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राजनीति: सीरिया का संकट और महाशक्तियां

सीरियन आब्जर्वेटरी फॉर ह्यूमन राइट्स के अनुसार मारे गए लोगों में दो सौ से ज्यादा बच्चे हैं। पूर्वी गूटा विद्रोहियों के कब्जे वाला आखिरी बड़ा शहर है। रूस और असद की सेना के ये हमले अब तक के सबसे भीषण हमले हैं। कहा जा रहा है कि इन हमलों में खतरनाक रासायनिक हथियारों का प्रयोग हो रहा है। सीरिया संकट को लेकर रूस और अमेरिका के बीच तनाव चरम पर है। दुनिया इसे तीसरे विश्व युद्ध की आहट से कम नहीं मान रही।

Author March 13, 2018 4:44 AM
Syrian Crisis: विद्रोहियों के कब्जे वाले हिस्से में ढाई लाख लोग रह रहे हैं, जिसकी वजह से सेना के हमले में बड़ी संख्या में आम नागरिक मारे जा रहे हैं। (PHOTO: REUTERS)

राहुल लाल

सीरिया संकट उलझता ही जा रहा है। सीरिया में लड़ी जा रही लड़ाई में मासूम बच्चों की जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, उन्हें देख कर किसी की भी रूह कांप जाएगी। अब तक हजारों बच्चे हवाई हमलों के शिकार हो चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पिछले महीने की 24 तारीख को संघर्ष विराम प्रस्ताव पास होने के बावजूद विद्रोहियों के ठिकानों पर सीरियाई सरकार के हवाई हवाले हमले जारी हैं। काफी जद्दोजहद के बाद सुरक्षा परिषद की बैठक में तीस दिन के संघर्ष विराम के प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पारित किया गया था। इससे पहले रूस इसका विरोध कर रहा था। सुरक्षा परिषद के सभी पंद्रह सदस्यों ने प्रभावित इलाके में सहायता पहुंचाने और मेडिकल सुविधाएं मुहैया कराने के लिए वोट किया। लेकिन हकीकत यह है कि संघर्ष विराम पूर्णत: विफल साबित हो रहा है और पूरा विश्व समुदाय मूक दर्शक बना है।

सीरिया की राजधानी दमिश्क के पास पूर्वी गूटा क्षेत्र में पिछले एक महीने के दौरान मरने वालों वालों की संख्या हजार से ऊपर निकल गई है। सीरियन आब्जर्वेटरी फॉर ह्यूमन राइट्स के अनुसार मारे गए लोगों में दो सौ से ज्यादा बच्चे हैं। पूर्वी गूटा विद्रोहियों के कब्जे वाला आखिरी बड़ा शहर है। रूस और असद की सेना के ये हमले अब तक के सबसे भीषण हमले हैं। कहा जा रहा है कि इन हमलों में खतरनाक रासायनिक हथियारों का प्रयोग हो रहा है। सीरिया संकट को लेकर रूस और अमेरिका के बीच तनाव चरम पर है। दुनिया इसे तीसरे विश्व युद्ध की आहट से कम नहीं मान रही। रूस 2015 से ही असद सरकार को हवाई सुरक्षा मुहैया करा रहा है। वहीं तुर्की ने इस लड़ाई को इराक तक ले जाने की धमकी दी है। पिछले महीने इस लड़ाई में इजराइल के शामिल होने से स्थिति और बिगड़ गई है। लेबनान युद्ध के बाद इजराइल ने सीरिया पर अब तक का सबसे बड़ा हवाई हमला किया, जिससे ईरान और इजराइल के बीच भी तनाव और बढ़ गया। कुछ हफ्ते पहले तक इजराइल के बारे में कहा जाता था कि 1982 के बाद से उसने अपना एक भी लड़ाकू विमान नहीं खोया था, लेकिन अब इजराइल के भी एफ-16 लड़ाकू विमान को सीरियाई बलों ने मार गिराया है। इससे सीरियाई युद्ध के क्षेत्र का विस्तार होता जा रहा है। सीरिया संकट की गंभीरता को इससे भी समझा जा सकता है कि ट्रंप जब अमेरिका में राष्ट्रपति बने थे तो रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ उनकी गहरी दोस्ती थी। लेकिन सीरिया संकट ने न केवल ट्रंप और पुतिन की इस दोस्ती को तोड़ डाला, बल्कि महाशक्तियों को आमने-सामने खड़ा कर दिया। सीरिया संकट की शुरुआत वर्ष 2011 में अरब मुल्कों में सत्ता में बदलावों से हुई थी। वर्ष 2011 में सीरिया में अरब स्प्रिंग की शुरुआत 26 जनवरी को हसन अली नामक व्यक्ति के असद सरकार के विरोध में आत्मदाह से हुई। इसके बाद असद सरकार के खिलाफ जबरदस्त जन आक्रोश उत्पन्न हुआ और लोकतंत्र का गढ़ कहा जाने वाला दारा शहर सुलग उठा। लोगों में राजनीतिक भ्रष्टाचार, बेरोजगारी जैसे मुद्दों को लेकर असद सरकार के प्रति असंतोष था। इसके बाद तो दमिश्क, अलहस्का और डेरहामा में सेना और प्रदर्शनकारियों में जबर्दस्त संघर्ष की शुरुआत हो गई। हालात बदतर होने पर असद सरकार ने अप्रैल, 2011 में आपातकाल लगा दिया। 2012 तक सीरिया बुरी तरह से गृहयुद्ध में फंस चुका था। यह लड़ाई असद और उनके विरोधियों से आगे निकल गई। इसके बाद मध्यपूर्व में क्षेत्रीय वर्चस्व कायम करने को लेकर क्षेत्रीय शक्तियों और महाशक्तियों में भी एक होड़ सी मचने लगी। सीरिया में अब तक तीन लाख से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं।

सीरिया सरकार यानी बशर अल असद के कठोर समर्थन के नाम पर रूस ने सीरिया में सैन्य अड्डा बना लिया। वहीं बशर के शिया होने और अधिकांश जनता के सुन्नी होने के कारण ईरान भी बशर समर्थकों के रूप में शामिल हो गया। ईरान के अलावा तुर्की और चीन जैसे देश भी सीरिया के पीछे खड़े हैं। शुरू में ईरान के शिया लड़ाके हिजबुल्लाह, सीरिया-ईरान सीमा पर केवल निगरानी का काम करते थे, लेकिन बाद में सीरिया, रूस के साझा अभियान में हिजबुल्लाह की गतिविधियां तेज हो गर्इं। दूसरी ओर, अमेरिका भी वर्चस्व की इस लड़ाई में शामिल हो गया। अमेरिका ने बशर को आतंकवादी करार देकर उनके खिलाफ संघर्षरत आतंकी समूहों को पूर्ण समर्थन प्रदान किया। ऐसे में क्षेत्रीय प्रभुत्व और सुन्नी वर्चस्व स्थापित करने के लिए सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात भी अमेरिकी समूह में शामिल हो गए। अमेरिकी गठबंधन सेना में अमेरिका के अलावा ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और आस्ट्रेलिया शामिल हैं। तुर्की भी सीरिया संकट में एक महत्त्वपूर्ण बाहरी शक्ति है। नाटो का सदस्य तुर्की वैसे तो अमेरिकी मित्र समूह में शामिल है। लेकिन कुर्दों को लेकर अमेरिका और तुर्की का तनाव अभी चरम पर है। अभी यह तनाव उत्तरी सीरिया के मनबिच में अमेरिका द्वारा कुर्दों को समर्थन देने से हुआ है। अमेरिका ने 2016 में कुर्दों को समर्थन देकर मनबिच मिलिट्री कमीशन का गठन किया था। पिछले साल कुर्द लड़कों के खिलाफ कार्रवाई की तुर्की की धमकी के बाद अमेरिका ने यहां अपनी सेना तैनात कर दी। पिछले साल ही पहली बार तुर्की ने रूस के साथ मिल कर सीरिया में हवाई हमले भी किए। अब तो तुर्की ने इस लड़ाई का विस्तार इराक तक करने की धमकी दे दी डाली है। अगर ऐसा हुआ तो सीरिया संकट की विभीषिका में अप्रत्याशित वृद्धि हो जाएगी। छह साल पहले जब सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद के नेतृत्ववाली सरकार और विद्रोहियों के बीच पहली बार संघर्ष विराम की सहमति बनी थी तो पूरी दुनिया को लगा था कि सीरिया संकट समाप्त हो गया है। लेकिन 2013 में सीरिया ने विद्रोहियों के खिलाफ जब बड़े पैमाने पर रासायनिक हथियार इस्तेमाल किए तो हालात फिर से बिगड़ गए। इस हमले में तेरह सौ से ज्यादा लोग मारे गए थे।

वर्ष 2017 में पुतिन और ट्रंप की मित्रता से सीरिया संकट के समाधान की उम्मीदें जागी थीं, लेकिन सीरिया संकट तो खत्म नहीं हुआ, बल्कि सीरिया के कारण ट्रंप और पुतिन की दोस्ती जरूर टूट गई। उत्तरी सीरिया के इदबिल प्रांत के खान शेखहुन में रासायनिक हमलों के बाद सैकड़ों लोग मारे गए। इसके जवाब में अमेरिका ने सीरिया के हवाई ठिकानों पर मिसाइलों से ताबड़तोड़ हमले किए। यहीं से रूस और अमेरिका के बीच की दोस्ती, दुश्मनी में बदल गई। मध्य पूर्व में जब भी तनाव फैलता है, तो वहां के विभिन्न देशों में काम करने वाले अस्सी लाख भारतीयों के जीवन पर असर पड़ने का खतरा हो जाता है। ये भारतीय हर साल अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा भेजते हैं जो देश की अर्थव्यवस्था के लिए महत्त्वपूर्ण है। इजराइल के भी सीरिया संकट में कूदने से जहां इजराइल और सऊदी अरब में ईरान के विरुद्ध तनाव में वृद्धि हुई है वहीं जैसा तुर्की धमकी दे रहा है कि वह इस युद्ध को इराक तक ले जाएगा, तो मामला और भी गंभीर हो जाएगा। इस बढ़ते तनाव का असर कच्चे तेल के उत्पादन पर भी पड़ सकता है। भारतीय अर्थव्यवस्था की दशा और दिशा काफी हद तक कच्चे तेल के आयात से तय होती है, क्योंकि हम अपनी जरूरत का बयासी फीसद कच्चा तेल आयात करते हैं। सीरिया संकट मानवता के लिए गंभीर संकट है। यह संकट अभी तक मध्यपूर्व को ही प्रभावित कर रहा था, लेकिन जिस तरह अमेरिका और रूस दोनों एक-दूसरे को उकसा रहे हैं, उससे स्थिति अति विस्फोटक हो सकती है। इसलिए वर्तमान स्थिति में यह आवश्यक है कि अमेरिका और रूस युद्ध का माहौल बनाने से बचें।

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