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सुरक्षित निवेश के सिमटते दायर

भारत जैसे विकासशील देश में अधिकांश लोग आज भी पारंपरिक जमा के हिमायती हैं। वे अपनी बचत बैंक और डाकघरों में रखना चाहते हैं।
Author September 25, 2017 05:19 am
इस तस्वीर का इस्तेमाल खबर की प्रस्तुतीकरण के लिए किया गया है।

मौद्रिक समीक्षा में केंद्रीय बैंक ने रेपो दर को कम करके पिछले दिनों छह प्रतिशत कर दिया। इसके तुरंत बाद भारतीय स्टेट बैंक ने बचत खाते में दिए जा रहे ब्याज दर को चार से घटाकर 3.5 प्रतिशत कर दिया। दूसरे निजी और सरकारी बैंकों ने भी बचत खाते पर दिए जा रहे ब्याज दर में कटौती की। निजी क्षेत्र के एचडीएफसी और आईसीआईसीआई जैसे दिग्गज बैंकों का नाम भी इसमें शामिल है। बैंकों द्वारा ऐसा करना लाजिमी था, क्योंकि रेपो दर में कटौती करने से बैंकों के पास सस्ती पूंजी की उपलब्धता में बढ़ोतरी हुई, जबकि नोटबंदी के कारण लगभग तीन लाख करोड़ रुपए बैंकों के पास पहले से ही अतिरिक्त रखे हैं।

कर्ज वितरण में नोटबंदी के बाद से सुस्ती का रुख बना हुआ है। बैंकों के पास उपलब्ध सस्ती पंूजी को स्थायी माना जा सकता है। इसलिए बैंकों पर कर्ज ब्याज दर में कटौती करने का दबाव बना हुआ है, ताकि कर्ज की मांग में इजाफा हो। ऐसा माना जा रहा है कि कर्ज दर में कटौती करने से कारोबारी कर्ज लेने के लिए प्रेरित होंगे और औद्योगिक गतिविधियों में तेजी आएगी। आमतौर पर बैंक कर्ज दर में कटौती जमा और कर्ज ब्याज दर के बीच के अंतर में सामंजस्य बनाने के लिए किया जाता है। इसी नीति के तहत बैंकों द्वारा कर्ज दर और जमा ब्याज दर में कटौती की जाती है या फिर बढ़ोतरी।

इस स्थिति को स्थायी नहीं माना जा सकता। कर्ज की मांग बढ़ने पर फिर से बचत खाते के ब्याज दर में बढ़ोतरी की जा सकती है। जमा दर में बीते सालों से लगातार कमी आ रही है। ऐसा भी नहीं कहा जा सकता है कि ताजा कटौती के बाद जमा ब्याज दर में कटौती नहीं की जाएगी, क्योंकि नोटबंदी के बाद से औद्योगिक क्षेत्र में सुस्ती बनी हुई है। छोटे बैंक जैसे, आईडीएफसी, आरबीएल, यस बैंक, कोटक महिंद्रा, इंडसइंड बैंक, डीसीबी,देना बैंक आदि को अभी भी पूंजी की जरूरत है। इसलिए वे जमा पर आकर्षक ब्याज दर की पेशकश कर रहे हैं। कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) और सार्वजनिक भविष्य निधि (पीपीएफ) भी मौजूदा माहौल में आकर्षक ब्याज दे रहे हैं। ईपीएफ में 8.65 प्रतिशत तो पीपीएफ में 7.8 प्रतिशत का प्रतिफल दिया जा रहा है। इन पर मिलने वाला ब्याज करमुक्त होने के कारण आकर्षक है।

वरिष्ठ नागरिक बचत योजना (एससीएसएस) भी आज की तारीख में निवेश का एक अच्छा विकल्प है, क्योंकि इसमें 8.3 प्रतिशत की दर से ब्याज दिया जा रहा है। इसमें पांच साल के लिए अधिकतम पंद्रह लाख रुपए, पत्नी के साथ तीस लाख रुपए तक निवेश किया जा सकता है। पीएमवीवीवाई भी निवेश का एक बढ़िया विकल्प है। इस योजना के तहत दस सालों तक हर महीने आठ प्रतिशत की दर से ब्याज दिया जाता है। इसमें वार्षिक प्रभावी ब्याज दर 8.30 प्रतिशत है। इसमें निवेश की अधिकतम सीमा 7.5 लाख रुपए रखी गई है। डाकघर मासिक आय योजना में ब्याज दर घटकर 7.5 प्रतिशत रह गया है, लेकिन बदली परिस्थिति में इसे बेहतर ही कहा जा सकता है। इसमें 4.5 लाख रुपए और पत्नी के साथ मिलकर नौ लाख रुपए तक निवेश किया जा सकता है।

भारत जैसे विकासशील देश में अधिकांश लोग आज भी पारंपरिक जमा के हिमायती हैं। वे अपनी बचत बैंक और डाकघरों में रखना चाहते हैं। जमा पर कम होते जा रहे ब्याज के माहौल में सवाल का उठना लाजिमी है कि आम आदमी अपना पैसा कहां निवेश करे। हमारे देश में बचत के दूसरे भी विकल्प हैं, लेकिन उनमें निवेश जोखिम भरा है और लोग जोखिम लेने के लिए तैयार नहीं हैं। दूसरी तरफ देश के अधिकांश लोग वित्तीय रूप से साक्षर नहीं हैं। लिहाजा, निवेशक के नए विकल्पों में निवेश करने के लिए विविध फंडों की चाल को समझना आवश्यक है। ऐसे में निवेश सलाहकार की अहमियत बढ़ जाती है, लेकिन विश्वसनीय निवेश सलाहकार की देश में भारी कमी है और जो उपलब्ध हैं उनकी सेवा लेने की क्षमता बहुत ही कम लोगों में है।

नए विकल्पों में कर मुक्त बांडों में निवेश किया जा सकता है। द्वितीयक बाजार से बांड खरीदना भी बेहतर विकल्प हो सकता है, जिसपर आमतौर पर 5.9 से 6 प्रतिशत कर मुक्त ब्याज दिया जाता है। करमुक्त होने के कारण निवेशक को इसमें ज्यादा लाभ मिलता है। भारत सरकार का आठ प्रतिशत ब्याज वाला बांड भी निवेश का एक अच्छा विकल्प बन सकता है। अगर निवेश करने वाले ज्यादा जोखिम नहीं लेना चाहते हैं तो वे डेट फंड में निवेश कर सकते हैं। डेट फंड में पांच साल या इससे अधिक समय के लिए निवेश करना ज्यादा लाभकारी है। डेट फंड में पहली बार निवेश करने वाले निवेशकों को अच्छी रेटिंग वाली प्रतिभूतियों में निवेश करना चाहिए, क्योंकि बेहतर रेटिंग वाली प्रतिभूति में निवेश करने पर नुकसान की गुंजाइश कम होती है। इक्विटी म्युचुअल फंडों में निवेश वित्तीय सलाहकार की मदद से करनी चाहिए।

बैलेंस्ड और इक्विटी फंडों में भी पांच साल या इससे अधिक समय के लिए निवेश करना बेहतर है। नए निवेशक शुरू में उन फंडों में निवेश करें, जिनका इक्विटी में कम निवेश हो। नए निवेशकों को मासिक आय योजना, इक्विटी बचत योजना, बैलेंस एडवांटेज फंड आदि में निवेश करना चाहिए। बाद में बैलेंस्ड फंड निवेश का एक अच्छा विकल्प हो सकता है। ऐसे निवेश पर धारा 80 सी के तहत आयकर में लाभ दिया जाता है। केंद्रीय बैंक और सरकार दोनों मिलकर सरकारी बैंकों की पूंजी की समस्या का जल्द से जल्द हल निकालना चाहते हैं। सात-आयामी इंद्रधनुष रणनीति के तहत वित्त वर्ष 2018-19 तक बैंकों को पुनर्पूंजीकरण के लिए सत्तर हजार करोड़ देने का प्रस्ताव है। इस क्रम में वित्त वर्ष 2015-16 और वित्त 2016-17 में क्रमश: पच्चीस हजार करोड़ रुपए बैंकों को दिए जा चुके हैं। चालू वित्त वर्ष में बैंकों को दस हजार करोड़ रुपए दिया जाना है।

गैरनिष्पादित आस्तियां (एनपीए) ने सरकारी बैंकों के मुनाफे में जबर्दस्त सेंध लगाया है और बैंक पूंजी के अभाव में ऋण वितरण का कार्य नहीं कर पा रहे हैं। माना जा रहा है कि समान तरह के प्रदर्शन करने वाले बैंकों के विलय से एनपीए के समाधान की रणनीति को अमलीजामा पहनाने में आसानी होगी। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का सकल एनपीए जून 2015 में 2,80,637 करोड़ रुपए था, जो 2016 में बढ़कर 5,60,841 करोड़ रुपए हो गया और जून 2017 में बढ़कर यह 7,38,776 करोड़ रुपए पर पहुच गया। सभी बैंकों का एनपीए पिछले साल कुल बैंक ऋण का दसवां हिस्सा था, जिसमें से बड़ा हिस्सा सरकारी बैंकों का है। इसमें से कुछ बैंकों का एनपीए अनुपात इस क्षेत्र के औसत से बहुत ही ज्यादा है।

आज एनपीए के कारण ही उद्योग जगत में मंदी की स्थिति बनी हुई है। ऋण वितरण में जब तक तेजी नहीं आएगी, स्थिति में सुधार नहीं होगा। बेहतरी के लिए ही सरकारी बैंकों का एकीकरण किया जा रहा है। इस क्रम में बैंकों में प्रशासनिक सुधार का भी प्रस्ताव है। इससे इस तरह की समस्याओं की पुनरावृति को रोका जा सकेगा। इस आलोक में बैंकों को पूंजी उपलब्ध कराने के साथ-साथ उन्हें बाजार से पूंजी उगाहने, बैंकों में सरकारी हिस्सेदारी को कम करने और बैंकों की संपत्तियों का समीचीन इस्तेमाल करने आदि उपायों का सहारा भी सरकार को लेना होगा। ज्यादा आजादी मिलने पर ही बैंक बिना किसी दबाव के बेहतर तरीके से कार्य कर सकेंगे। सरकारी बैंक एनपीए को नियंत्रित करने में असफल रहे हैं। बैंकों की मौजूदा समस्याओं का निवारण किए बिना बचत खाते के ब्याज दर में बढ़ोतरी नहीं की जा सकती है, क्योंकि ऐसा करने के लिए बैंकों को कर्ज वितरण में तेजी लानी होगी, जो बैंकों का स्वास्थ ठीक रहने पर ही संभव हो सकता है।

 

 

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