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अकथ कहानी खेत की

आंदोलन से निपटने के लिए सरकार को ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ पर केवल तुअर, मूंग और उड़द खरीदने और आठ रुपए किलो में प्याज खरीदने और फिर भंडारण की कमी के चलते सड़ाने की तजवीज भर नजर आई।
Author July 3, 2017 05:03 am
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है। (इंडियन एक्सप्रेस ग्राफिक्स)

राकेश दीवान  

जून महीने के बीस दिनों में हुर्इं चालीस से अधिक किसानों की आत्महत्याओं का किसी के पास कोई जवाब नहीं है। किसान आंदोलन से निपटने के लिए सरकार को ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ पर केवल तुअर, मूंग और उड़द खरीदने और आठ रुपए किलो में प्याज खरीदने और फिर भंडारण की कमी के चलते सड़ाने की तजवीज भर नजर आई। आज भी किसानी ‘अन-स्किल्ड’ यानी अकुशल श्रम भर मानी जाती है और नतीजतन कुशल श्रमिकों की मजदूरी खेती-पाती में लगे मजदूरों के मुकाबले डेढ़ से दो गुनी तक है। केंद्र से प्राप्त होने वाले ‘उपभोक्ता मूल्य सूचकांक’ के आधार पर इसकी गणना करके हर छह महीने पर- अप्रैल और अक्टूबर में- राज्य सरकारें इसे घोषित भी करती है। ‘न्यूनतम मजदूरी’ के नाम से पहचानी जाने वाली मजदूरी दरअसल अकुशल श्रमिकों की मजदूरी मानी जाती है जिसे ‘अकुशल कृषि मजदूरी’ कहा जाता है। इसी तरह पिछले पैंतालीस सालों का लेखा-जोखा करें तो खुलासा होता है कि जहां किसानों की आय में 19 गुने की वृद्धि हुई है, वहीं कर्मचारियों और दूसरे व्यवसायियों की आय में 120 से 150 गुनी वृद्धि दर्ज की गई है। अलबत्ता, इन कारनामों के साथ-साथ तीन साल के सतत सूखे और करीब तीन लाख करोड़ रुपयों के कर्जों के दबाव के बावजूद देश के किसान 2016-17 में करीब 27 करोड़ मीट्रिक टन अनाज की पैदावार कैसे कर देते हैं, क्या यह हमारे नीति-नियंताओं, राजनेताओं को दिखाई नहीं देना चाहिए?

किसान और किसानी के नाम पर सिर्फ कृषि से जुडेÞ उद्योगों ने, संकट के सालों में भी, मुनाफा काटा है। वर्ष 2016-17 में खाद बनाने वाली तीन सबसे बड़ी कंपनियों ने 1255 करोड़ रुपयों का मुनाफा कमाया था, जो पिछले साल के मुकाबले सैंतीस फीसद ज्यादा था। कीटनाशकों की तीन सबसे बड़ी कंपनियों ने पिछले साल के मुकाबले तेईस प्रतिशत ज्यादा यानी 900 करोड़ रुपयों का मुनाफा कमाया था। इसी तरह तीन सबसे बड़ी ट्रैक्टर बनाने वाली कंपनियों ने 5300 करोड़ रुपयों का और तीन सबसे बड़ी बीज उत्पादककंपनियों ने 85 करोड़ रुपयों का फायदा कमाया था। संकटग्रस्त खेती तक से भारी मुनाफा कमाने वाले इन कृषि उद्योगों के बरक्स केवल पचास हजार से पांच लाख का कर्ज न चुका पाने के कारण किसान आत्महत्या कर लेते हैं। पिछले बाईस सालों में देश के करीब सवा तीन लाख किसानों ने खुदकुशी है। इनमें सिर्फ एक साल, 2015 में, मध्यप्रदेश के 1290 किसानों ने खुदकुशी की।

हमारे नीति नियंता और अधिकतर अर्थशास्त्री खेती के संकट से निपटने के लिए उत्पादन बढ़ाने पर जोर देते हैं। वे किसानों के लिए, बस कृषि विकास दर के लिए चिंतित रहते हैं। इसके लिए वे ‘जीन संवर्धित’ (जीएम) बीजों, दलहन, फल, फूल जैसे तरह-तरह के अभियानों से उत्पादन में बढ़ोतरी की मुहिम चलाते हैं। मध्यप्रदेश भी इस नीति से अछूता नहीं है, लेकिन क्या वह देख पा रहा हैं कि देश के अन्न-भंडारों का अधिकांश हिस्सा भरने और दुनिया में सर्वाधिक (98 प्रतिशत) सुनिश्चित सिंचाई वाला पंजाब खुद किसान आत्महत्याओं में अव्वल पांच राज्यों में शुमार हो चुका है। पंजाब के 86 प्रतिशत किसान और 80 प्रतिशत खेत मजदूर भारी कर्जों के बोझ तले दबे हैं। गेहूं और धान का सर्वाधिक उत्पादन करने वाला पंजाब कैंसर और मधुमेह की चपेट में है। पंजाब की कृषिभूमि की उर्वरता तेजी से घटती जा रही है। भोपाल स्थित केंद्रीय मृदा संस्थान के अध्ययनों के अनुसार, पंजाब के कई इलाकों की आधी मिट्टी बंजर हो गई है। अब क्या अन्य राज्यों को पंजाब बनाने का सपना दिखाया जा सकता है?
कृषि संकट से निपटने के लिए आमतौर पर ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (एमएसपी) की तजवीज पेश की जाती है। हाल के किसान आंदोलन से निपटने के लिए भी गर्मी की मूंग, उड़द और तुअर को समर्थन मूल्य पर खरीदने की घोषणा की गई थी। लेकिन क्या ‘कृषि लागत एवं मूल्य आयोग’ (सीएसीपी) द्वारा निर्धारित किए गए न्यूनतम समर्थन मूल्य से किसानों का संकट दूर हो सकेगा? साठ के दशक में भारी लागत से भारी पैदावार वाली ‘हरित क्रांति’ हुई थी। इसके चलते अनाज की कीमतें कम होने लगी थीं और तब सरकार ने एमएसपी लागू करने का तय किया था। इससे अपेक्षा थी कि अधिक पैदावार की वजह से कम होती कीमतों से किसानों को नुकसान नहीं होने दिया जाएगा। हरित क्रांति को आधी से अधिक सदी बीत जाने के बाद भारतीय खाद्य निगम की पड़ताल के लिए गठित शांताकुमार समिति ने बताया है कि अब 22 फसलों की कीमत तय करने वाला एमएसपी बस छह प्रतिशत किसानों को लाभ पहुंचाता है। तो फिर बाकी के 94 प्रतिशत किसान क्या करते हैं?

एमएसपी की कमी-बेशी की पड़ताल करने की खातिर गठित डॉ रमेशचंद्र समिति ने किसानी को कुशल श्रम मान कर उसके जोखिम और प्रबंधन पर होने वाले खर्चों को इसमें जोड़ने की सिफारिश की थी। फसल कटने के बाद होने वाले उड़ावनी, बिनाई, ढुलाई आदि के खर्चों को भी इसमें जोड़ा जाना चाहिए। फिलहाल इन्हें मौजूदा एमएसपी में शामिल नहीं किया जाता। हर ब्लॉक के कम-से-कम दो गांवों की वास्तविक स्थिति को आधार बना कर कृषि मूल्य निर्धारण को पूरी तरह पारदर्शी बनाया जाए। जो लोग कृषि विकास दर को ही रामबाण मान बैठे हैं उन्हें मध्यप्रदेश के उदाहरण से कुछ सीख लेनी चाहिए। मध्यप्रदेश बरसों से देश में सर्वाधिक कृषि विकास दर वाला राज्य है। इसे पांच बार कृषि कर्मण अवार्ड मिल चुका है। फिर भी इस राज्य के किसानों की हालत क्या है, यह अभी हुए किसान आंदोलन और किसानों की खुदकुशी के सिलसिले ने बता दिया है। किसानों की खुदकुशी का सिलसिला लगातार जारी है। जब तक खेती घाटे का धंधा रहेगी, कृषि की ऊंची विकास दर से किसानों का कोई भला होने वाला नहीं है। अधिक पैदावार तभी किसानों के लिए खुशहाली ला सकती है जब पैदावार का वाजिब दाम मिले। अभी तो हालत यह है कि जब सूखा, बाढ़, ओलावृष्टि या कीट प्रकोप से फसल मारी जाती है तब तो किसान मुसीबत में होता ही है, क्योंकि उसके पास बेचने को कुछ नहीं होता। मगर जब पैदावार अच्छी होती है तब भी किसान खुद को ठगा गया महसूस करता है क्योंकि उसकी पैदावार का वाजिब दाम नहीं मिल पाता है। कई बार लागत भी नहीं निकल पाती है। विडंबना यह भी है कि ऊंची कृषि विकास दर वाला मध्यप्रदेश कुपोषण में भी अव्वल है।

वर्ष 1996 में विश्व बैंक ने कृषिजीवियों की संख्या घटाने और उन्हें शहरों की तरफ स्थानांतरित करने की सलाह दी थी। इसके मुताबिक गांवों में बसी देश की करीब चौहत्तर प्रतिशत आबादी में से चालीस करोड़ को शहरों की ओर खदेड़ा जाना है। 2008 में विश्व बैंक ने फिर से अपनी यह सलाह दोहराई थी। किसानों की मदद की बात उठते ही ‘वित्तीय घाटे’ का रोना रोने वाले अर्थशास्त्री, नौकरशाह और अपनी-अपनी दुनिया में गाफिल राजनेता किसानी को कितना बचा पाएंगे, यह ताजा अनुभवों की बिना पर तो कहना मुश्किल है। कृषिभूमि पर निर्भर लोगों की तादाद घटाने की सलाह वहां मायने रखती है जहां जहां गैर-कृषि कार्यों और शहरों में रोजगार की काफी संभावनाएं हों। यहां तो हालत यह है कि शहरों के पास सबके लिए रोजगार तो दूर, सिर छिपाने के लिए साफ-सुथरी जगह देने का भी बंदोबस्त नहीं है। मुंबई और दिल्ली की झुग्गियां इस बात की गवाह हैं। शहरों की तरफ ग्रामीण आबादी के पलायन में हल देखना असल में खेती-किसानी के असल सवालों से पलायन करना है।

 

 

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