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आप की जमीन और वाम

अजेय कुमार मोदी के स्वच्छ भारत अभियान में विशेषकर और अन्य कई अभियानों के सरकारी विज्ञापनों में गांधीजी की छवि और उनके उपदेशों का भरपूर इस्तेमाल किया गया है। मोदी ने अपने भाषणों में भी कई बार गांधीजी के संदर्भ दिए हैं और आज भी यह बदस्तूर जारी है। जो भी लोग गांधीजी और उनके […]

Author Published on: March 3, 2015 10:20 PM

अजेय कुमार

मोदी के स्वच्छ भारत अभियान में विशेषकर और अन्य कई अभियानों के सरकारी विज्ञापनों में गांधीजी की छवि और उनके उपदेशों का भरपूर इस्तेमाल किया गया है। मोदी ने अपने भाषणों में भी कई बार गांधीजी के संदर्भ दिए हैं और आज भी यह बदस्तूर जारी है। जो भी लोग गांधीजी और उनके ‘वाद’ से वाकिफ हैं, भलीभांति जानते हैं कि उन्होंने कितना सादा जीवन जिया और तन पर न्यूनतम वस्त्र ही पहने। एक किस्सा याद आता है। जब गांधीजी बिहार गए तो उन्होंने एक गरीब महिला को देखा जो लगभग निर्वस्त्र थी। गांधीजी उस वक्त धोती पहने हुए थे, उन्होंने अपनी धोती को थोड़ा खोला और उसे फाड़ कर उसका एक हिस्सा उस महिला की ओर बढ़ा दिया। हिंदुस्तान की जनता कथनी और करनी में फर्क को देखती है। गांधीजी की लोकप्रियता और उनकी जनलामबंदी की अपार क्षमता के पीछे उनके दैनिक जीवन के कई अद्भुत उदाहरण हैं जिन्हें जनता आज तक नहीं भूली है।

देश की जनता ने नौ महीने पहले एक ‘चायवाले’ को चुना था। पर उसने उसे अदानियों और अंबानियों के आगे नतमस्तक होते देखा। और जब उसी आदमी ने दस लाख रुपए का सूट पहन कर, जिसे हाल ही में एक व्यापारी ने लगभग दो करोड़ रुपयों में खरीदा है, भारत की गरीब जनता का लगभग फूहड़ मजाक उड़ाया, तो उसे उसी जनता ने जमीन पर ला पटका। ऐसा नहीं है कि गांधीजी के पास इतने पैसे नहीं थे कि वे सूट न खरीद सकें। वे चाहते तो क्या नहीं खरीद सकते थे। पर उन्होंने हमेशा याद रखा कि भारत की अधिकांश जनता अत्यंत गरीब है।

एक झोंपड़ी में जाकर अगर आप देखें कि वहां बच्चों के पास खाने को कुछ भी नहीं है तो आप घर आकर, कम से कम उस दिन, कोल्ड ड्रिंक नहीं पी सकते। मुझे याद नहीं पड़ता कि हमारे अब तक हुए प्रधानमंत्रियों में से किसी ने भी कभी किसी विदेशी मेहमान के सामने एक दिन में इतनी बार अपनी पोशाकें बदली हों। इसे जनता ने अपना अपमान समझा। यहां सवाल केवल पोशाक बदलने का नहीं, उस मानसिकता का है जो आपको मजबूर करती है कि कहीं दुनिया का सबसे ताकतवर राष्ट्रपति उन्हें छोटा आदमी न समझ ले।

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि एक व्यक्ति केवल दस प्रतिशत संप्रेषण मौखिक रूप से करता है। शेष वह अपने चेहरे के हाव-भाव, उठने-बैठने के ढंग, वेश-भूषा आदि से करता है। एक खांसता हुआ, जी-जी करता हुआ, अपनी पुरानी गलतियों के लिए क्षमा मांगता हुआ, फिल्म ‘जागते रहो’ में राजकपूर के आम आदमी के किरदार की याद दिलाता हुआ शख्स आक्रामक मुद्रा में गरजते हुए व्यक्ति पर भारी पड़ा। एक सादे स्वेटर और मफलर ने जो संप्रेषित किया, वह अपने को शहंशाह समझने वाले का सूट न कर सका।

दूसरा विश्वासघात जो गांधीजी के साथ मोदी सरकार ने किया है, वह है तीस जनवरी के दिन विज्ञापनों में संविधान के ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द का हटाया जाना। तीस जनवरी वह दिन है, जिस दिन सांप्रदायिक ताकतों ने एक धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति से डर कर उसकी नृशंस हत्या कर दी थी। दंगे रुकवाने के लिए गांधीजी ने जीते जी अपना जीवन दांव पर लगा दिया था, जब वे नोआखली में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे थे। वर्ष में जिस एक दिन को भारतवासी गांधीजी को जरूर याद करते हैं उसी दिन हमारे आका सरकारी विज्ञापनों में धर्मनिरपेक्ष शब्द को निकाल देते हैं, जिसके लिए उन्होंने अपनी जान की परवाह नहीं की।

खैर, जिस व्यक्ति की छत्रछाया में गांधीजी के अपने राज्य (गुजरात) में सांप्रदायिक ताकतों का नंगा नाच हुआ हो और लगभग तीन हजार बेकसूर नागरिक मौत के घाट उतार दिए गए हों, करोड़ों रुपए की संपत्ति स्वाहा कर दी गई हो, उनसे इस भूल का क्या गिला करना! पर अफसोस तब हुआ, जब इसकी व्याख्या देने के लिए कैबिनेट स्तर के मंत्रियों ने संविधान की प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्दों की जरूरत पर सवाल उठाए और इस पर देशव्यापी बहस कराने की मांग कर डाली।

तात्पर्य यह हुआ कि यह महज एक भूल न थी। सोचे-समझे तरीके से इन शब्दों को हटाया गया। यह तब किया गया, जब दिल्ली के चुनाव सिर पर थे और घर-वापसी, लव जिहाद, रामजादे और हरामजादे प्रकरण, गिरजाघरों को जलाए जाने की घटनाएं जारी थीं। एक भाजपा सांसद ने यहां तक घोषणा कर डाली कि महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता के रूप में दिखाना गलत है और कि अगर गांधी देशभक्त थे तो गोडसे भी देशभक्त थे। यह बात सर्वविदित है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने दस्तावेजों में गांधीजी को कभी भी राष्ट्रपिता नहीं कहा। उसका फूहड़ तर्क यह दिया गया था कि हमारा राष्ट्र तो गांधीजी के जन्म से कई वर्ष पहले मौजूद था, इसलिए वे पिता कैसे हुए?

मुद्दा केवल यह नहीं कि गोडसे की प्रतिमा लगाने की बातें हो रही हैं, अधिक दुखद यह है कि प्रधानमंत्री ने इन कुकृत्यों पर उस वक्त चुनावों से पहले कुछ भी कहना ठीक नहीं समझा। जब ओबामा ने भारत में धार्मिक असहिष्णुता पर अपने विचार व्यक्त किए, तब दिल्ली चुनावों के ठीक दस दिन बाद, मोदी को अंगरेजी में कहना पड़ा कि धार्मिक हिंसा से सख्ती से निपटा जाएगा।

पिछले दिनों एक अंगरेजी समाचार चैनल में भाजपा के चंदन मित्रा ने उन पत्रकारों का मजाक उड़ाया जो ‘अब तक खामोश थे’, पर अब मोदी की बखिया उधेड़ने में लग गए हैं। याद रहे कि चंदन मित्रा खुद एक प्रतिष्ठित दैनिक पत्र के संपादक रह चुके हैं।

भाजपा में कई वर्ष रह कर, लगता है, चंदन मित्रा जैसे अनेक लोग अब केवल एक नेता से आदेश लेने के अभ्यस्त हो गए हैं और इस अंधभक्ति में वे अपने नेता के किसी भी क्रियाकलाप पर कोई प्रश्नचिह्न लगाने के लिए तैयार नहीं हैं। नीतिगत फैसलों को रोकना तो दूर, टोकना तक उन्हें मंजूर नहीं है।

चुनाव में बुरी तरह पिट जाने के बाद जब भी भाजपा प्रवक्ताओं से पार्टी में अंदरूनी कार्यप्रणाली पर सवाल किया गया, सबका लगभग एक ही जवाब था कि भाजपा सामूहिक नेतृत्व में विश्वास करती है। जिस पार्टी के ऊपर, नीचे, दाएं, बाएं केवल मोदी की दहाड़ (अमित शाह उन्हें भाजपा का शेर कहते हैं) सुनाई दे या केवल उसे सुनने की इजाजत हो तो साधारण कार्यकर्ता की सुध कौन लेगा? साधारण कार्यकर्ता तो दूर, राज्य-स्तर के नेता और कैबिनेट मंत्री तक चुप हैं।

अपने आप को ‘कांग्रेस’ से भिन्न कहने वाली पार्टी की कार्यप्रणाली भी कांग्रेस जैसी ही है जहां सोनिया गांधी के खिलाफ बोलने के लिए काफी हिम्मत जुटानी पड़ती है और जिसका हश्र दिल्ली चुनाव में ‘जमानत जब्त पार्टी’ के रूप में हुआ है। दबी जुबान में ही सही, जगदीश मुखी और दिल्ली के अन्य कई नेता मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को सारे फैसले करने का अधिकार देने को गलत कह रहे हैं। गोविंदाचार्य ने भाजपा की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा है कि पार्टी ने सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया को भी तिलांजलि दे दी है।

साधारण रिक्शा, स्कूटर चलाने वाले, पान की दुकान, रेहड़ी-पटरी लगाने वालों से लेकर युवाओं, अल्पसंख्यकों और लगभग हर सामाजिक क्षेत्र से संबंधित व्यक्ति से बात करने पर स्पष्ट था कि भाजपा हार रही है। ‘मोदी को लगाम लगाना जरूरी है’, ‘चाय वाले का दिल गद््दी पर बैठने के बाद बदल गया’ जैसे वाक्य प्राय: सुनने को मिल रहे थे। दिल्ली में आरएसएस का प्रभाव होते हुए भाजपा को इतना तो पता चल गया था कि वह चुनाव हारने जा रही है। फिर भी किरण बेदी को लाना राज्य के स्थापित नेताओं के साथ-साथ बेदी के साथ भी ज्यादती थी। मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर उनका नाम घोषित होने के बाद भी भाजपा का चुनावतंत्र मोदी को ही आगे करता रहा।

कुछ लोगों ने यह संशय जाहिर किया है कि अंतत: भाजपा और कांग्रेस को खत्म करने के बाद आम आदमी पार्टी वामपंथी पार्टियों को भी चोट पहुंचाएगी। हम प्राय: यह देखते हैं कि कई पार्टियां अपने जुनून में भारत को अन्य पार्टियों से मुक्त करने का दावा करती रही हैं, कोई कांग्रेस-मुक्त भारत और कोई भाजपा-मुक्त भारत की बात करता है। पर वामपंथी पार्टियों को छोड़ कोई अन्य पार्टी शोषण-मुक्त भारत की बात नहीं करती।

जब केजरीवाल ने व्यापारियों की सभा को संबोधित किया तो उन्हें यह कहने में कोई हिचक नहीं हुई कि वे एक बनिया हैं और ‘एक बनिया अगर आपकी समस्याएं नहीं समझेगा तो कौन समझेगा?’ केजरीवाल और उनके साथियों से जब भी उनकी विचारधारा के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वे न दक्षिणपंथी हैं, न वामपंथी। यह बात किसी हद तक सही है। वे एक साफ-सुथरा प्रशासन दे सकते हैं। यह भी संभव है कि वे राष्ट्रीय स्तर पर सांप्रदायिक ताकतों के विरुद्ध जनता को गोलबंद कर सकें जो कि अत्यंत स्वागतयोग्य होगा। पर फैक्ट्रियों में श्रम कानून लागू हों, ठेकेदारी प्रथा खत्म हो, निजीकरण की नीतियां बंद हों, और खेतिहर मजदूरों को उनका वाजिब मेहनताना मिले, इसकी गारंटी वे नहीं दे सकते और न ही उन्होंने ऐसी कोई गलतफहमी पाली है। यह उनके एजेंडे में ही नहीं है। तब सबसे निचले पायदान पर खड़े आदमी की चिंता कौन करेगा?

कहना न होगा कि केवल वामपंथी पार्टियों के एजेंडे में शोषण-मुक्त भारत का अक्स दिखाई देता है। वे पहल करके एकजुट होकर इस सपने को साकार कर सकती हैं। इसके लिए उन्हें गतिशील होना होगा, विचार और व्यवहार की दूरी को कम करना होगा, अपने संप्रेषण के तौर-तरीकों में बदलाव लाना होगा, जनता के साथ उसकी भाषा में संवाद करना सीखना होगा।

बंगाल में पैंतीस वर्षों के लंबे शासन के चलते जो भी कमजोरियां वामपंथी संगठनों में आर्इं हैं उन पर काबू पाना होगा। उत्तर भारत में भाजपा का सफाया अगर ‘आप’ करती है, तो वह ऐसी जमीन तैयार करेगी जिस पर वर्गीय राजनीति करना आसान होगा। भाजपा की धर्म और जाति आधारित राजनीति जनता को हमेशा वामपंथी विचारधारा से दूर ले जाती है। मुक्तिबोध कह गए हैं: ‘हमारी हार का बदला चुकाने आएगा/ संकल्पधर्मा चेतना का रक्तप्लावित स्वर/ हमारे ही हृदय का गुप्त स्वर्णाक्षर/ प्रकट होकर विकट हो जाएगा।’

 

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