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राजनीति: बढ़ती आबादी की चुनौतियां

देश में लोग गांव छोड़ कर शहरों की ओर पलायन को इसलिए मजबूर हो रहे हैं कि सरकारें गांव में रोजगार, अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं करा पाई हैं। संयुक्त राष्ट्र की नई रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2050 तक दुनिया की अड़सठ फीसद आबादी शहरों में रहने लगेगी। वर्तमान में लगभग पचपन फीसद जनसंख्या शहरों में निवास करती है। देश की आबादी इसी तरह विस्फोटक रूप से बढ़ती रहेगी, तो संकट और गंभीर रूप धारण करते जाएंगे।

अश्विनी शर्मा

जब भी देश में जनसंख्या नियंत्रण के मुद्दे पर विमर्श प्रारंभ होता है, तो कुछ लोगों की प्रतिक्रिया इस प्रकार होती है जैसे उनका हक छीना जा रहा हो। कुछ लोग इतने असहिष्णु हो जाते हैं मानो उनके निजी जीवन पर हमला किया जा रहा हो। लेकिन जनसंख्या वृद्धि की समस्या इन सभी तर्कों से ऊपर है। जनसंख्या विस्फोट से संसाधनों की अपर्याप्तता के कारण उत्पन्न हुई समस्याओं का असर सब पर पड़ेगा। जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर देश में बड़ी-बड़ी योजनाएं तो बनीं, लेकिन किसी पर कायदे से अमल नहीं हुआ। इसका नतीजा यह रहा कि जनसंख्या कम होने या थमने के बजाय बढ़ती ही चली गई। जनसंख्या नियंत्रण के लिए भारत में कोई ठोस नीति नहीं बनी। केवल ‘हम दो हमारे दो’ जैसे सरकारी नारों से लेकर परिवार नियोजन के सरकारी विज्ञापन बनते रहे, लेकिन आबादी बढ़ती रही।

आज जनसंख्या वृद्धि देश में ज्यादातर समस्याओं का बड़ा कारण बनती जा रही है। गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, अशिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, अपराध, स्वच्छ पानी की कमी जैसी समस्याओं का बड़ा कारण बढ़ती आबादी भी है। देश के पास दुनिया की कुल जमीन का 2.4 फीसद हिस्सा है और इसमें दुनिया की अठारह फीसद आबादी निवास करती है। देश में जमीन के कुल साठ फीसद हिस्से पर खेती होने के बावजूद बीस करोड़ लोग भुखमरी के शिकार हैं। देश की आबादी अनियंत्रित रूप से बढ़ने के कारण ट्रैफिक जाम की समस्या भी भविष्य में देश की बड़ी समस्याओं में से होगी, क्योंकि देश में वाहनों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है, लेकिन जनसंख्या वृद्धि के हिसाब से सड़कों का निर्माण नहीं हो रहा है। इसी कारण देश की बढ़ती आबादी का बोझ सड़कों पर आसानी से देखा जा सकता है। वर्ष 1950 में भारत की आबादी सैंतीस करोड़ थी। वर्तमान तक यह आंकड़ा एक अरब पच्चीस करोड़ के आसपास पहुंच गया है। इस वृद्धि से अनुमानत: वर्ष 2050 तक देश में चालीस करोड़ लोग और बढ़ जाएंगे। जनसंख्या वृद्धि में दिल्ली सबसे आगे है। एक अनुमान के मुताबिक अगले एक दशक तक दिल्ली दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला शहर बन जाएगा। देश में जब भी जनसंख्या नियंत्रण को लेकर नीति निर्माण की चर्चा होती है तो कुछ बुद्धिजीवी चीन की जनसंख्या वृद्धि को प्रोत्साहन देने की नीति का उदाहरण देकर, भारत की जनसंख्या वृद्धि को उचित ठहराते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में जनसंख्या नीति को लेकर चीन से तुलना उचित नहीं है। चीन ने अनुमान लगाया है कि वर्ष 2060 तक साठ वर्ष से ऊपर के प्रति दो बुजुर्गों पर तीन युवा होंगे। ऐसे में संकट यह होगा कि युवा नौकरी करेंगे या बुजुर्गों की सेवा करेंगे। जबकि भारत एक युवा देश है जिसकी वर्तमान युवा आबादी साठ फीसद से अधिक है। ऐसे में भविष्य की आवश्यकता को देखते हुए भारत के संदर्भ में चीन की जनसंख्या नीति अनुपयुक्त है। चीन ने अपनी बढ़ती हुई आबादी को संसाधन मानकर, लोगों को अर्थव्यवस्था के विकास में भागीदार बनाया। इसलिए चीन आज दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक है। जिस तरह चीन ने अपनी आबादी को दक्ष कामगार बनाकर उत्पादन और निर्माण से जुड़े कार्यों में लगाया है, उससे हमारी सरकार इतनी बड़ी आबादी को अच्छा जीवन और रोजगार देने के बारे में चीन से प्रेरणा ले सकती है।

एक अनुमान के मुताबिक देश में कामकाजी लोगों की संख्या अगले तीन दशकों तक तीस फीसद की दर से बढ़ती रहेगी। इसी दौरान चीन में कामकाजी लोगों की संख्या बीस फीसद की दर से कम हो जाएगी। विडंबना यह है कि जनसंख्या नियंत्रण, जो राष्ट्रीय हित से जुड़ा हुआ मुद्दा है, उस पर नियंत्रण के लिए कभी किसी दल या संगठन ने आवाज नहीं उठाई। देश की तमाम राजनीतिक पार्टियां रोटी, कपड़ा, मकान की बातें तो करती हैं, लेकिन जनसंख्या नियंत्रण जैसे राष्ट्रीय हित के मुद्दे पर कानून बनाने का वादा कोई राजनीतिक पार्टी नहीं करती। इसलिए राष्ट्रीय हित के मुद्दे चुनावी मुद्दे नहीं बन पाते। चीन और भारत अभी दुनिया के सबसे ज्यादा आबादी वाले देश हैं। चीन की वर्तमान जनसंख्या एक अरब इकतालीस करोड़ और भारत की एक अरब पच्चीस करोड़ के लगभग है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक अगले छह वर्षों में भारत की जनसंख्या चीन से आगे निकल जाएगी। देश की जनसंख्या अनियंत्रित रूप से इसी तरह बढ़ती रही तो, आने वाले समय में शहरों में गाड़ी चलाने के लिए सड़क, पीने के लिए पानी और सांस लेने के लिए स्वच्छ हवा मिलनी मुश्किल हो जाएगी। जापान की राजधानी टोक्यो सबसे ज्यादा आबादी वाला शहर है। टोक्यो की जनसंख्या तीन करोड़ सत्तर लाख है। वर्तमान में राजधानी दिल्ली की जनसंख्या दो करोड़ नब्बे लाख है। लेकिन एक अनुमान के मुताबिक दस साल में ही दिल्ली की जनसंख्या टोक्यो को भी पीछे छोड़ देगी। ऐसा नहीं है कि विस्फोटक रूप से जनसंख्या वृद्धि केवल दिल्ली में ही हो रही है, बल्कि पूरे देश की हालत ऐसी ही है। जनसंख्या वृद्धि का सबसे ज्यादा असर भारत पर पड़ रहा है। ग्रामीण आबादी के रोजगार की तलाश में लगातार शहरों की ओर पलायन करने से, शहरी लोगों की जिंदगी भी मुश्किल बनती जा रही है। इसके लिए भी सरकारी नीतियां जिम्मेदार हैं। आजादी के सत्तर साल बाद भी ऐसी कोई ठोस नीति नहीं बन पाई है जिससे ग्रामीण आबादी का शहरों की ओर पलायन रुक सके। देश में लोग गांव छोड़ कर शहरों की ओर पलायन को इसलिए मजबूर हो रहे हैं कि सरकारें गांव में रोजगार, अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं करा पाई हैं। संयुक्त राष्ट्र की नई रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2050 तक दुनिया की अड़सठ फीसद आबादी शहरों में रहने लगेगी। वर्तमान में लगभग पचपन फीसद जनसंख्या शहरों में निवास करती है।

देश की आबादी इसी तरह विस्फोटक रूप से बढ़ती रहेगी, तो संकट और गंभीर रूप धारण करते जाएंगे। दिल्ली का ही उदाहरण लें। दिल्ली में अभी भी 2001 का मास्टर प्लान लागू है। जबकि शहर में 2021 का मास्टर प्लान लागू हो जाना चाहिए था। इस मास्टर प्लान के अनुसार 2021 तक दिल्ली में हर आदमी को रहने के लिए चालीस वर्ग मीटर जगह की आवश्यकता होगी। इस मास्टर प्लान के मुताबिक दिल्ली की आबादी को 920 वर्ग किलोमीटर की जगह चाहिए। लेकिन दिल्ली की वर्तमान आबादी को रहने के लिए 1107 वर्ग किलोमीटर जगह चाहिए। ऐसे में यह सोच कर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि दस वर्ष बाद जब दिल्ली की आबादी तीन करोड़ के पार होगी, तब क्या होगा? संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत 2024 तक दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन जाएगा। ऐसे में यह गंभीर सवाल है कि क्या जनसंख्या के बोझ से जूझ रहे भारत के पास लोगों को अच्छा जीवन और रोजगार देने के संसाधन होंगे? देश में दस से पैंतीस वर्ष के मध्य आयुवर्ग के युवाओं की आबादी लगभग साठ करोड़ है। इस युवा आबादी को सही दिशा और पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराए जाएं तो भारत दुनिया का सिरमौर बन सकता है। लेकिन सच्चाई यह है कि देश में केवल अनपढ़ युवाओं की ही आबादी लगभग तीस करोड़ है। देश में दस करोड़ युवा ऐसे हैं, जो शिक्षित होने के बावजूद किसी कौशल में दक्ष नहीं हैं। वर्ष 2030 तक दस करोड़ नई नौकरियों की जरूरत होगी। इसके लिए इतने दक्ष युवा तैयार करना भी एक चुनौती होगी। जनसंख्या विस्फोट के प्रभाव से बचने के लिए जरूरी है कि लोगों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाओं और नीतियों का निर्माण किया जाए, जिससे लोग बीमारी और बेरोजगारी जैसी विपरीत परिस्थितियों में दूसरों पर निर्भर न रहें।

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