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राजनीति: पराली की आग, बेफिक्र सरकार

हालांकि पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण को अगर सरकार रोकना चाहती है तो इसके लिए दीर्घकालिक रणनीति अपनानी होगी। फसली विविधता को बढ़ा कर पंजाब और हरियाणा से धान की खेती को धीरे-धीरे कम करना होगा, ताकि भूजल स्तर भी बचा रहे और पूरे उत्तर भारत को प्रदूषण से बचाया जा सके। पंजाब के कृषि क्षेत्र के वैज्ञानिक भी यह तर्क दे रहे हैं।

Author October 26, 2018 2:45 AM
पराली नष्ट करने को लेकर अपनाई गई सरकार की नीतियों में भारी खामियां हैं।

दिल्ली और इसके आसपास की हवा लगातार जहरीली होती जा रही है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक वायु गुणवत्ता सूचकांक तीन सौ पार कर गया है, जो काफी खराब की श्रेणी में है। गुड़गांव और गाजियाबाद की हालत तो इससे भी बदतर है। पंजाब में सरकार के तमाम आदेशों और विज्ञापनों को धता बताते हुए किसानों ने खेतों में पराली जलाना शुरू कर दिया है। अगले साल लोकसभा चुनाव होने हैं, इसलिए किसानों पर सख्ती करने से सरकार बच रही है। हालांकि पुआल न जलाने और पर्यावरण बचाने के लिए जारी विज्ञापनों पर अब तक उन्नीस करोड़ रुपए सरकार ने खर्च कर दिए हैं। इतनी रकम से पुआल नष्ट करने वाली सैकड़ों मशीनें खरीदी जा सकती थीं। पंजाब में किसानों ने साफ कह दिया है कि वे खेतों में पराली जलाएंगे, क्योंकि इसे नष्ट करने के दूसरे तरीकों पर प्रति एकड़ तीन से चार हजार रुपए का खर्च आ रहा है। किसानों ने पराली जलाने को रोकने के लिए धान पर दो सौ रुपए प्रति क्विंटल बोनस की मांग की है। पंजाब सरकार ने किसानों की मांग आगे केंद्र को बता दी है। पंजाब सरकार प्रति क्विंटल कम से कम सौ रुपए बोनस मांग रही है। हकीकत यह है कि सरकार और किसानों के पास इतनी मशीनें भी नहीं हैं कि बीस दिनों में दो करोड़ टन पराली को नष्ट कर दें। किसान किसी भी कीमत पर अक्तूबर के आखिर तक पराली को नष्ट करना चाहते हैं, ताकि नवंबर के मध्य से गेहूं की बिजाई शुरू हो जाए।

पराली नष्ट करने को लेकर अपनाई गई सरकार की नीतियों में भारी खामियां हैं। पराली नष्ट करने के लिए उपलब्ध मशीनों को अगर पूरे राज्य में इस्तेमाल भी किया जाए तो गेहूं की बिजाई के समय तक मात्र बीस फीसद पराली नष्ट हो पाएगी। ऐसे में किसानों के पास पराली जलाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। सीमांत किसानों का तर्क है कि राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) का आदेश था कि छोटे किसानों को मशीन मुफ्त में दी जाए। लेकिन सरकार सबसिडी दे रही है। उनके पास मशीन खरीदने के लिए बाकी के पैसे नहीं हैं। राज्य के मालवा इलाके में किसान संगठनों ने सरकार की नीतियों के खिलाफ रैली भी की। उधर, राज्य सरकार ने दावा किया है कि इस साल पराली जलाने के मामलों में सत्तर फीसद तक कमी आएगी। अभी तक जो आंकड़े आए हैं, वे पिछले साल के मुकाबले कम हैं। वर्ष 2016 में अक्तूबर मध्य तक पराली जलाने के छह हजार सात सौ तैंतीस और 2017 में अक्तूबर मध्य तक तीन हजार एक सौ इकतालीस मामले आए थे। इस साल अक्तूबर मध्य तक एक हजार दो सौ बारह मामले सामने आए हैं। वर्ष 2016 में पूरे सीजन के दौरान पराली जलाने के लगभग अस्सी हजार से ज्यादा मामले आए थे। लेकिन 2017 में आधे तक की कमी आ गई।

पंजाब में लगभग अट्ठाईस लाख हेक्टेयर में लगे धान के पुआल को नष्ट करना है। वहीं हरियाणा में भी लगभग दस लाख हेक्टेयर जमीन में पुआल नष्ट करना है। किसानों का तर्क है कि पराली नष्ट करने के लिए धान काटने वाली साझेदारी में लगाई गई विशेष मशीनों से खर्च बढ़ा है। साझेदारी में किसानों को प्रति एकड़ यह खर्च दो हजार रुपए बैठ रहा है, जो पिछले साल बारह सौ रुपए प्रति एकड़ था। इसके पीछे तर्क यह दिया जा रहा है कि पुआल नष्ट करने वाली विशेष मशीन के इस्तेमाल से डीजल की खपत बढ़ गई है। पिछले साल के मुकाबले डीजल इस साल पंद्रह रुपए प्रति लीटर महंगा है। पुआल नष्ट करने वाली एक और मशीन महंगी है। इसे किसान खरीदना नहीं चाहते। इसके कई कारण हैं। यह सबसिडी के बावजूद महंगी पड़ रही है। इसलिए कर्ज के बोझ तले दबे किसान इसे खरीद पाने में सक्षम नहीं हैं। बाद में इसके रखरखाव पर भी खर्च आएगा। इसके अलावा, इस मशीन को चलाने के लिए साठ हार्स पावर का ट्रैक्टर चाहिए। ये ट्रैक्टर राज्य में बड़े किसानों के पास ही हैं। सीमांत और छोटे किसान इन्हें खरीद नहीं सकते। छोटे किसानों के पास पैंतीस से पचास हार्स पावर वाला ट्रैक्टर है। साठ हार्स पावर वाले ट्रैक्टर की कीमत आठ लाख रुपए के करीब है। दूसरी तरफ पुआल नष्ट करने वाली मशीनें राज्य सरकार ने काफी कम उपलब्ध करवाई हैं। हर गांव को औसतन एक मशीन दी गई है, जिससे पूरे राज्य में अस्सी हजार टन पराली नष्ट की जा सकती है। जबकि राज्य में लगभग दो करोड़ टन पराली है। यही कारण है कि किसान संगठन परंपरागत तरीके से पुआल नष्ट करने के लिए सरकार से धान पर दो सौ रुपए प्रति क्विंटल बोनस मांग रहे हैं। उनका तर्क है कि अगर दो सौ रुपए प्रति क्विंटल बोनस मिलेगा तो किसान अपने ट्रैक्टर से पराली को परंपरागत तरीके से नष्ट कर देगा, लेकिन इस खर्च को सरकार उठाए। किसानों का कहना है कि पराली उनके लिए उपयोगी नहीं है, इसलिए उसे जलाने के अलावा कोई चारा नहीं है।

हालांकि पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण को अगर सरकार रोकना चाहती है तो इसके लिए दीर्घकालिक रणनीति अपनानी होगी। फसली विविधता को बढ़ा कर पंजाब और हरियाणा से धान की खेती को धीरे-धीरे कम करना होगा, ताकि भूजल स्तर भी बचा रहे और पूरे उत्तर भारत को प्रदूषण से बचाया जा सके। पंजाब के कृषि क्षेत्र के वैज्ञानिक भी यही तर्क दे रहे हैं। सरकार को 2009 में बनाए गए उस अधिनियम में संशोधन करना होगा, जिसके अनुसार किसान पंद्रह जून से पहले धान की बुआई नहीं कर सकता है। राज्य सरकार ने प्रदेश में घटते भूजल स्तर के कारण यह सख्त फैसला लिया था। इससे पहले पंजाब में मई महीने में धान की बुआई शुरू हो जाती थी। सितंबर महीने तक धान की कटाई शुरू हो जाती थी। इसके बाद पुआल नष्ट करने के लिए किसानों के पास पर्याप्त समय होता था। लेकिन अब अक्तूबर के मध्य में धान की कटाई शुरू होती है और पंद्रह नवंबर से गेहूं की बिजाई शुरू हो जाती है। अगर किसान गेहूं की बिजाई दिसंबर में ले जाएंगे तो ज्यादा ठंड होने के कारण गेहूं की फसल अच्छी नहीं होगी। इससे किसानों को प्रति एकड़ चार से पांच क्विंटल गेहूं उत्पादन का नुकसान हो जाएगा। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय की सिफारिश के मुताबिक गेहूं की बिजाई का उपयुक्त समय पच्चीस सितंबर से लेकर पंद्रह नवंबर के बीच है। अस्सी के दशक में सरदारा सिंह जौहल कमेटी ने अपनी सिफारिश में पंजाब से धान की खेती का रकबा घटाने को कहा था। जौहल कमेटी का तर्क था कि एक किलो चावल के लिए पांच हजार लीटर पानी का इस्तेमाल हो रहा है। इससे राज्य की जमीन बंजर होने का खतरा था। राज्य में भारी भूजल संकट की भविष्यवाणी भी जौहल कमेटी ने की थी। उसका तर्क था कि अगले तीस-चालीस सालों में पंजाब बंजर हो जाएगा। जौहल कमेटी की आशंका अब सच होती नजर आ रही है। राज्य के सौ से ज्यादा ब्लाक भूजल के मामले में खतरनाक स्तर तक पहुंच गए हैं। इसलिए स्थायी तौर पर अगर उत्तर भारत में वायु और जल को बचाना है, तो पंजाब और हरियाणा से धान की खेती के रकबे में कम से कम पचास फीसद की कमी करनी होगी। देश की जरूरत के हिसाब से बाकी राज्यों में धान की खेती को बढ़ावा देना होगा। वैज्ञानिकों का तर्क है कि किसानों पर जुर्माना लगाना उत्तर भारत के वायु और जल के बचाव का स्थायी समाधान नहीं है। किसानों पर जुर्माने से हल नहीं निकलेगा। इसका स्थायी समाधान खोजना होगा। लेकिन इसके लिए सरकार चिंतित नजर नहीं आती।

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