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बैंकों की दशा सुधारने की कवायद

धर्मेंद्रपाल सिंह देश की अर्थव्यवस्था से आजकल अजीब इशारे मिले हैं। बीते अक्तूबर में औद्योगिक उत्पादन 4.2 फीसद गिरा। जुलाई से सितंबर की तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की दर 5.3 प्रतिशत दर्ज की गई। सरकार ने अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए पूरा जोर लगा रखा है, लेकिन देशी-विदेशी पूंजीपति नया निवेश […]

Author January 12, 2015 12:36 PM

धर्मेंद्रपाल सिंह

देश की अर्थव्यवस्था से आजकल अजीब इशारे मिले हैं। बीते अक्तूबर में औद्योगिक उत्पादन 4.2 फीसद गिरा। जुलाई से सितंबर की तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की दर 5.3 प्रतिशत दर्ज की गई। सरकार ने अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए पूरा जोर लगा रखा है, लेकिन देशी-विदेशी पूंजीपति नया निवेश करने से कतरा रहे हैं। कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि हमारा देश ‘बैलेंस शीट रिसेशन’ के दौर से गुजर रहा है। फिलहाल सरकार और कंपनियों ने बैंकों से भारी कर्ज ले रखा है। उसका मूल और ब्याज चुकाने में उन्हें दिक्कत आ रही है। इसीलिए दोनों अपनी बैलेंस शीट से उधारी कम करने के लिए खर्चों में कटौती कर रहे हैं। इससे निवेश और खपत दोनों उतार पर हैं और अर्थव्यवस्था मंदी की जकड़न से मुक्त नहीं हो पा रही।

फिंच रेटिंग्स की भारतीय सहयोगी इंडिया रेटिंग्स के अनुसार भारतीय बैंकों के पांच सौ बड़े कर्जदारों में से बयासी का कर्ज संकट में है और तिरासी का संकट के कगार पर। कर्ज संकट का अर्थ है बयासी कॉरपोरेट का ऋण बैड लोन की श्रेणी में आ चुका है। उधार लेने वाली कंपनी न मूल और न ही ब्याज चुका रही हैं। अन्य तिरासी को कर्ज की अदायगी में छूट (ब्याज दर कम करना, अवधि बढ़ाना आदि) दी जा रही है। इन कर्जदारों में से अधिकतर ने सार्वजनिक बैंकों से पैसा उठा रखा है। हिसाब लगाने पर पता चलता है कि बड़े उद्योगों द्वारा बैंकों से लिए गए एक तिहाई धन की उगाही के आसार बहुत कम हैं। ऐसे में नए निवेश की आशा कैसे की जा सकती है?

मौजूदा स्थिति का अर्थव्यवस्था पर जो असर पड़ रहा है सो पड़ रहा है, इससे सार्वजनिक बैंक भी लहूलुहान हो चुके हैं। इन बैंकों में आम आदमी की खून-पसीने की कमाई का पैसा जमा है। अगर उद्योगों के कर्ज बैंक राइट आॅफ या रिस्ट्रक्चर किए जाते हैं, तो उसकी कीमत अंतत: जनता को ही चुकानी पड़ती है। हाल ही में सरकार ने खर्च कटौती के नाम पर स्वास्थ्य बजट में बीस हजार करोड़ रुपए कम कर दिए। हमारे देश में स्वास्थ्य बजट पहले ही काफी कम है। इस कटौती की मार भी गरीब आदमी पर पड़ेगी। दूसरी ओर बड़े-बड़े उद्योग हैं, जिन्हें कर्ज न चुकाने पर भी सरकार और बैंक दंडित करने से हिचकते हैं।

‘मेक इन इंडिया’ नारे को साकार करने के लिए मोदी सरकार ने सार्वजनिक बैंकों की नकेल कसनी शुरू कर दी है। पुणे में इन बैंकों के करीब सौ आला अधिकारियों के दो दिवसीय ज्ञान संगम सम्मेलन के बाद जो सिफारिशें छन कर आर्इं, केंद्र सरकार ने उन पर शीघ्र निर्णय लेने का आश्वासन दिया है। इस सम्मेलन को प्रधानमंत्री ने भी संबोधित किया और बैंक अधिकारियों को भरोसा दिलाया कि सरकार उनके कामकाज में हस्तक्षेप नहीं करेगी। उन्हें पेशेवर तरीके से काम करने की पूरी छूट मिलेगी।
बैंकों के सम्मेलन के बाद जो सिफारिशें सरकार को सौंपी गर्इं, उनमें से अधिकतर पुरानी हैं। सबको पता है कि कर्ज न लौटाने वाले उद्योग कानूनी दांव-पेच का सहारा लेकर अक्सर बच जाते हैं। वे अदालतों से स्थगनादेश ले आते हैं। उन्हें विलफुल डिफाल्टर (जानबूझ कर कर्ज न लौटना) घोषित करने में बैंकों को पसीना आ जाता है। अब मांग की जा रही है कि जानबूझ कर कर्ज न लौटाने वाले उद्योगों के खिलाफ फौजदारी का मामला दर्ज किया जाए और दोषी कंपनियों के मैनेजमेंट में बदलाव की प्रक्रिया को आसान बनाया जाए, ताकि प्रबंधन अपने हाथ में लेकर बैंक अपना कर्ज वसूल कर सकें। साथ ही दोषी कंपनियों की संपत्ति बेचने की प्रक्रिया आसान बनाई जाए। केंद्रीय सतर्कता आयोग के निर्देश के अनुसार फिलहाल ऐसी संपत्ति खुली नीलामी के जरिए बेची जा सकती है। बैंक चाहते हैं कि उन्हें अपने बैड लोन सीधे बेचने की अनुमति दी जाए।

सार्वजनिक बैंकों ने बैंक बोर्ड ब्यूरो और बैंक इन्वेस्टमेंट कंपनी के गठन की अनुमति भी मांगी है। ब्यूरो के जरिए बैंकों के वरिष्ठ पदों पर नियुक्ति के लिए पेशेवरों का डेटाबेस तैयार किया जाएगा। अगर मंजूरी मिल गई तो सरकारी धन सीधे नहीं, इन्वेस्टमेंट कंपनी के माध्यम से लगेगा। धन जुटाने के लिए बैंकों को बाजार से पैसा जुटाने की अनुमति भी मिलेगी। सार्वजनिक बैंकों में सरकार का निवेश इक्यावन फीसद से कम करने का सुझाव भी दिया गया है। कैंपस सेलेक्शन, अधिक वेतन देने की छूट और उत्पादकता बढ़ाने के लिए हायर ऐंड फायर नीति लागू करने का विचार भी ज्ञान सम्मेलन में उभरा है।

पिछले चार दशक के दौरान देश की तरक्की में सत्ताईस सार्वजनिक बैंकों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। उदारीकरण और निजीकरण के मौजूदा दौर में भी उनकी पैठ कायम है। देश में इक्यासी प्रतिशत शाखाएं सार्वजनिक बैंकों की हैं और कुल जमा धन का सतहत्तर प्रतिशत हिस्सा उनके पास है। पिछले कुछ बरस में निजी बैंकों का तेजी से विस्तार हुआ है फिर भी आम आदमी अपना पैसा सार्वजनिक बैंकों में ही सुरक्षित समझता है। लेकिन राजनीतिक हस्तक्षेप, भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन के कारण इन बैंकों की माली हालत तेजी से बिगड़ी है।

आज सार्वजनिक बैंकों द्वारा दिया गया 12.9 प्रतिशत कर्ज फंसा हुआ है, जबकि निजी बैंकों के मामले में यह रकम महज 4.4 फीसद है। भ्रष्टाचार के कारण ही सार्वजनिक बैंकों का तीन गुना अधिक धन डूबने के कगार पर है। उनके नान परफार्मिंग एसेट (एनपीए) भी निजी बैंकों (2 प्रतिशत) के मुकाबले ढाई गुना (5 प्रतिशत) अधिक है। ऐसे में उन्हें पटरी पर लाने के लिए दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। पेशेवर रवैया अपनाए जाने के साथ-साथ शीर्ष पदों पर बैठे अफसरों की जवाबदेही भी तय करनी पड़ेगी। अच्छे काम पर इनाम और बुरे काम पर दंड देने की स्पष्ट नीति अपनानी पड़ेगी। बैंक और वित्तीय संस्था हर देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं। फिलहाल हमारी रीढ़ चोटिल है। उसका शीघ्र इलाज शुरू किया जाना चाहिए।

सन 2012-13 में बैंकों के 1.64 लाख करोड़ रुपए फंसे पड़े थे, जो कोयला और 2-जी घोटाले की रकम को टक्कर देते हैं। फिलहाल बैंकों के पास जनता का कुल अठहत्तर लाख सड़सठ हजार नौ सौ सत्तर करोड़ रुपए जमा हैं, जिनमें से साठ लाख छत्तीस हजार अस्सी करोड़ रुपए उन्होंने बतौर कर्ज दे रखा है। कर्जे का बड़ा भाग कॉरपोरेट घरानों और बड़े उद्योगों के पास है। अनेक बड़े उद्योगों ने बैंकों से अरबों रुपए का ऋण ले रखा है, जिसे वे लौटा नहीं रहे हैं। अखिल भारतीय बैंक कर्मचारी संघ ने पिछले साल एक सूची जारी की, जिसमें एक करोड़ रुपए से ज्यादा रकम के चार सौ छह बकाएदारों के नाम हैं। इस सूची में अनेक प्रतिष्ठित लोग और संगठन हैं।

पिछले पांच वर्ष में बैंक दो लाख चार हजार पांच सौ उनचास करोड़ रुपए के कर्ज को बट््टेखाते में डाल चुके हैं। इसका अर्थ है कि हर साल बैंकों का चार खरब से ज्यादा पैसा डूब जाता है। गरीबों को दी जा रही सबसिडी पर शोर मचाने वाले लोग बरसों से हो रहे इस महाघोटाले पर मौन क्यों हैं? सार्वजनिक बैंक किसान, मजदूर या अन्य गरीब वर्ग को कर्जा देते समय कड़ी शर्त लगाते हैं और वसूली बेदर्दी से करते हैं। लेकिन जिन बड़े घरानों पर अरबों रुपए की उधारी है उनसे नरमी बरती जाती है। सीबीआइ के पूर्व निदेशक रंजीत सिन्हा ने तो यह बात सार्वजनिक मंच से कही थी। उन्होंने कहा कि बैंक अपने बड़े खाता धारकों की जालसाजी बताने में हिचकिचाते हैं। ऋण पुनर्निर्धारित कर उन्हें बचाने का प्रयास किया जाता है।

दरअसल, बैंक में जालसाजी के बढ़ते मामले इस बात के प्रमाण हैं कि यह धंधा सुनियोजित है। पिछले तीन साल में गलत कर्ज मंजूरी और जालसाजी से बैंकों को बाईस हजार सात सौ तैंतालीस करोड़ रुपए का चूना लग चुका है। मतलब यह कि हर दिन बैंकों का 20.76 करोड़ रुपए डूब जाता है। इस दौरान जालसाजी और पद दुरुपयोग के आरोप में छह हजार कर्मचारियों को निलंबित किया जा चुका है। यानी हर दिन पांच से ज्यादा कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई हुई है। इन कर्मचारियों में बैंक अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक तक शामिल हैं।

बिना राजनीतिक संरक्षण के इतने बड़े पैमाने पर हेराफेरी असंभव है। रिजर्व बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर केसी चक्रवर्ती ने कुछ समय पहले लिखे अपने शोधपत्र में बताया कि अधिकतर सार्वजनिक बैंक कर्जा वसूल न कर पाने से आज भारी घाटा उठा रहे हैं। एनपीए को कम करने के लिए ऋण पुनर्निर्धारण (लोन रीस्ट्रक्चरिंग) का मार्ग अपनाया जा रहा है, जो बैंकों की सेहत के लिए ठीक नहीं है। स्टेट बैंक आॅफ इंडिया, पंजाब नेशनल बैंक, इलाहाबाद बैंक, बैंक आॅफ इंडिया, सेंट्रल बैंक, बैंक आॅफ बड़ौदा की अनुत्पादक परिसंपत्ति में पिछले तीन साल में तेजी से वृद्धि हुई है।

जानबूझ कर बड़े कर्जदारों को बचाने की बैंकों की कोशिश पर अंकुश लगाने के लिए वित्त मंत्रालय को तुरंत जरूरी कदम उठाने चाहिए। बड़े कर्जदार ऋण लेते वक्त जो परिसंपत्ति रेहन रखते हैं, उसे लोन न चुकाने पर तुरंत जब्त किया जाना चाहिए। ऋण लेने वाले के समर्थन में गारंटी देने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई की जानी चाहिए। बड़ी बात यह है कि बैंकों के हर मोटे कर्जे को उनका बोर्ड मंजूरी देता है, इसलिए वसूली न होने पर बोर्ड के सदस्यों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए। अपना मुनाफा बढ़ाने की होड़ में अक्सर बैंक किसी प्रोजेक्ट का मूल्यांकन करते वक्त उसकी कई खामियों की अनदेखी कर देते हैं, जिसका परिणाम उन्हें बाद में भुगतना पड़ता है। सोचने की

बात यह भी है कि जब देश में आर्थिक विकास की दर लगभग पांच फीसद हो तब बैंकों के मुनाफे में वृद्धि का लक्ष्य 15-20 प्रतिशत क्यों रखा जाना चाहिए?
इंदिरा गांधी ने जब बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया तब तर्क दिया गया था कि बैंक देश के बड़े औद्योगिक घरानों के हाथ का औजार हैं। उनमें जमा जनता का पैसा कॉरपोरेट जगत के हित में इस्तेमाल होता है। राष्ट्रीयकरण के बाद सार्वजनिक बैंकों ने जनकल्याण से जुड़ी योजनाओं को अमली जामा पहनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लगता है अब फिर उन्हें निजी हाथों में सौंपने की तैयारी की जा रही है। सार्वजनिक बैंकों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के बजाय पेशेवर बनाने की आड़ में उनका निजीकरण किया जा रहा है। ऐसे में आम आदमी के कल्याण से जुड़ी योजना उनकी वरीयता सूची से स्वत: बाहर हो जाएगी ।

 

 

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