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चुनावी खर्च की मर्यादा का सवाल

धर्मेंद्रपाल सिंह दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान फिर महसूस हुआ कि हमारे कानूनों में कितनी खामियां हैं। निर्वाचन आयोग ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव में खड़े होने वाले प्रत्याशियों के खर्चे की सीमा तो बांध रखी है लेकिन पार्टियों के खर्चे पर कोई बंदिश नहीं है। वे असीमित धन खर्च कर सकती हैं। इसी प्रकार […]

धर्मेंद्रपाल सिंह

दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान फिर महसूस हुआ कि हमारे कानूनों में कितनी खामियां हैं। निर्वाचन आयोग ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव में खड़े होने वाले प्रत्याशियों के खर्चे की सीमा तो बांध रखी है लेकिन पार्टियों के खर्चे पर कोई बंदिश नहीं है। वे असीमित धन खर्च कर सकती हैं। इसी प्रकार मतदान से दो दिन पहले चुनाव प्रचार पर रोक लग जाती है। कोई भी पार्टी रेडियो और टीवी पर अपना विज्ञापन नहीं दे सकती लेकिन अखबारों में छपवा सकती है।
दिल्ली में चुनाव प्रचार समाप्त हो जाने के बाद भाजपा ने हर छोटे-बड़े अखबार के पहले पेज पर अपना विज्ञापन छपवाया। जनता से वोट की अपील की। जब कांग्रेस और ‘आप’ ने शिकायत की तो चुनाव आयोग ने कहा कि यह काम कानून-सम्मत है। एसोचैम के अनुसार इस बार राजनीतिक दलों ने दिल्ली विधानसभा चुनाव पर 200 करोड़ रुपए से ज्यादा फूंके। यह रकम करीब एक वर्ष पहले हुए चुनाव से तीस-चालीस फीसद अधिक है। एक अन्य अनुमान के अनुसार खर्च तीन हजार करोड़ रुपए का आंकड़ा पार कर गया है। जब पैसे का इतना जोर हो जाए तब छोटी पार्टियों और ईमानदार प्रत्याशियों का चुनावी दंगल में टिके रहना कठिन हो जाता है। हमारे यहां यही हो रहा है।

बात यहीं समाप्त नहीं होती। राजनीतिक दल कानूनी खामियों का तो लाभ उठाते ही हैं, और जहां नियम-कानून हैं भी, वहां उनका पालन नहीं करते। नियम यह है कि लोकसभा चुनाव समाप्त हो जाने के नब्बे दिनों के भीतर और विधानसभा चुनाव निपट जाने के पचहत्तर दिनों के भीतर सभी दलों को अपने आय-व्यय का ब्योरा चुनाव आयोग के पास जमा कर देना चाहिए। पिछले लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा और कांग्रेस ने निर्धारित समय-सीमा में हिसाब नहीं दिया। इसीलिए जनवरी में जाकर ही आयोग 2014 के आम चुनाव और तीन विधानसभा चुनावों (आंध्र, ओड़िशा और सिक्किम) में राष्ट्रीय दलों के खर्च का ब्योरा जारी कर पाया। पार्टियों द्वारा आयोग को दिए गए विवरण से पता चलता है कि कांग्रेस के मुकाबले भारतीय जनता पार्टी ने लगभग सौ करोड़ रुपए अधिक खर्च किए। यह तथ्य चौंकाता है। आम धारणा है कि जो दल सत्ता में होता है वही सर्वाधिक चंदा जुटाने की ताकत रखता है और चुनाव में भी वही पार्टी सबसे अधिक धन खर्च करती है। लेकिन इस बार पहाड़ा उलटा पढ़ा गया। भाजपा ने माना कि उक्त चुनावों में उसने 714.28 करोड़ रुपए लगाए, जबकि कांग्रेस ने 516.02 करोड़ रुपए व्यय करने की बात कबूली है।

राजनीतिक दलों को चंदा देने वाले कॉरपोरेट भी नियमों की धज्जियां उड़ाने में पीछे नहीं हैं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (एडीआर) के अनुसार, जनवरी 2013 के बाद पंद्रह बड़े औद्योगिक घरानों ने राजनीतिक दलों को चंदा देने के लिए चुनावी न्यास पंजीकृत कराए। सात न्यासों ने कुल 85.37 करोड़ रुपए का चंदा भी दिया, जबकि नौ न्यासोें के बारे में तो आयोग या सरकार के पास कोई भी जानकारी नहीं है। इन न्यासों से भाजपा को 41.37 करोड़ (48.44 प्रतिशत), कांग्रेस को 36.50 करोड़ और राकांपा को चार करोड़ रुपए मिले।

आज यह बात तो सारे बड़े नेता भी मानते हैं कि देश की मौजूदा चुनाव व्यवस्था काले धन पर टिकी है। विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के अनुसार भारत में हर वर्ष छह सौ खरब का काला धन पैदा होता है जिसका दस फीसद हिस्सा विदेशों में जमा किया जाता है और बाकी देश में रहता है। इस काली कमाई का एक मोटा भाग राजनीतिक दलों को चंदे के तौर पर मिलता है। हर पार्टी में जिन नेताओं के पास पैसा होता है, सत्ता का नियंत्रण भी उनके पास रहता है। वे ही टिकट बांटते और चुनाव लड़ाते हैं।

सबसे पहले ये नेता अपने परिवार के सदस्यों को ही राजनीति में जमाने का प्रयास करते हैं। सोलहवीं लोकसभा के सदस्यों की पृष्ठभूमि खंगालने पर पैसे और परिवार-मोह में जकड़ी पार्टियों की स्थिति स्पष्ट हो जाती है। इस बार लोकसभा के 543 में से कम से कम 130 सदस्य ऐसे हैं जिनका रिश्ता किसी न किसी राजनीतिक परिवार से है। मतलब यह है कि मौजूदा लोकसभा के लगभग एक चौथाई सांसद सियासी कुनबापरस्ती के झंडाबरदार हैं। यों भी कहा जा सकता है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश राजशाही की पिट चुकी परंपरा पर लौट रहा है। यह संकेत इसलिए और भी चिंताजनक है कि अधिकतर पार्टियां और नेता परिवारिक मोह में जकड़े हुए हैं।

जिस हिसाब से चुनावी खर्च लगातार बढ़ रहा है उससे लगता है कि भविष्य में क्षेत्रीय और छोटी पार्टियों के लिए अपना अस्तित्व बचाना कठिन हो जाएगा। बड़ी पार्टियां अपने धन के बल पर छोटे दलों को निगल जाएंगी। हमारे यहां भी यूरोपीय देशों और अमेरिका की तरह दो-तीन दल बचेंगे।

कॉरपोरेट जगत को ऐसी स्थिति भाती है। चुनिंदा दलों और नेताओं को ‘मैनेज’ करना उनके लिए आसान होता है। ऐसी स्थिति में वे अपनी मर्जी से सरकार और नेताओं की अदला-बदली करते रहते हैं। अमेरिका और यूरोपीय देशों में पूरा कॉरपोरेट जगत और मीडिया पार्टी लाइन पर बंटा हुआ है। जिसकी पार्टी जीत जाती है उसकी पौ बारह हो जाती है। हमारे देश में भी यह प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। अगर हालात नहीं बदले तो अगले आम चुनाव तक कॉरपोरेट खेमेबंदी और तेज हो जाएगी।

दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान चंदे पर घमासान मचा। ‘आवाम’ नामक संगठन ने आम आदमी पार्टी (आप) को मिले दो करोड़ रुपए के चंदे पर सवाल उठाया। आरोप लगाया कि जिन कंपनियों ने चंदा दिया वे फर्जी हैं। भाजपा के बड़े नेताओं ने तो यह तक कहा कि पैसा हवाला की उपज है। जवाब में आप के नेता अरविन्द केजरीवाल ने केंद्र सरकार को अपने और सभी बड़े राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे की जांच कराने की चुनौती दी। इस काम के लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एक विशेष जांच दल गठित करने का पासा फेंका। अनुभव बताता है कि चुनाव के दौरान अक्सर चंदे को लेकर आरोप-प्रत्यारोप लगते हैं और चुनाव खत्म होते ही यह मुद्दा दफन हो जाता है। 2013 में दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने ‘आप’ को मिले चंदे पर प्रश्नचिह्न लगाया था, लेकिन जांच के बाद पार्टी निर्दोष पाई गई।

नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ पब्लिक फाइनेंस ऐंड पॉलिसी (एनआइपीएफपी) ने पिछले वर्ष सरकार को काले धन पर अपनी रिपोर्ट सौंपी, जो अब तक संसद के पटल पर रखी नहीं गई है। इस रिपोर्ट के अनुसार बड़ी पार्टियों को मिलने वाले धन का तीन चौथाई (75 प्रतिशत) स्रोत अज्ञात है। 2009-10 और 2010-11 के बीच कांग्रेस को 774.66 करोड़ रुपए मिले, जिसमें से 88.11 फीसद का स्रोत अज्ञात था। इस दौरान भाजपा को चंदे के 426.01 करोड़ रुपए मिले, जिसमें से 77.24 प्रतिशत रकम अनाम स्रोतों से आई, जबकि बहुजन समाज पार्टी को 172.67 करोड़ रुपए मिले, जो शत-प्रतिशत अज्ञात हाथों ने दिया। वास्तव में राजनीतिक दल जन-प्रतिनिधित्व कानून की उस धारा का लाभ उठाते हैं जिसके अनुसार बीस हजार रुपए से कम के चंदे का स्रोत बताना जरूरी नहीं है। इसी कानूनी कमजोरी के कारण चुनावों में काला पैसा जमकर लगता है।

फिलहाल चुनावी चंदे के हमाम में लगभग सारे दल नंगे हैं। पिछले वर्ष दिल्ली उच्च न्यायालय ने कांग्रेस और भाजपा को विदेशी कंपनियों से पैसा लेने का दोषी ठहराया था।

अदालत ने पाया कि इन दोनों राष्ट्रीय दलों ने ब्रिटिश नागरिक और वेदांता ग्रुप के मालिक अनिल अग्रवाल की कंपनियों से करोड़ों रुपए चंदा लिया, जो विदेशी अनुदान नियमन अधिनियम का सीधा-सीधा उल्लंघन है। कांग्रेस ने वेदांता की सहायक कंपनी स्टरलाइट से छह करोड़ और सेसा गोवा से 2.79 करोड़ रुपए लिए, जबकि भाजपा ने सेसा से 1.4 करोड़ रुपए और मद्रास एल्युमिनियम से 3.5 करोड़ रुपए लिए। यह गैरकानूनी ही नहीं, नैतिक दृष्टि से भी पाप है। आंकड़े गवाह हैं कि कांग्रेस और भाजपा का लगभग सत्तासी फीसद चंदा कॉरपोरेट घरानों की देन है।

चुनाव व्यवस्था में सुधार के प्रति राजनीतिक दल कभी भी गंभीर नहीं रहे। सुधार के लिए सबसे पहले 1964 में संथानम समिति बनाई गई। फिर 1971 में वांगचू समिति और 1990 में गोस्वामी समिति गठित की गई थी। इसके बाद 1993 में वोहरा समिति और 1998 में इंद्रजीत गुप्त समिति ने चुनाव व्यवस्था में सुधार के लिए महत्त्वपूर्ण सिफारिशें कीं।
विधि आयोग और चुनाव आयोग भी समय-समय पर कारगर सुझाव देते रहे हैं। सभी रिपोर्टें और समस्त सुझाव बरसों से सरकारी फाइलों में धूल फांक रहे हैं लेकिन अमल किसी पर नहीं हुआ। अलबत्ता सर्वोच्च न्यायालय की कृपा से अदालत से सजा प्राप्त जनप्रतिनिधियों की संसद और विधानसभा की सदस्यता समाप्त करने और उन्हें चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित करने का कानून भी बन पाया है।

आज चुनाव आयोग से मान्यता प्राप्त दलों को अनेक सुविधाएं मिली हुई हैं। दलों को मिलने वाले चंदे पर कोई कर नहीं लगता, सरकार उन्हें रियायती दर पर भूखंड और भवन देती है और 1998 से चुनाव के दौरान मान्यता प्राप्त पार्टियों को प्रचार के लिए रेडियो और दूरदर्शन पर निशुल्क समय आबंटित होता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो वे सभी सार्वजनिक संगठन की परिभाषा में आते हैं और उनके कामकाज तथा आय-व्यय में पूर्ण पारदर्शिता बरती जानी चाहिए। इसलिए पिछले साल मुख्य सूचना अधिकारी ने सभी राष्ट्रीय दलों को सूचनाधिकार के तहत लाने का आदेश दिया था। इस निर्णय के विरोध में कांग्रेस और भाजपा सहित सभी बड़े दलों ने हाथ मिला लिया और सूचना आयोग के आदेश को निष्प्रभावी कर दिया।

स्टाकहोम स्थित इंटरनेशनल इंस्टीटयूट ऑफ डेमोक्रेसी ऐंड इलेक्टोरल असिस्टेंट द्वारा जारी रिपोर्ट (पोलिटिकल फाइनेंस रेगुलेशन अराउंड द वर्ल्ड) के अनुसार 2012 में दुनिया के 71 देशों में चुनाव का खर्च वहां की सरकारें उठा रही थीं। यूरोप के 86 प्रतिशत, अफ्रीका के 71 प्रतिशत, अमेरिका के 63 प्रतिशत और एशिया के 58 प्रतिशत देशों में अब चुनाव लड़ने के लिए सरकार से धन मिलता है। फिर भारत में यह व्यवस्था क्यों लागू नहीं की जा सकती?

 

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