धर्मेंद्रपाल सिंह का लेख : कर्ज के भंवर में बैंकों की नैया - Jansatta
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धर्मेंद्रपाल सिंह का लेख : कर्ज के भंवर में बैंकों की नैया

कर्ज पर वसूला गया ब्याज ही बैंकों की कमाई का मुख्य जरिया होता है। जब कर्ज देने को पैसा नहीं होगा, तब कमाई की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (File Photo)

भारतीय बैंकों की पिछले वित्त वर्ष (2015-16) की बैलेंस शीट पढ़ने के बाद रिजर्व बैंक के गवर्नर पर निशाना साधने वालों का स्वार्थ साफ समझ में आता है। आज देश में कुल सूचीबद्ध बैंकों की संख्या उनतालीस है। रिजर्व बैंक ने पिछले साल एक आदेश जारी किया था, जिसके अनुसार सभी बैंकों के लिए वित्त वर्ष 2015-2016 की अंतिम दो तिहाई में नॉन परफॉर्मिंग एसेट (एनपीए), रिस्ट्रक्चर्ड लोन और बैड लोन जाहिर करना और मार्च 2017 तक उनकी भरपाई के प्रावधान बताना जरूरी कर दिया गया। सभी बैंकों को चालू वित्त वर्ष (2016-17) में अपनी बैलेंस शीट पाक-साफ करने का आदेश है। इस हुक्म से बैंकों की मानो शामत आ गई। बरसों से करोड़ों-अरबों रुपए का कर्ज दबा कर बैठे मुट्ठी भर बड़े लोगों और उद्योगों पर सरकार की नकेल कसने लगी है। वे बौखला गए हैं, रिजर्व बैंक के गवर्नर को बेदखल करने के लिए हर हथकंडा आजमा रहे हैं।

बैंकिंग शब्दकोश में जब कोई कर्ज लेने वाला व्यक्ति या संस्था तीन माह से ज्यादा समय तक अपनी किश्त नहीं चुकाती तो उसका ऋण एनपीए घोषित कर दिया जाता है। बैलेंस शीट सेहतमंद दिखाने और एनपीए के दाग से बचने के लिए बैंक अक्सर मोटे कर्जे रिस्ट्रक्चर कर देते हैं। देखा जाए तो यह कदम ऋण न चुकाने वाले को दंडित करने के बजाय, छूट देना ही कहा जाएगा। मोटामोटी एनपीए और रिस्ट्रक्चर्ड लोन को जोड़ कर जो रकम बनती है उसे ‘स्ट्रेस लोन’ (ऐसा कर्ज जो संकट में हो) कहा जाता है। जब उधार दी रकम और उसका ब्याज वापस मिलने की कोई संभावना नहीं रहती, तब बैंक ऐसा कर्ज बट्टे खाते में डाल देते हैं। अगर एनपीए, रिस्ट्रक्चर लोन और बट्टे खाते में डाल दिए गए ऋण को जोड़ दिया जाए तो मार्च 2016 में सार्वजनिक बैंकों का बीस प्रतिशत से अधिक उधार खतरे में था, जबकि निजी बैंकों का मात्र 4.6 फीसद कर्ज संकट में था।

अब यह बात साफ हो चुकी है कि सार्वजनिक बैंक एनपीए और बैड लोन की समस्या से लंबे समय से जूझ रहे हैं, पर अपनी कमजोरियों पर परदा डालने और कर्ज न लौटाने वाले प्रभावशाली लोंगों के नाम छिपाने के लिए वे हेराफेरी कर अपनी बैलेंसशीट तंदुरुस्त दिखाते आए हैं। रिजर्व बैंक के आदेश के बाद उनके हाथ बंध गए, सच बताना जरूरी हो गया। परिणामस्वरूप पिछले वित्त वर्ष की अंतिम दो तिमाही में सार्वजनिक बैंकों के बैड लोन की रकम तूफानी गति से बढ़ गई। पिछले एक साल में देश के उनतालीस बैंकों के बैड लोन में पंचानबे फीसद का इजाफा हुआ है। अक्तूबर-दिसंबर, 2015 की तिमाही में यह रकम दस खरब रुपए बढ़ी, जबकि जनवरी-मार्च, 2016 की तिमाही में उसमें पंद्रह खरब रुपए का इजाफा हुआ। मतलब यह कि महज छह महीने में पच्चीस खरब रुपए के बैड लोन पर पड़ा रहस्य का परदा हट गया। यह राशि खतरे में पड़े कुल कर्ज का करीब आधा हिस्सा है।

मार्च, 2016 तक देश के सभी सार्वजनिक बैंकों ने कुल 554 खरब रुपए का ऋण दे रखा था, जिसमें से पांच खरब रुपए ‘बैड लोन’ (ऐसा कर्ज जिसके लौटने की संभावना बहुत क्षीण है) की श्रेणी में आता है। मतलब यह कि करीब दस फीसद ऋण के वापस आने की आशा न के बराबर है। अगर इसमें ्नरिस्ट्रक्चर्ड लोन और बट्टे खाते में डाली गई रकम भी जोड़ दी जाए, तो स्ट्रेस लोन का आंकड़ा दो गुना हो जाएगा। आज कुल बैड लोन का नब्बे प्रतिशत हिस्सा सार्वजनिक बैंकों के खाते में लिखा है, जबकि केवल सत्तर फीसद बैंकिंग बाजार पर उनका अधिकार है। दूसरी तरफ निजी बैंक हैं, जिनका तीस प्रतिशत बाजार पर कब्जा है, पर बैड लोन में उनकी हिस्सेदारी केवल दस फीसद है।

सार्वजनिक बैंक पिछले पंद्रह बरस में इतने खराब दौर से कभी नहीं गुजरे। इस साल जनवरी से मार्च के बीच महज तीन महीनों में उन्हें 23,493 करोड़ रुपए का घाटा (पिछले वर्ष साढ़े आठ हजार करोड़ रुपए का लाभ था) हुआ, जबकि इसी अवधि में निजी बैंकों ने 8,807.48 करोड़ रुपए का मुनाफा कमाया। इस दौरान पंजाब नेशनल बैंक को 5,367 करोड़ रुपए, केनरा बैंक को 3,905 करोड़ रुपए, बैंक आफ इंडिया को 3,587 करोड़ रुपए, बैंक आॅफ बड़ोदा को 3,230 करोड़ रुपए, सिंडिकेट बैंक को 2,158 करोड़ रुपए, यूको बैंक को 1,715 करोड़ रुपए और आइडीबीआई बैंक को 1,736 करोड़ रुपए का घाटा हुआ।

स्टेट बैंक आॅफ इंडिया देश का सबसे बड़ा बैंक है, लेकिन सर्वाधिक बैड लोन भी उसके खातों में चढ़ा है। ताजा बैलेंस शीट देख कर पता चलता है कि इस बैंक का दस खरब रुपए का ऋण खतरे में है। इसी प्रकार दूसरे सबसे बड़े सार्वजनिक बैंक पीएनबी का 55,818 करोड़ रुपए, बैंक आॅफ इंडिया का 49,879 करोड़ रुपए तथा बैंक आॅफ बड़ोदा का 40,521 करोड़ रुपए बतौर बैड लोन फंसा है। पिछले एक बरस में सार्वजनिक बैंकों की बैड लोन की रकम बढ़ कर दो गुना से अधिक हो चुकी है। यूको बैंक का बैड लोन 6.76 से बढ़ कर 15.43 फीसद, बैंक आॅफ इंडिया का 5.39 से बढ़ कर 13.07 फीसद और बैंक आॅफ बड़ोदा का 3.72 से बढ़ कर 9.9 फीसद हो चुका है। निजी बैंकों में सबसे बुरी हालत आइसीआइसीआइ बैंक की है, जिसके माथे 5.82 प्रतिशत बैड लोन चढ़ा है।

भारत के पच्चीस में से चौदह सार्वजनिक बैंकों की बैड लोन रकम नौ से 17.4 प्रतिशत के बीच है। यहां याद दिलाना जरूरी है कि सार्वजनिक बैंकों में आम आदमी अपनी खून-पसीने की कमाई का पैसा जमा करता है। इन बैंकों से लिया उधार जानबूझ कर न लौटाना, जनता के धन की लूट ही कही जाएगी। कुछ सफेदपोश लोगों के इस अपराध की वजह से आज अधिकतर सार्वजनिक बैंकों पर संकट के बादल छाए हैं।
पिछले वित्त वर्ष की अंतिम दो तिमाहियों में तेरह सार्वजनिक बैंकों को लगातार घाटा हुआ है और जिन नौ ने मुनाफा दिखाया, उनका लाभ भी पिछले साल के मुकाबले काफी कम था। घाटे वाले बैंकों को अपने बैड लोन के लिए अलग से रकम का इंतजाम करना पड़ा है। एक वर्ष पहले यह रकम 9.37 खरब रुपए थी, जो 87 प्रतिशत वृद्धि के बाद अब 17.5 खरब रुपए हो गई है। इसका मतलब यह भी है कि आज सार्वजनिक बैंकों के पास कर्ज देने के लिए कम पैसा है। गत वर्ष उनके दिए कर्जों में मात्र 2.73 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, जबकि निजी बैंकों के ऋण 22.40 फीसद की गति से बढ़े। इस कमजोरी का असर सार्वजनिक बैंकों की आमदनी पर पड़ा है।

कर्ज पर वसूला गया ब्याज ही बैंकों की कमाई का मुख्य जरिया होता है। जब कर्ज देने को पैसा नहीं होगा, तब कमाई की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? वित्त वर्ष 2015-16 की अंतिम तिमाही में सार्वजनिक बैंकों की ऋण से होने वाली आय में केवल दो प्रतिशत वृद्धि हुई। उनकी आय उन्नीस अरब रुपए से बढ़ कर 19.4 अरब रुपए हो पाई, जबकि इसी अवधि में निजी बैंकों की आय में शानदार इक्कीस फीसद का इजाफा हुआ है।

गत फरवरी माह में सूचना के अधिकार के तहत जुटाई गई जानकारी से पता चला कि उनतीस सार्वजनिक बैंकों ने सन 2013 से 2015 के बीच महज दो बरस में बड़े डिफाल्टरों का 1.14 लाख करोड़ रुपए का कर्ज बट्टे खाते (राइटआॅफ) में डाल दिया। सन 2004 से 2015 के बीच 2.11 लाख करोड़ रुपए का कर्ज राइटआॅफ किया जा चुका है। अखबारों में छपी इस खबर का संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने रिजर्व बैंक से डिफाल्टर की सूची तलब की थी। बैंकों के अदालत में दाखिल हलफनामे के अनुसार वर्ष 2014 से पहले पांच सौ करोड़ रुपए या इससे अधिक रकम के ‘रिस्ट्रक्चर लोन’ की कोई जानकारी उसके पास नहीं है। इस हलफनामे से बैंकों की नीयत पर शक होता है। जब से किंगफिशर के मालिक विजय माल्या सत्रह बैंकों से लिया 7800 करोड़ रुपए का कर्ज बिना लौटाए विदेश भाग गए, तब से ऋण न लौटाने वाले कॉरपोरेट का मुद्दा मीडिया में छाया हुआ है। आज माल्या से कहीं बड़ा कर्ज उठाने वाले करीब तिरालीस उद्योगपति हैं, जिन पर बैंकों की चार लाख करोड़ रुपए की उधारी चढ़ी है।

जानकारों का मत है कि नब्बे के दशक में भी सार्वजनिक बैंकों के सामने आज जैसा संकट था और वे बैड लोन के झंझावात का सामना करने में सफल रहे थे। लेकिन यह दावा करने वाले भूल जाते हैं कि तब और अब के हालात में भारी अंतर है। तब स्टेटेचुरी लिक्विडिटी रेश्यो (एसएलआर) 38.5 प्रतिशत थी, जो अब गिर कर 21.25 फीसद कर दी गई है। इसी प्रकार तब कैश रिजर्व रेश्यो (सीआरआर) 14.5 प्रतिशत थी, जो अब घट कर चार फीसद रह गई है। इस हिसाब से 1993 में कोई बैंक अपने पास जमा कुल जमा रकम का सैंतालीस फीसद (100-38.5 + 14.5 = 47) से ज्यादा धन बतौर कर्ज नहीं दे सकता था, जबकि अब 74.75 प्रतिशत (100-21.25 + 4 =74.75) तक ऋण दे सकता है। इस हिसाब से आज सार्वजनिक बैंकों का कहीं अधिक धन फंसा हुआ है और अगर यह रकम समय पर वसूली नहीं जाती, तो उनका अपने बूते संभलना कठिन हो जाएगा। निस्संदेह सार्वजनिक बैंक आज अपने सबसे खराब दौर से गुजर रहे हैं। उन्हें बचाने के लिए रिजर्व बैंक के गवर्नर के रूप में काबिल अर्थशास्त्री की सख्त जरूरत है।

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