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राजनीति: ब्रेग्जिट और भविष्य का संकट

ब्रिटेन के यूरोपीय यूनियन से बाहर आने के संकट का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है। स्वयं ब्रिटेन की आंतरिक सुरक्षा के लिए भी यह बड़ी चुनौती बन सकता है। ब्रिटेन के यूरोपीय यूनियन से अलग होने से अन्य देश भी अलगाव के रास्ते पर जा सकते हैं। स्कॉटलैंड और आयरलैंड के लोग इस संधि में बने रहना चाहते हैं, अत: ब्रिटेन के अलग होने से अलगाववाद पुन: यहां सिर उठा सकता है।

Author नई दिल्ली | August 15, 2019 3:10 AM
सांकेतिक तस्वीर।

रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने जब उदारवादी वैश्विक अर्थव्यवस्था के युग में लोकतंत्र में उदारवाद के समाप्त होने का अंदेशा जताया था तो इसकी कड़ी प्रतिक्रिया हुई थी। यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष डोनल्ड टस्क ने इसका जवाब देते हुए कहा था कि ऐसा सोचना ठीक वैसा ही है जैसे दुनिया में आजादी का समाप्त हो जाना या कानून के शासन और मानवाधिकारों का बेकार हो जाना। दरअसल, उदारवाद को लेकर दुनिया के कई देशों की आंतरिक और वैश्विक राजनीति में भारी विरोधाभास देखने को मिल रहे हैं। विश्व के सबसे बड़े बाजार यूरोपियन यूनियन का आर्थिक द्वार ब्रिटेन भी इस नीति को लेकर गहरे पसोपेश में है।

ब्रिटिश समाज मुक्त व्यापार के फायदों और अपने देश की आर्थिक प्रगति से ज्यादा अप्रवासन की उन चुनौतियों से ज्यादा आशंकित है जो पूर्वी यूरोप और गृहयुद्ध से जूझ रहे अरब और अफ्रीकी देशों से आ रही है। यहां के निवासियों को लगता है कि यूरोपीय यूनियन में ज्यादा समय तक बने रहने से न केवल उनका सांस्कृतिक और सामाजिक परिदृश्य बदल जाएगा, बल्कि स्थानीय नागरिकों के सामने रोजगार और सुरक्षा का संकट भी गहरा सकता है।

ब्रेग्जिट पर यूरोपीय संघ के साथ समझौते को संसद से पास न करा पाने से निराश थेरेसा मे के प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद भी इस देश की आंतरिक राजनीति में उथल-पुथल थमती नहीं दिखाई पड़ रही है। नए प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन घोर परंपरावादी माने जाते हैं और वे उदारवाद के नाम पर अप्रवासन और यूरोपीय संघ के मुक्त आवाजाही के नियमों को बर्दाश्त कर लें, इसकी संभावनाएं नगण्य हैं। दुनिया भर में उदारवादी लोकतंत्र को मार्ग दिखलाने के लिए ब्रिटेन की पहचान रही है। लेकिन वर्तमान में दक्षिणपंथी राजनीति के वैश्विक उभार का व्यापक असर यहां के समाज पर भी देखने को मिल रहा है।

यूरोपीय संघ के मुक्त अर्थव्यवस्था के इतर फ्रीडम आॅफ मूवमेंट का विरोध जिस प्रकार ब्रिटेन में किया गया, उससे दुनिया की साझा संस्कृति वाले समाज की कमजोर होती जड़ें खुल कर सामने आई हैं। इस समय ब्रिटेन की राजनीति में उथल-पुथल होने का सबसे बड़ा कारण ही यह है कि यूरोपीय संघ के लिए भले ही अर्थव्यवस्था बड़ा मुद्दा हो लेकिन ब्रिटेन के लिए अप्रवासन को बड़ी समस्या और चुनौती मान लिया गया है।

साल 2011 में ब्रिटेन में जनगणना करने वाले विभाग आॅफिस फॉर नेशनल स्टेटिस्टिक्स ने जब ब्रिटेन की जनसंख्या के आंकड़े जारी किए तो उसकी भी यहां के परंपरावादी समाज में कड़ी प्रतिक्रिया देखी गई थी। इसके अनुसार ब्रिटेन की जनसंख्या को छह करोड़ बत्तीस लाख बताया गया था जिसमें ब्रिटेन के स्थानीय निवासियों का अनुपात 2001 की जनगणना के सत्तासी फीसद के मुकाबले घट कर अस्सी फीसद बताया गया था। आंकड़ों के अनुसार ब्रिटेन के मुख्य प्रांतों इंग्लैंड और वेल्स में हर आठवां व्यक्ति विदेश में जन्मा है। ब्रिटेन के जनसंख्या अनुपात में पिछले दस सालों में आए बदलाव के लिए मुख्य कारण अप्रवासियों का ब्रिटेन आना बताया गया।

इन कारणों से ब्रिटिश राजनीति में अप्रवासन की समस्या को लेकर हलचल बढ़ गई। इसका असर जनमत संग्रह में देखने को मिला। साल 2016 में ब्रिटेन में हुए जनमत संग्रह में लोगों से यह सवाल किया गया कि आप यूरोपीय संघ के सदस्य बने रहना चाहते हैं या उससे बाहर निकलना चाहते हैं। जवाब में बावन फीसद लोगों ने यूरोपीय संघ से बाहर निकलने के पक्ष में मतदान किया था, जबकि उसमें बने रहने के पक्ष में मतदान करने वाले अपेक्षाकृत कम थे और अड़तालीस प्रतिशत लोगों ने यूरोपीय संघ के पक्ष में वोट दिया था। ये नतीजे अप्रत्याशित थे।

इस जनादेश को कंजर्वेटिव पार्टी के लिए लोकप्रिय माना गया और इसे कानूनी जामा पहनाने के लिए थेरेसा मे के बाद प्रधानमंत्री बने बोरिस जॉनसन भी कृत संकल्पित नजर आते हैं। थेरेसा मे की सरकार ने शरणार्थियों की बढ़ती संख्या में कटौती के लिए गैर-यूरोपीय संघ के लोगों के लिए वीजा नीति में बदलाव कर दिया था और इसे ब्रिटिश समाज में राष्ट्रवाद के उभार के तौर पर देखा गया था। बोरिस जॉनसन लगातार ब्रिटेन के यूरोपीय यूनियन से अलग होने के समर्थक बने हुए हैं। उन्हें दक्षिणपंथी विचारधारा की ओर झुकाव के लिए जाना जाता है।

लोकतंत्र को लेकर सबसे ज्यादा उदारता दिखाने वाले ब्रिटिश समाज का इस समय राष्ट्रवाद के रूप में उभरने वाला परंपरावादी रुख वैश्विक प्रभाव डाल सकता है। याद रहे कि अतिवादी राष्ट्रवादी विचारधारा के कारण ही द्वितीय युद्ध हुआ था और यह समूची यूरोपीय अर्थव्यवस्था के विनाश का कारण बना था। लेकिन पचास के दशक में जर्मनी, इटली, फ्रांस, बेल्जियम, नीदरलैंड और लक्जमबर्ग जैसे देश लामबंद हुए और 1957 में यूरोपीय आर्थिक समुदाय अस्तित्व में आया। साल 1985 में शेंजन की संधि हुई जिसके द्वारा यूरोपीय नागरिकों के मुक्त आवागमन का प्रावधान किया गया। यूरोपीय संघ अट्ठाईस देशों की एक आर्थिक और राजनीतिक सहभागिता वाली व्यवस्था है। ये देश एक संधि के द्वारा संघ के रूप में जुड़े हुए हैं, ताकि व्यापार आसानी से हो सके।

ब्रिटेन के यूरोपीय यूनियन से बाहर आने के संकट का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है। स्वयं ब्रिटेन की आंतरिक सुरक्षा के लिए भी यह बड़ी चुनौती बन सकता है। ब्रिटेन के यूरोपीय यूनियन से अलग होने से अन्य देश भी अलगाव के रास्ते पर जा सकते हैं। स्कॉटलैंड और आयरलैंड के लोग इस संधि में बने रहना चाहते हैं, अत: ब्रिटेन के अलग होने से अलगाववाद पुन: यहां सिर उठा सकता है। इन दोनों प्रांतों के निवासियों ने पहले ही यूरोपीय यूनियन में बने रहने के पक्ष में मतदान किया था। वैसे यूरोपीय यूनियन के देश आर्थिक समझौते के साथ सांस्कृतिक एकता भी चाहते रहे हैं। यह इलाका ईसाई बाहुल्य के लिए जाना जाता है लेकिन तुर्की के प्रभाव से मुसलिम अप्रवासन बढ़ने को बड़ा संकट माना गया।

इसके साथ ही अरब से अफ्रीका के गृह युद्ध से पनपे संकट में शरणार्थियों के लिए जर्मनी ने उदारता से अपने द्वार खोले। जर्मनी भी यूरोपीय यूनियन का सबसे बड़ा और प्रभावी देश माना जाता है अत: इसका प्रभाव अन्य देशों पर पड़ा और ब्रिटेन के समाज को अप्रवासन उनके देश के लिए सांस्कृतिक संकट महसूस हुआ। यही नहीं, मुक्त आवाजाही के कारण यूरोप के अन्य देशों के नागरिक ब्रिटेन में आकर रोजगार तलाशने लगे और स्थानीय लोगों में प्रवासियों के प्रति असंतोष उत्पन्न हुआ। यूरोपीय संघ के दूसरी सबसे बड़ी जनसंख्या वाले देश ब्रिटेन को इसके प्रशासनिक संचालन में भी बड़ी आर्थिक भूमिका निभानी होती है जिससे इस देश के लोगों को लगता है कि उन पर ब्रिटिश सरकार का नहीं, बल्कि यूरोपीय संघ का नियंत्रण हो गया है। यूरोपीय संघ के मुक्त व्यापार के साथ मुक्त आवाजाही, पर्यावरण, खाद्य सामग्री और अन्य नियमों के पालन को भी यहां का समाज अपनी स्वतंत्रता के विरुद्ध मानने लगा है।

यूरोपीय संघ के विकास को लोकतंत्र का विकास माना गया क्योंकि इसका सदस्य वही देश बन सकता है जो लोकतांत्रिक हो और जिसका मानवाधिकारों का भी बेहतर रिकार्ड हो। दुनिया में गरीबी, आतंकवाद और गृहयुद्ध से जूझते लोगों को लेकर यूरोप का समाज जिस तरह दो भागों में बंट रहा है, उससे भी लोकतंत्र और मानवाधिकारों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पर संकट गहरा गया है। ब्रिटेन तो दुनिया के बहुलतावादी समाज का प्रतीक रहा है और वहां के उदारवादी समाज का कड़ा रुख बहु-सांस्कृतिक ढांचे पर ही कड़ा प्रहार है। बहरहाल, ब्रेक्जिट से बाहर होने की ब्रिटिश सरकार की राष्ट्रवादी भावनाओं के उभार की कोशिशों के बीच दुनिया में बहु-संस्कृतिवाद के अस्तित्व को लेकर आशंकाएं गहराने लगी हैं। यह वैश्विक अर्थव्यवस्था और समूची मानव जाति के लिए खतरनाक संकेत है।

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