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राजनीति: मौत के वायरस और सवाल

दरअसल, आजकल जीवाणुओं और विषाणुओं की मूल सरंचना में परिवर्तन करके खतरनाक जैविक हथियार बनाए जाने लगे हैं।

Author Published on: February 8, 2020 12:41 AM
2003 में दक्षिण चीन से सॉर्स नामक वायरस फैला और इसने दुनिया के छब्बीस देशों को अपनी चपेट में ले लिया

चीन सहित पूरी दुनिया में कोरोना नाम के जिस वायरस ने आतंक मचाया हुआ है, उसे वुहान स्थित वायरस प्रयोगशाला पी-4 में तैयार किए जाने की आशंका वैज्ञानिकों ने जताई है। दरअसल, आजकल जीवाणुओं और विषाणुओं की मूल सरंचना में परिवर्तन करके खतरनाक जैविक हथियार बनाए जाने लगे हैं। यह आशंका इसलिए जताई गई है, क्योंकि चीन ने एक महीने तक इस बीमारी के फैलने की जानकारी सार्वजनिक नहीं की। यह आशंका इसलिए भी है, क्योंकि चीन में ही कोरोना के वायरस पहली बार पाए गए हैं। 1996 में बर्ड फ्लू चीन से ही फैला था। इसके बाद 2003 में दक्षिण चीन से सॉर्स नामक वायरस फैला और इसने दुनिया के छब्बीस देशों को अपनी चपेट में ले लिया। इसके बाद 2012 में चीन से ही मर्स नाम का वायरस फैला था और इसने सत्ताईस देशों में कहर ढहाते हुए आठ सौ से ज्यादा लोगों को मौत की नींद सुला दिया। इन सभी वायरसों का उत्सर्जन उसी वुहान शहर से हुआ है, जहां चीन की वायरॉलोजी पी-4 प्रयोगशाला है। इसलिए यह शक वैज्ञानिकों को है कि कोरोना वायरस किसी अन्य वायरस के जीन में वंशानुगत परिवर्तन करते समय भूलवश प्रयोगशाला से निकल भागा और दुनिया को महामारी के संकट में डालने का सबब बन गया। चीन करीब डेढ़ महीने तक इसे मामूली बीमारी बताता रहा। जब बीमारी बेकाबू होती चली गई, तब चीन ने इस जानकारी को विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के साथ दुनिया के अन्य देशों से भी साझा किया। लेकिन तब तक यह बीमारी दुनिया के पैंतीस से ज्यादा देशों को अपनी चपेट में ले चुकी थी।

मशहूर वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग ने मानव समुदाय को सुरक्षित बनाए रखने की दृष्टि से जो चेतावनियां दी थीं, उनमें एक चेतावनी आनुवंशिक अभियांत्रिकी (जेनेटिक इंजीनियरिंग) से खिलवाड़ करना भी है। आजकल खासतौर से चीन और अमेरिकी वैज्ञानिक वायरस और बैक्टीरिया से प्रयोगशालाओं में छेड़छाड़ कर एक तो नए वायरस और जीवाणु तैयार में लगे हैं, दूसरे उनकी मूल प्रकृति में बदलाव कर उन्हें और ज्यादा खतरनाक बना रहे हैं। इनका उत्पादन मानव स्वास्थ्य के हित के बहाने किया जा रहा है, लेकिन ये बेकाबू हो गए तो तमाम मुश्किलों का भी सामना करना पड़ सकता है। कई देश अपनी सुरक्षा के लिए घातक वायरसों का उत्पादन कर खतरनाक जैविक हथियार भी बनाने में जुटे हैं। कोरोना वायरस के बारे में यह शंका स्वाभाविक है कि कहीं यह वायरस किसी ऐसे ही खिलवाड़ का हिस्सा तो नहीं है?

हॉलीवुड में ऐसी अनेक फिल्में बन चुकी हैं, जिनमें आनुवंशिक रूप से परिवर्धित किए वायरस और बैक्टीरिया के प्रकोप दिखाए गए हैं। लेकिन फिल्मों की यह परिकल्पना अब प्रयोगशालाओं की वास्तविकता में बदल गई है। साल 2014-15 में फैले इबोला वायरस ने ही हजारों लोगों के प्राण लील लिए थे, जबकि इबोला प्राकृतिक वायरस था। इबोला की सबसे पहले पहचान 1976 में सूडान और कांगो में हुई थी। अफ्रीकी देश जैरे की एक नन के रक्त की जांच करने पर एक नए इबोला का ज्ञान हुआ था। करीब चालीस साल तक शांत पड़े रहने के बाद एकाएक इस वायरस का संक्रमण सहारा अफ्रीका में फैलना शुरू हुआ था। हालांकि यह महामारी में बदलता इससे पहले इस पर काबू पा लिया गया था। जब इबोला वायरस बड़ा तांडव रचने में कामयाब हो सकता है तो आनुवंशिक रूप से संवर्द्धित वायरस तो वर्ण संकर होने के कारण भयंकर तबाही मचा सकता है।

अमेरिका के विस्कॉसिंन मेडिकल यूनिवसर््िाटी के वैज्ञानिक योशिहीरो कावाओका ने स्वाइन फ्लू के वायरस में परिवर्तन करते हुए उसे इतना ज्यादा ताकतवर बना डाला कि मानव का प्रतिरक्षा तंत्र उसका मुकाबला कर ही नहीं सकता। यहां सवाल उठता है कि खतरनाक वायरस को आखिर और खतरनाक बनाने का औचित्य क्या है? कावाओका का दावा है कि उनका प्रयोग 2009 एच-1, एन-1 वायरस में होने वाले बदलाव पर नजर रखने के हिसाब से नए आकार में ढाला गया है। कावाओका ने यह भी दावा किया था कि उन्होंने 2014 में रिर्वस जेनेटिक्स तकनीक का प्रयोग कर 1918 में फैले स्पेनिश फ्लू जैसा जीवाणु बनाया है, जिसकी वजह से प्रथम विश्व युद्ध के बाद पांच करोड़ लोग मारे गए थे। पोलियो, रैबिज और चेचक जैसे घातक रोगों के टीके पर उल्लेखनीय काम करने वाले वैज्ञानिक स्टेनली प्लॉटकिन ने भी कावाओका के काम के औचित्य पर सवाल उठाते हुए कहा था, ‘ऐसी कोई सरकार या दवा कंपनी है, जो ऐसे रोगों के विरुद्ध वैक्सीन बनाएगी जो वर्तमान में मौजूद ही नहीं हैं?’ कावाओका द्वारा प्रयोगशाला में उत्पादित किए जा रहे इन खतरनक वायरसों के बारे में रॉयल सोसायटी के पूर्व अघ्यक्ष व ब्रिटिश सरकार के पूर्व विज्ञान सलाहकार लॉर्ड-मे ने भी इन प्रयोगों पर गहरी आपत्ति जताई थी।

हाल में त्वचा कैंसर के उपचार के लिए टी-वैक थैरेपी की खोज की गई है। इसके अनुसार शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को ही विकसित कर कैंसर से लड़ा जाएगा। इस सिलसिले में स्टीफन हॉकिंग ने सचेत किया था कि इस तरीके में बहुत जोखिम हैं, क्योंकि जीन को संवर्द्धित करने के दुष्प्रभावों को लेकर उनके निष्कर्षों का सटीक परीक्षण नहीं हुआ है। कुछ समय पहले खबर आई थी कि आनुवंशिक रूप से संवर्द्धित ऐसे जीवाणु तैयार कर लिए गए हैं जो तीस गुना ज्यादा रसायनों का उत्पादन करेंगे। जीन में बदलाव करके इस जीवाणु के अस्तित्व को आकार दिया गया है। माना जा रहा है कि यह एक ऐसी खोज है जिससे दुनिया के रसायन उत्पादन कारखानों में पूरी तरह आनुवंशिक रूप से संवर्द्धित बैक्टीरिया का ही उपयोग होगा। इस शोध के लिए वैज्ञानिकों ने ई-कॉली नामक बैक्टीरिया का इस्तेमाल किया है। दरअसल जीवाणु एक कोशकीय होते हैं, लेकिन ये स्वयं को निरंतर विभाजित करते हुए अपना समूह विकसित कर लेते हैं।

वैज्ञानिक इन जीवाणुओं पर ऐसे एंटीबायोटिकों का प्रयोग करते हैं, जिससे केवल उत्पादन क्षमता रखने वाली कोशिकाएं ही जीवित रहें। इन कोशिकाओं के जीन में बदलाव करके इन्हें ऐसे रसायन उत्पादन में सक्षम बनाया जाता है, जो उसे एंटिबायोटिक से बचाने में सहायक होता है। ऐसे में एंटीबायोटिक का सामना करने के लिए बैक्टीरिया को ज्यादा से ज्यादा रसायन का उत्पादन करना पड़ता है। रसायन उत्पादन की यह रफ्तार एक हजार गुना ज्यादा होती है। यह खोज ‘सर्वाइवल आॅफ फिटेस्ट’ के सिद्धांत पर आधारित है। इस खोज से फार्मास्युटिकल बायोफ्यूल और अक्षय रसायन भी तैयार होंगे, लेकिन मानव शरीर में इसके भविष्य में क्या खतरे हो सकते हैं, यह प्रश्न फिलहाल अनुत्तरित ही है।

इसीलिए इन वायरस और बैक्टीरिया के उत्पादन पर यह सवाल उठ रहा है कि क्या वैज्ञानिकों को प्रकृति के विरुद्ध वायरसों की मूल प्रकृति में दखलदांजी करनी चाहिए? दूसरे यह कि प्रयोग के लिए तैयार किए गए ऐसे वायरस और बैक्टीरिया कितनी सुरक्षा में रखे गए हैं? यदि वे जान-बूझकर या दुर्घटनावश बाहर आ जाते हैं, तो इनके द्वारा जो नुकसान होगा, उसकी जबावदेही किसकी होगी? ऐसे में वैज्ञानिकों की ईश्वर बनने की महत्वाकांक्षा पर यह सवाल खड़ा होता है कि आखिर वैज्ञानिकों को अज्ञात के खोज की कितनी अनुमति दी जानी चाहिए? यदि वाकई वायरसों से छेड़छाड़ जैविक हथियारों के निर्माण के लिए की जा रही है तो यह स्थिति बेहद खौफनाक है, क्योंकि यदि जैविक हथियारों से किसी देश पर हमला किया गया तो इससे बचना बहुत मुश्किल होगा। हथियार के रूप में ये जीवाणु और वायरस कुछ क्षणों में ही बड़ी आबादी को अपनी गिरफ्त में ले लेंगे। चूंकि इन नए बैक्टीरिया व वायरस की कोई दवा या टीका उपलब्ध नहीं होगा, इसलिए इलाज संभव ही नहीं हो पाएगा। यह वायरस चिकित्सकों को भी चपेट में ले लेगा, इसीलिए उपचार कौन करे, यह संकट भी तत्काल बना रहेगा। बहरहाल जैविक हथियारों की कल्पना ही भयावह अमानवीयता है।

प्रमोद भार्गव

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