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राजनीति: कावेरी के पानी में लगी आग

तमिलनाडु ने कम बारिश के कारण राज्य में पैदा हुई दयनीय स्थिति को उजागर करते हुए कहा था कि प्रदेश की चालीस हजार एकड़ जमीन में फसल बर्बाद हो रही है, इसलिए उसे तुरंत पानी की जरूरत है।

Author नई दिल्ली | Published on: September 12, 2016 11:06 PM
कावेरी नदी।

नदियों के जल बंटवारे और बांधों की ऊंचाई से जुड़े अंतर-राज्यीय विवाद अब राज्यों की वास्तविक जरूरतों से वास्ता नहीं रखते, इसके बजाय ये सस्ती लोकप्रियता हासिल करने और वोट बैंक की राजनीति का शिकार होते जा रहे  हैं। कावेरी का विवाद राज्यों के बीच इकलौता जल विवाद नहीं है, इस तरह के कई और विवाद हैं।

कर्नाटक और तमिलनाडु की जीवनरेखा मानी जाने वाली नदी कावेरी के जल को लेकर दोनों राज्यों में एक बार फिर विवाद गहरा गया है। दरअसल, तमिलनाडु में इस साल कम बारिश होने के कारण पानी की जबर्दस्त किल्लत है। इस समस्या के तात्कालिक समाधान के लिए तमिलनाडु ने सर्वोच्च न्यायालय से पानी देने की गुहार लगाई थी। तमिलनाडु ने कम बारिश के कारण राज्य में पैदा हुई दयनीय स्थिति को उजागर करते हुए कहा था कि प्रदेश की चालीस हजार एकड़ जमीन में फसल बर्बाद हो रही है, इसलिए उसे तुरंत पानी की जरूरत है। इस बाबत अदालत ने दो सितंबर को कर्नाटक सरकार को ‘जियो और जीने दो’ की तर्ज पर पंद्रह हजार क्यूसेक पानी रोजाना दस दिन तक तमिलनाडु को देने का आदेश दिया। इस आदेश के जारी होने के बाद कर्नाटक में मंड्या, मैसूर व हासन सहित कई जिलों में उग्र विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हो गया।

बंगलुरु-मैसूर हाइवे जाम कर दिया गया। हिंसा पर आमादा लोगों को खदेड़ने के लिए पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा। हालात से निपटने के लिए प्रशासन को केंद्रीय सुरक्षा बल भी लगाने पड़े। इसके उलट तमिलनाडु सरकार का कहना है कि पंद्रह हजार क्यूसेक पानी हमारे लिए पर्याप्त नहीं है। किसान संगठनों ने भी पानी की मात्रा बढ़ाने के लिए शीर्ष न्यायालय जाने की मांग उठा दी। भारत में नदियों के जल का बंटवारा, बांधों का निर्माण और राज्यों के बीच उनकी हिस्सेदारी एक गंभीर व अनसुलझी रहने वाली समस्या का रूप धारण किए हुए है। इसका मुख्य कारण नदी जैसे प्राकृतिक संसाधन के समुचित, तर्कसंगत उपयोग की जगह राजनीतिक और सतही भावनात्मक मुद््दे की तरह इस्तेमाल करना है। कर्नाटक में जल विवाद के सामने आते ही पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा ने क्षेत्रवादी मानसिकता का परिचय देते हुए इस मुद््दे को गरमाना शुरू कर दिया। उन्होंने कहा कि ‘इस मुद््दे पर लड़ाई जीतने के लिए राजनीतिक पार्टियों व जनता को एकजुट होना होगा।’ यही नहीं, सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी नाराजगी जताते हुए देवगौड़ा ने कहा है, ‘तमिलनाडु के किसान एक साल में तीन फसल उगा रहे हैं, जबकि कर्नाटक के पास एक फसल के लिए भी पानी नहीं है। ऐसे में उन्हें पानी देना कैसे संभव है। इसके विरोध में हमें तमिलनाडु के लोगों की तरह एकजुट होना होगा।’

देश का प्रधानमंत्री रह चुका व्यक्ति भी जब किसी विवाद को सुलझाने के बजाय क्षेत्रीयता के आधार पर लोगों को उकसाने की बात करे तो भला विवाद कैसे सुलझेगा! ऐसी ही एकपक्षीय धारणाओं की वजह से कर्नाटक-तमिलनाडु के बीच कावेरी जल विवाद आजादी के पहले से ही चला आ रहा है और लगता है स्थायी रूप ले चुका है। इसे हल करने की खातिर बने पंचाट (ट्रिब्यूनल)के फैसले के मुताबिक कर्नाटक, तमिलनाडु व पांडिचेरी के लिए कावेरी के पानी के उपयोग व उसकी बचत की मात्रा तय कर दी गई है, लेकिन कोई भी पक्ष इसे मान नहीं रहा है। नतीजतन, दशकों से यह विवाद अदालती लड़ाई में फंसा है।

दक्षिण भारत की गंगा मानी जाने वाली कावेरी नदी कर्नाटक तथा उत्तरी तमिलनाडु में बहने वाली जीवनदायी सदानीरा नदी है। यह पश्चिमी घाट के ब्रह्मगिरी पर्वत से निकली है। यह आठ सौ किलोमीटर लंबी है। इसके आसपास के दोनों राज्यों के हिस्सों में खेती होती है। तमिल भाषा में कावेरी को ‘पोन्नी’ कहते हैं। पोन्नी का अर्थ सोना उगाना है। दोनों राज्यों की स्थानीय आबादी में ऐसी लोकमान्यता है कि कावेरी के जल में धूल के कण मिले हुए हैं। इस लोकमान्यता को हम इस अर्थ में ले सकते है कि कावेरी के पानी से जिन खेतों में सिंचाई होती है उन खेतों से फसल के रूप में सोना पैदा होता है। इसीलिए यह नदी कर्नाटक और तमिलनाडु की कृषि आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मूलाधार है। ब्रह्मगिरी पर्वत कर्नाटक के कुर्ग क्षेत्र में आता है, जो कर्नाटक के अस्तित्व में आने से पहले मैसूर राज्य में था। यहीं से यह नदी (पूर्व) मैसूर राज्य को सिंचित करती हुई दक्षिण पूर्व की ओर बहती हुई तमिलनाडु में प्रवेश करती है और फिर इस राज्य के बड़े भू-भाग को सिंचित करती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती है।

1892 व 1924 में मैसूर राज्य व मद्र्रास प्रेसिडेंसी (वर्तमान तमिलनाडु) के बीच जल बंटवारे को लेकर समझौते हुए थे। आजादी के बाद मैसूर का कर्नाटक में विलय हो गया। इसके बाद से कर्नाटक को लगने लगा कि मद्र्रास प्रेसिडेंसी पर अंग्रेजों का प्रभाव अधिक था, इसलिए समझौता मद्रास के पक्ष में किया गया है। लिहाजा वह इस समझौते को नहीं मानता है। जबकि तमिलनाडु का तर्क है कि पूर्व समझौते के मुताबिक उसने ऐसी कृषियोग्य भूमि विकसित कर ली है जिस पर खेती कावेरी से मिलने वाले पानी के बिना संभव ही नहीं है। इस बाबत 1986 में तमिलनाडु ने विवाद के निपटारे के लिए केंद्र सरकार से एक (ट्रिब्यूनल) बनाने की मांग की। नदी विवाद जल अधिनियम के तहत 1990 में न्यायाधिकरण बनाया गया। इस न्यायाधिकरण ने कर्नाटक को तमिलनाडु के हिस्से का पानी देने का आदेश दिया। पर कर्नाटक ने इस आदेश को मानने से इनकार करते हुए कहा कि कावेरी पर हमारा पूरा हक है, इसलिए हम पानी नहीं देंगे।

कर्नाटक का तर्क है कि अंग्रेजी राज के दौर में कुर्ग मैसूर रियासत का हिस्सा था, और तमिलनाडु मद्र्रास प्रेसिडेंसी के रूप में फिरंगी हुकूमत का गुलाम था। लिहाजा, 1924 के फैसले को सही नहीं ठहराया जा सकता। हालांकि न्यायाधिकरण के फैसले और अदालत के हस्तक्षेत्र के चलते कर्नाटक मजबूरीवश तमिलनाडु को पानी दे रहा है, लेकिन ऐसा करने की उसकी मंशा कतई नहीं है। यह पानी कर्नाटक में कावेरी नदी पर बने कृष्ण-राजा सागर बांध से तमिलनाडु के लिए दिया जाता है।
दरअसल, भारत में नदियों के जल बंटवारे और बांधों की ऊंचाई से जुड़े अंतर-राज्यीय विवाद अब राज्यों की वास्तविक जरूरतों से वास्ता नहीं रखते, इसके बजाय ये सस्ती लोकप्रियता हासिल करने और वोट बैंक की राजनीति का शिकार होते जा रहे हैं। कावेरी का विवाद राज्यों के बीच इकलौता जल विवाद नहीं है, इस तरह के कई और विवाद दशकों से चले आ रहे हैं। मसलन, तमिलनाडु व केरल के बीच भी मुल्ला पेरियार बांध की ऊंचाई को लेकर विवाद चला आ रहा है। तमिलनाडु इस बांध की ऊंचाई 132 फुट से बढ़ा कर 142 फुट करना चाहता है, वहीं केरल इसकी ऊंचाई कम रखना चाहता है। इस परिप्रेक्ष्य में केरल का दावा है कि यह बांध खतरनाक है, इसीलिए इसकी जगह नया बांध बनना चाहिए। जबकि तमिलनाडु ऐसे किसी खतरे की आशंका को सिरे से खारिज करता है।

गौरतलब है कि पेरियार नदी पर बना यह बांध 1895 में अंग्रेजों ने मद्रास प्रेसिडेंसी को 999 साल के पट्टे पर दिया था। जाहिर है, अंग्रेजों ने अपने शासन काल में अपनी सुविधा और जरूरत के मुताबिक बांधों का निर्माण व अन्य विकास कार्य किए। लेकिन स्वतंत्र भारत में उन कार्यों, फैसलों और समझौतों की राज्यों की नई भौगोलिक सीमा व संबंधित राज्य में रहने वाली जनता की सुविधा व जरूरत के हिसाब से पुनर्व्याख्या करने की जरूरत है। क्योंकि अब राज्यों के तर्क वर्तमान जरूरतों के हिसाब से सामने आ रहे हैं। इस लिहाज से केरल का तर्क है कि इस पुराने बांध की उम्र पूरी हो चुकी है, लिहाजा यह कभी भी टूट कर धराशायी हो सकता है।

अब इस आशंका की तकनीकी समीक्षा हो और अगर आशंका निर्मूल हो तो जनता को जागरूक करने की जरूरत है। इस परिप्रेक्ष्य में तमिलनाडु को अंदेशा है कि केरल जिस नए बांध के निर्माण का प्रस्ताव रख रहा है, तो यह जरूरी नहीं कि वह तमिलनाडु को पूर्व की तरह पानी देता रहेगा। इसलिए प्रस्ताव में दोनों राज्यों के हितों से जुड़ी शर्तों का पहले अनुबंध हो, तब बांध को तोड़ा जाए। केरल के सांसदों ने राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन से भी इस मसले पर हस्तक्षेप करने की अपील की है। पंजाब में रावी व ब्यास नदी के जल बंटवारे पर पंजाब और हरियाणा पिछले कई दशकों से अदालती लड़ाई लड़ रहे हैं। इनके बीच दूसरा जल विवाद सतलुज और यमुना लिंक का भी है। प्रस्तावित योजना के तहत सतलुज और यमुना नदियों को जोड़ कर नहर बनाने से पूर्वी व पश्चिमी भारत के बीच अस्तित्व में आने वाले जलमार्ग से परिवहन की संभावना बढ़ जाएगी। इस मार्ग से जहाजों के द्वारा सामान की ढुलाई शुरू हो जाएगी। सड़क के समांतर जलमार्ग का विकल्प खुल जाएगा। हरियाणा ने तो अपने हिस्से का निर्माण कार्य पूरा कर लिया है, लेकिन पंजाब को इसमें कुछ नुकसान नजर आया तो उसने विधानसभा में प्रस्ताव लाकर इस समझौते को ही रद््द कर दिया। यह मामला भी अदालत में है।

इसी तरह कर्नाटक, महाराष्ट्र और गोवा राज्यों के बीच महादयी नदी के जल बंटवारे को लेकर दशकों से विवाद जारी है। गौरतलब है कि न्यायाधीश जेएम पंचाल व महादयी नदी जल न्यायाधिकरण ने तीनों राज्यों को सलाह दी है कि जल बंटवारे का हल परस्पर बातचीत व किसी तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप के बगैर सुलझाएं। यह मसला सुलझता है या नहीं, यह तो बातचीत के नतीजे सामने आने के बाद पता चलेगा। बहरहाल, अंतरराज्यीय जल विवादों का राजनीतिकरण होता रहा तो ये कभी सुलझ पाएंगे, कहना मुश्किल ही है।

 

 

 

 

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