ताज़ा खबर
 

‘आप’, वे और हम

उर्मिलेश आम आदमी पार्टी की राजनीतिक मामलों की समिति (पीएसी) से दो संस्थापक सदस्यों, प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव, के हटाए जाने के साथ पार्टी के आंतरिक विवाद की कहानी का अभी सिर्फ एक अध्याय लिखा गया। सांगठनिक विवाद की कहानी का अंत अभी बाकी है। एक पत्रकार के लिए यह भविष्यवाणी करना उचित नहीं […]

Author March 9, 2015 10:20 PM

उर्मिलेश

आम आदमी पार्टी की राजनीतिक मामलों की समिति (पीएसी) से दो संस्थापक सदस्यों, प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव, के हटाए जाने के साथ पार्टी के आंतरिक विवाद की कहानी का अभी सिर्फ एक अध्याय लिखा गया। सांगठनिक विवाद की कहानी का अंत अभी बाकी है। एक पत्रकार के लिए यह भविष्यवाणी करना उचित नहीं कि कहानी का अंत हू-ब-हू कैसा होगा! पर यह बात आईने की तरह साफ है कि इस नई पार्टी का सांगठनिक ढांचा राष्ट्रीय या क्षेत्रीय राजनीति के अन्य परंपरागत दलों से गुणात्मक रूप से बहुत भिन्न नहीं है। इसके पास फैसले लेने या अपने मसलों को सुलझाने का न भिन्न किस्म का तंत्र है और न ही नई पार्टी-संस्कृति है। नई संस्कृति कहां से आएगी, जब नए मूल्य और मिजाज के नए नेता नहीं पैदा होंगे? सिर्फ नेताओं के ‘रूप’ में अंतर होने से ‘अंतर्वस्तु’ और संस्कृति नहीं बदलती।

यह संयोग नहीं कि इतने कम दिनों में पार्टी के अंदर हाइकमान जैसा ढांचा उभर चुका है। हाइकमान के इर्दगिर्द कुछ पसंदीदा लोगों का ताकतवर गुट सक्रिय है, जो पार्टी और सरकार के सारे महत्वपूर्ण फैसले लेने और उसे अमली जामा पहनाने वाले तंत्र पर पूर्ण नियंत्रण रखने में सहयोग करता है। पार्टी कार्यकर्ताओं-नेताओं की दूसरी-तीसरी कतारें हाइकमान के ‘अतिविश्वासपात्रों’ के इर्दगिर्द मंडराते रहने के लिए अभिशप्त हैं। नजरों से गिरने के बाद प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव जैसे शीर्ष नेताओं का हाइकमान से फोन-संवाद तक अवरुद्ध हो गया। क्या मंत्रिपरिषद के गठन के नजरिए और तरीके को लेकर ‘आप’ और कांग्रेस, भाजपा, पीडीपी, राजद, सपा, बसपा में कोई फर्क दिखता है? फैसले की प्रक्रिया में अगर सामूहिकता नहीं तो संगठन में समूह की प्रतिभा या समझ का उपयोग कैसे संभव होगा? दिल्ली मंत्रिमंडल में किसी महिला को न रखने जैसा फैसला क्या सामूहिक-विमर्श आधारित हो सकता था?

इस ठोस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता कि ‘आप’ में एक दीवार खिंच चुकी है- ‘भरोसेमंद’ और ‘गैर-भरोसेमंद’ के बीच। ‘गैर-भरोसेमंद’ लोगों में वे हैं, जो कभी सहमत तो कभी असहमत भी हो सकते हैं यानी जिनका रुख पहले से तय न हो। नेतृत्व चाहता है कि सभी लोगों का रुख एक-सा हो। इसी सोच के धरातल से ‘आप’ में पनपी है हाइकमान की संस्कृति। इसके लिए सिर्फ केजरीवाल या उनके खास गुट को जिम्मेवार ठहराना पूरी तरह सही नहीं होगा। इसके लिए वे भी जिम्मेवार हैं, जिन्हें हाइकमान ने पीएसी से बाहर का रास्ता दिखाया। महज दो साल पहले गठित पार्टी में इतना ताकतवर हाइकमान एक व्यक्ति के कारण पैदा नहीं हो सकता। प्रशांत हों या योगेंद्र, सबने केजरीवाल के इर्दगिर्द खास तरह का राजनीतिक प्रभामंडल बुने जाने की प्रक्रिया में अपना-अपना अवदान दिया।

अगर केजरीवाल की जगह योगेंद्र होते तो भी इस प्रक्रिया में उभरती पार्टी का ढांचा और कार्य-संस्कृति गुणात्मक रूप से भिन्न नहीं होती। सिर्फ हाइकमान और उसके खास गुट के चेहरे अलग होते। क्या यह सही नहीं कि अशोक अग्रवाल, अग्निवेश, मधु भंडारी या विनोद बिन्नी, सभी के प्रकरण में आज के असंतुष्ट नेताओं ने आंदोलन और पार्टी के अंदर ‘बनते-पनपते हाइकमान’ का आंख मूंद कर साथ दिया? किसी ने मालूम करना चाहा कि कई महत्त्वपूर्ण सामाजिक कार्यकर्ता, गणमान्य लोग या आंदोलनकारी इस पार्टी में शामिल हुए और फिर जल्दी ही निराश होकर अलग-थलग क्यों पड़ गए? कुडानकुलम आंदोलन के नेता एसपी उदय कुमार और नर्मदा आंदोलन की नेता मेधा पाटकर जैसे कई नाम इस संदर्भ में लिए जा सकते हैं। एडमिरल रामदास और दयामनि बारला जैसे लोग भी नेतृत्व के रवैए से निराश बताए जाते हैं। जो लोग रामदास को ठीक से जानते हैं, केजरी-खेमे का यह दुष्प्रचार उनके गले कैसे उतरेगा कि एडमिरल ने पिछले दिनों जो कुछ कहा या किया, वह सब शांति भूषण या प्रशांत भूषण के इशारे पर किया!

‘आप’ की सांगठनिक समस्याओं, आंतरिक लोकतंत्र की कमी या उसके अंदर हाइकमान संस्कृति के विस्तार की प्रक्रिया को समझने के लिए पार्टी की संरचना को ठीक से समझना जरूरी है। जैसा कि बहुत सारे लोग कहते हैं कि यह आंदोलन से निकली पार्टी है या कि इसका जन्म जन-आंदोलन के गर्भ से हुआ और यह सब स्वत:स्फूर्त था। लेकिन इसके गठन की पृष्ठभूमि पर बारीक नजर डालें तो ये तथ्य पूरी तरह सही नहीं मालूम होते।

जंतर-मंतर या फिर रामलीला मैदान के जन-अभियानों से पहले एनजीओ और सूचना-अधिकार के अभियानी-दायरे में काम करने वाले केजरीवाल और उनकी अपनी टीम के सदस्यों ने सन 2005 से सन 2010 के बीच विभिन्न दलों के प्रमुख नेताओं, सिविल सोसायटी के स्तर पर सक्रिय लोगों-संगठनों और देश-विदेश में फैले कुछ असरदार युवा प्रवासी-भारतीयों से लगातार संपर्क-संवाद चलाया। इस बात के लिए उनकी तारीफ करनी होगी कि शिक्षण-प्रशिक्षण से इंजीनियर और पेशे से नौकरशाह होने के बावजूद अपनी छोटी-सी टीम के साथ उन्होंने दिल्ली के सुंदरनगरी सहित कुछेक इलाकों में एनजीओ के जरिए गरीब और साधारण लोगों के बीच काम करना जारी रखा।

कई स्वयंसेवी संगठनों के संचालकों की तरह (अच्छे-कर्मठ संगठन और कार्यकर्ता भी कम नहीं हैं) वह ‘सेवा’ के नाम पर ‘मेवा’ बटोरने के धंधे में नहीं फंसे, समाज-राजनीति में वृहत्तर हस्तक्षेप के ‘अपने महत्त्वाकांक्षी एजेंडे’ पर लगातार काम करते रहे। मैगसेसे जैसा अंतरराष्ट्रीय सम्मान पाने के बाद सामाजिक-राजनीतिक जीवन में उनकी विशिष्ट पहचान बन गई थी। नौकरशाहों, सिविल सोसायटी के लोगों और विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं से उनका संवाद-संपर्क जारी रहा।

एनजीओ-आधारित कामकाज और धरना-प्रदर्शन-अनशन जैसे अभियानों के बीच केजरीवाल का राजनेता के रूप में रूपांतरण तो हुआ, लेकिन उनकी कार्य-संस्कृति और मिजाज पर एनजीओ-शैली हमेशा हावी रही, जिसमें एक निदेशक के तहत सारी संरचना संचालित होती है। मकसद के प्रति कर्मठता और व्यक्तिवाद से उपजा जिद्दीपन हमेशा उनकी शख्सियत का हिस्सा रहे।

यह बहुप्रचारित धारणा सही नहीं कि उनकी पार्टी किसी स्वत:स्फूर्त जन आंदोलन के गर्भ से अनायास पैदा हुई। उक्त आंदोलन और पार्टी बनाने के लिए वह काफी समय से कोशिश कर रहे थे। यूपीए-1 में उन्हें मौका नहीं मिला। पर यूपीए-2 में भ्रष्टाचार से जुड़े कई मुद्दों के यकायक खुलासे ने नए किस्म के आंदोलन की शुरुआत का उन्हें मौका दे दिया। इसके लिए एक बैठक संघ-भाजपा विचारों के मशहूर थिंक टैंक विवेकानंद फाउंडेशन में भी हुई। केजरीवाल के साथ स्वामी रामदेव की जोड़ी बनाने की पहल हुई। पर केजरी-रामदेव में बात नहीं बन सकी। दोनों हरियाणवी थे और अति-महत्त्वाकांक्षी भी। कैसे बनती!

फिर अण्णा हजारे से संपर्क साधा गया। शुरू के अण्णा-केजरी अभियान को संघ-भाजपा ने समर्थन और सहयोग दिया। संघ-प्रेरित कुछ लोगों और संस्थाओं ने कई तरह से मदद भी की। उनके अभियान से तब उन्हें अपना फायदा नजर आया। कांग्रेस के खिलाफ भाजपा कोई बड़ा अभियान चलाने में समर्थ नहीं थी। भ्रष्टाचार-विरोधी जन-गोलबंदी के दौरान मीडिया के बड़े हिस्से में अण्णा की गांधी-जेपी जैसी छवि और केजरीवाल की एक सीधे-सरल निम्न मध्यवर्गीय संघर्षशील व्यक्ति की छवि उभरी। केजरीवाल के दिमाग में पहले से ही एक नई पार्टी बनाने का सपना पल रहा था। एनजीओ और फिर जनलोकपाल आंदोलन के जरिए पार्टी तक पहुंचने की उनकी यात्रा आसान हो गई। यह कोई साधारण कामयाबी नहीं थी। श्रेय केजरीवाल को जाता है, इसके लिए उन्होंने बरसों मेहनत की।

केजरीवाल-समर्थक उन्हें एक ‘व्यवहारवादी’ और ‘फ्री-थिंकर’ के रूप में पेश करते हैं। राष्ट्रीय राजनीति में समर्थ और ईमान वाले नेताओं और दलों की कमी के मौजूदा दौर में उनकी राजनीति की एनजीओ-नुमा अलग शैली दिल्ली के लोगों को पसंद आई। फिर क्या, रातों-रात नई पार्टी आ गई, जिसके बनने का इंतजार वे बरसों से कर रहे थे।

मगर सत्ता में प्रचंड बहुमत से लौटने के बाद वे अपने राजनीतिक जीवन में पहली बार इतने गंभीर सवालों से घिरे हैं। इन सवालों की जड़ें ‘आप’ के सोच और संरचना में ही हैं, जो किसी लंबी राजनीतिक प्रक्रिया के तहत नहीं बनी। ज्यादा लंबे, सतत संघर्ष और समाज के बुनियादी वर्गों की सक्रिय संबद्धता के बगैर कुछ धरना-प्रदर्शन-अनशन की कामयाबी को आधार बना कर यह उभरी। इसके नेता-कार्यकर्ता आमतौर पर मध्यवर्गीय लोग ही हैं।

पार्टी ने जनता से निकटता जरूर कायम की है, पर उसके पास न तो कोई नई राजनीतिक संरचना है और न ही नया राजनीतिक विचार। ले-देकर इसकी सांगठनिक संरचना में प्रमुख रूप से चार तरह के लोग हैं- स्वयंसेवी संगठनों-एनजीओ आदि से जुड़े लोग, समाजवादी धारा के बौद्धिक या कार्यकर्ता, कुछ आदर्शों से प्रेरित प्रोफेशनल्स और ऐसे लोग, जो नब्बे के दशक या पिछली सदी के आखिरी दशक के आरक्षण-विरोधी अभियानों में सक्रिय रहे। इन्हीं लोगों से ‘आपह्ण का सांगठनिक ढांचा खड़ा हुआ। इनमें ज्यादातर लोग किसी लंबी राजनीतिक प्रक्रिया या व्यवहार की उपज नहीं हैं, इसलिए अच्छी मंशा, समझदारी या बौद्धिकता के बावजूद उनमें व्यापक जनपक्षधरता के लिए अपने अहंकार को पीछे कर समूह-बोध विकसित करने वाले मिजाज का अभाव है। जनता और समाज के फौरी या दूरगामी सरोकारों से ज्यादा तवज्जो वे अपने निजी विचार, लाइन या अपने पसंदीदा लोगों को देते हैं।

असम के छात्र आंदोलन के बीच से उभरी नई पार्टी असम गण परिषद के नेता होस्टल से सीधे सचिवालय और मुख्यमंत्री-मंत्री निवास पहुंचे थे। लेकिन लंबे समय तक नहीं टिक सके और सबसे पहले इसके दो शीर्ष संस्थापक नेता पीके मंहत और भृगु फूकन ही आपस में भिड़ गए। पार्टी जनता की आकांक्षाओं पर खरा नहीं उतर सकी। ‘आप’ के बारे में मैं यहां ऐसी कोई भविष्यवाणी नहीं कर रहा हूं। इतिहास अपने को हू-ब-हू नहीं दोहराता। पर इतना जरूर कहा जा सकता है कि ‘आप’ को अगर अपने को राष्ट्रीय स्तर पर प्रासंगिक बनाना है तो उसके नेताओं को पार्टी के परिप्रेक्ष्य, दिशा और संगठन में कामकाज की नई संस्कृति के बारे में नए सिरे से सोचना होगा।

अगर वे सोचते हैं कि सिर्फ दिल्ली में अपेक्षाकृत अच्छे सरकारी कामकाज के दम पर वे राष्ट्रीय विकल्प बन सकते हैं तो यह उनका भ्रम होगा। दूसरी बात, महानगरीय दिल्ली के कामकाज से देश के दूसरे राज्यों, खासकर बड़े हिंदीभाषी राज्यों या सुदूर के राज्यों की जनता को आश्वस्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए सक्षम-समर्थ संगठन, राजनीतिक प्रक्रिया से गुजरते सहिष्णु और समझदार नेता-कार्यकर्ता और समावेशी विकास का राजनीतिक-आर्थिक एजेंडा चाहिए। ले-देकर ‘आप’ एक ऐसी मध्यमार्गी पार्टी के रूप में उभरी है, जिससे आम मध्यवर्गीय भारतीय ‘लोकतांत्रिक-सेक्युलर-उदार और पारदर्शी संरचना’ बनने की उम्मीद लगाए है। इसके लिए ईमानदारी के साथ समझदारी और वैचारिक सहिष्णुता भी चाहिए। लोकतांत्रिक संगठन और समावेशी विकास का सोच भी चाहिए। क्या केजरीवाल की ह्यआपह्ण के पास यह सब कुछ है या भविष्य में हो सकता है?

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

 

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App