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चीन की साइबर जंग

निरंकार सिंह यह खबर चौंकाने वाली है कि पिछले दिनों भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की व्यावसायिक वेबसाइट ‘एंट्रिक्स’ हैक कर ली गई। 12 जुलाई 2015 को देर शाम तक भारत की ओर साइट को लाइव नहीं किया जा सका जिसके कारण अंडरकांस्ट्रक्शन ही दिखती रही। इस करतूत के पीछे चीन का हाथ माना जा […]
Author July 27, 2015 14:40 pm

निरंकार सिंह

यह खबर चौंकाने वाली है कि पिछले दिनों भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की व्यावसायिक वेबसाइट ‘एंट्रिक्स’ हैक कर ली गई। 12 जुलाई 2015 को देर शाम तक भारत की ओर साइट को लाइव नहीं किया जा सका जिसके कारण अंडरकांस्ट्रक्शन ही दिखती रही। इस करतूत के पीछे चीन का हाथ माना जा रहा है। इसरो ने इसके दो दिन पहले ही पांच ब्रिटिश उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजा था। दरअसल अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोेपीय संघ और भारत सहित दुनिया के कई देश चीनी ‘साइबर वार’ से त्रस्त हैं। साइबर स्पेस में लड़ी जाने वाली जंग को साइबर वार कहते हैं।

पश्चिमी देशों और चीन के माहिर हैकर्स के बीच साइबर वार शुरू हो चुका है। पिछले वर्षों में अमेरिका और भारत के कुछ सैन्य संस्थानों पर कई बार साइबर हमले हुए। ये हमले खुफिया सूचना जुटाने के मकसद से किए गए थे। इन हमलों के पीछे चीनी हैकर्स का हाथ था। हालांकि ऐसा पहली बार नहीं हुआ जब चीनी हैकर्स ने पश्चिमी देशोें को निशाना बनाया, लेकिन इस बार निशाने पर खुफिया सूचनाएं थीं। लिहाजा, नाटोे और यूरोपीय संघ ने सभी सदस्य-देशों को अलर्ट जारी कर दिया।

चीन भविष्य में साइबर युद्ध होने पर खुद को लाभ की स्थिति में रखना चाहता है। यही कारण है कि उसने साइबर स्पेस में अपनी गतिविधियां बढ़ा दी हैं। चीन अपनी साइबर क्षमता को कई तरह से लैस कर रहा है। वेबसाइट्स को ब्लाक करने, साइबर कैफों में गश्त लगाने और मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर निगरानी रखने के लिए बड़ी संख्या में साइबर पुलिस (हैकर्स) तैनात कर रखी है। दुनिया चीन की साइबर मोर्चेबंदी से परेशान है।

लंदन में पिछले वर्ष साइबर सुरक्षा के लिए कैबिनेट ऑफिस बनाया गया था। इस ऑफिस का कहना है कि साइबर हमले दो प्रकार के होते हैं। एक जो कंप्यूटर सिस्टम को खराब करते हैं, और दूसरे हमले ‘फिशिंग ट्रिप्स’ कहलाते हैं। इस प्रकार के साइबर हमले संवेदनशील सूचनाएं हासिल करने के मकसद से किए जाते हैं। कैबिनेट ऑफिस के अलावा विशेष टीम को गवर्नमेंट कम्युनिकेशंस हेडक्वार्टर्स में भेजा गया है जो कि ब्रिटेन के ग्लोसेस्टरेशायर में स्थित है। वहां कार्यरत टीम का एजेंडा खुफिया सूचनाओं को साइबर हमलों से बचाना है। इस टीम ने मार्च से ही कार्य करना शुरू कर दिया है, जिसमें अमेरिका और ब्रिटेन के जाने-माने विशेषज्ञ शामिल हैं लेकिन यूरोेपीय संघ की हालत ज्यादा खराब है। ‘द सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक ऐंड इंटरनेशनल स्टडीज’ से जुड़े जेम्स लुइस का कहना है कि यूरोपीय संघ की साइबर सुरक्षा में सूराख होने के कारण चीनी हैकर्स के लिए यह ‘सॉफ्ट टारगेट’ बन गया है।

यूरोपीय संघ से जुड़े देशों के बारे में सूचना हासिल करने से चीनी हित भी सधते हैं। वह इन देशों पर साइबर हमले कर हथियारों की बिक्री और तिब्बत से जुड़े मसलों के बारे में जानकारी हासिल करना चाहता है। वैसे यूरोपीय संघ के कमजोर होने के पीछे एक कारण यह भी है कि अमेरिका और उसके बीच खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान ठीक नहीं है। इस कारण यूरोपीय सिस्टम अधिक खतरे में है। ब्रिटिश खुफिया एजेंसी एमआइ-5 के महानिदेशक जॉनसन ईवंस ने वर्ष 2007 में चेताया था कि कुछ देश साइबर हमले कराने में महारत हासिल कर चुके हैं और लगातार ऐसा कर भी रहे हैं। हालांकि चीन ने ऐसे आरोपों को हमेशा खारिज किया है, लेकिन अब यह बात जगजाहिर हो चुकी है।

कनाडा के कुछ साइबर अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार चीनी हैकर भारत के रक्षा मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय तक घुसपैठ कर चुके हैं। वैसे तो सभी देश एक दूसरे के कंप्यूटर नेटवर्क में हैकिंग या अन्य तरीकों से ताक-झांक करते ही रहते हैं। मगर चीन ने इस मामले में खास महारत हासिल कर रखी है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि चीन हैकिंग के अंडरवर्ल्ड का डॉन है और इस कारण वह दुनिया भर में बदनाम भी है। वह न केवल भारत पर बल्कि अमेरिका, जर्मनी और ब्रिटेन पर भी साइबर हमले करता रहता है।

चीन कितने बड़े पैमाने पर साइबर हमले अन्य देशों पर कर रहा है इसका अंदाजा इस आंकड़े से लगाया जा सकता है कि अमेरिका के रक्षा संस्थानों सहित सभी सरकारी और गैर-सरकारी संस्थानों पर होने वाले साइबर हमलों में से नब्बे फीसद और जर्मनी पर होने वाले साइबर हमलों में साठ फीसद चीन की तरफ से किए जाते हैं। ब्रिटेन भी बड़े पैमाने पर चीनी साइबर आक्रमण का शिकार बन रहा है।

वर्ष 2007 में ‘फाइनेंशियल टाइम्स’ ने खबर छापी थी कि चीन ने पेंटागन (अमेरिका के रक्षा मंत्रालय) के कंप्यूटर नेटवर्क को हैक कर लिया है। यह अमेरिका के रक्षा प्रतिष्ठान पर सफल चीनी साइबर हमला था, जिसने यह बता दिया कि चीन बहुत संवेदनशील ठिकानों पर अमेरिका के सिस्टम को ध्वस्त करने की क्षमता रखता है। दरअसल, चीन ने 2003 से अपने मिलिट्री हैकरों के जरिए अमेरिका के कंप्यूटर नेटवर्कों में सेंध लगानी शुरू की और कुछ समय में नासा और लाकहीड मार्टिन जैसे संस्थानों के नेटवर्क हैक करने में सफलता हासिल कर ली। बाद में यह गूगल तक को हैक करने लगा।

जब हैकिंग की खबर आती है, तो चीनी सरकार उसका खंडन करती है। उसका कहना होता है कि इससे सरकार का कोई लेना-देना नहीं। यह काम तो गैर सरकारी लोग कर रहे हैं। मगर दुनिया इस सफाई से संतुष्ट नहीं। उसका मानना है कि चीन स्वसत्तावादी देश है, वहां इस तरह का कोई काम सरकार की रजामंदी के बगैर हो नहीं सकता। गैर-सरकारी लोगों की सक्रियता की बात बहानेबाजी है।

साइबर दुनिया के जानकारों का कहना है कि चीन हैकरों का स्वर्ग है। रूस और पूर्वी यूरोप के देशोें की तरह हैकिंग वहां का भारी मुनाफा देने वाला राष्ट्रीय खेल बन चुका है, जहां हैकर्स सम्मेलन होते हैं। हैकर्स ट्रेनिंग अकादमियां और हैकर्स डिफेंस और हैकर्स एक्स फाइल जैसी पत्रिकाएं हैं जो कंप्यूटर को भेदने और ट्रोजन हार्स और ट्रेपडोअर जैसी हैकिंग तकनीकों की विस्तृत जानकारी देती हैं। इसके अलावा हैकर्स पेनीट्रेशन मेनुअल जैसी पुस्तकें भी उपलब्ध हैं। इस इंटरनेट से जुड़ी नई दुनिया में अगला निर्णायक युद्ध साइबर युद्ध होगा क्योंकि सारी जानकारियां कंप्यूटर नेटवर्क में ही संग्रहीत हैं और इंटरनेट ही सूचनाओं के आदान-प्रदान का सबसे प्रमुख जरिया है। अगर आप दुश्मन के इस नेटवर्क को भेदने और उसे अपने ढंग से चलाने की क्षमता हैकिंग के जरिए हासिल कर लेते हैं तो बाजी आपके हाथों में होगी।

हाल ही में रूस और इस्टोनिया में विश्वयुद्ध स्मारक को लेकर मतभेद हो गए तो रूस के सरकारी और गैर-सरकारी साइबर योद्धाओं ने पहले कदम के तौर पर इस्टोनिया के इंटरनेट संजाल को ध्वस्त कर दिया। अगर नब्ज रूपी कंप्यूटर नेटवर्क ही ध्वस्त हो जाए तो वह देश पहले ही मनोवैज्ञानिक हताशा का शिकार हो जाएगा। चीन भारत के खिलाफ भी धीमी रफ्तार से साइबर युद्ध चला रहा है। हालांकि भारत आइटी-शक्ति कहलाता है मगर ब्राड बैंड के इस्तेमाल और इंटरनेट कनेक्शनों की संख्या के मामले में वह चीन से बहुत पीछे है। चीन की साइबर जंग भारत ही नहीं, दुनिया के सामने एक बड़ी चुनौती है।

भारत के सरकारी संस्थान साइबर मामलों में महफूज नहीं हैं। दरअसल, सरकार और कॉरपोरेट जगत के कर्ताधर्ताओं को हैकरों द्वारा अपनाए जा रहे खतरनाक तरीकों के बारे में कोई खास जानकारी ही नहीं है। इस बारे में साझेदारी कार्यक्रम से जुड़े संयुक्त राष्ट्र के वरिष्ठ अधिकारी बाबूलाल जैन का कहना है कि बीस साल के एक छात्र द्वारा भारतीय स्कूल प्रमाणपत्र परीक्षा परिषद (सीआइएससीइ) और केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा परिषद (सीबीएसइ) की वेबसाइटों की हैकिंग ने साइबर हमलों को लेकर भारत के सरकारी विभागों की असुरक्षा को दर्शाया है। इस हमले के पीछे कोई द्वेषपूर्ण मंशा नहीं थीे और इससे कोई नुकसान नहीं हुआ, लेकिन साजिशकर्ता के शब्दों में यह साबित करना था कि ऐसी वेबसाइटें कितनी असुरक्षित हैं जिन पर स्कूल की पढ़ाई पूरी कर अपनी पसंद के क्षेत्र में जाने का प्रयास कर रहे लाखों छात्रों का भविष्य निर्भर है।

जैन के अनुसार हैकिंग-निरोधक प्रयासों की क्या बात की जाए, हैरानी की बात तो यह है कि भारत में ज्यादातर सरकारी संस्थानों और कॉरपोरेट जगत के कर्ताधर्ताओं को हैकरों द्वारा इन दिनों प्रयुक्त किए जा रहे खतरनाक तरीकों की जानकारी तक नहीं है। यहां तक कि सेना और खुफिया विभागों की सूचनाएं और आंकड़े तक महफूज नहीं रह गए हैं। इन दिनों हैकर क्रेडिट कार्ड की धोखाधड़ी या अन्य आपराधिक क्रियाकलापों में शामिल अपराधी समेत सबसे ज्यादा बोली लगाने वाले को चुराई हुई खुफिया सूचनाएं बेचने में हिचकिचाते नहीं है। बिजली, ग्रिड, बंदरगाह, रेलवे, हवाई अड्डे,२ बैकिंग और वित्तीय सेवाओं समेत ज्यादातर ढांचे इंटरनेट पर निर्भर हैं।

आदर्श एंटी वायरस और फायरवॉल सॉफ्टवेयर लोड करने के बाद भारत में ज्यादातर विभाग और कॉरपोरेट कंपनियां महसूस करती हैं कि उन्होंने अपने सिस्टम और नेटवर्क को साइबर हमलों से सुरक्षित कर लिया है। इस गलतफहमी में वे वाइट हाउस और पेंटागन सहित अन्य सरकारी विभागों की वेबसाइटों और इमेल की नियमित रूप से हैकिंग की खबरों को नजरअंदाज करते हैं। जिसका नतीजा हुआ, कई बार चीनी हैकरों के हमले हुए।

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