ताज़ा खबर
 

सोना है या पीतल है

राजकिशोर अरविंद केजरीवाल की जगह मैं होता तो चुल्लू भर पानी में डूब मरता। ये हजरत इस तरह आचरण कर रहे हैं जैसे भाषा के साथ बलात्कार उन्होंने नहीं, किसी और शख्स ने किया हो। आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय परिषद द्वारा चार व्यक्तियों की परिषद की सदस्यता छीन लेने और उसके बाद बेवफाई के […]

Author April 4, 2015 11:20 PM

राजकिशोर

अरविंद केजरीवाल की जगह मैं होता तो चुल्लू भर पानी में डूब मरता। ये हजरत इस तरह आचरण कर रहे हैं जैसे भाषा के साथ बलात्कार उन्होंने नहीं, किसी और शख्स ने किया हो। आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय परिषद द्वारा चार व्यक्तियों की परिषद की सदस्यता छीन लेने और उसके बाद बेवफाई के आरोप में रोज किसी न किसी को पार्टी से निकालना एक अहम मसला है। पर, उमेश कुमार सिंह द्वारा किए गए स्टिंग से केजरीवाल की स्वाभाविक भाषा का जो नमूना सामने आया है, वह उससे ज्यादा अहम विषय है। राजनीतिक तानाशाही हमने बहुत देखी है, अपने विरोधियों को कमीना बताते हुए पहली बार सुना है।

दिल्ली जैसे ऐतिहासिक शहर में, जो एक समय में अपनी तहजीब के लिए जाना जाता था और जहां उर्दू जैसी भाषा पली और बढ़ी, मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को जिस शब्दावली का प्रयोग करते हुए पाया गया, उसके उदाहरण निराला और उग्र जैसे लेखकों में भी नहीं मिलते जिन्होंने हिंदी के फालतू आभिजात्य को तोड़ा था। हो सकता है, बात-बात में गालियों का प्रयोग कुछ इलाकों में बहुत आम हो, मगर आम आदमी के नाम पर बनी पार्टी का सर्वोच्च नेता अपने गुस्से को आम आदमी की इसी भाषा में प्रगट करे, यह कोई बड़ी सफलता नहीं है। लेकिन, मामला शब्दावली में निहित भाव-बोध का भी है।

मेरी नजर में, उमेश कुमार ने अपने नेता के साथ विश्वासघात किया है। राजनीति में निजी बनाम सार्वजनिक का भेद एक लोकप्रिय छल है, पर अनुभव बताता है कि बहुत-सी बातें सार्वजनिक करने लायक नहीं होतीं। कानाफूसी एक चीज है, बातचीत से लदी हुई टेप दूसरी चीज। संयोग से उमेश कुमार के हाथ में केजरीवाल की पगड़ी आ गई थी, जिसे उछाल देने में उन्हें थोड़ा भी संकोच न हुआ। जो बातचीत रिकॉर्ड की गई है, उसमें उमेश आप पार्टी को एकजुट होते हुए देखना चाहते हैं। वे बार-बार केजरीवाल से आग्रह करते हुए सुनाई पड़ते हैं कि कृपया किसी भी तरह पार्टी को बचा लीजिए। यह गिड़गिड़ाहट और इस बातचीत को सड़क पर बिछा देना, दो परस्पर विरोधी बातें हैं। इसका सकारात्मक पहलू सिर्फ यह है कि आप के शीर्ष नेता की मानसिकता का एक लज्जास्पद नमूना हमारे सामने आ गया है। नमूना ऐसा है, तो बाकी कैसा होगा? क्या यह भारत की राजनीति में शिष्टाचार की अवसान वेला है? रिकार्ड की हुई बातचीत के बीच से अचानक एक नया अरविंद केजरीवाल हमारे बीच आ बैठा है। इससे भी ज्यादा नाजुक सवाल यह है कि क्या यह केजरीवाल सचमुच नया है?

इसमें संदेह नहीं कि केजरीवाल ने सुहागरात में ही बिल्ली मार कर दिखा दिया है। इससे उनका भावी जीवन आसान हो जाएगा। जिन्हें देर से समझ में आता है, उन्हें नोट कर लेना चाहिए कि केजरीवाल आप से हिंदू पत्नी की तरह आचरण करने की अपेक्षा रखते हैं। राष्ट्रीय परिषद के सदस्यों को उन्होंने खुली धमकी दी थी कि आप लोग देख लीजिए कि पार्टी को ऐसा बना सकते हैं कि नहीं जिसमें मैं काम कर सकूं, नहीं तो अपने सड़सठ विधायकों को लेकर मैं अलग पार्टी बना लूंगा। इनमें से अनेक विधायक उस बैठक में मौजूद थे। उपमुख्यमंत्री भी वहां उपस्थित थे। उनमें से एक ने भी उठ कर प्रतिवाद नहीं किया कि माफ कीजिए, मैं आप का नहीं, आप पार्टी का विधायक हूं। डर का यह वातावरण भविष्य में और मजबूत होगा। विमत या असहमति के लिए कोई जगह नहीं बचेगी। जो बिग बॉस बनने की कोशिश करेगा, उसका सिर कलम कर दिया जाएगा।

यह सवाल अपनी जगह है कि योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे लोग आप में करने क्या गए थे। क्या उन्हें एक बार भी दिखाई नहीं दिया कि यह एक म्युनिसिपल दिमाग है, जिससे राष्ट्रीय पुनर्जागरण का वाहक बनने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए? दार्शनिकों को राजा के पास नहीं जाना चाहिए- यह राजा का कर्तव्य है कि वह दार्शनिकों के पास जाए। लेकिन, छोटा भी खूबसूरत होता है। अरविंद केजरीवाल अगर दिल्ली को सब के रहने लायक शहर बना डालें, तो यह कोई मामूली उपलब्धि नहीं होगी। हम सभी उनके कृतज्ञ होंगे।

फिलहाल, मुद्दा यह है कि क्या योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण पार्टी के भीतर अरविंद केजरीवाल के रकीब बन गए थे? आप का जो ढांचा है, उसमें क्या यह संभव था? वोट अरविंद केजरीवाल के नाम पर मिला है, योगेंद्र या प्रशांत के नाम पर नहीं। इनमें अगर राजनीतिक स्टार बनने की क्षमता होती, तो कभी के बन गए होते।

जो अतीत में नहीं हुआ, वह भविष्य में भी नहीं होगा, ऐसा कोई नियम नहीं है। फिर भी, क्या कोई एक भी उदाहरण दे सकता है जब योगेंद्र यादव ने या प्रशांत भूषण ने अरविंद केजरीवाल की नंबर एक पोजीशन को चुनौती दी हो?

जरूर, चुनौती की परिभाषा अलग-अलग है। एक वैचारिक चुनौती भी होती है। लेकिन किसी चीज के पक्ष में वातावरण बनाना एक बात है और चुनौती देना या बन जाना बिल्कुल दूसरी बात। वर्तमान राजनीति का यह एक प्रमुख मुद्दा है (था नहीं, है) कि क्या किसी को पार्टी के दो शीर्ष पदों पर एक साथ बने रहना चाहिए? जब से पार्टी बनी है, तभी से अरविंद उसके राष्ट्रीय संयोजक हैं।

पिछली बार जब वे मुख्यमंत्री बने थे, उन्होंने एक बार भी यह इच्छा नहीं जताई थी कि अब किसी और नेता को राष्ट्रीय संयोजक की जिम्मेदारी संभालनी चाहिए। चलिए, वह तूफानी दौर था और मुख्यमंत्री का आसन डगमग था। इस बार यह पांच साल के लिए पक्का है। दिल्ली का प्रशासन चलाना अपने आप में एक भारी काम है। क्या इतने व्यस्त आदमी के लिए यह संभव है कि वह आप जैसी पार्टी को देश के विभिन्न हिस्सों में स्थापित करने की जिम्मेदारी भी निभा सके?

मामला व्यावहारिकता का ही नहीं, सिद्धांत का भी है। पार्टी और सरकार, दो अलग-अलग इकाइयां हैं। दोनों को अलग-अलग ही रहना चाहिए। नहीं तो सत्तारूढ़ दल का अदना से अदना आदमी भी मंत्री नहीं तो राज्यमंत्री या उपमंत्री बन ही जाता है। पहली बार इंदिरा गांधी ने दोनों का खुद में विलय कर दिया था। उसके बाद जो क्षेत्रीय पार्टियां उभरीं, उनमें से एक में भी संगठन और सत्ता को अलग-अलग रखने का पुराना विवेक लागू नहीं किया गया। जो एक मामले में प्रमुख है, वह सभी मामलों में प्रमुख है।

एक अन्य दृष्टि से यह उचित और स्वाभाविक भी है। अगर हम राजनीतिक दल की परिभाषा सत्ता पर कब्जा करने की मशीनरी के रूप में करें, तो सत्ता जितनी केंद्रीकृत होगी, वह उतनी ही प्रभावशाली होगी। योगेंद्र और प्रशांत जरा हवा-हवाई किस्म के लोग हैं। ये न तो एक सफल पार्टी चलाना जानते हैं न चुनाव लड़ना। जहां तक योगेंद्र की बात है, समाजवादी जन परिषद में रह कर यह सब सीखने का कोई उपाय नहीं था। स्वयं किशन पटनायक इस कला में माहिर नहीं थे। लेकिन केजरीवाल को चुनाव लड़ना था और जीतना था। भविष्य में भी चुनाव लड़ना और जीतना है। इसके लिए क्या-क्या करना पड़ता है और क्या-क्या करना पड़ सकता है, यह वे ही जानते हैं। इस मामले में कोई उनसे बहस क्यों करे?

साफ है कि जो यादववादियों के लिए राजनीति का मूल धर्म है, वह अरविंद केजरीवाल के लिए चुनौती है। केजरीवाल का पक्ष यह जान पड़ता है कि जो ‘एक व्यक्ति एक पद’ का मुद््दा उठाता है, वह उन्हें कमजोर करना चाहता है। आप कई हीरो वाली फिल्म नहीं है। जो केजरीवाल की समझ पर शक करता है, वह विभीषण है। सोने की लंका में उसके लिए कोई जगह नहीं है।

यह समझ में आना मुश्किल है कि आप पार्टी में राष्ट्रीय संयोजक का पद अभी तक क्यों बना हुआ है। पार्टी को स्थापित हुए तीन साल हो चुके हैं। दिल्ली में उसकी सरकार है। कायदे से अब आप को अपना तदर्थ ढांचा छोड़ कर एक व्यवस्थित रूप प्रदान किया जाना चाहिए। तब आप का एक राष्ट्रीय अध्यक्ष होगा, सचिव होगा। संगठन के क्षेत्रीय स्तर होंगे। विभिन्न स्तरों पर चुनाव होंगे। यह एक तरह से सत्ता का विकेंद्रीकरण होगा। क्या केजरीवाल को इसी से डर लगता है? लेकिन सच्चाई यह भी है कि यादववादियों के पास इतनी शक्ति नहीं है कि उन्हें समझौता करने लायक माना जाए। वास्तव में ये पार्टी के अंदरूनी लोग नहीं थे न बन पाए। यानी उस पार्टी के, जो केजरीवाल बनाना चाहते हैं या कहिए बना चुके हैं।

आप में अब आदर्शवाद का खमीर दुबारा उठने वाला नहीं है। जब उठ रहा था, वह आप का सर्वाधिक रचनात्मक समय था। तरह-तरह के अच्छे विचार और लोग आप को आप्लावित कर रहे थे। तो क्या हम पीतल को सोना समझ बैठे थे? क्या हमारे साथ ठगी हुई है? हमने इस केजरीवाल की जय तो नहीं बोली थी। या, जिसे हम पीतल मानने लगे हैं, वह वास्तव में सोना है?

मैं धीरज रखने की सलाह देना चाहता हूं। केजरीवाल कुछ आदर्शवाद लेकर ही भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन में आए थे। अण्णा हजारे ने उन्हें यों ही आकर्षित नहीं किया था। केजरीवाल में बचपन से ही कुछ अलग और अच्छा करने की भावना रही है- पर अपने कैरियर की कीमत पर नहीं। राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, किशन पटनायक और अण्णा हजारे की तरह फकीर बन कर कुछ भी करना उन्हें मंजूर नहीं। अच्छा खाना, अच्छा पहनना अगर जनता का अधिकार है, तो यह अधिकार सबसे पहले उसके नेता का है।

आदर्शवाद दो तरह का होता है- साध्य और असाध्य। मेहरबानी करके अरविंद केजरीवाल से असाध्य किस्म के आदर्शवाद की उम्मीद न की जाए। वे सफलता नामक लोकप्रिय देवी के उपासक हैं। यहां विफल लोगों के लिए कोई स्थान नहीं है। इसीलिए वे अण्णा के साथ बहुत दूर तक नहीं चल पाए। वह रास्ता मेधा पाटकर और अरुणा राय जैसों के लिए है। अरविंद को गांधी के बजाय जवाहरलाल बन कर ज्यादा खुशी होगी। मुझे यकीन है, वे मुख्यमंत्री पद से अच्छे-अच्छे निर्णय लेते रहेंगे और जनता के बीच लोकप्रिय बने रहेंगे। यही उनकी घाटी है और यही शिखर है। इसलिए विचारक और न्यायप्रिय लोगों को उनसे न टकरा कर उनके लिए रास्ता खाली कर देना चाहिए। चलने के लिए और भी बहुत-से रास्ते हैं।

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App