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विकास के लिए चाहिए नैतिक आधार

गरीब और धनी देशों के बीच मूल अंतर एक ही दिखता है, और वह है अपने काम के प्रति मनोवृत्ति या दृष्टिकोण का।
Author September 26, 2017 06:01 am
वाराणसी में विभिन्‍न कार्यक्रमों में सम्मिलित होते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (Photo: BJP/Twitter)

गिरीश्वर मिश्र

इधर इस बात की चर्चा काफी गर्म है कि अगले कुछ दशक में भारत चीन से विकास के मामले में बाजी मार सकता है क्योंकि इस बीच यहां की जनसंख्या में युवा आयु वर्ग के लोगों का अनुपात अधिक होगा और चीन में वृद्धों की संख्या ज्यादा होगी। इस लाभकारी स्थिति का फायदा मिल सके इसके लिए कौशलयुक्त और सुशिक्षित मानव संसाधन की जरूरत होगी। अर्थात इस अवसर का लाभ उठाने के लिए देश के मानव संसाधन के विकास पर खासतौर पर ध्यान केंद्रित करना होगा।  ‘विकास’ शब्द हमारे मन में घर कर गया है और आए दिन विकसित होने के लिए नुस्खे दिए जाते हैं। गौरतलब है कि किस सरकार के जमाने में कितना विकास हुआ इसके दावे को लेकर एक दूसरे पर दोषारोपण करने वाले पोस्ट आजकल सोशल मीडिया में खूब प्रचारित किए जा रहे हैं। उनकी सच्चाई की व्याख्या विवाद में ही रहेगी, लेकिन संचार तंत्र के हर माध्यम में आजकल जो शब्द गूंज रहे हैं और चित्र तिरते दिख रहे हैं उनमें आम आदमी को राहत नहीं दिखती न मन को भरोसा मिलता है। किसी दिन का कोई-सा अखबार, वह चाहे जिस भी क्षेत्र का हो, उठा लें तो उद््घाटन और लोकार्पण के अलावा ज्यादातर खबरें एक-सी ही मिलेंगी जिनमें नैतिकता में सेंधमारी ही प्रमुख होती है, हालांकि उसके तौर-तरीके भिन्न हो सकते हैं। किसी भी दिन के अखबार में प्रकाशित समाचारों की संख्या की गिनती करें तो झूठ, फरेब, बेईमानी, विश्वासघात, दुष्कर्म, चोरी, हत्या, बलात्कार, धोखाधड़ी, दबंगई आदि की घटनाओं का ही पलड़ा भारी मिलेगा।

यदि अखबार को समाज का दर्पण कहें तो मुश्किल बढ़ जाती है क्योंकि इन घटनाओं की न केवल संख्या बढ़ रही है बल्कि इनके लिए आरोपों की सूची में मंत्री, अफसर, मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, आइजी, न्यायमूर्ति और सेना के बड़े अधिकारी, सीबीआइ निदेशक, साधू, संत, बाबा, प्राध्यापक कोई भी छूटता नहीं दिख रहा है। समाज के कमोबेश हर तबके का प्रतिनिधित्व इन घटनाओं में मिलेगा। हालत यह है कि जीवन-मरण तक का सौदा हो रहा है। कचहरी तो कचहरी ठहरी, अब अस्पताल भी बूचड़खाने होते जा रहे हैं। अस्पताल में आक्सीजन और वेंटिलेटर न मिलने की खबरें लगातार आ रही हैं। और तो और, बड़े अस्पतालों में मृत व्यक्ति की झूठमूठ की दवा दिखा कर पैसा उगाहने की घटनाएं डॉक्टरी के पेशे को लज्जित कर रही हैं। लूटपाट, झपटमारी, चाकू मारना, वाहनों और मोबाइलों की चोरी, छोटी-छोटी बातों पर हिंसा में काफी इजाफा हो रहा है। दुर्घटनाओं की संख्या बढ़ रही है। गटर में सफाईकर्मियों की मौत, बस का सड़क से नीचे गिरना, सड़क पर हादसा, ट्रेन का पटरी से उतरना बढ़ता ही जा रहा है। दायित्व के प्रति प्रतिबद्धता, नियम-कानूनों का आदर और मानवीय मूल्यों की संवेदना की दृष्टि से तेजी से गिरावट दर्ज हो रही है। इस क्षोभजनक अवस्था में विकास एक दु:स्वप्न ही है, एक खयाली पुलाव।

विकसित देशों की ओर देखते हैं तो स्पष्ट हो जाता है कि वे गरीब नहीं हैं। वहां अच्छी शिक्षा की समुचित व्यवस्था है। लोगों द्वारा नियमों और कानूनों का पालन किया जाता है। नागरिक सुविधाएं उपलब्ध हैं। लोग खुशहाल हैं। जरूरी नहीं कि ये देश पुराने हों या फिर वहां किसी खास नस्ल के लोग रहते हों। या फिर वहां प्रकृति बड़ी मेहरबान हो। कुछ देशों की अनोखी उन्नति के उदाहरण सोचने पर मजबूर कर देते हैं। भारत और मिस्र (पुराना इजिप्ट)विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं के वारिस हैं, पर आर्थिक विकास और खुशहाली की दृष्टि से और तमाम देशों की तुलना में काफी नीचे हैं। दूसरी ओर, नए-नए देश जैसे कनाडा, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड, जिनका इतिहास कुल मिलाकर डेढ़ सौ साल से ज्यादा का नहीं है, आज आर्थिक प्रगति, शैक्षिक विकास और समृद्धि के हर पैमाने पर बहुत आगे हैं।

यह जरूरी नहीं कि किसी देश के पास विपुल प्राकृतिक संपदा हो तभी वह विकास कर सकेगा। अनेक विकसित देशों की स्थिति विकट है। इस मायने में जापान एक अनोखा ही देश है। उसके पास पर्याप्त भूमि भी नहीं है और काफी बड़ा हिस्सा, लगभग अस्सी प्रतिशत, तो पहाड़ी है। वे खुद बहुत कुछ पैदा करने की स्थिति में नहीं हैं, पर उनका विकास कमाल का है। पूरे विश्व से वे कच्चे माल का आयात करते हैं और अनेकानेक उत्पाद पैदा करते हैं और सारे संसार में निर्यात करते हैं। आज उनकी अर्थव्यवस्था पूरे संसार में दूसरे नंबर पर है। दूसरा उदाहरण स्विट्जरलैंड का है जो स्वयं अपने यहां तो कोक नहीं पैदा करता, पर पूरे विश्व में सर्वोत्तम चाकलेट बनाने के लिए विख्यात है। वहां पशुपालन होता है। खेती साल भर में सिर्फ चार महीनों में हो पाती है। पर सबसे बढ़िया किस्म के दुग्ध उत्पाद वहीं मिलते हैं। सबसे मजबूत बैंक भी उन्हीं का है।

गरीब और धनी देशों के बीच मूल अंतर एक ही दिखता है, और वह है अपने काम के प्रति मनोवृत्ति या दृष्टिकोण का। इस बारे में हुए अनेक अध्ययनों में ‘कार्य की केंद्रीयता’ एक महत्त्वपूर्ण मनोवृत्ति के रूप में उभर कर आई है। विकसित देशों में ज्यादातर लोग नैतिक मूल्यों पर भरोसा करते हैं और उन्हें सिर्फ कागजी न मान कर व्यावहारिक व उपयोगी मानते हैं। वे लोग अपने काम को, चाहे वह शारीरिक श्रम हो या बौद्धिक, बिना किसी शर्म या हीनता की भावना के, मुस्तैदी के साथ करते हैं। यह भी पाया गया है कि वे छोटे-बड़े हर काम को करने का आनंद भी उठाते हैं। दी गई हर छोटी जिम्मेदारी ठीक से निभाने में वे गौरव महसूस करते हैं और उसे व्यक्त भी करते हैं। सामान्य रूप से कार्य की कुशलता को ही कार्य के परिसर में प्रमुखता मिलती है, न कि लोग क्या कहते हैं या उनके बीच छवि क्या बनती है। इन देशों में नियम-कानूनों का पालन होता है, नागरिकों के अधिकारों का सम्मान किया जाता है, उनमें अपने काम के लिए बेहद प्यार होता है, काम सिर्फ काम होता है, उसमें किसी और चीज का घालमेल नहीं होता। आराम अलग है और समाजीकरण अलग। अक्सर बचत और निवेश करना उनकी आदत होती है।

अधिकतर विकसित देशों में काम के अलिखित नियमों में समय की पाबंदी (पंक्चुअल होना) खास होती है। सामाजिक जीवन में कथनी और करनी मेंस्वाभाविक रूप से संगति बनाई जाती है। वहां की व्यवस्थाओं में स्थिरता है और आम जनता इन आधारों पर चलने को सार्थक मान कर एक आधारभूत आचार संहिता में विश्वास करती है और बिना समझौते के अपने ऊपर लागू करती है। गरीब देशों में स्थिति इसके ठीक उलट है। यहां अधिकांश लोग जीवन में इन सब पर ध्यान नहीं देते और उदासीन रुख अपनाते हैं, क्योंकि यहां का आधारभूत विश्वास है ‘सब चलता है।’ हम गरीब इसलिए नहीं हैं कि प्राकृतिक संसाधन कम हैं या फिर प्रकृति कठोर है, फर्क है कार्य के प्रति मनोवृत्ति का। आज हर चीज के ऊपर हर व्यक्ति लाभ पाना चाहता है, चाहे वह कितना भी गलत क्यों न हो। हम नियमों का पालन करना अपनी प्रतिष्ठा के विरुद्ध मानते हैं। काम-धाम को लेकर एक किस्म की विशृंखलता फैल रही है, जिसमें काम खुद स्वाभाविक रूप से नहीं होता बल्कि ‘कराया जाता है’ और कुछ लोग ‘काम कराने के गुर’ जानते हैं। हम विश्वकर्मा जयंती तो मना लेंगे, पर कर्म की प्रतिष्ठा के लिए स्वयं को समर्पित नहीं करेंगे। एक विकसित राष्ट्र की कामना करते हुए कार्य-नैतिकता को बचपन से ही स्थापित करना होगा और स्कूल के स्तर से ही उसका अनुभव देना होगा।

 

 

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