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राजनीति: राममंदिर ट्रस्ट की स्वीकार्यता और अंदेशे

विश्व हिंदू परिषद द्वारा प्रायोजित रामजन्म भूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास और चम्पत राय को नए ट्रस्ट में शामिल नहीं किया जा सका।

Author Published on: February 10, 2020 1:00 AM
फिलहाल, वे बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले के अभियुक्त हैं, जिस पर अदालत का फैसला आना शेष है।

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए नए ट्रस्ट के गठन और उसके सदस्यों के चयन के साथ ही अब उसकी स्वीकायर्ता को लेकर विवाद भी शुरू हो गया है। साधु-संतों और संगठनों में इस बात को लेकर तो पहले से ही असंतोष जताया जा रहा है कि ट्रस्ट में अयोध्या के राम मंदिर के लिए संघर्षरत रहे संतों-महंतों का प्रतिनिधित्व नहीं है, पर अब इस बात को लेकर भी आपत्ति उठी है इस ट्रस्ट का दफ्तर अयोध्या में हो या फिर दिल्ली में।

ऐसे में यह सवाल फिर सिर उठा रहा है कि सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय और उस पर अमल विवाद का वास्तविक हल निकालने में सफल रहा या नहीं? यह भी सवाल है कि 22-23 दिसंबर, 1949 की रात बाबरी मस्जिद में मूर्तियां रखे जाने (जिसे मंदिर समर्थक रामलला का प्राकट्य बताते हैं) से लेकर 1990 के कारसेवा आंदोलन और छह दिसंबर, 1992 को हुए बाबरी मस्जिद विध्वंस तक के प्रकरण धार्मिक अनिवार्यताओं से जुड़े थे या राजनीतिक आवश्यकता का परिणाम थे? जो भी हो, विवाद का समाधान आपसी सुलह-समझौते पर आधारित होता तो कटुताएं भी घटतीं और उसकी स्वीकार्यता भी व्यापक और उत्साहित करने वाली होती।

अब कोई इसे कानून की विसंगति कहे या बाध्यता कि सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में बाबरी मस्जिद में मूर्तियां रखे जाने को अनुचित और उसके विध्वंस को अपराध करार देकर इससे जुड़े लोगों के खिलाफ कार्रवाई की अपेक्षा की, लेकिन उसी का परिणाम है कि विश्व हिंदू परिषद द्वारा प्रायोजित रामजन्म भूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास और चम्पत राय को नए ट्रस्ट में शामिल नहीं किया जा सका। फिलहाल, वे बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले के अभियुक्त हैं, जिस पर अदालत का फैसला आना शेष है।

थोड़ा पीछे लौट कर देखें तो विवाद को सुलह समझौते से निपटाने की कोशिशें तो सन 1986 में सफल होते-होते रह गई थीं, 1983 से विश्व हिंदू परिषद के इस विवाद में शामिल और आंदोलित होने के तीन ही साल बाद। तब मुस्लिम पक्ष इस बात पर सहमत हो गया था कि सन् 1885 में हिंदू जिस स्थल को जन्मभूमि बता कर मुकदमा हार गए थे, वहीं से मंदिर का निर्माण आरंभ हो और बाबरी मस्जिद को ग्यारह फीट ऊंची दीवारों से घेर दिया जाए। विश्व हिंदू परिषद ने अयोध्या में हुई बैठक में इसे स्वीकार भी किया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दोनों मुखपत्रों ‘पांचजन्य’ और ‘आॅर्गनाइजर’ ने हिंदुओं की विजय कह कर इसका स्वागत किया था, लेकिन तत्कालीन सरसंघ चालक भाऊराव देवरस को यह समझौता रास नहीं आया था। तब उन्होंने विहिप नेताओं को उसका स्वागत करने के लिए भरपूर डांट पिलाई थी। यह कह कर कि ‘देश में आठ सौ राम मंदिर हैं, इस समझौते से एक और बन जाएगा तो उनकी संख्या आठ सौ एक हो जाएगी, लेकिन उसके बाद बनाने वाले की पहचान की जरूरत नहीं रह जाएगी। हमने अपना आंदोलन इसके लिए नहीं, इस विवाद को राजनीतिक अस्त्र के रूप में प्रयुक्त कर दिल्ली की सत्ता प्राप्त करने के लिए शुरू किया है। इसलिए हमें सुलह के इस समझौते से हट जाना चाहिए।’

गौरतलब है कि उनका यह दृष्टिकोण तब था, जब रामजन्म भूमि न्यास के अध्यक्ष नृत्यगोपाल दास को उक्त समझौते के आधार पर बनने वाले ट्रस्ट का भी अध्यक्ष स्वीकार कर लिया गया था। उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य मुख्तार अहमद किदवई उसके एकमात्र मुसलिम सदस्य थे। लेकिन अंतत: देवरस की डांट रंग लाई और विश्व हिंदू परिषद ने इस समझौते को नकार दिया। फिर उसका आंदोलन बाबरी मस्जिद के ध्वंस तक जा पहुंचा, तो तत्कालीन नरसिंह राव सरकार ने अयोध्या विशेष क्षेत्र अधिग्रहण अधिनियम बनाया-‘लंबे समय से चले आ रहे विवाद के सर्वधर्म समभाव पर आधारित समाधान के लिए’। इसके तहत अधिग्रहीत भूमि पर मंदिर-मस्जिद के साथ वाचनालय, पुस्तकालय, संग्रहालय और जन-सुविधाओं से जुड़े निर्माण की बात थी। सर्वोच्च न्यायालय की जस्टिस वेंकेटचेलैया की अध्यक्षता वाले पांच सदस्यों के संविधान पीठ ने इसे संविधान-सम्मत भी स्वीकार कर लिया था।

लेकिन इस अधिग्रहण कानून में विवाद से संबंधित मुकदमों की समाप्ति के प्रावधान को लेकर न्यायालय का तर्क था कि सरकार को भले ही मुकदमे समाप्त करने का अधिकार है, लेकिन संबंधित पक्षों को न्याय पाने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। उसने कहा कि चूंकि उक्त प्रावधान में न्याय की वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है, इसलिए वह असंवैधानिक है। उसकी इस व्यवस्था की परिणति विवाद के पुनर्जीवन के रूप में हुई, जो हाईकोर्ट के रास्ते सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा तो उसका फैसला भी अनेक साधारण लोगों की समझ से परे रहा। उसने बाबरी मस्जिद में मूर्ति रखने को अनुचित और मस्जिद के विध्वंस को आपराधिक बताया और यह भी कहा कि इस स्थल के उत्खनन से मिले सबूतों से मंदिर गिरा कर मस्जिद का निर्माण साबित नहीं होता। लेकिन इसके साथ ही रामलला के पक्ष में फैसला देकर सेंट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड को मस्जिद निर्माण के लिए अयोध्या में महत्त्वपूर्ण जगह पर पांच एकड़ भूमि देने का आदेश दिया। उत्तर प्रदेश सरकार ने यह भूमि लखनऊ रोड पर अयोध्या से बाईस किलोमीटर दूर धन्नीपुर गांव में दी है। अभी उस भूमि पर हरीभरी फसलें लहरा रही हैं और उसके स्वामी किसानों का कहना है कि उसे उनसे छीन कर जीवन के आधार से वंचित किया जा रहा है। देखना है कि वे इसे स्वीकार करते हैं या अस्वीकार?

बहरहाल, अयोध्या विवाद समाप्त हो, यह प्राय: सभी की इच्छा है। लेकिन इससे जुड़ी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएं अभी भी इसमें सहयोगी नहीं हो रहीं। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अधिग्रहीत 67.7 एकड़ भूमि अयोध्या विशिष्ट क्षेत्र अधिग्रहण अधिनियम बनने पर केंद्र के कब्जे में आ गई थी। प्रावधानों के अनुसार उसे नए ट्रस्ट को ही दिया जा सकता था। पांच फरवरी को दिल्ली में राममंदिर ट्रस्ट के गठन की औपचारिकता तो पूरी कर दी गई, लेकिन जिस उद्देश्य के लिए संसद ने उक्त कानून स्वीकार किया था, वह धरा का धरा रह गया लगता है। इस कारण जहां मुसलमानों के एक धड़े का मत है कि जो भी हुआ, विवाद से तो छुट्टी मिली, वहीं दूसरे धड़े का कहना है कि देश को हिंदू-मुसलिम के आधार पर विभाजित करने की कोशिशों के रहते उनका संकट बढ़ेगा ही।

गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय भी विवाद का परस्पर सहमति पर आधारित निपटारा चाहता था, लेकिन इसमें सफल नहीं हो पाया, क्योंकि कुछ कट्टरवादियों का मानना था कि मंदिर निर्माण हिंदू शौर्य का प्रतिपादक न हो तो उसका क्या फायदा? परमहंस रामचंद्र दास ने तो स्कन्द पुराण में निर्धारित जगह पर राममंदिर बनाने के प्रस्ताव को यह कह कर नकार दिया था कि यदि भगवान राम स्वयं प्रकट होकर कहें कि हमारी जन्मस्थली पृथक है, तब भी हम उनसे यही कहेंगे कि ‘चलो, उधर बैठो, जहां हम बता रहे हैं, वही तुम्हारी जन्मस्थली है।’ ऐसे में शांति और सौहार्दपूर्वक समाधान के आग्रह पर हिंदू शौर्य के दुराग्रह को हावी होना ही था। इसी कारण अनेक लोग अभी भी यही मानते हैं कि यह विवाद सिर्फ मंदिर-मस्जिद या राम जन्मस्थल का न होकर मुसलमानों को समाज की मुख्य धारा से काटने के मंसूबे से जुड़ा है और इसके समाधान में सफलता हासिल करके भी हम भविष्य में ऐसे विवादों से मुक्त नहीं हो पाएंगे।

शीतला सिंह

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