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बराक के लिए बाजार पहले है

पुष्परंजन बराक ओबामा मंगलवार को सऊदी अरब में रहेंगे। राष्ट्रपति ओबामा जब शार्ली एब्दो हिंसा कांड के समय पेरिस नहीं गए, तो यूरोप के नेताओं को हैरानी हुई थी। उनके पास इजराइली प्रधानमंत्री बेन्जामिन नेतन्याहू से भी मिलने का वक्त नहीं था। फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वां ओलांद और नेतन्याहू, दोनों राष्ट्रपति ओबामा से दोस्ती का […]

पुष्परंजन

बराक ओबामा मंगलवार को सऊदी अरब में रहेंगे। राष्ट्रपति ओबामा जब शार्ली एब्दो हिंसा कांड के समय पेरिस नहीं गए, तो यूरोप के नेताओं को हैरानी हुई थी। उनके पास इजराइली प्रधानमंत्री बेन्जामिन नेतन्याहू से भी मिलने का वक्त नहीं था। फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वां ओलांद और नेतन्याहू, दोनों राष्ट्रपति ओबामा से दोस्ती का दम भरते रहे हैं। दोनों देश अमेरिका के वैसे रणनीतिक साझेदार रहे हैं, जिनके भरोसे अमेरिका, अफ्रीका से लेकर पश्चिम एशिया तक में अपनी ताकत प्रदर्शित करता रहा है। इन दो घटनाओं की चर्चा, यह समझने के लिए आवश्यक है कि अमेरिकी राष्ट्रपति दोस्ती से ज्यादा जरूरी ‘बिजनेस’ को समझते हैं।

ओबामा इसलिए आगरा नहीं गए कि उन्हें आतंकवादी खतरे से आगाह किया गया था। या यह भी नहीं कि मोदी नहीं चाहते थे कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ओबामा को अपने आईने में उतार लेते। जमीनी सच्चाई यह है कि एक अमेरिकी राष्ट्रपति को अपनी प्राथमिकताएं तय करनी होती हैं। ओबामा ने आगरा के बदले सऊदी अरब जाना जरूरी समझा, तो उसके पीछे शुद्ध रूप से व्यापार है। ओबामा, सऊदी अरब के शाह अब्दुल्ला के निधन पर मातमपुर्सी के लिए जा रहे हैं, वह परदे पर दिखता है। लेकिन परदे के पीछे का सच यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति को सऊदी अरब के नए शाह सलमान से मिलना है, जिनके माध्यम से पेट्रोल उत्पादन से लेकर हथियार बेचने तक के बारे में बड़े फैसले करने हैं।

सुरक्षा विश्लेषक समूह ‘आइएचएस’ ने 2013 में जानकारी दी थी कि अमेरिकी सैन्य साजो-सामान का सबसे बड़ा खरीदार सऊदी अरब रहा है, लेकिन अब उसकी जगह भारत ने ले ली है। 2013 में भारत ने 1.9 अरब डॉलर के अमेरिकी सैन्य साजो-सामान खरीदे थे, जिसमें सी-17 ग्लोबमास्टर थ्री और पी-81 मल्टीमिशन एअरक्राफ्ट भी शामिल था। भारत अब भी सत्तर प्रतिशत सैन्य हार्डवेयर बाहर से मंगाने को विवश है। यह तस्वीर क्या प्रतिरक्षा में उनचास प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के बाद बदल गई है? बल्कि बराक ओबामा के लिए लाल कालीन बिछाने वाले कुछ ‘राष्ट्रवादी मित्र’ प्रतिरक्षा में सौ फीसद प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की वकालत इसीलिए कर रहे हैं।
ओबामा को भारत जैसा बाजार, ‘बिन मांगे मोती’ की तरह मिला है। मोदीजी पिछले तीन महीने में अमेरिकी राष्ट्रपति से इतने अंतरंग हो गए कि साझा प्रेस सम्मेलन में अनौपचारिक होकर बार-बार ‘बराक… बराक’ संबोधन से पीछा नहीं छुड़ा पा रहे थे। लेकिन राष्ट्रपति ओबामा ने ‘मिस्टर प्राइम मिनिस्टर’ के संबोधन के जरिए कूटनीतिक शालीनता और शृंखलता को बनाए रखा। ओबामा ने बड़ी शाइस्तगी से चुटकी ली थी कि प्राइम मिनिस्टर मोदी न्यूयार्क के मेडिसिन स्क्वायर सभागार में ‘बॉलीवुड स्टार की तरह अवतरित’ हुए थे। शायद ओबामा की बातों का असर था कि मोदी ने दूसरे दिन बिल्कुल बॉलीवुड स्टार की तरह गणतंत्र दिवस समारोह में काला चश्मा लगाए रखा। जबकि मौसम बूंदा-बांदी वाला था और आसमान में काले बादल छाए हुए थे।

ऐसा पहली बार हुआ कि गणतंत्र दिवस समारोह में झांकियां वैसी निकलीं, जो प्रधानमंत्री के राजनीतिक एजेंडे पर आधारित थीं। ‘प्रधानमंत्री जन धन योजना’, ‘मेक इन इंडिया’ जैसी झांकियां क्या प्रधानमंत्री मोदी के राजनीतिक एजेंडे को प्रस्तुत नहीं कर रही थीं? ऐसा क्या हुआ कि पश्चिम बंगाल ने ‘कन्या श्री’ कार्यक्रम को लेकर झांकी प्रस्तुत करने का प्रस्ताव भेजा, जो स्वीकार नहीं किया गया? पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने दावा किया कि ‘कन्या श्री’ कार्यक्रम के जरिए सूबे की दस लाख लड़कियों का भला किया गया है। केंद्र द्वारा ऐसी झांकी को नहीं मानने का नतीजा था कि पश्चिम बंगाल ने राजपथ पर झांकी निकालने से मना कर दिया।

यह मुद्दा ‘केजरीवाल के न्योते’ की तरह टीवी चैनलों पर छाया रहा। केजरीवाल के साथी आशुतोष को इसकी कसक थी कि किरण बेदी को अग्रिम पंक्ति में बैठने की जगह दी गई और एक पूर्व मुख्यमंत्री को निमंत्रण तक नहीं भेजा गया। आम आदमी पार्टी के एक और नेता आशीष खेतान ने तो यहां तक कह दिया कि यह भारतीय जनता पार्टी का गणतंत्र समारोह था। काश! केजरीवाल आम आदमी की तरह लाइन में लग कर स्वतंत्रता दिवस समारोह का टिकट खरीदते और राजपथ जाते। यह आलोचना से कई गुना अधिक असरदार होता।

यों कइयों को महाराष्ट्र, गोवा, गुजरात की झांकियों पर उनके प्रदेश के नेताओं के उठ खड़े होने और अपनी प्रफुल्लता प्रदर्शित किए जाने पर आपत्ति थी। यह स्वाभाविक है कि जिसकी सत्ता होती है, उसके नेता अपनी ताकत भी ऐसे राष्ट्रीय समारोहों में पूरे जोश के साथ दिखाते हैं। जिनकी सत्ता नहीं होती, उनकी खीज और खलिश पद्म पुरस्कारों तक पर दिखती है। ‘पद्म’ के छदम से पूरा देश वाकिफ है।

कांग्रेस और दूसरी पार्टियों की सरकारों ने भी अपने समय में कुपात्रों को पद्म की रेवड़ियां बांटीं। इस बार पद्म पुरस्कारों का खास पक्ष यही है कि बड़ी संख्या में बाबाओं और स्वामियों को इसके योग्य समझा गया।

खैर! ओबामा को इस बात से निराशा अवश्य हुई है कि उनके नए-नवेले मित्र ‘मिस्टर मोदी’ ने यूक्रेन हमले की निंदा नहीं की। हैदराबाद हाउस में बराक ने जिस तरह पुतिन की यूके्रन नीति की मजम्मत की उससे भारतीय विदेश नीति के रणनीतिकार असमंजस में थे कि इस विषय पर क्या लाइन लें। यह अच्छा हुआ कि सरकार की ओर से चुप्पी साध ली गई। अमेरिकी कूटनीतिकों को हैरानी नहीं होनी चाहिए कि राजपथ पर प्रदर्शित किए जाने वाले अधिकतर साजो-सामान रूस से निर्यात किए गए थे। यहां तक कि राजपथ के फ्लाइंग पास्ट में ‘सुखोई-30 एमकेआइ’ विमानों ने जिस तरह से उड़ानें भरीं, वह इसका जवाब था कि इतनी जल्दी भारत, रूस से पीछा नहीं छुड़ा पाएगा।

आज जिस तरह मोदीजी ‘मेक इन इंडिया’ का खम ठोकते फिर रहे हैं, वह काम रक्षा क्षेत्र में 2002 से पहले हो चुका है। एक सौ चालीस अदद ‘सुखोई-30 एमकेआइ’ विमानों का भारत में निर्माण करने के लिए सन 2000 में रूस ने समझौता किया था। 2004 में हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड की फैक्ट्री में निर्मित ‘सुखोई-30 एमकेआइ’ युद्धक विमान भारतीय वायु सेना के बेड़े में शामिल किए गए। मोदीजी पहली बार ‘मेक इन इंडिया’ नारा नहीं दे रहे हैं, उनके पूर्ववर्ती अटल बिहारी वाजपेयी बिना किसी तामझाम के यह काम कर चुके हैं। उसके लिए अटलजी ने राजपथ पर झांकी नहीं निकाली थी।

अब तो कायदे से ‘मेड इन इंडिया’ पर काम होना चाहिए था। इस पर जोर देना चाहिए कि अमेरिका, जिस तरह से भारत में ड्रोन निर्माण के लिए पायलट प्रोजेक्ट ‘सी-130’ शुरू कर रहा है, उसकी सौ फीसद तकनीक वह क्यों नहीं साझा करे। हम पहले रूस के लिए एक बाजार थे और अब अमेरिका के लिए हथियार बाजार बन जाएंगे। बस बेचने वाले बदले हैं। बाजार तो वहीं का वहीं है। अब हथियार निर्माण के लिए अमेरिका को भारत में सस्ता मजदूर मिल जाएगा। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस ऐंड रिसर्च इंस्टीट्यूट ‘सिपरी’ ने 2011 में जारी रिपोर्ट में जानकारी दी थी कि दुनिया भर में जितने हथियार बेचे जाते हैं, उसका अकेले दस प्रतिशत भारत खरीदता है। चीन और पाकिस्तान इसके आधे भी नहीं खरीदते।

आप मंगल ग्रह पर स्वदेशी यान भेजने की ताकत रखते हैं, पर अत्याधुनिक हथियारों के लिए अब भी पश्चिमी देशों पर निर्भर हैं। यह अजब-गजब स्थिति है। भारत में सैन्य साजो-सामान बनाने और शोध के लिए अब तक सरकार डीआरडीओ (डीफेंस रिसर्च ऐंड डेवलपमेंट आर्गेनाइजेशन) पर निर्भर रही है। डीआरडीओ की पचीस प्रयोगशालाएं, पांच हजार वैज्ञानिक, उनतालीस आयुध कारखाने, पचीस हजार सहायकों के होते हुए भारत क्यों हथियार बेचने का सबसे बड़ा विदेशी बाजार बना रहा, इस पर देश को सोचना चाहिए।

अपने देश में हथियार निर्माण और उसके अनुसंधान पर मात्र छह प्रतिशत राशि के आबंटन से कोई आम भारतीय यह क्यों नहीं सोचने पर विवश होगा कि सेना में कमीशनखोर लॉबी जान बूझ कर भारत को विकसित देशों की कतार से बाहर रखना चाहती है।

पूरे एशिया में चीन नंबर एक हथियार आपूर्तिकर्ता देश है, और विश्व में अमेरिका, रूस के बाद तीसरे नंबर पर आता है। चीन को इसके लिए प्रतिरक्षा में उनचास प्रतिशत एफडीआइ की जरूरत नहीं पड़ी। चीन ने इस वास्ते घरेलू निर्माताओं को आगे किया। दुनिया के बहुतेरे सैन्य हार्डवेयर बनाने वाले सस्ती दर पर चीनी फैक्ट्रियों में माल बनाते, और उसे दूसरे देशों को आपूर्ति कर देते हैं। चीन इनकी नकल करते-करते रक्षा सामग्री बनाने के मामले में आगे बढ़ गया। उदाहरण के लिए, सुखोई एसयू-27 युद्धक विमान है, जिसे चीन ने रूस से आयात किया, और अपने ‘जे-11 फाइटर प्लेन’, एसयू-27 एयरफे्रम को बेस बना कर विकसित कर लिया। क्या इन कारणों से चीन ने कहा है कि ‘भारत-अमेरिका की दोस्ती सतही’ है? या फिर चीन को डर सता रहा है कि एशिया में भारत का जीडीपी, उसे पीछे नहीं छोड़ दे।

हम गालिबन खुश हैं कि अमेरिका, असैन्य परमाणु उत्तरदायित्व कानून के कठोर प्रावधानों को शिथिल कर चुका है। अमेरिका भारतीय परमाणु प्रसंस्करणों पर नजर नहीं रखेगा, बल्कि आइएइए (अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा अधिकरण) के मानकों के अनुरूप निगरानी होगी। मगर सच यह है कि हम पहले भी ‘आइएइए’ के मानकों के अनुरूप काम कर रहे थे। अमेरिका एटमी फैलाव पर रोकथाम चाहता था, जिसे अब वह नहीं करेगा। दोनों देशों के बीच ‘एटमी इन्श्योरेंस पूल’ पर भी सहमति बनी है, जिसमें साढ़े सात सौ करोड़ नाभिकीय कंपनियां देंगी, उतनी ही राशि सरकार देगी।

ये सारी घुमावदार शर्तें उसी के इर्द-गिर्द हैं, जिसके अनुसार अमेरिकी कंपनियों को परमाणु बिजली घर लगाने के लिए अरबों डॉलर का संयंत्र बेचना है। इसके लिए ‘वेस्टिंगहाउस तोशिबा’ और ‘जनरल इलेक्ट्रिक’ जैसी दो अमेरिकी कंपनियां लंबे समय से घेराबंदी कर रही थीं। ‘फर्स्ट सोलर’ और ‘सन एडीशन इंक’ दो ऐसी अमेरिकी कंपनियां हैं, जिन्हें ओबामा की भारत यात्रा में भरपूर फायदा मिला है। ये कंपनियां, छह अरब डॉलर इस वित्तवर्ष तक भारतीय सौर ऊर्जा के क्षेत्र में निवेश करेंगी, और अगले वित्तवर्ष तक चैदह अरब डॉलर। लेकिन इससे प्रफुल्लित होने की आवश्यकता नहीं है।

भारत में एक लाख मेगावाट सौर ऊर्जा बनाने वाली ये अमेरिकी कंपनियां किस दर पर बिजली बेचेंगी, और कितने अरब डॉलर इस देश से लेकर जाएंगी, इसका ब्योरा जब आएगा, तब पता चलेगा कि हमने क्या खोया और क्या पाया है। अभी पूरे देश को नारेबाजी के नशे में इतना चूर कर दिया गया है कि हम निवेश के अलावा कुछ सुनना नहीं चाहते!

 

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