Jansatta Editorial: Company Badi ya Desh - Jansatta
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कंपनी बड़ी या देश

अरविंद कुमार सेन नोबेल पुरस्कार विजेता पॉल क्रुगमैन ने दो दशक पहले शोध पत्रिका हॉवर्ड बिजनेस रिव्यू में ‘देश एक कंपनी नहीं है’ शीर्षक से शोध-पत्र लिखा था। यह शोध-पत्र उस दौर में प्रकाशित हुआ था, जब भुगतान संतुलन की बीमारी से दो-चार हो रही भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक […]

Author December 22, 2014 12:13 PM

अरविंद कुमार सेन

नोबेल पुरस्कार विजेता पॉल क्रुगमैन ने दो दशक पहले शोध पत्रिका हॉवर्ड बिजनेस रिव्यू में ‘देश एक कंपनी नहीं है’ शीर्षक से शोध-पत्र लिखा था। यह शोध-पत्र उस दौर में प्रकाशित हुआ था, जब भुगतान संतुलन की बीमारी से दो-चार हो रही भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक संगठन की अगुआई में नवउदारवादी नीतियां थोपी जा रही थीं। हर तरफ आर्थिक सुधारों की मार्फत अर्थव्यवस्था को खोलने पर जोर दिया जा रहा था। विकासशील देशों के नेता प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) लाने के लिए अमेरिका का रुख कर रहे थे। देश को कंपनी समझते हुए राष्ट्रप्रमुख को मुख्य कार्यकारी अधिकारी की तर्ज पर काम करने की नसीहतें दी जा रही थीं।

पॉल क्रुगमैन का अहम तर्क था कि देश चलाने के लिए जरूरी आर्थिक नीति का मसविदा कंपनी की रणनीति से बिल्कुल जुदा होता है। कंपनियां एक तरह का उत्पादन करती हैं, खुले बाजार से संसाधन लेती और बेचती हैं। जबकि देश की अर्थव्यवस्था में कई तरह की वस्तुओं का उत्पादन होता है और खरीद-बिक्री प्रणाली में कई हितसमूह जुड़े रहते हैं। कंपनियों, यहां तक कि विकेंद्रित प्रबंधन वाली कंपनियों में भी उच्च स्तर पर किए गए फैसलों का पालन सबको करना होता है। देशों के मामले में ऐसा नहीं है। किसी भी कंपनी के सीइओ का केवल एक सबसे अहम लक्ष्य होता है- कंपनी के शेयरधारकों के मुनाफे और प्रतिफल में इजाफा करना। मगर सब जानते हैं कि देश कोई कारोबार नहीं है।

राष्ट्रप्रमुख मुनाफे या प्रतिफल के गुणा-भाग को ध्यान में रख कर फैसला करने के बजाय जनता के व्यापक हित में निर्णय लेना चाहिए। 2008 की आर्थिक मंदी ने इस कड़वे सबक की घुट््टी अमेरिका और यूरोप को पिलाई है। मगर भारत के नीति निर्माता अब भी यह पाठ पढ़ने को तैयार नहीं हैं। ऐसा लगता है कि वे दरिया में खुद डूब कर उसकी गहराई की थाह लेना चाहते हैं। नई सरकार ने आर्थिक सुधारों को अच्छे दिनों का पर्याय बना डाला है। प्रधानमंत्री ताबड़तोड़ विदेश यात्राएं कर रहे हैं और एफडीआइ के आश्वासनों के ढेर के साथ स्वदेश वापसी करते हैं। अब एफडीआइ आने के आश्वासनों की बिना पर ही दावा किया जाने लगा है कि भारत विश्व पटल पर छा गया है। एफडीआइ राग की तह में जाने के लिए इस पर तफ्सील से गौर करते हैं।

सरकार का पूरा जोर देश में एफडीआइ लाने पर है। सरकार के आर्थिक सलाहकार नए-नए तरीके ईजाद कर रहे हैं, ताकि विदेशी पूंजी की राह आसान हो सके। क्या एफडीआइ आने से देश की अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट आएगी? जवाब है, नहीं। हमारी अर्थव्यवस्था में आने वाली कुल एफडीआइ का जीडीपी में महज दो फीसद हिस्सा है। जबकि इसके विपरीत घरेलू निवेश का हमारी जीडीपी में अट्ठाईस फीसद योगदान है। अगर अर्थव्यवस्था में हो रहे विदेशी निवेश के प्रवाह में इजाफा हो जाए तब भी यह विकास की गारंटी नहीं है, क्योंकि हमारी कमजोरी देश के भीतर है।

यह भी कड़वी हकीकत है कि तमाम मशक्कत के बावजूद एक सीमा (अंदाजन अधिकतम जीडीपी का पांच फीसद) से ज्यादा विदेशी निवेश हमारी अर्थव्यवस्था में आने की संभावना नहीं है। सीमा पार निवेश बहुराष्ट्रीय कंपनियां करती हैं। हर कंपनी का एक ही मकसद है, अपने शेयरधारकों को ज्यादा से ज्यादा प्रतिफल देना। जाहिर है, कोई भी कंपनी ऐसे देश में निवेश करना चाहेगी, जहां उसके उत्पादों की मांग जोरदार हो और लगाई गई रकम पर प्रतिफल भी ज्यादा मिले। प्रधानमंत्री अक्सर अपनी विदेश यात्राओं के दौरान एक सौ पच्चीस करोड़ आबादी वाले विशाल भारतीय बाजार का हवाला देते हैं। मगर क्या इस कथित विशाल बाजार में इतना पैसा है कि वह विदेशी कंपनियों को निवेश के लिए आकर्षित कर सके! जवाब एक बार फिर नहीं में है। मिसाल के तौर पर भारत की प्रति व्यक्ति आय के आंकड़ों पर नजर डालिए।
भारत की प्रति व्यक्ति आय फिलवक्त डेढ़ हजार डॉलर है। विकसित देशों की प्रति व्यक्ति आय की तुलना में यह महज चार फीसद है। इतनी कम आय के कारण पैदा होने वाली मांग भी बेहद कम होती है। दूसरे आंकड़े पर गौर फरमाएं। भारत वैश्विक जीडीपी का महज तीन फीसद उत्पादन करता है। दोनों आंकड़ों का सीधा मतलब है कि भारतीय बाजार का आकार भी बेहद छोटा है और इसमें पैदा हो रही मांग भी बेहद कम है।

साफ है, आकार और मांग के हिसाब से भारतीय बाजार बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पैमानों पर खरा नहीं उतरता। दुनिया की आला पांच सौ कंपनियों में से पचहत्तर फीसद से ज्यादा के मुख्यालय यूरोप और अमेरिका में हैं। यह सही बात है कि विकसित देशों के बाजारों में मांग अपनी अधिकतम सीमा को छू चुकी है और अब वहां मांग में और इजाफे की गुंजाइश नहीं बची है।

मगर भारत का विशाल, पर गरीब बाजार इन कंपनियों के कारोबार विस्तार के लिहाज से कोई खास आकर्षक नहीं है। वैश्विक मापदंडों के हिसाब से भारत की तकरीबन अस्सी फीसद आबादी रोजाना दो डॉलर से कम पर जीवनयापन करती है। महंगे उत्पादों के जरिए धनी वर्ग के हिसाब से कारोबार करने वाली विकसित देशों के बहुराष्ट्रीय कंपनियां गरीबी के इस दलदल में नहीं आना चाहती हैं।

भारत का बाजार विशाल हो सकता है, मगर गरीबी के कारण इस बाजार में मांग बेहद कम कीमत वाले उत्पादों की है। यही कारण है कि अमेरिका से लेकर आस्ट्रेलिया तक प्रधानमंत्री ने विदेशी निवेशकों को रिझाने के तमाम जतन किए हैं, मगर हकीकत में अर्थव्यवस्था पर इसका कोई असर नहीं दिखा है। कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री के एफडीआइ आमंत्रण दौरों से अर्थव्यवस्था की सेहत में कुछ खास सुधार नहीं आने वाला है और न ही इस थोड़े-बहुत पूंजी निवेश से भारत की विशाल आबादी के जीवन में कोई सकारात्मक बदलाव आने वाला है।

मौजूदा सरकार से जुड़े कुछ लोगों का तर्क है कि बेशक एफडीआइ की मार्फत आने वाले निवेश की रकम छोटी है, मगर इससे देश में नई औद्योगिक तकनीक आती है और रोजगार के अवसर पैदा होते हैं। यह तर्क मानने का मतलब है विकसित देशों की ओर से आइएमएफ-डब्ल्यूटीओ की अगुआई में अंतरराष्ट्रीय कारोबार पर नियंत्रण करने की साजिश से आंख मूंदना। पहली बात, बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपनी हर तकनीक पर बौद्धिक संपदा अधिकार रखती हैं, लिहाजा तकनीक हस्तांतरण या तकनीक को स्थानीय लोगों या कंपनियों के साथ साझा करने का तो सवाल ही नहीं उठता। दूसरी बात, पूरी दुनिया का विनिर्माण क्षेत्र सूचना क्रांति की बढ़ते दखल के कारण उच्च तकनीक और रोबोट युग में प्रवेश कर गया है, जहां कंपनियां लागत कम से कम करने और गुणवत्ता में इजाफा करने के लिए ज्यादा से ज्यादा उच्च तकनीक और रोबोट का सहारा ले रही हैं।

लिहाजा, बहुराष्ट्रीय कंपनियों की ओर से किए जा रहे निवेश के कारण उत्पादन में इजाफा हो सकता है, लेकिन इसी अनुपात में रोजगार के मौकों में भी बढ़ोतरी हो, ऐसा जरूरी नहीं है। एफडीआइ को लेकर एक और भ्रांति यह है कि इस श्रेणी का निवेश विदेशी संस्थागत निवेश (एफआइआइ) के मुकाबले ज्यादा टिकाऊ होता है। सही बात है कि एफडीआइ के रास्ते निवेश करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियां एक सीमा तक आधारिक संरचना का निर्माण करती हैं। मगर यह आधारिक संरचना लंबे समय तक उन कंपनियों के देश में टिक कर कारोबार करने की गारंटी नहीं है। अगर कंपनी के शेयरधारकों को किसी मोड़ पर अहसास हुआ कि एक खास विनिर्माण संयंत्र से उम्मीद के अनुसार मुनाफा नहीं हो रहा है तो फिर उस संयंत्र को बंद करने या उस देश से कंपनी का कारोबार समेटने में देर नहीं की जाती।

क्या यूनियन कार्बाइड कंपनी को भारतीय बाजार से अपना कारोबार समेटने से रोका जा सका? कारोबारी इतिहास में ऐसे उदाहरण कई हैं। एक भरमाने वाला तर्क यह भी है कि विदेशी निवेश करने वाली कंपनियां जब हमारे देश में कारोबार करती हैं तो उनके मुनाफे से रॉयल्टी के रूप में पैसा सरकार को मिलता है।

अब बीते एक साल से चर्चा में रही मोबाइल फोन कंपनी नोकिया के भारतीय परिचालन पर गौर करिए। नोकिया ने भारत और एशियाई बाजार में मोबाइल फोन की आपूर्ति करने के लिए चेन्नई के नजदीक श्रीपेरंबुदूर के नजदीक विनिर्माण संयंत्र लगाया था। बीते साल नोकिया के सारे कारोबार को अमेरिका की माइक्रोसॉफ्ट कंपनी ने खरीद लिया।

भारतीय कानूनों के मुताबिक अगर कोई बहुराष्ट्रीय कंपनी अपनी भारतीय इकाई किसी दूसरी कंपनी को बेचती है तो उस परिचालन पर पूंजीगत लाभ कर भारत सरकार को चुकाना होता है। माइक्रोसॉफ्ट ने नोकिया के पूरे वैश्विक कारोबार को खरीदा था और इसमें भारतीय इकाई भी शामिल थी। बदले हालात में स्मार्टफोन बनाने वाले कंपनियों ने भारत समेत पूरे वैश्विक मोबाइल फोन बाजार से नोकिया को चोटी के स्थान से बेदखल कर दिया और नोकिया के कारोबार में लगातार कमी आने लगी। माइक्रोसॉफ्ट ने गुणा-भाग करके पाया कि नोकिया की भारतीय इकाई से जितना मुनाफा नहीं होगा, उससे ज्यादा भारत सरकार को पूंजीगत लाभ कर चुकाना पड़ेगा। लिहाजा, कर की मार से बचने के लिए नोकिया और माइक्रोसॉफ्ट, दोनों कंपनियों ने यह तर्क दिया कि नोकिया-माइक्रोसॉफ्ट सौदे में नोकिया की भारतीय इकाई शामिल नहीं थी।

जाहिर है, दोनों बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने यह शिगूफा कर से बचने के लिए खड़ा किया है। विवाद बढ़ने पर नोकिया ने अपनी भारतीय विनिर्माण इकाई का परिचालन पूरी तौर पर बंद कर दिया और संयंत्र में कार्यरत सारे कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया। नई सरकार ने यह कह कर इस पूरे मााले पर परदा डाल दिया कि अगर दोनों कंपनियों पर कर अदा करने के लिए दबाव बनाया गया तो देश का कारोबारी माहौल बिगड़ जाएगा और निवेशकों का भरोसा उठेगा। वोडाफोन-हच कराधान मामले से लेकर मारुति सुजुकी की गुजरात में स्थापित हुई नई विनिर्माण इकाई में खड़े हुए रॉयल्टी भुगतान विवाद तक ऐसी ढेरों मिसालें दी जा सकती हैं, जहां एफडीआइ के रास्ते आने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने तय मानकों के अनुसार कर या रॉयल्टी का भुगतान नहीं किया।

बहरहाल, किसी समस्या से निपटने के दो तरीके होते हैं। पहला, आप उस समस्या की तह में जाएं और उसका समाधान करें। दूसरा, उस गंभीर समस्या का सरलीकरण करके किसी अलहदा मुद्दे पर सारा ध्यान केंद्रित कर दिया जाए। हद से ज्यादा प्रचार-प्रसार के कारण लोग उस छोटी समस्या की चमक में अपनी बड़ी बीमारी को भूल जाएंगे। भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के मामले में नई सरकार भी कुछ इसी राह पर चल रही है। अर्थव्यवस्था की अंदरूनी कमजोरियों को दूर करने के बजाय प्रधानमंत्री एफडीआइ को सब मर्जों की दवा के रूप में प्रचारित करने में जुटे हैं। देश के विकास के नाम पर केवल दो शब्दों, पीपीपी और एफडीआइ का ही शोर है। देखना है कि यह भ्रम की धुंध कितने दिन कायम रहती है।

 

 

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