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राजनीति: प्रतिभाशाली होने की कसौटी

शिक्षा के क्षेत्र में सुधार और पारदर्शिता की जरूरत है। भारत में साक्षरता दर अब भी बहुत कम है। इसलिए, हमें शहरों के साथ-साथ गांवों पर भी समान रूप से ध्यान देना चाहिए। फिलवक्त, भारत में सकल नामांकन अनुपात करीब साढ़े बारह प्रतिशत है, जबकि विश्व का औसत पच्चीस प्रतिशत और विकसित देशों का पचास प्रतिशत है। पिछड़े देशों में यह औसत छह प्रतिशत है। इस तरह, हमारी स्थिति भी पिछड़े देशों के समान है।

Author November 10, 2018 2:44 AM
प्रतीकात्मक फोटो

सोनल छाया

आज अकादमिक संस्थानों से बड़ी संख्या में युवा प्रबंधक, इंजीनियर, डॉक्टर, शिक्षक आदि की डिग्रियां लेकर निकल रहे हैं। वे सूचनाओं से लैस तो हैं, पर बोध के स्तर पर बहुत कमजोर हैं। इसलिए हकीकत यह है कि बौद्धिक योग्यता और दक्षता के अभाव में ऐसे पेशेवर चपरासी, सेल्समैन, लिपिक आदि की नौकरी करने या बेरोजगार रहने को मजबूर हैं। डॉक्टर की पढ़ाई करने वाले डॉक्टर तो बन जाते हैं, लेकिन अधकचरे ज्ञान की वजह से कई मरीजों की जान ले लेते हैं, जिसके लिए उन्हें सजा भी नहीं मिलती है। कई स्नातकोत्तर और पीएचडी की डिग्री वाले दो पंक्तियां शुद्ध हिंदी या अंग्रेजी में नहीं लिख पाते हैं। इसी वजह से लंबे समय तक भटकने के बाद चपरासी या सफाईकर्मी की नौकरी के लिए प्रबंधन, इंजीनियरिंग, स्नातकोत्तर आदि डिग्री वाले लाखों नौजवान आवेदन करते हैं और कुछ को छोड़ कर अन्य असफल हो जाते हैं। ऐसी स्थिति देश के नौजवानों की अक्षमता को तो दर्शाती ही है, हमारी शिक्षा प्रणाली पर भी सवाल खड़ी करती है। इसलिए आज इस बात पर बल दिया जा रहा है कि ज्ञान या हुनर विकसित करना जरूरी है। केवल किताबें रट कर परीक्षा तो उत्तीर्ण की जा सकती है, लेकिन ज्ञान नहीं अर्जित किया जा सकता। कहते हैं कि अगर किसी के पास ज्ञान या हुनर है, तो वह भूखा नहीं रह सकता। इतिहास गवाह है, कम पढ़े-लिखे या औपचारिक शिक्षा न हासिल करने वाले अनेक लोगों ने विविध क्षेत्रों में उपलब्धियां हासिल की हैं। इस क्रम में सचिन तेंदुलकर, थॉमस अल्वा एडिसन, आइजक न्यूटन आदि का नाम लिया जा सकता है।

सच कहें तो दसवीं, बारहवीं, स्नातक या स्नातकोत्तर की परीक्षाओं में उत्तीर्ण या अनुतीर्ण होने से किसी के होनहार होने पर सवाल नहीं खड़े किए जा सकते हैं। आज दुनिया में काम करने के अनगिनत विकल्प हैं और कोई भी अपने पसंद के क्षेत्र में सर्वोच्च उपलब्धि हासिल कर सकता है। केवल अकादमिक रिकार्ड दोयम दर्जे का होने या प्रतिष्ठित रोजगार नहीं हासिल करने से उसकी योग्यता को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता, पर हमारी शिक्षा प्रणाली के तहत अच्छे अंक लाने वाले बच्चों को ही नौकरी में प्राथमिकता दी जाती है या उन्हें प्रतियोगी परीक्षा में शामिल होने का पात्र मान लिया जाता है, जबकि इसके लिए अलग से प्रतियोगी परीक्षा का आयोजन किया जाता है। ऐसी प्रणाली की वजह से ऐसे जहीन बच्चे, जो किसी वजह से अकादमिक परीक्षाओं में कम अंक लाते हैं, प्रतियोगिता से बाहर हो जाते हैं। इससे संबंधित संस्थान या देश को उनकी योग्यता का लाभ नहीं मिल पाता है।

आज दसवीं और बारहवीं में शत प्रतिशत अंक लाने वाले या टॉप करने वाले छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं में फिसड्डी रह जाते हैं या जिंदगी में पिछड़ जाते हैं। शत-प्रतिशत अंक लाने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन इस संबंध में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्यों दसवीं और बारहवीं के अधिकांश टॉपर या इन परीक्षाओं में अच्छे अंक लाने वाले छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं में पीछे रह जाते हैं। इसके उलट संघ लोक सेवा आयोग में पचास प्रतिशत या इससे कम अंक प्राप्त करने वाले उम्मीदवार परीक्षा में टॉप कर जाते हैं। अगर मान भी लिया जाए कि संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा का स्तर बहुत ऊंचा होता है, तो भी ऐसे छात्रों को मेडिकल, इंजीनियरिंग और दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं में दसवीं और बारहवीं के प्रदर्शन को दोहराना चाहिए। मगर एकाध अपवाद को छोड़ कर ऐसा नहीं हो पा रहा है।

मजेदार बात यह है कि सीबीएससी और आईआईसी बोर्ड के छात्रों का सफलता प्रतिशत सौ होता है, लेकिन राज्य बोर्ड में यह प्रतिशत गिर कर चालीस से सत्तर हो जाता है। यहां यह सवाल उठना लाजिमी है केंद्रीय और राज्य बोर्ड के परीक्षाफल में इतना बड़ा अंतर क्यों है? क्या केंद्रीय और राज्य बोर्ड में पढ़ने वालों की प्रतिभा एक समान नहीं है? अगर सीबीएससी और आईआईसी बोर्ड के परीक्षाफल को होनहार होने की कसौटी माना जाए तो अधिकतर छात्रों को सभी प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होना चाहिए। बैंक और दूसरे संस्थानों मसलन, रेलवे, बीमा आदि के अधिकारियों और लिपिकों की प्रतियोगी परीक्षाओं में उन्हें आसानी से उत्तीर्ण हो जाना चाहिए, क्योंकि इन परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने का प्रतिशत चालीस से साठ के बीच होता है।

अनियमितताएं दूर करने के तमाम सरकारी दावों के बावजूद शिक्षा केंद्रों में आज भी भ्रष्टाचारियों और दलालों का बोलबाला है। ऐसे माहौल में स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ने और पढ़ाने की बात करना बेमानी है। आज शिक्षकों का ज्ञान संदेह से परे नहीं है। शिक्षा के क्षेत्र में सुधार और पारदर्शिता की जरूरत है। भारत में साक्षरता दर अब भी बहुत कम है। इसलिए, हमें शहरों के साथ-साथ गांवों पर भी समान रूप से ध्यान देना चाहिए। फिलवक्त, भारत में सकल नामांकन अनुपात करीब साढ़े बारह प्रतिशत है, जबकि विश्व का औसत पच्चीस प्रतिशत और विकसित देशों का पचास प्रतिशत है। पिछड़े देशों में यह औसत छह प्रतिशत है। इस तरह, हमारी स्थिति भी पिछड़े देशों के समान है। शिक्षा के क्षेत्र में कुशल और प्रशिक्षित शिक्षकों की भारी कमी है। हालांकि, इस कमी को दूर करने के लिए संविदा पर शिक्षक नियुक्त किए जा रहे हैं, लेकिन तनख्वाह कम होने के कारण वे बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं दे पा रहे हैं। बेशक, राज्य सरकारें धन की कमी से जूझ रही हैं, लेकिन शिक्षा एक मूलभूत आवश्यकता है और इसकी राह में धन की कमी को अड़चन नहीं बनाया जा सकता है। शिक्षक दोषी जरूर हैं, लेकिन इनके साथ सरकार भी दोषी है। आज शिक्षकों को शक्तिमान मान लिया गया है, जिन्हें पल्स पोलियो से लेकर चुनाव कराने तक के कामों में जब-तब तैनात कर दिया जाता है, लेकिन शिक्षक के तौर पर नहीं। वे साल के अधिकतर महीने सरकारी योजनाओं को मूर्त रूप देने के काम में लगे रहते हैं। ऐसे में वे शिक्षक की जिम्मेदारियों का निर्वहन कैसे कर सकते हैं?

शिक्षा के स्तर में गिरावट आने के बाद गंभीर छात्रों ने खुद से ज्ञान हासिल करना शुरू कर दिया है। बिहार में इसकी बानगी ‘सुपर थर्टी’ और एजुकेशनल क्लब में देखी जा सकती है, जिसके तहत छात्र खुद से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। मगर इन स्थितियों को देखते हुए भी यही कहा जा सकता है कि शिक्षा का अर्थ सिर्फ रोजगार हासिल करना नहीं है। शिक्षा का अर्थ एक सुशिक्षित समाज का निर्माण करना है। आज जरूरत लोगों को अक्षर ज्ञान कराने के साथ-साथ उनके अंदर मौजूद हुनर को निखारने की है। हुनरमंद लोगों को रोजगार का अकाल नहीं है। अगर किसी के पास रोजगार नहीं है तो वह स्व-रोजगार के माध्यम से जीवन यापन कर सकता है। कुछ लोगों ने अपने हुनर की बदौलत जीवन में सर्वोच्च उपलब्धियां हासिल की है।

साफ है कि अंकों के प्रतिशत को होनहार होने की कसौटी नहीं माना जा सकता है। इसलिए, सीबीएससी और आईआईसी बोर्ड द्वारा दिए जा रहे अंकों को लेकर सवाल खड़े किए जा सकते हैं। मौजूदा समय में शिक्षा के स्तर में निश्चित रूप से भारी गिरावट आई है। लिहाजा, देश के कर्णधारों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मुहैया कराने के साथ-साथ शिक्षा और परीक्षा प्रणाली में जरूरी बदलाव लाने की जरूरत है। अनेक शिक्षाविद इस जरूरत को लंबे समय से रेखांकित करते रहे हैं। इस आलोक में सरकार को ऐसी योजनाएं लागू करनी चाहिए, जिनसे सभी बच्चे स्कूल जाने के लिए प्रेरित हों। बच्चों और अभिभावकों को भी इस मामले में सकारात्मक भूमिका निभाने की जरूरत है।

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