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राजनीति: बारिश और जल प्रबंधन

आज प्रबंधन प्रौद्योगिकी ने अच्छा-खासा विकास कर लिया है। प्रबंधन प्रौद्योगिकी के शोधार्थियों को जल प्रबंधन पर शोध के काम में लगाया जा सकता है। लेकिन प्रबंधन प्रौद्योगिकी अभी उद्योग व्यापार यानी कॉरपोरेट जगत से बाहर निकल कर नहीं आ पा रही है। जबकि जल जैसे महत्त्वपूर्ण संसाधन के प्रबंधन के लिए यह विशिष्ट प्रौद्योगिकी बहुत बड़ी भूमिका निभा सकती है।

Author नई दिल्ली | Published on: August 17, 2019 1:44 AM
सांकेतिक तस्वीर।

सुविज्ञा जैन
पिछले दो हफ्ते से देश में बाढ़ से हाहाकार मचा है। इससे पहले तक सूखे का अंदेशा था। लेकिन इस पखवाड़े कुछ जगहों पर औसत से काफी ज्यादा पानी पड़ा और देश में औसत बारिश का आंकड़ा पूरा हो गया। लेकिन एक तिहाई हिस्सा अभी भी कम बारिश का शिकार है। पिछले साल भी ऐसा ही हुआ था। सामान्य बारिश के सरकारी दावे के बावजूद आधा देश सूखे की चपेट में आ गया था। लगता है, इस बार भी सरकारी एजेंसियों ने पिछले साल से कोई सबक नहीं लिया। कम बारिश वाले इलाकों पर सरकारी ध्यान इस बार भी नहीं गया है। अखबारों और टीवी में अब तक सिर्फ बाढ़ की खबरें छाई हैं, जबकि एक तिहाई देश पर सूखे की चिंता गायब है। मामला गौरतलब इस कारण से है कि देश में मानसून के चार में से ढाई महीने गुजर चुके हैं। सबसे ज्यादा बारिश का समय यानी जुलाई का पूरा महीना और अगस्त का पहला पखवाड़ा भी गुजर गया है। लिहाजा पानी के हिसाब-किताब पर गौर का यही सही समय है।

यह ठीक है कि कुछ जगह भारी बारिश और बाढ़ ने सांख्यिकी के लिहाज से सूखे के अंदेशे को कुछ कम कर दिया। लेकिन क्या बाढ़ खुद में एक त्रासदी नहीं है? सरकार को जितनी चिंता सूखे की करनी थी, उतनी ही चिंता बाढ़ ने बढ़ा दी। यह भी ध्यान रखना पड़ेगा कि सूखे की चिंता पूरी खत्म नहीं हुई है। दरअसल, देश में बारिश कहीं तो बहुत कम और कहीं काफी ज्यादा हुई है। इस तरह आपदा की दोहरी मार है, पिछले साल से भी ज्यादा। मौजूदा हालात पर नजर डालें तो मौसम विभाग के अड़तीस उपसंभागों में सात उपसंभाग पानी की भारी कमी झेल रहे हैं। जबकि ज्यादा बारिश के शिकार भी सात ही उपसंभाग हैं।

सबसे ज्यादा गौर करने की बात यह कि जिन चौबीस उपसंभागों को मौसम विभाग सामान्य बारिश की श्रेणी में डाले हुए हैं, उनमें ज्यादातर में औसत से कम ही बारिश हुई है। अगर देश के कुल क्षेत्रफल के लिहाज से देखें तो औसत से कम बारिश का इलाका साठ फीसद से ज्यादा है। देश का एक चौथाई इलाका तो उन्नीस फीसद से भी ज्यादा कमी वाला यानी जलन्यून श्रेणी में बना हुआ है। इसी बीच, ये अनुमान भी जताए गए हैं कि मानसून के बचे डेढ़ महीने में अल नीनो असर के कारण बारिश कम हो सकती है।

इधर प्रबंधन के मौजूदा हालात ये हैं कि जहां ज्यादा पानी गिरता भी है तो उसे रोक कर रखने का पूरा इंतजाम देश के पास नहीं है। इसीलिए सामान्य बारिश के बावजूद कई साल से अगला मानसून आते-आते आधा देश सूखे की चपेट में आ जाता है। पिछला अनुभव बता रहा है कि अच्छी बारिश वाले इलाकों में भी कृषि सूखा पड़ने की आशंका बनी हुई है। यानी अगर मौसमी सूखा न भी पड़े तो जल कुप्रबंधन के कारण अपना देश कृषि सूखे की चपेट से बच नहीं पाता। यह साल इस बात को पुख्ता कर रहा है कि चाहे बाढ़ हो या सूखा, उसका कारण एक ही है कि हम बारिश के पानी को सुचारु रूप से संचित नहीं कर पा रहे हैं। इसके लिए पर्याप्त बांध और जलाशय चाहिए। लेकिन दिक्कत यह है कि पिछले कुछ दशकों में हम कई कारणों से बारिश के पानी को रोक कर रखने के लिए बड़े बांध या बड़े जलाशय बनाने का इतना विरोध कर चुके हैं कि हाल फिलहाल बड़े बांधों का सुझाव देने का खतरा कोई भी मोल नहीं लेना चाहेगा।

सियासी वक्त की नजाकत को देखते हुए समस्या के समाधान के लिए छोटे बांध या तालाबों का ही विकल्प बचा है। सबसे ज्यादा अच्छी बात यह है कि तालाबों के रूप में पारंपरिक जल प्रबंधन के लाखों साक्ष्य आज भी उपलब्ध हैं। यहां इस तथ्य पर भी गौर कर लेना चाहिए कि तरकीब चाहे पुरानी हो या नई, उसके पीछे का विज्ञान लगभग एक जैसा ही होता है। जल संचयन के मामले में अगर दोनों पद्धतियों में कोई अंतर दिखता है तो वह सिर्फ आकार का है।

देश में पिछले कई सालों से सूखे से अभिशप्त रहने वाले बुंदेलखंड में जल प्रबंधन की प्राचीन पद्धति के अवशेष आज भी मौजूद हैं। प्रतीकात्मक रूप से ये प्राचीन तालाब एक हजार साल बाद आज भी बारिश के पानी को रोक कर रख रह रहे हैं और गर्मियों के दिनों में उनमें भरे पानी से जीव जगत के प्राण बच पा रहे हैं। ये तालाब नौवीं सदी से तेरहवीं सदी के बीच बुंदेलखंड में चंदेल शासकों ने बनवाए थे। उनकी राजधानी महोबा में सात तालाबों की एक ऐसी शृंखला जीवित है जो अपने जल ग्रहण क्षेत्र का एक-एक बूंद पानी संचित करने में सक्षम थी।

दरअसल, ये सातों प्राचीन तालाब एक दूसरे से नहरों के जरिए आपस में जुड़े हैं। ज्यादा बारिश होने की स्थिति में एक तालाब के पूरा भर जाने के बाद उसका पानी नीचे के दूसरे तालाब में जाने लगता है, दूसरे के भरने पर तीसरे में और इसी तरह सातवें तालाब तक। तीन दशक पहले इन तालाबों के जलविज्ञान का एक अध्ययन करवाया था। उसका निष्कर्ष यह था कि यह प्राचीन तालाब शृंखला जल प्रबंधन का एक ऐसा नायाब नमूना है जो आधुनिक जल विज्ञान के लगभग सभी नुक्तों के लिहाज से भी खरा है।

आज जब न सिर्फ भारत में बल्कि पूरी दुनिया में जल संकट का खतरा मंडरा गया है तो जल संसाधन के प्राचीन प्रबंधन के इस अद्भुत स्वरूप पर प्रबंधन प्रौद्योगिकी के शोधार्थियों की नजर क्यों नहीं जानी चाहिए! यह मान लेने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि देश में जल प्रबंधन पर शोधकार्य की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। जल प्रबंधन का पूरा काम आज भी सार्वजनिक निर्माण के अभियंता ही देखते हैं। उनका शिक्षण-प्रशिक्षण सुरक्षित संरचना के निर्माण के मद्देनजर ही होता है। किसी संसाधन के प्रबंधन के नुक्तों से उनका ज्यादा सरोकार न होना स्वाभाविक है। उनसे पानी के अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र या समाजशास्त्र की अतिरिक्त शिक्षा की अपेक्षा रखना उन पर ज्यादती ही होगी।

आज प्रबंधन प्रौद्योगिकी ने अच्छा-खासा विकास कर लिया है। प्रबंधन प्रौद्योगिकी के शोधार्थियों को जल प्रबंधन पर शोध के काम में लगाया जा सकता है। लेकिन प्रबंधन प्रौद्योगिकी अभी उद्योग व्यापार यानी कॉरपोरेट जगत से बाहर निकल कर नहीं आ पा रही है। जबकि जल जैसे महत्त्वपूर्ण संसाधन के प्रबंधन के लिए यह विशिष्ट प्रौद्योगिकी बहुत बड़ी भूमिका निभा सकती है। इतना ही नहीं, आजकल शोध क्षेत्र में अंतर-विषयक शोध की बात भी होने लगी है। लिहाजा, देश के विश्वविद्यालयों और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों के प्रबंधन अध्ययन विभागों की नजर इस विषय पर पड़ने की दरकार है। ऐसे संस्थान चाहें तो संसाधन के रूप में पानी को अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र जैसे विषयों से भी जोड़ सकते हैं।

कहने का मतलब यह कि महोबा के चंदेलकालीन जल प्रबंधन का अध्ययन जल संकट के कारणों और उसके समाधान को तलाशने में भी फौरी मदद पहुंचा सकता है। अगर पिछले कई दशकों तक युद्धस्तर की तमाम कोशिशों के बावजूद बुंदेलखंड की जल त्रासदी को कम नहीं किया जा सका है तो जरा तसल्ली के साथ सोच-विचार करके सही समाधान क्यों न ढूंढ़ लिया जाए। सनद रहे कि इस तथ्य पर कोई विवाद नहीं है कि बुंदेलखंड की मुख्य समस्या जल संकट ही है। सार्वभौमिक जल संकट के समाधान ढूंढने निकलें तो उसके लिए भी चंदेलकालीन जल प्रबंधन के प्राचीन भौतिक साक्ष्य हमें काफी कुछ बता सकते हैं। कम से कम जल संकट की इस घड़ी में हमें इतना तो देख ही लेना चाहिए कि क्या प्राचीन जल प्रबंधन प्रौद्योगिकी आज भी प्रासंगिक है?

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