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राजनीति: उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और प्रयोग

वित्तीय आत्मनिर्भरता के लिए संस्थानों की बौद्धिक क्षमता को आधार बनाना होगा, तभी शोध परिणाम, उत्पाद, संरचना, संकल्पनाओं के पेटेंट अच्छी आय का स्रोत बन सकते हैं। विशेषज्ञता हासिल कर उद्योग जगत की आवश्यकताओं के अनुरूप परामर्श के माध्यम से भी अनेक संस्थानों ने अच्छी कमाई की है। इसलिए संस्थानों की प्रवृत्ति और प्रकृति के अनुसार उनकी क्षमताओं के सही आकलन और दोहन के लिए उचित रणनीति बनाने की बनाने की जरूरत है।

Author नई दिल्ली | August 14, 2019 1:56 AM
सांकेतिक तस्वीर।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने पिछले साल नवंबर में ‘लीडरशिप फॉर एकेडेमिशियंस’ (लीप) नामक एक अभिनव योजना का शुभारंभ किया था। इस योजना का उद्देश्य देश के उच्च शिक्षण संस्थानों को विश्व रैंकिंग में अव्वल बनने के लिए तैयार करना था। इस योजना के तहत विभिन्न विश्वविद्यालयों के उन शिक्षाविदों को नेतृत्व का प्रशिक्षण दिया गया जो योग्यता और योगदान की दृष्टि से उच्च श्रेणी के और वरिष्ठता क्रम में द्वितीय स्तर पर थे और जो भविष्य के नेतृत्व के लिए तत्पर थे। केंद्रीय भूमिका में नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ रैंकिंग फ्रेमवर्क (एनआइआरएफ) रैंकिंग में शीर्षस्थ संस्थाओं को दायित्व दिया गया। इनमें मुंबई, कानपुर, खड़गपुर और रुड़की के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी), राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआइटी)- त्रिची, आइआइएसआर- कोलकाता, जेएनयू (दिल्ली), दिल्ली विश्वविद्यालय, टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ सोशल साइंस-मुंबई, हैदराबाद विश्वविद्यालय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय- वाराणसी और अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय जैसे प्रमुख संस्थान शामिल थे।

चयनित शिक्षाविदों को पहले दो सप्ताह इन संस्थानों में एक गहन प्रशिक्षण में सहभागिता करनी थी और फिर विश्व के एक शीर्षस्थ विश्वविद्यालय में एक सप्ताह के अध्ययन के लिए जाना था। इस प्रशिक्षण के लिए मिशिगन विश्वविद्यालय (अमेरिका), एनटीयू (सिंगापुर), हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय, परडु विश्वविद्यालय, शिकागो विश्वविद्यालय, स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय (अमेरिका), मोनास विश्वविद्यालय (मेलबर्न) और आॅक्सफोर्ड विश्वविद्यालय (इंग्लैंड) का चयन हुआ। शुरुआती दो सप्ताह के प्रशिक्षण हेतु प्रशिक्षक के रूप में देश के जाने-माने शिक्षाविदों, प्रशासकों, वैज्ञानिकों को इसमें निमंत्रित किया गया था। कार्यक्रम में जहां प्रशिक्षु शिक्षाविदों को शैक्षिक संस्थानों में नेतृत्व का अर्थ समझाया गया, वहीं गुणवत्ता बढ़ाने के लिए किए जाने वाले प्रयासों की सम्यक रूपरेखा भी दी गई। संस्थानों में अच्छी टीम के निर्माण से लेकर शिक्षण और शोध की गुणवत्ता सुधारने जैसे विषयों पर गहन प्रशिक्षण हुआ।

विदेश प्रवास के दौरान इन्हें एक विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय की कार्य-पद्धति के गहन अध्ययन का अवसर मिला। इस योजना का प्रथम चरण पूर्ण हो गया है और सारे शिक्षाविद प्रशिक्षण के बाद अपने-अपने संस्थानों में वापस आ गए हैं। अपेक्षित परिणाम के लिए अब उपयुक्त रणनीति की आवश्यकता है जिससे यह स्पष्ट हो कि शिक्षाविदों के प्रशिक्षण के बाद उनके संस्थानों में क्या बदलाव आया। परिवर्तन और परिवर्द्धन के लिए नई सोच, सम्यक दृष्टिकोण, उत्कृष्टता की प्रतिबद्धता और प्रशासनिक सहयोग की जरूरत होती है। इस अत्यंत महत्त्वपूर्ण और भविष्य को ध्यान में रख कर बनाई गई योजना के सुपरिणाम उत्तराखंड के पंतनगर में स्थित गोबिंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय में देखने को मिले। क्या रही उनकी रणनीति और कैसे रहे उनके परिणाम, यह देश के दूसरे संस्थानों के लिए अध्ययन का विषय होना चाहिए।

लीप परियोजना के अंतर्गत गोबिंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय से तीन प्राध्यापकों (वैज्ञानिकों) का चयन हुआ। तीनों वैज्ञानिक हैदराबाद विश्वविद्यालय और फिर मोनास विश्वविद्यालय (आस्ट्रेलिया) गए। इन तीनों वैज्ञानिकों के अनुसार टीम में जाने का लाभ यह मिला कि तीनों सहभागियों ने प्रत्येक दिन साथ बैठ कर नए दृष्टिकोण और अपने विश्वविद्यालय के संदर्भ में संभावित परिवर्तनों को लेकर विचार-विमर्श किया। यह टीम एक सम्यक सोच और रणनीति के साथ वापस लौटी।

विश्वविद्यालय प्रशासन ने इन प्राध्यापकों के विचारों और योजनाओं का सम्मान किया। पंतनगर विश्वविद्यालय के कुलपति ने तीनों वैज्ञानिकों का व्याख्यान आयोजित करवा कर उसमें विश्वविद्यालय के लिए महत्त्वपूर्ण कार्यों की रूपरेखा बनवाई। इससे यह स्पष्ट हुआ कि रैंकिंग सुधारने का आधार शोध गुणवत्ता के विकास पर बहुत निर्भर है। इसी में यह बात भी उठी कि स्वायत्तता मूल कुंजी है, पर इसी के साथ जवाबदेही भी जुड़ी है। अच्छे परिणामों के लिए उत्कृष्ट, जिम्मेवार, अनुशासित और स्व-प्रेरित शिक्षकों का समूह जरूरी है। देश के जिन संस्थानों में यह हो पाया वे संस्थान अपनी अलग पहचान बनाने में सफल हुए।

दुनिया के उत्कृष्ट विश्वविद्यालयों के उदाहरण देखने पर यह भी पता चला कि वित्तीय आत्मनिर्भरता के लिए संस्थानों की बौद्धिक क्षमता को आधार बनाना होगा, तभी शोध परिणाम, उत्पाद, संरचना, संकल्पनाओं का पेटेंट अच्छी आय का स्रोत बन सकते हैं। विशेषज्ञता हासिल कर उद्योग जगत की आवश्यकताओं के अनुरूप परामर्श के माध्यम से भी अनेक संस्थानों ने अच्छी कमाई की है। इसलिए संस्थानों की प्रवृत्ति और प्रकृति के अनुसार उनकी क्षमताओं के सही आकलन और दोहन के लिए उचित रणनीति बनाने की बनाने की जरूरत है।

गोबिंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय में विश्वविद्यालय रैंकिंग संवर्धन टीम बनाई गई है। इसमें पूरे विश्वविद्यालय के प्रत्येक महाविद्यालय के प्राध्यापक शामिल किए गए हैं। इस टीम ने संस्थान की क्षमता आकलन का अभियान शुरू किया है जिससे संस्थान की कमियों का पता लगा कर उन्हें दूर करने का काम किया जा सके। इस दल के शिक्षकों का मानना है कि अभी तो संस्थान की वर्तमान उपलब्धियों और क्षमताओं का सही मायने में संकलन ही कर लिया जाए तो रैंकिंग कुछ सुधर सकती है। इसके बाद मध्यम और लंबी अवधि की रणनीति बनाई जाए तो गुणवत्ता को काफी हद तक सुधारा जा सकता है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा कृषि विश्वविद्यालय एवं संस्थानों की रैंकिंग का प्रस्ताव जारी हुआ है। यह दायित्व स्वाभाविक रूप से इस टीम को दिया गया। अपने अनुभवों और उत्कृष्टता के पैमानों को समक्ष रख इस टीम ने विश्वविद्यालय के योगदान से संबंधित आंकड़े जुटाए।

संकलित आंकड़ों को आधार मानते हुए रैंकिंग संवर्धन टीम ने विश्वविद्यालय के उस प्रत्येक बिंदु को स्पर्श किया जहां उपलब्धियों के कुछ आंकड़े संकलन में शामिल नहीं हुए थे। पूर्व छात्रों के सहयोग से छात्रों के सेवायोजन के आंकड़े अद्यतन किए गए। अनेक परियोजना अधिकारियों और विशेषज्ञों से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात करने का प्रयत्न हुआ। इस तरह सभी मानकों पर विश्वविद्यालय की स्थिति सुधरी। अब तक जहां अनेक मानकों की उपलब्धियों, जिन्हें पहले शून्य माना जा रहा था, को नए सिरे से सुधारा गया जिससे अपनी क्षमताओं को समझने का अवसर मिला।

कई स्तरों के आकलन और समीक्षा के बाद रैंकिंग संवर्धन टीम ने वर्ष 2018 के विश्वविद्यालय के योगदान पर आधारित अपना आइसीएआर रैंकिंग आवेदन तैयार किया। लीप योजना के क्रियान्वयन के बाद केवल कुछ महीने गुजरे थे, इसलिए अभी रैंकिंग टीम को उपलब्धियों को नए दृष्टिकोण से देखने का अवसर भर मिला। आत्म-अन्वेषण और सामग्री संयोजन के इस प्रयास ने पंतनगर विश्वविद्यालय को देश के चौंसठ कृषि विश्वविद्यालयों और तीन केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालयों में पहले स्थान पर ला खड़ा किया। वर्ष 2019 की आइसीएआर रैंकिंग में दो आइसीएआर संस्थानों को प्रथम एवं द्वितीय रैंक मिली और तीसरे स्थान पर पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय रहा।

पिछले कई सालों से पंतनगर का यह कृषि विश्वविद्यालय सातवें-आठवें स्थान पर बना हुआ था। रैंकिंग संवर्धन टीम के मुताबिक देश के कृषि विश्वविद्यालयों में विशिष्ट कार्य संस्कृति है। इस कारण कृषि विश्वविद्यालयों में विश्व के सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थान के रूप में उभरने की क्षमता है। प्रतियोगी भाव से देश के कृषि विश्वविद्यालय दुनिया के अग्रणी संस्थानों में अपना स्थान बनाने में सक्षम हो सकते हैं।

लीप परियोजना से देश के अनेक विश्वविद्यालयों ने कई महत्त्वपूर्ण उपलधियां हासिल की हैं। विश्वविद्यालयों को उत्कृष्ट बनाने के लिए सबसे जरूरी है कि प्राध्यापकों की क्षमताओं का पूरा उपयोग किया जाए। इसके लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय को अपने इस अभिनव प्रयास को जारी रखना होगा ताकि इस परियोजना के लाभों को सार्थक परिणामों तक पहुंचाया जाए। तभी देश उच्च शिक्षा के क्षेत्र में विश्व में अपना खास मुकाम बना पाएगा।

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