामने आए। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भी बलात्कार की घटनाओं में इजाफा हो गया। इस मसले पर राजनीति भी हुई और दिल्ली पुलिस के कामकाज पर भी सवाल उठाया गया। दिल्ली में पिछले साल 1813 बलात्कार के मामले सामने आए।

इसके बाद आम आदमी पार्टी और केंद्र सरकार के बीच दिल्ली पुलिस की कार्यशैली को लेकर जुबानी जंग शुरू हो गई।
एनसीआरबी के आंकड़े चौंकाने वाले हैं, क्योंकि उत्तर प्रदेश और बिहार, बलात्कार के मामले में मध्यप्रदेश से पीछे हो गए हैं। मध्यप्रदेश इस समय इसमें अव्वल है। मध्यप्रदेश में औसतन ग्यारह बलात्कार प्रतिदिन हो रहे हैं। पिछले साल वहां 5,076 बलात्कार के मामले दर्ज किए गए। राजस्थान और महाराष्ट्र को भी खासी बदनामी झेलनी पड़ी। नाबालिगों के साथ बलात्कार के मामले बढ़े हैं। हालांकि इससे संबंधित कानून में बदलाव किया गया, मगर 2012 में जहां नाबालिगों से बलात्कार के 9,082 मामले सामने आए, वहीं 2013 में यह आंकड़ा बढ़ कर 13,304 हो गया।

वर्ष 2013 में भारत सरकार ने यौनहिंसा संबंधी कानून में संशोधन किया। इस संशोधन में बलात्कार से संबंधित सजाएं और सख्त की गर्इं। यही नहीं, बलात्कार की परिभाषा के दायरे को भी बढ़ाया गया। बलात्कार और छेड़छाड़ संबंधी घटनाओं की शिकायत दर्ज कराए जाने संबंधी प्रक्रिया को सरल बनाते हुए महिला पुलिस अधिकारी द्वारा शिकायत दर्ज करना अनिवार्य कर दिया गया। पीड़िता की त्वरित मेडिकल जांच और मजिस्ट्रेट के सामने बयान दर्ज कराना भी अनिवार्य कर दिया गया। न्यायालय में सुनवाई के लिए जहां तक संभव हो, महिला जज की नियुक्ति का प्रावधान किया गया। भारत की सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए सरकार ने कानून में ये संशोधन किए।

लेकिन संशोधित कानून को लेकर अब भी समाज में जागरूकता नहीं आ पाई है। संशोधित कानून के बारे में देश के ग्रामीण इलाकों में जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए, पर अभी तक ऐसी पहल नहीं की गई है। यही नहीं, ग्रामीण समाज में जहां अब भी सामंती मानसिकता हावी है, कानून का भय अपराधियों को नहीं है। यही कारण है कि देश के कई इलाकों में पंचायतों द्वारा किसी परिवार के एक सदस्य की गलती पर उस परिवार की महिला सदस्य के साथ बलात्कार के आदेश देने के कई मामले सामने आए हैं। यह पूरी तरह से मध्यकालीन सामंती समाज की सोच को दिखाता है।

हाल ही में देश के कुछ इलाकों में पंचायतों ने किसी परिवार को दंडित करने के लिए बलात्कार के जो फरमान जारी किए वे पाकिस्तान में मुख्तारन माई के साथ हुई घटना को याद दिलाते हैं, जिसमें गांव की दबंग जातियों की पंचायत ने मुख्तारन माई के साथ बलात्कार का आदेश दिया था। जब यह वाकया हुआ, जनरल परवेज मुशर्रफ पाकिस्तान के राष्ट्रपति के पद पर काबिज थे। मुशर्रफ ने इस घटना के साथ सख्ती से निपटा। लेकिन पाकिस्तान के कई इलाकों में समाज आज भी इस तरह की मानसिकता से गुजर रहा है, जहां पर छोटी जातियों और अल्पसंख्यक महिलाओं की इज्जत सुरक्षित नहीं है।

लगभग डेढ़ साल पहले पश्चिम बंगाल के वीरभूम में भी एक पंचायत के आदेश पर तेरह लोगों ने एक महिला के साथ बलात्कार किया। महिला पर पंचायत ने आरोप लगाया था कि उसके किसी दूसरी जाति के पुरुष से संबंध थे। यह घटना मुख्तारन माई की घटना से काफी कुछ मिलती-जुलती थी, जहां पर पंचायत ने देश के कानून को ताक पर रख, बर्बर आदेश दिए। हाल ही में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक पंचायत का दलित महिला के साथ बलात्कार का आदेश देना, यह दिखाता है कि देश का ग्रामीण समाज आज भी सामंती मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाया है।

बलात्कार की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई तो आने वाली शिकायतों में वृद्धि भी हुई। कुछ कानूनविद बलात्कार के आंकड़ों में वृद्धि का एक कारण यह भी बताते हैं। उनके अनुसार पहले बहुत-से मामले दबा दिए जाते थे। लेकिन अब मामले को दबाना मुश्किल होता है; बलात्कार के आंकड़ों में हुई वृद्धि का एक कारण थानों तक पहुंचने वाली शिकायतों में पहले के मुकाबले हुई वृद्धि है। संशोधित कानून में शिकायत संबंधी प्रक्रिया आसान बना दी गई है। इसके तहत पीड़िता के घर या जहां पीड़िता चाहती है, वहां जाकर एक महिला पुलिस अधिकारी उसका बयान रिकार्ड करेगी। कमजोर तबके के पुरुष भी थाने जाने से डरते हैं। वैसे में बलात्कार पीड़ित का थाने जाकर अपना बयान दर्ज करवाना आसान नहीं हो सकता। थाने का माहौल, वहां मौजूद पुरुष पुलिसकर्मी किसी भी पीड़िता के लिए माहौल को असहज बनाते हैं।

देश के कई इलाकों में जहां अब भी महिलाओं को भोग की वस्तु समझा जाता है, वहीं शहरी परिवेश में तकनीकी क्रांति को भी कुछ हद तक बलात्कार की घटनाओं के लिए जिम्मेवार ठहराया जा रहा है। हालांकि तकनीकी क्रांति का ही प्रभाव है कि अब लोग पुलिस थानों तक बलात्कार और छेड़छाड़ की शिकायत लेकर पहुंचने लगे हैं। भारतीय ग्रामीण परिवेश में सामाजिक परिवर्तन तो हुआ है। लेकिन इस परिवर्तन ने सामंती मानसिकता को खत्म नहीं किया है। अगर सामंती सोच वाला एक वर्ग अपनी कुर्सी से हटा तो उसकी जगह दूसरे लोग आ गए। पहले ग्रामीण समाज में अमूमन अगड़ी जातियों द्वारा बलात्कार किए जाने की शिकायतें आती थीं। लेकिन समय के साथ अपराध की यह सामाजिक तस्वीर थोड़ी बदली है। बहुत सारे मामलों में आरोपी दबंग पिछड़ी जातियों के होते हैं और पीड़िता उनसे कमजोर तबके की।

बलात्कार की घटनाएं बढ़ने का एक प्रमुख कारण समाज में नैतिकता और रिश्तों की मर्यादा का तेजी से होता क्षरण है। सामाजिक पतन की यह सबसे दारुण कहानी है। एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि ज्यादातर मामलों में पीड़िता के नजदीकी लोगों ने ही बलात्कार को अंजाम दिया। 2014 में दर्ज कुल 37,413 मामलों में 32,187 लोग आरोपी पीड़िता के करीबी या नजदीक से जानने वाले थे। वहीं, 8344 मामलों में अपराध करने वाले पीड़िता के पड़ोसी थे। जबकि 1640 मामलों में बलात्कार के आरोपी पीड़िता के नजदीक के संबंधी थे। बलात्कार संबंधी मामलों में परिचितों-पड़ोसियों और नजदीक के संबंधियों की संलिप्तता घोर चिंता का विषय है। निश्चय ही पारिवारिक-सामाजिक संबंधों और नैतिक मूल्यों में आई गिरावट काफी हद तक इसके लिए जिम्मेवार है।

हालांकि कई समाजशास्त्री मानते हैं कि यह नई बात नहीं है, पहले भी ग्रामीण परिवेश में नजदीक के पारिवारिक संबंधियों द्वारा महिलाओं के यौन उत्पीड़न की घटनाएं होती थीं, लेकिन सामाजिक दबाव और लोकलाज के कारण वे सामने नहीं आती थीं; अब समाज में आई जागरूकता और तकनीकी प्रगति की वजह से ऐसे मामलों को छिपाना या दबाना संभव नहीं रह गया है। पर यह बात आंशिक रूप से ही कही जा सकती है। कुल तस्वीर वाकई बहुत भयावह है। यह भी कम चिंता की बात नहीं है कि राजनीति या राज-काज से जुड़े कई ताकतवर लोग ऐसी घटनाओं को हल्के में ले रहे हैं।

(संजीव पांडेय)

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