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राजनीति: धरोहर से भी ज्यादा हैं नदियां

ये तो नहीं हो सकता है कि हम गंदगी फैलाते रहें और सरकारों को कोसते रहें कि वह गंदगी को साफ नहीं कर रही है। अदालतें तो लगातार निर्देश दे रही हैं कि नदियों पर अतिक्रमण न हो, उनमें अनुपचारित जल-मल, गंदगी, औद्योगिक कचरा न जाए, पॉलीथिन का उपयोग बंद हो, पेंट की हुई मूर्तियां प्रवाहित न की जाएं। परंतु न तो स्वत: इनका अनुपालन हो रहा है और न प्रशासन अनुपालन करवाने की हिम्मत ही जुटा पाता है।

Author February 28, 2018 3:03 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

वीरेंद्र कुमार पैन्यूली

राज्य अपने-अपने क्षेत्र में बहती नदियों को अपने स्वामित्व की सरकारी संपत्ति मानते रहे हैं। कई मामलों में राज्यों की जनता भी वैसी ही समझ रखती है। ऐसी संपत्ति जिसको वे तिजोरी में बंद कर सकते हैं और उसमें दूसरों की हिस्सेदारी वे ही तय करेंगे। बांधों और नहरों पर पहरे लगने और उनके लिए जंग होने की खबरें अब कोई नई बात नहीं हैं। कावेरी नदी के जल पर तो सौ साल से ही जंग चल रही थी। गंगा को भी जब हरिद्वार में बांधने का काम अंग्रेजों ने शुरू किया था तो सफलतापूर्वक इसे छोड़ने की मांग की लड़ाई और सेवा करने का मिशन अंग्रेजों के समय में ही पंडित मदन मोहन मालवीय ने 1905 में ही शुरू कर दिया था। लेकिन अब 16 फरवरी, 2018 को लगता है कि सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक व तमिलनाडु के दशकों पुराने कावेरी जल विवाद पर जो अपना अंतिम फैसला दिया है, उससे राज्यों को तो भविष्य के विवादों के मामलों में यह तो जरूर चेता दिया है कि नदियां राज्यों की संपत्ति नहीं हैं। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि नदियां संपत्ति हैं, संसाधन हैं। निस्संदेह वे मात्र राष्ट्र की संपत्ति हैं। तो ऐसे में क्या होगा जब विभिन्न राजनीतिक दलों या दबावों वाली केंद्र की सरकार आम समझ के हिसाब से संपत्ति के स्वामी के अपनी संपत्ति को बेचने, खरीदने व अपने पास ही रखने के हक का इस्तेमाल करने लगे।

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नदियां प्रकृति प्रदत्त हैं। मनुष्य के लिए धरती पर सबसे बड़ा और जरूरी प्राकृतिक संसाधन हैं। केवल मनुष्य नहीं, बल्कि अनगिनत जलचर व वनस्पतियां भी इन नदियों पर निर्भर होती हैं। इसीलिए नदियों को जीवनदायी कहा गया है। नदियों से स्थानीय पारिस्थितिकी और पर्यावरण प्रभावित होता है। अनेक वैज्ञानिक अध्ययनों से स्थापित हुआ है कि नदियों को सुरंगों में डालने या बांधने के बाद जलचरों और वनस्पतियों के घनत्व तथा व्यवहार में अंतर आया है। नदियों को प्रासंगिक संदर्भों में जीवन रेखाओं विभिन्न, संस्कृतियों और सभ्यताओं का गवाह भी कहा गया है। नदियों के विभिन्न प्रखंडों की अपनी-अपनी पहचान होती है। लेकिन आज नदियों पर संकट है। संपत्ति से ज्यादा उन्हें धरोहर माने जाने की जरूरत है। बात फिर सुप्रीम कोर्ट के ही एक फैसले की है। हालांकि यह फैसला नदियों के संदर्भ में नहीं है। संचार स्पेक्ट्रम के आबंटन के संदर्भ में दो फरवरी, 2012 के फैसले में संचार तरंगों को प्राकृतिक संसाधन मानते हुए सर्वोच्च अदालत ने कहा था कि सरकारें प्राकृतिक संसाधनों की मालिक नहीं, ट्रस्टी होती हैं। इसलिए नदियों को संपत्ति माने जाने के बाद भी सरकार को अपने को इन संपदाओं का ट्रस्टी मानना चाहिए और उन्हें अपने पास भारतीय जन की धरोहर समझना चाहिए। सार में कागजी वैधानिक नमामि के बजाय नदियों को नैतिक मानवीय व्यवहार में नमामि कहें। नमामि का सिलसिला तो चला ही हुआ है। गंगा के लिए नमामि, ब्रह्मपुत्र के लिए नमामि, नर्मदा के लिए नमामि, सभी नदियों के लिए नमामि।

मार्च, 2017 में नैनीताल उच्च न्यायालय ने भारत में अपने तरह के पहले और अब तक के अकेले फैसले में गंगा, यमुना और उनकी सहायक नदियों को वैधानिक मानव का दर्जा दिया था। अर्थात अधिकारों के हनन या अपने पर चोट पहुंचाए जाने पर ये नदियां न्यायालयों का दरवाजा खटखटा सकतीं हैं। इनके पक्ष में कानूनी कार्यवाही भी इन्हें मानव मानते हुए ही होगी। उच्च न्यायालय ने तीन अधिकारियों को संरक्षक नामित कर उन्हें नदियों के मानवीय अधिकारों की रक्षा के लिए जिम्मेदार भी बनाया था। उच्च न्यायालय के इस फैसले का मकसद गंगा की दुर्गति रोकना था। हालांकि केंद्र सरकार को इस आदेश को नमामि गंगा परियोजना का मददगार आदेश मानते हुए इसका स्वागत करना चाहिए था, लेकिन हुआ इसका उलट। उत्तराखंड व केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट जाकर इस आदेश पर स्थगन ले लिया। हालांकि अभी भी नैनीताल उच्च न्यायालय के आदेश को गलत नहीं ठहराया गया है, लेकिन उस पर अमल भी नहीं हो रहा है। कोई स्थगन हटवाने में भी रुचि नहीं ले रहा है। गंगा सच में यदि सजीव होती तो जानना चाहती कि उसके न्यायिक मानवीय अधिकारों के संदर्भ में क्या फैसला हुआ। फिलहाल स्थगन के बाद गंगा मात्र नदी है। और अब एक संपत्ति भी है- पराधीन। उल्लेखनीय है कि चार नवंबर, 2008 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सरकार ने गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया था। लेकिन इस घोषणा के बाद भी गंगा की स्थिति नहीं सुधरी। आज भी हरिद्वार में कुल सीवरेज का आधे से ज्यादा यानी डेढ़ अरब लीटर अनुपचारित गंदगी गंगा में जाती है। गंगा का पानी पीने को तो छोड़ दीजिए, लक्ष्मण झूला और ऋषिकेश के नीचे नहाने लायक भी नहीं रहा। हालांकि स्थानीय प्रशासन और राज्य सरकार ने कुछ कदम उठाए तो, पर वे सब बेमानी ही साबित हुए।

विशेषज्ञों के अनुसार राष्ट्रीय नदी घोषित होने के बाद भी प्रदूषण के अलावा बड़ी समस्या अवैज्ञानिक तरीकों सें जगह-जगह उससे बांध, बैराज, नहरों और अन्य तरीकों से अत्याधिक पानी निकाला जाना है। यह समस्या गंगा की ही नहीं, सभी नदियों की है। इसी तरह से गंगा नदी जल में आक्सीजन सोखने, उसे बनाए रखने और जैव विविधता में भी चिंताजनक कमी है। यह स्थिति देश की अधिकांश नदियों की है। तमाम नदियां इसी का शिकार हैं। या तो वे सूख कर खत्म हो रही हैं या फिर प्रदूषण की मार झेल रही हैं। राष्ट्रीय संपदा घोषित होने के बाद नदियों के प्रति सरकार ही क्यों, समुदाय-जनता और कारखानों को चलाने वालों के रुख में भी तो स्वत: बदलाव आना चाहिए। ये तो नहीं हो सकता है कि हम गंदगी फैलाते रहें और सरकारों को कोसते रहें कि वह गंदगी को साफ नहीं कर रही है। अदालतें तो लगातार निर्देश दे रही हैं कि नदियों पर अतिक्रमण न हो, उनमें अनुपचारित जलमल, गंदगी, औद्योगिक कचरा न जाए, प्लास्टिक पॉलीथिन का उपयोग बंद हो, पेंट की हुई मूर्तियां प्रवाहित न की जाएं। लेकिन न तो स्वत: इनका अनुपालन हो रहा है और न प्रशासन अनुपालन करवाने की हिम्मत ही जुटा पाता है। नदियों की सफाई के लिए तो एक बड़ा जनजागरण और अभियान चलाने की जरूरत है। नदियों की पवित्रता को बनाए रखना है तो आमजन में जागरूकता तो पैदा करनी ही होगी।

यह तो निर्विवाद ही है कि गंगा और उसकी सहायक नदियां मानव हों या न हों, किंतु किसी भी हाल में न समाज के स्तर पर, न सरकारों के स्तर पर और न ही न्यायालयों के स्तर पर हम उनसे मानवीय व्यवहार कर रहे हैं। परोक्ष में चाहे कुछ भी कहा जाए, लेकिन यथार्थ में गंगा को मां कहने वाले या अन्य नदियों को भी उसे निर्जीव व दोहन के लिए खुले संसाधन से ज्यादा मानने के लिए तैयार नहीं हैं। इस परिप्रेक्ष्य में भी कावेरी जल विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फरवरी, 2018 के फैसले की अपने-अपने ढंग से व्याख्या के अवसर आएंगे। परोक्ष में चाहे कुछ भी कहा जाए, लेकिन यथार्थ में गंगा व अन्य नदियों को भी नमामि कहने वाले उन्हें निर्जीव व दोहन के लिए खुले संसाधन से ज्यादा मानने के लिए तैयार नहीं हैं। इसलिए नदियों को संसाधन न मानें, क्योंकि ये तो जीवनदायी हैं। नदियां नहीं होंगी तो हम भी नहीं बच पाएंगे।

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