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बड़ी पूंजी के हित का बजट

अरविंद कुमार सेन भारत की जनता ने तेज बदलाव के लिए वोट दिया था। इन अल्फाजों के साथ वित्तमंत्री अरुण जेटली ने अपने बजट-भाषण का आगाज किया। उनका पूरा बजट-भाषण पढ़ जाइए, पर बदलाव की एक झलक भी नहीं मिलेगी। अहसास होगा कि यह मनमोहन-मोदी सरकार की संयुक्त साझेदारी में पेश किया गया बजट है। […]

Author March 2, 2015 10:30 PM

अरविंद कुमार सेन

भारत की जनता ने तेज बदलाव के लिए वोट दिया था। इन अल्फाजों के साथ वित्तमंत्री अरुण जेटली ने अपने बजट-भाषण का आगाज किया। उनका पूरा बजट-भाषण पढ़ जाइए, पर बदलाव की एक झलक भी नहीं मिलेगी। अहसास होगा कि यह मनमोहन-मोदी सरकार की संयुक्त साझेदारी में पेश किया गया बजट है। बजट के लक्षित समूह, आबंटन, विकास की दिशा, प्राथमिकता और विकास के लिए नीतियों की रूपरेखा के पैमाने पर इस बजट और पहले की यूपीए सरकार के बजट में कोई खास फर्क नहीं है। कह सकते हैं कि जब नरेंद्र मोदी कांग्रेसमुक्त भारत का वादा कर रहे थे तो वह केवल कांग्रेसी नेताओं से मुक्ति की बात थी। कांग्रेसी नीतियों के खात्मे से उस वादे का कोई ताल्लुक नहीं है, भाजपा की अगुआई वाली राजग सरकार के दूसरे बजट ने इस बात को पक्का कर दिया है।

बजट में ऐसी ढेरों मिसालें गिनी जा सकती हैं जिनके जरिए सरकार ने चांद-तारे लाने का दावा किया है। मगर जमीनी स्तर पर ऐसी घोषणाओं का कोई मतलब नहीं है। मसलन, निर्भया फंड के लिए बजट में एक हजार करोड़ रुपए का आबंटन किया गया है। दिल्ली के चर्चित बलात्कार मामले पर बवाल उठने पर दो साल पहले तब की यूपीए सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर एक हजार करोड़ रुपए के आबंटन से निर्भया फंड बनाया था। कोई पूछे, उस एक हजार करोड़ रुपए से महिलाओं की कितनी और कैसे सुरक्षा की गई। जवाब है कि बीते दो साल के दरम्यान सरकार यह तय ही नहीं कर पाई कि इस पैसे का इस्तेमाल कैसे किया जाए। अब कथित महिला सशक्तीकरण में अपना योगदान देने के लिए राजग सरकार ने भी उतनी ही राशि का आबंटन कर दिया है। मगर इस पैसे का कब और कैसे इस्तेमाल होगा, कोई नहीं जानता। बहुत संभावना है कि अगले बजट में इसी घोषणा का दोहराव करते हुए दम भरा जाए कि महिलाओं के हित में सरकार ने निर्भया फंड के एक हजार करोड़ रुपए विलोपित नहीं करने का फैसला किया है और इसी चले हुए कारतूस को फिर से दागा जाए।

सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा के नाम पर की गई बजटीय घोषणाएं भी जुबानी जमाखर्च से ज्यादा कुछ नहीं हैं। भारत दुनिया के उन निचली कतार के देशों में अग्रणी है जो सामाजिक सुरक्षा पर अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का सबसे कम हिस्सा खर्च करते हैं। वित्तमंत्री ने बजट में घोषणा की है कि सरकार गरीबों और हाशिये पर रहने वाले लोगों को पेंशन की सुविधा देने के लिए अटल पेंशन योजना की शुरुआत करेगी। मगर दिक्कत यह है कि इस पेंशन सुविधा का लाभ उठाने के लिए लोगों को पहले एक निश्चित अवधि तक तयशुदा रकम जमा करवानी होगी।

सवाल है कि जब गरीब अपने पैसे से पेंशन योजना का लाभ उठा पाने में सक्षम है तो वह सीधे बाजारी कंपनियों के पास ही चला जाएगा, इसमें सरकार की मध्यस्थता की क्या जरूरत है। ठीक इस तर्ज पर बजट में कहा गया है कि सरकार गरीबों के लिए प्रधानमंत्री बीमा सुरक्षा योजना शुरू करेगी। लेकिन इस बीमा योजना का फायदा उठाने के लिए बीमाधन (प्रीमियम) लोगों को ही भरना होगा। कहना न होगा कि सामाजिक सुरक्षा मुहैया कराने के नाम पर घोषित की गई ये योजनाएं प्रधानमंत्री जन-धन योजना जैसी ही हैं। नाम और आवरण बेहतर है, पर इनको अमल में लाने के लिए जरूरी वित्तीय प्रावधानों का बजट में कहीं अता-पता नहीं है।

आप अर्थव्यवस्था के किसी भी बुनियादी क्षेत्र को इस तराजू पर रख कर तौल सकते हैं। जहां भी अहम बदलाव की जरूरत थी, बजट में छिटपुट आबंटन करके मामले को रफा-दफा कर दिया गया है। शोध और विकास क्षेत्र के आधारभूत ढांचे को मजबूत करने के लिए एक सौ पचास करोड़ का आबंटन किया गया है, जो किसी एक चीनी या कोरियाई विश्वविद्यालय के शोध-बजट से भी कम है। सभी नागरिकों को 2022 तक घर मुहैया कराया जाएगा। कैसे, कोई नहीं जानता। इतने महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल करने के लिए जरूरी आबंटन कहां है, बजट में इसका कोई जवाब नहीं है।

सरकार किसानों के हक में सोचती है, पूर्वोत्तर भारत का विकास किया जाएगा, ग्रामीण भारत का आधारभूत ढांचा विकसित किया जाएगा, कृषिक्षेत्र को अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा बनाया जाएगा, आदि-आदि। सब सुनहरी बातें हैं, सुनने में अच्छी लगती हैं, पर इनको जमीन पर उतारने के लिए पैसे की जरूरत पड़ती है, और सबसे बड़ी बात, एक जुदा आर्थिक सोच की जरूरत है जो इस बजट में तो नहीं है। जैसा पहले ही बताया जा चुका है, पूरे बजट में गरीबों और विकास के नाम पर ऐसी छोटी-छोटी घोषणाओं और मामूली राशि आबंटित किए जाने की मिसालों की लंबी फेहरिस्त है, लेकिन इन खोखली बातों की जमीनी स्तर पर कोई खास मतलब नहीं है।

मौजूदा सरकार ने जो खाका खींचा है, उसके मुताबिक निजी-सार्वजनिक भागीदारी (पीपीपी) और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की बिक्री के जरिए भारतीय अर्थव्यवस्था की कमान निजी हाथों में सौंपने के पहले से ही चल रहे अभियान को और तेज किया जाएगा। निजीकरण की राह को आसान करने के कई उपाय सरकार ने बजट में किए हैं। मिसाल के तौर पर, पीपीपी परियोजनाओं के जोखिम का बड़ा हिस्सा सरकार वहन करेगी। सीधे लफ्जों में कहें तो मुनाफा होने की दशा में निजी हिस्सेदार सारा पैसा बटोर सकेंगे, लेकिन घाटा होने पर सरकार (जनता के पैसे से) भरपाई करेगी।

वहीं बजट में कहा गया है कि वित्तवर्ष 2015-16 में सरकारी कंपनियों में हिस्सेदारी की बिक्री (विनिवेश) और सरकारी कंपनियों को पूरी तरह निजी हाथों में सौंप कर (रणनीतिक बिक्री) 69,500 करोड़ रुपए जुटाए जाएंगे। मौजूदा वित्तवर्ष में विनिवेश से 31,350 करोड़ जुटाए गए हैं। दोगुने से भी ज्यादा का विनिवेश-लक्ष्य तय करके मोदी सरकार ने एक दफा फिर साबित कर दिया है कि राष्ट्रीय संसाधनों का इस्तेमाल करके जिन सरकारी क्षेत्र की कंपनियों को खड़ा करने में बरसों लगे थे, उनको बेचने के मामले में वह कांग्रेस से कहीं ज्यादा कुशल और तेज है। विडंबना देखिए, स्वदेशी का दम भरने वाले कई संगठनों के तार इसी भाजपा से गहरे तक जुड़े हैं, जो खुल्लमखुल्ला देश की अर्थव्यवस्था के अहम हिस्से निजी कारोबारियों की सेवा में परोस रही है।

मौजूदा सरकार के नुमाइंदे इस बात को दोहराते नहीं थकते कि नीति-निर्माण गरीबों को ध्यान में रख कर ही किया जाता है। लेकिन बजट की बुनियादी दिशा और राजकोषीय नीति इस तरह से बुनी गई है कि कथित आर्थिक विकास का फायदा केवल पूंजीपतियों और उच्च-मध्यवर्ग को मिलता रहेगा और इसकी कीमत गरीब तबका चुकाता रहेगा। बजट में संपदा (वेल्थ) कर समाप्त करने का एलान किया गया है। बड़े धन्नासेठों (सुपर रिच) पर ज्यादा कर लगाने की बात पूरी दुनिया, यहां तक कि अमेरिका और पश्चिमी यूरोपीय देशों में भी चल रही है। मगर हमारी सरकार धन्नासेठों पर महज दो फीसद का अतिरिक्त अधिभार (सरचार्ज) लगा कर बच निकली है।

भारत दुनिया के उन देशों में एक है, जहां सकल घरेलू उत्पाद के मुकाबले कर का अनुपात (टैक्स-जीडीपी रेश्यो) बेहद कम (लगभग 17 फीसद) है। किसी भी सरकार के पास अपनी आमदनी बढ़ाने और विकास पर खर्च करने के लिए पैसे जुटाने के दो तरीके हैं। पहला, कर की दरों में इजाफा करके आमदनी बढ़ाई जाए, या दूसरा, मौजूदा खर्चों में कटौती करके पैसे की उपलब्धता में बढ़ोतरी की जाए।

हमारी कथित गरीब हितैषी सरकार ने दूसरा रास्ता चुना है। मौजूदा सार्वजनिक खर्चों में कटौती का मतलब है जरूरतमंदों को दी जाने वाली सबसिडी में कमी की जाए और सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं पर होने वाले खर्च में कटौती की जाए। दोनों ही तरह के फैसलों की कीमत गरीब जनता को चुकानी पड़ती है। वित्तवर्ष 2015-16 के लिए खाद्य, उर्वरक और पेट्रोलियम उत्पादों पर दी जाने वाली सबसिडी में सरकार ने दस फीसद कटौती करने की बजटीय घोषणा की है। वित्तमंत्री का तर्क है, सबसिडी (पूंजीपति राष्ट्रीय संसाधनों को देश की गरीब जनता के हित में मोड़ने वाली इन सबसिडियों को नाक-भौं सिकोड़ कर लोकलुभावन बर्बादी कहते हैं) योजनाओं का पूरा फायदा लक्षित समूह-वर्ग के लोगों को नहीं मिल पा रहा है।

अगर सबसिडी का फायदा लक्ष्य के मुताबिक ठीक से नहीं मिल रहा है तो इन योजनाओं का क्रियान्वयन दुरुस्त कीजिए। बजट कहता है कि इसके लिए सरकार ‘जाम तिकड़ी’ (जन-धन योजना, आधार और मोबाइल) का इस्तेमाल करेगी। बाजार के मुखौटे अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष-विश्व बैंक की ओर से पूरी दुनिया में जोर-शोर से हर तरह की सबसिडी का हस्तांतरण नगद में किए जाने का अभियान चल रहा है। मूल बात यह कि नगद का इस्तेमाल गरीब लोग किसी और जगह भी कर सकते हैं और इस तरह सबसिडी से लोगों का सीधा जुड़ाव (मसलन भोजन या केरोसिन) खत्म कर दिया जाता है। इसके बाद दूसरे काम में इस्तेमाल का हवाला देकर किसी भी सबसिडी योजना को बंद करना आसान होता है। सवाल उठता है कि सरकार अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए कर की दरों में इजाफा क्यों नहीं करती। जवाब है नहीं, क्योंकि असल में सरकार गरीबी का मुलम्मा चढ़ा कर हर नीति से अमीर और उच्च मध्यवर्ग की सेवा में जुटी है।

भारतीय अर्थव्यवस्था महंगाई बनाम विकास के जिस द्वंद्व में फंसी है, नया बजट उससे निकलने की कोई राह नहीं दिखाता। बल्कि बजट में इस तरह के प्रावधान किए गए हैं कि उनसे भारतीय अर्थव्यवस्था का संकट खत्म होने के बजाय और गहरा जाएगा। विकास के नाम पर विदेशी निवेश नाम का एक ही तीर इस सरकार के तूणीर में है। विदेशी पूंजी की राह आसान करने की हरसंभव कोशिश बजट में की गई है। मिसाल के तौर पर, पुरानी तिथि से लागू होने वाले कानून (गार) को लागू करने का फैसला एक बार फिर से दो साल के लिए टाल दिया गया है। पहले के वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने भी इसे दो साल के लिए टाला था। क्या किसी और सबूत की जरूरत है कि विदेशी पूंजी के सामने नतमस्तक होने के मामले में भाजपा और कांग्रेस के बीच कोई फर्क नहीं है!

महंगाई कम नहीं होगी, क्योंकि इसके लिए आपूर्ति-तंत्र की खामियां दूर करना जरूरी है। बजट इस पर खामोश है, बल्कि सेवा-कर में दो फीसद का इजाफा करके इस दबाव को और बढ़ाया गया है। किसान आत्महत्या करते रहेंगे और युवा हाथों को काम नसीब नहीं होगा, क्योंकि बजट में इस संकट से बाहर निकलने की कोई राह नहीं बताई गई है। मोदी सरकार के दूसरे बजट ने एक ही पैमाने पर उम्मीद से ज्यादा प्रदर्शन किया है, और वह विदेशी पूंजी की राह आसान करना। सरकार ने बजट में लोगों की खरीद क्षमता बढ़ाने के उपाय करने के बजाय देशी-विदेशी पूंजी के मुनाफा कमाने की राह आसान करने के जतन किए हैं। जैसा कि वित्तमंत्री ने अपने बजट भाषण में दावा किया है, इस राह पर चलने से हो सकता है भारतीय अर्थव्यवस्था एकाध वित्तीय वर्ष में विकास की ऊंची दर हासिल कर ले। लेकिन वह विकास दर बरकरार रखना मुमकिन नहीं होगा, क्योंकि दिशा ही गलत है।

 

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