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राजनीति: सबकी सेहत का सपना

किसी भी समाज का आकलन लोगों को व्यापक स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने की उसकी क्षमता से आंका जाता है। स्वास्थ्य सुविधा के तहत सिर्फ बीमारियों का इलाज ही नहीं किया जाता, बल्कि उसमें उसकी रोकथाम के लिए जरूरी कदम उठाना भी शामिल है। स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति, साफ सफाई और समुचित पोषण के अभाव में लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है और वे जल्दी बीमार हो जाते हैं।

प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के जरिए दस करोड़ परिवारों अर्थात लगभग पचास करोड़ लोगों को पांच लाख रुपए तक इलाज कराने की सुविधा मिलेगी। राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के तहत आने वाले हर परिवार का स्वास्थ्य बीमा होगा। उसे एक हेल्थ कार्ड मिलेगा। इस बीमे का प्रीमियम केंद्र एवं राज्य सरकार देगी। यह योजना 25 सितंबर, 2018 से लागू होगी। इसकी घोषणा लाल किले से प्रधानमंत्री ने की है। इस इलाज की सुविधा सरकारी और कुछ चुने हुए निजी अस्पतालों में प्राप्त होगी। गरीबों के लिए यह योजना बहुत बड़ा सहारा बन सकती है। किसी भी समाज का आकलन लोगों को व्यापक स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने की उसकी क्षमता से आंका जाता है। स्वास्थ्य सुविधा के तहत सिर्फ बीमारियों का इलाज ही नहीं किया जाता, बल्कि उसमें उसकी रोकथाम के लिए जरूरी कदम उठाना भी शामिल है। स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति, साफ सफाई और समुचित पोषण के अभाव में लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है और वे जल्दी बीमार हो जाते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों और कुछ सर्वे रिपोर्टों के अनुसार देश में आने वाले वर्षों में वे रोग तो फैलेंगे ही जो विकासशील देशों में फैले हैं। इनमें कुछ संक्रामक और प्रसरणशील हैं। लेकिन साथ ही, वे रोग भी फैलेंगे जो विकसित देशों में फैले हैं। कैंसर, मधुमेह (डायबिटीज), हृदय रोग या आनुवांशिक बीमारियों जैसे रोग अब असाध्य नहीं रह गए हैं। शायद अच्छी आदतों का विकास और लोगों को जागरूक करने के अलावा रोकथाम का कोई और उपाय नहीं है। क्षय रोग (टीबी), एड्स और डायरिया प्रमुख संक्रामक बीमारियां हैं जो भारत की उच्च मृत्यु दर का कारण है। पहले पोलियो सबसे बड़ी समस्या थी, लेकिन लगातार चलाए जा रहे सरकारी अभियानों की वजह से इस बीमारी पर नियंत्रण पा लिया गया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि क्षय रोग के कारण मरने वाले लोगों के बारे में जो जानकारी हमारे पास है, वह अतिन्यून है। इस तथ्य के बावजूद कि इस रोग के बारे में बहुत अधिक अध्ययन किए जा चुके हैं, उसके बारे में आंकड़ों और जानकारियों को विकसित करने की आवश्यकता है। क्षय रोग का निदान छाती की जांच द्वारा की जाती है। इसके लिए रोगी के थूक और बलगम के ‘एसिड-फास्ट’ जीवाणु की पहचान के लिए ‘स्पूट्रम माइक्रोस्कोपी’ की जाती है। यह जांच निर्धारित अस्पतालों व संस्थाओं द्वारा ही की जाती है। निदान करने वाले ‘एंडोस्कोपी’ और ‘ब्रॉकोग्राफ’ उपकरण सिर्फ विशेष अस्पतालों में उपलब्ध होते हैं। क्षय रोग के निदान व इलाज के लिए भविष्य में उपकरणों, उपायों व प्रक्रियाओं की आवश्यकता होगी। इसके लिए इस रोग के निदान और इलाज के लिए काम आने वाले ‘एलिसा किट’ के विकास में पूंजी लगाने और शोध व विकास की आवश्यकता है। पर एड्स जैसी जानलेवा बीमारी पर सामने से हमला करने की जरूरत है। सौभाग्य से इस बीमारी के बारे में, क्षय रोग की अपेक्षा आम लोगों में ज्यादा जागरूकता है। अभी तक, एचआइवी के संक्रमण के खिलाफ किसी टीके की खोज नहीं हो पाई है, हालांकि इस दिशा में नैदानिक परीक्षण किए जा चुके हैं। अभी तक, ‘ए.जेड.टी.’ नाम की अकेली दवा ‘एचआइवी’ को रोकने के प्रयोग में आ रही है। लेकिन अगले बारह से सोलह महीनों के बाद ‘वायरल म्यूटेशंस’ दवा का प्रतिरोध करने लगते हैं।

ऐसा तब होता है, जब ‘ए.जेड.टी’ का इस्तेमाल दूसरी दवाओं के साथ कराया जाता है। देश में एड्स की महामारी तेजी से बढ़ी है। इसे रोकने के लिए भारत के पास जो विकल्प मौजूद है, वह यह कि हम इसके लिए रोग-निरोधी उपाय अपनाएं। इसके लिए हमें सर्वाधिक जोखिम वाले रोगियों की पहचान करनी होगी। ऐसा संदिग्ध व्यक्तियों की जांच करके और ज्यादा से ज्यादा लोगों को ‘एड्स’ के जानलेवा खतरों के बारे में अधिक से अधिक जानकारी प्रदान करके किया जा सकता है। अपनी पारंपरिक चिकित्सा विधियों में इस रोग से बचने और रोग ग्रस्त हो जाने पर अपनी प्राण रक्षा के उपायों की जानकारी प्राप्त करके, समुचित शोध करना होगा। भारत के लोग जिस अन्य महारोग से तिहाई से ज्यादा मरते हैं वह है- जठरांत्र संबंधी गड़बड़ियां (गेस्ट्रो-एंट्राइटिस)। इस महारोग को समूल नष्ट किया जा सकता है, लोगों के लिए अच्छा, शुद्ध, पीने का पानी और उनके रहने और काम करने के स्थानों को साफ-सुथरा और प्रदूषण रहित बनाकर। इन उपायों के अलावा, इस महारोग के हो जाने पर उसे दूर करने के लिए सरल, सुरक्षित और कम खर्च वाली निदान विधि की खोज करनी होगी।

असंक्रामक रोगों को प्राय: ‘विकसित देशों के रोग’ या उत्तर-संक्रामी रोग कहा जाता है। चूंकि ये रोग इन देशों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं, इसलिए उनके बारे में काफी जानकारी उपलब्ध है। नगरीकरण और बदली हुई जीवन शैली कुछ लोगों के लिए हृदय रोगों और उससे सबंधित रोगों का कारण बन जाते हैं या उन पर इन रोगों से ग्रस्त होने का खतरा बना रहता है। हृदय रोगों के बारे में माना जाता है कि वे आगामी कई वर्षों तक सबका ध्यान खींचते रहेंगे। असंक्रामक रोगों को एक नया साथी गठिया का रोग, जो मूलत: गरीबों का रोग है, भी मिल गया है। इन दोनों के साथ हृदय धमनी रोग (कॉरोनरी हार्ट डिजिज) और अतिरिक्त दाब (हाइपर टेंशन) जैसे रोग भी शामिल हैं। भारत में प्रतिवर्ष लगभग पैंतीस लाख मौतें हृदय रोगों से होती हैं। एक अन्य रोग, मधुमेह भी चिंता का विषय है। देश की आबादी का पांच से दस प्रतिशत मधुमेह रोग से पीड़ित है। इसके रोकथाम के उपायों में है आनुवांशिकी दोषों पर नियंत्रण पाना और आहार व पोषण संबंधी तथा जीवन शैली में समुचित परिवर्तन के परामर्शों को प्राप्त कर, उनके अनुरूप परिवर्तन करना। रक्त में ग्लूकोज की मात्रा को जानने-पहचानने की युक्तियों और निदानात्मक उपकरण, औजार आदि भी इस रोग को काबू में रखने में काफी मददगार हो सकते हैं। इसके लिए 2020 में इंसुलिन की आवश्यकता का अनुमान करीब ढाई सौ अरब यूनिट प्रतिवर्ष लगाया गया है।

कैंसर एक ऐसा रोग है जिसके बारे में विशेष ध्यान दिये जाने की जरूरत है। भारत में कैंसर की घटनाओं के विश्लेषण से पता चलता है कि तंबाकू का प्रयोग चालीस प्रतिशत पुरुष रोगियों और बीस प्रतिशत महिलाओं के कैंसर के लिए सीधा जिम्मेदार है। इनमें से कैंसर के अधिकांश मामले प्रकाश में तब आते हैं, जब रोग बहुत पुराना हो हो जाता है। प्रारंभिक चरण में ऐसे मामले बहुत कम प्रकाश में आते हैं। कैंसर के कारण होने वाली मौतों में लगातार वृद्धि का यही कारण है। दक्षिण भारत में आमाशय के कैंसर की घटनाएं अपेक्षाकृत अधिक होती हैं, जबकि उत्तर भारत में पित्ताशय के कैंसर की घटनाएं अधिक देखने-सुनने में आती हैं। कैंसर के निदान हेतु विज्ञान और महामारी विज्ञान के विवेचन से यह निष्कर्ष तो निकाला ही जा सकता है कि भारत में इस रोग का विस्तृत अध्ययन अत्यावश्यक है। कैंसर की आधारभूत सूचनाओं को एकत्रित करके ज्ञात हो सकता है कि देश के किस भाग में किस रूप का कैंसर पाया जाता है। बाद में उसके आधार पर देश के उन विभिन्न इलाकों के बारे में प्राप्त जानकारी के आधार पर वहां के जोखिम वाले व्यक्तियों की पहचान की जा सकती है और उन्हें कैंसर से होने वाले खतरों के प्रति सावधान किया जा सकता है। प्रभावशाली निदान और रोग निवारक सुविधाओं की देश भर के कैंसर रोगियों के लिए आवश्यकता है। मिसाल के तौर पर कैंसर की निदानात्मक सेवाओं के लिए एंडोस्कोपों का प्रयोग आवश्यक है। वे सिर्फ विशिष्ट संस्थानों में उपलब्ध हैं। इस दिशा में प्रयास किया जाना चाहिए, ताकि रोगियों को सस्ते उपचार की सुविधा मिल सके। हमें कम खर्च वाले उपचार यंत्रों, औषधियों और टीकों की खोज करते रहने की जरूरत है जिससे स्वास्थ्य सुविधा सबके लिए उपलब्ध हो सके।

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