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रघु ठाकुर का लेख : ब्रिटेन की विदाई का मतलब

यूरोपियन यूनियन का बिखराव भारत जैसे देशों के लिए और भी ज्यादा दुखद है, क्योंकि हम लोग महासंघ वाली दुनिया और फिर एक निर्वाचित विश्व संसद वाली दुनिया का सपना देखने वाले लोग हैं।

Author नई दिल्ली | July 21, 2016 6:26 AM
ब्रिटेन को यूरोपियन यूनियन से अलग होने के विरोध में ईयू और ब्रिटेन के फ्लैग के रंगों से अपने चेहरे को रंगे हुए जर्मनी के बर्लिन में दो कार्यकर्ता।(REUTERS/Hannibal Hanschke)

यूरोपियन यूनियन से ब्रिटेन के अलग होने का निर्णय दुनिया में कई प्रकार के प्रभाव डालेगा। जनमत संग्रह में बावन प्रतिशत लोगों ने यूरोपियन यूनियन से ब्रिटेन के बाहर निकलने का समर्थन किया और अड़तालीस प्रतिशत लोगों ने प्रधानमंत्री कैमरन की अपील के साथ ब्रिटेन के यूरोपियन यूनियन में रहने के पक्ष में वोट दिया। यह जनमत संग्रह ब्रिटिश लोकतंत्र की सफलता का परिणाम है। जाहिर है कि वहां की सरकारें जनमत की राय के हिसाब से ही अपने निर्णय तय करती या बदलती हैं। दूसरे जनमत संग्रह में कैमरन के पक्ष की हार के बाद प्रधानमंत्री कैमरन ने अपने पद से इस्तीफा देने की घोषणा की, यानी इस लोकतांत्रिक संवेदनशीलता को प्रमाणित किया कि अगर जनमत हमारे विचार के पक्ष में नहीं है, तो हमें नेतृत्व करने का नैतिक अधिकार नहीं है। इतना ही नहीं, पहले यह कहा गया कि कैमरन अक्तूबर तक हट जाएंगे, पर अब ये सूचनाएं आई हैं कि वे सितंबर तक ही हट जाएंगे और उनके स्थान पर नया प्रधानमंत्री चुना जाएगा। उधर चौदह जुलाई को ही नई प्रधानमंत्री श्रीमती थेरेसा ने अपने पद की शपथ ले ली।

इस जनमत संग्रह में युवा मतदाताओं ने अस्सी प्रतिशत तक यूरोपियन यूनियन से हटने के पक्ष में मतदान किया और पचास वर्ष से अधिक के उम्रदराज लोगों के बहुमत ने यूरोपियन यूनियन में बने रहने के पक्ष में मतदान किया। यह आयु सीमा का पक्ष भी कुछ संकेत देता है। एक तो यह कि युवा पीढ़ी और बुजुर्ग पीढ़ी की अपेक्षाएं और आदर्श भिन्न-भिन्न हैं। वरिष्ठ पीढ़ी अब भी यूरोपीय समुदाय को एक आर्थिक संगठन, एक संसद और एक यूरोप की भावना से देखती है। उनके लिए एक यूरोप परोक्ष रूप से ब्रिटिश राज्यतंत्र के खोए हुए गौरव की वापसी जैसा है।

इसलिए जब एक आयरिश सुरक्षाकर्मी ने, जो अब वहां का मंत्री भी है, महारानी को सेल्यूट कर उनसे हाथ मिला कर उनके स्वास्थ्य का हाल जाना तो उन्होंने कहा कि ‘मैं अभी तक जिंदा हूं।’ क्या यह उनकी घोर निराशा का उद्गार नहीं है? यह वही ब्रिटेन है कि जब आयरलैंड को अलग करने वाले लोगों ने आयरलैंड को ब्रिटेन से अलग करने की मांग की थी तो वहां के जनमत ने अलगाव को नकार दिया था।

यूरोपियन यूनियन के गठन के बाद यूरोप के देशों का अंतरदेशीय आवागमन तेजी से बढ़ा है। क्योंकि अब इसमें शामिल देशों के नागरिक बगैर किसी प्रतिबंध के यूरोप के अन्य देशों में जाकर बस सकते हैं और व्यवसाय, नौकरी आदि कर सकते हैं। आवागमन की यह सुविधा मिलने के कारण और तुर्की, सीरिया आदि की घटनाओं के कारण काफी बढ़ी संख्या में शरणार्थी और आप्रवासी ब्रिटेन पहुंचे। लगभग सात करोड़ की आबादी वाले ब्रिटेन में तीस लाख से अधिक लोग आप्रवासी हैं।

इसी प्रकार फ्रांस और जर्मनी आदि में बढ़ी संख्या में आप्रवासी और शरणार्थी पहुंच गए हैं। शायद नौजवानों ने बड़े पैमाने पर यूरोपियन यूनियन से हटने का समर्थन इसलिए भी किया है कि वे घुसपैठ से परेशान हैं और आप्रवासी समूह प्रवेश नहीं कर सके। क्योंकि वे उनके रोजगार के अवसर प्रभावित कर रहे हैं, और हाल की आतंकवादी घटनाओं के लिए भी वे मुख्यत: इन्हें जवाबदेह मानते हैं।

ऐसी परिस्थिति दुनिया के दूसरे देशों में भी बन रही है। गे-क्लब पर आतंकी हमले के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप का समर्थन बढ़ा है और वहां भी इस्लामिक फोबिया फैल रहा है। ऐसे समाचार मीडिया से मिल रहे हैं कि वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद अमेरिका ने बिल लादेन और उसकी संस्था को गुनहगार माना था, पर आम मुसलमान को नहीं। पर यह दुखद है कि पिछले कुछ वर्षों की आतंकवादी घटनाओं के बाद समूचे यूरोप और अमेरिका में इस्लाम विरोधी भावनाओं में बढ़ोतरी हुई है और हर मुसलमान शक की नजर से घिरा रहता है।

निस्संदेह वैदिक काल में भारतीय दर्शन और सोच एकात्मकता और व्यापकता की थी। उसका कारण यह भी था कि उस समय दुनिया में दूसरे धर्मों का उदय नहीं हुआ था। पर अब समूची दुनिया और खासकर उन देशों में जहां गैर-इस्लामिक लोग बहुलता या अल्पमत में हैं, इस्लाम विरोधी भावनाएं पनप रही हैं। मजहबी अंत:संघर्षों से दुनिया के अन्य हिस्सों की तरह यूरोप भी अछूता नहीं रहा है और तीन-चार सौ वर्ष के पहले का यूरोप भले ही ईसाई कट््टरपंथ और राजतंत्र तथा बाद में उदारवाद का प्रवर्तक रहा है। वह लोकतंत्र के और उदारवादी ताकतों के बीच युद्ध और संघर्ष का क्षेत्र रहा है। पर पिछली तीन-चार सदियों में लोकतांत्रिक राष्ट्रों का उदय हुआ और नस्ली तथा धार्मिक कट््टरता कम हुई और उदारवादी सोच का फैलाव हुआ था।

पर अब फिर से नस्ली और धार्मिक कट्टरता को पनपने के तर्क मिल रहे हैं। ब्रिटेन में कैमरन के इस्तीफे की घोषणा से ब्रिटिश लोगों को भारी ठेस लगी है। उन्होंने यूरोपियन यूनियन से हटने के लिए तो मतदान किया था, पर शायद फिलहाल वे कैमरन का इस्तीफा नहीं चाहते थे। जर्मनी और फ्रांस में भी, पोलैंड और हंगरी में भी अब इस्लामिक फोबिया का प्रभाव तेजी से हुआ है। वहां की उदारवादी पार्टियां क्रमश: चुनाव में सत्ता से बाहर हो रही हैं क्योंकि मतदाताओं के मन में आप्रवासी और इस्लामिक लोग आतंकवाद के पर्याय हैं ऐसी धारणा बनने लगी है।

ब्रिटेन में यूरोपियन यूनियन में रहने या निकलने के लिए पुनर्मतदान यानी दूसरे ब्रेक्जिट की भी कुछ पहल हुई है। परंपरा के अनुसार अगर किसी सदस्य देश के न्यूनतम एक लाख लोग हस्ताक्षर करके जनमत की मांग करते हैं, तो वह देश यूरोपियन यूनियन में रहे या न रहे इसके लिए जनमत करा सकता है। ब्रिटेन में तो दूसरे बे्रक्जिट के लिए यानी ब्रिटेन यूरोपियन यूनियन से न हटे, इसके पक्ष में तीस लाख लोगों ने हस्ताक्षर कर फिर से जनमत संग्रह कराने की पहल की है। शायद यह पहल उनके पुनर्विचार और कैमरन को बचाने की पहल थी। हालांकि दूसरे ब्रेक्जिट की यह मांग कैमरन को स्वीकार नहीं थी।

भारत सहित दुनिया के अन्य देशों में इस्लाम के मानने वालों या इस्लामिक देशों के सत्ताधीशों को इस गंभीर स्थिति पर विचार करना चाहिए और दुनिया में फैल रहे इस इस्लामिक फोबिया को रोकने के लिए एकजुट होकर पहल करनी चाहिए। दुनिया के समाजवादी विचार के लोगों को भी सावधान होना होगा, क्योंकि इस्लामिक फोबिया या उसकी रक्षा के नाम पर जगा दूसरा मजहबी फोबिया वैश्विक पूंजीवाद के लिए सबसे बड़ा सुरक्षा कवच साबित होगा। दर्शन विहीन धर्म और मानवता विहीन पूंजीवाद अंतत: एक ही सिक्के के दो पहलू होंगे। कुल मिला कर इन घटनाओं से समता और मानवता, उदारता और वैश्विक एकता का विचार पीछे जाएगा और कट््टरपंथ, युद्ध और शस्त्रों की अमानवीय दुनिया का उदय होगा।

यूरोपियन यूनियन का बिखराव भारत जैसे देशों के लिए और भी ज्यादा दुखद है, क्योंकि हम लोग महासंघ वाली दुनिया और फिर एक निर्वाचित विश्व संसद वाली दुनिया का सपना देखने वाले लोग हैं। महात्मा गांधी के बीज-विचार के आधार पर राममनोहर लोहिया ने भारत-पाक महासंघ की कल्पना की थी। इतना ही नहीं, लोहिया ने तो यह भी कल्पना की थी कि अगर प्राथमिक तौर पर समूची दुनिया चार-पांच महासंघों में बंध जाए तो भी हम एक विश्व की दिशा में आगे बढ़ेंगे। लोहिया के इसी विचार को आगे फैलाते हुए दक्षेस महासंघ (दक्षिण एशियाई देशों का महासंघ) की कल्पना और उसे आगे बढ़ाने का प्रयास हम लोग कर रहे हैं। हम लोग अपने लेखों और भाषणों में यूरोपियन यूनियन का और जर्मनी की एकता, अफ्रीकी महासंघ आदि का उदाहरण देते हैं। पर यूरोपियन यूनियन के बिखराव के बाद एक दुनिया का सपना देखने वालों का तर्क कुछ खंडित हुआ है।

हाल ही में कुछ साम्यवादी विचारकों ने यूरोप के घटनाक्रम को उग्र राष्ट्रवाद या कट््टर राष्ट्रवाद का पर्याय और उदय माना है। इस शाब्दिक जुमले का इस्तेमाल ये पहले भी करते रहे हैं। हालांकि साम्यवादियों के आदर्श रूस और चीन भी इस इस्लामिक कट््टरपंथ और कुछ हद तक इस्लामिक फोबिया का शिकार हो रहे हैं। चीन ने कई बार चीनी मुसलमानों के विद्रोह को कठोरतापूर्वक दबाया है। रूस में भी साम्यवादी परिर्वतन के बाद इस्लामिक ताकतों को बांधा गया था और जैसे ही रूस का बिखराव हुआ, सोवियत रूस जो कई देशों का महासंघ था, टुकड़ों में बंट गया और कई इस्लामिक राष्ट्र बन गए। हालांकि साम्यवादी विचारकों की यह लाचारीभरी सीमा है कि वे रूस या चीन की कट्टरता को उग्र राष्ट्रवाद नहीं कह सकते।

दुनिया नस्ली और मजहबी कट््टरपंथ में न बंटे, यह हर उस व्यक्ति का लक्ष्य होना चाहिए जो समता का समाज चाहता है। देश और दुनिया के मुसलिम समुदाय के लोगों से अपील की जानी चाहिए कि वे इन बातों को आरोप या सफाई के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि दुनिया के भविष्य और अपने मजहबी दर्शन की कसौटी पर देखें। इस्लामिक फोबिया को समाप्त करने का सामूहिक कदम उठाएं। यह कटु सत्य है कि आज इस्लामिक राष्ट्र अपने आप आतंकवाद और अंत:संघर्षों से पीड़ित हैं, और एक धर्म वाले ही अपने धर्म वालों को मार रहे हैं। पर इसका हल भी उन्हें ही खोजना होगा।

(रघु ठाकुर)

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