ताज़ा खबर
 

राजनीति: प्रदूषण नियंत्रण की चुनौती

यह हवा ही है जो प्रदूषण को अन्यत्र पहुंचाती है। गंगा-यमुना का मैदानी क्षेत्र हिमालय व विध्यांचल पर्वत मालाओं के बीच का क्षेत्र है। यह विभिन्न वायु धाराओं से अक्सर प्रभावित रहता है। इसलिए एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में निर्माण या औद्योगिक गतिविधियों के प्रदूषक भी पहुंच सकते हैं। नाइट्रोजन प्रदूषण की स्थितियों में सौर विकिरण प्रक्रिया से जमीन की सतह के पास ओजोन निर्माण के कारण धुंध भी बढ़ सकती है। ओजोन जनित प्रभाव भी कम गंभीर नहीं होते हैं।

Author October 31, 2018 2:27 AM
दिल्ली सरकार ने नवंबर 2017 के पहले हफ्ते में स्मॉग के कारण आपातस्थिति घोषित कर दी थी।

वीरेंद्र कुमार पैन्यूली

दिल्ली की वायु गुणवत्ता हाल के वर्षों में अच्छी नहीं रही है। साल 2014 में तो विश्व स्वास्थ्य संगठन ने हवा में तैरते सबसे घातक 25 पीएम (पार्टिक्युलेट मैटर) के प्रदूषक कणों के आधार पर दिल्ली को सबसे प्रदूषित राजधानी माना था। यहां प्रदूषक कणों की घातकता सर्दियों में बेहद खतरनाक स्तर तक पहुंच जाती है। वायु गुणवत्ता सूचकांक तीन सौ भी पहुंच जाए तो चिंता की बात है। लेकिन पिछले साल यह कानपुर, लखनऊ जैसे शहरोंं और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में चार सौ नब्बे अंक को भी पार कर गया था। इस बार अभी से राजधानी की हवा खराब हो गई है। दिल्ली सरकार आश्वस्त कर रही है कि वह स्थितियों पर निगाह रखे हुए है और जरूरत पड़ेगी तो वे सब कदम उठाए जाएंगे जो 2017 में उठाए गए थे। उधर कुछ लोग अध्ययन से सिद्ध करते रहे हैं कि इन कदमों का प्रभाव ऊंट के मुंह में जीरा जैसा होता है और अंतत: भगवान भरोसे ही रहना पड़ता है। प्रदूषण नियंत्रण के प्रशासनिक कदमों में स्कूलों को बंद किया जा सकता है। भारी वाहनों के दिल्ली में प्रवेश और सड़क-भवन निर्माण कार्यों पर रोक लगाई जा सकती है। सम-विषम नंबरों से तय दिनों पर ही वाहनों को सड़कों पर आने की अनुमति दी सकती है। पानी का छिड़काव हो सकता है। कूड़ा जलाने वालों और धुआं छोड़ते वाहनों के मालिकों को दंडित किया जा सकता है आदि-आदि। आर्थिक रूप से जो संपन्न हैं, उन्हें ज्यादा से ज्यादा समय तक एसी चलाए रखने की सलाह दी जा सकती है। मास्क पहनने, सुबह-शाम घर से कम बाहर न निकलने, खुले में कसरत न करने, खेल न खेलने आदि तमाम सुझाव दिए जा सकते हैं। लेकिन दिहाड़ी मजदूर कहां जाएंगे? लाखों लोगों के सामने सर्दी से राहत के लिए अलाव जलाने की मजबूरी भी होगी। ऐसे समय में हवा में पीएम-10 प्रदूषकों का स्तर भी मानक से नौ-दस गुना ज्यादा तक पहुंच सकता है। अगर हवा की गति कम रही तो प्रदूषण का स्तर काफी बढ़ सकता है।

दिल्ली सरकार ने नवंबर 2017 के पहले हफ्ते में स्मॉग के कारण आपातस्थिति घोषित कर दी थी। इस वर्ष भी स्थितियां उसी तरफ बढ़ रही हैं। राजधानी क्षेत्र के आसपास पराली जलाना शुरू हो गया है। सुबह-रात का तापमान गिरने लगा है, आद्रता भी बढ़ने लगी है। आसमान में धुंध की परत और वायु की गुणवत्ता नीचे आने लगी है। इन स्थितियों की लगातार निगरानी और चेतावनी जारी करने की प्रणालियां फिर सक्रिय की जा रही हैं। स्मॉग शब्द एक बार फिर आम बोलचाल में आने लगा है। स्मॉग अंग्रेजी शब्दों ‘स्मोक’ व ‘फॉग’ के जोड़ से बनाया गया है अर्थात धुएं और कोहरे का सम्मिश्रण। स्मॉग की वजह से वायु-गुणवत्ता और दृश्यता घट जाती है। ऐसे में गाड़ियों का धुआं और सड़कों की धूल के कण लंबे समय तक हवा में बने रहते हैं। तापमान में कमी के चलते ये बहुत अधिक ऊपर नहीं जाते हैं। वैसे हमेशा की तरह प्रदूषण के कारण दिल्ली के भीतर पैदा आपात स्थितियों का दोष केवल पड़ोसी राज्यों में लाखों टन धान की पराली और जलाने पर ही नहीं ही लगाया जा सकता है। पराली जलाने से निस्संदेह प्रदूषक कण बढ़ते हैं लेकिन वाहनों या औद्योगिक इकाइयों के सापेक्ष घातक रासायनिक प्रदूषण आनुपातिक रूप से वायुमंडल में उतना नहीं जाता है। हमें कुप्रभावों को सीमित संसाधनों के बीच कम करने की रणनीति में केवल धुएं और विषैले धुएं वाले कोहरे में अंतर करना होगा। पराली जलाने से दिल्ली तक पहुंचता धुआं भी नवंबर का चौथे सप्ताह आते-आते खत्म हो जाएगा लेकिन इसके बाद भी यहां वायु प्रदूषण की स्थिति गंभीर स्तर पर ही बने रहने की आशंका रहती है।

2017 में पटाखे जलाने पर रोक के बावजूद दिवाली के बाद के दिनों में वायु की गुणवत्ता काफी खराब रही थी। उसी दौरान राष्ट्रीय हरित अधिकरण को पंद्रह नवंबर को दिल्ली सरकार को चेताना पड़ा था कि सुप्रीम कोर्ट की रोक के बावजूद दिल्ली में दस साल पुरानी टैक्सियां क्यों चल रही हैं! तथ्य यह भी है कि 2007 के बाद दिल्ली में निजी वाहनों की संख्या तिगुनी हुई है। इसी तरह खुले में कूड़ा जलाने पर कानूनी रोक तो लगी है पर आज भी कई-कई एकड़ में फैले डलावघरों में सालों साल क्षमता से कहीं ज्यादा मीथेन जैसी ज्वलनशाील गैसें पैदा करने वाला कूड़ा जमा होता रहता है। उसमें अक्सर आग लगती रहती है और प्रदूषक पैदा होते हैं। पतझड़ आएगा तो लाख रोकने पर भी पत्तियां जलाई जाएंगी ही। आवासीय व व्यावसायिक संस्थानों में बिजली व जल आपूर्ति की बाधित या खराब स्थिति के कारण जेनरेटर सेट चलाए ही जाएंगे, उनसे भी प्रदूषण पैदा होगा। औद्योगिक प्रदूषण भी जारी रहेगा। जगह-जगह भवनों या अन्य संरचनाओं के कारण खुली जगह में जो कमी आ रही है, उससे स्थानीय स्तर पर वायु प्रवाह में भी दिक्कत हो रही है। इससे भी प्रदूषण आसपास ही मंडराता रहता है।

जीवाश्म र्इंधन जलाने या औद्योगिक प्रदूषण से कार्बन, सल्फर या नाइट्रोजन के आक्साइड जब वायुमंडल में पहुंच कर स्मॉग का हिस्सा हो जाते हैं तो वे तेजाब पैदा करते हैं। इससे तेजाबी बरसात होती है। इस बरसात के बाद वायु तो कम प्रदूषित हो जाती है, लेकिन वही बरसात वनस्पति, जमीन, खेती, जल स्रोतों, भवनों पर गिर कर उन्हें नुकसान पहुंचा सकती है। हवा में मौजूद प्रदूषक कणों के संदर्भ में ताजमहल के बदरंग होने या कमजोर पड़ने की चिंता की ही जाती रही है। इससे पेड़ों को जमीन से मिलने वाले पोषक तत्त्व कुप्रभावित होते हैं। तालाबों-नदियों के जलचर पीड़ित हो जाते हैं। भवनों की धातु संरचनाओं का क्षरण होने लगता है। इसलिए अच्छा यही रहेगा कि ऐसे उपाय किए जाएं कि सल्फर, नाइट्रोजन व कार्बन का प्रदूषण वायुमंडल में कम से कम पहुंचे । हमें समझ लेना चाहिए कि यह हवा ही है जो प्रदूषण को अन्यत्र पहुंचाती है। तभी तो दिल्ली वाले कह रहे हैं कि पड़ोसी राज्यों से प्रदूषण यहां पहुंच रहा है। गंगा-यमुना का मैदानी क्षेत्र हिमालय व विध्यांचल पर्वत मालाओं के बीच का क्षेत्र है। यह विभिन्न वायु धाराओं से अक्सर प्रभावित रहता है। इसलिए एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में निर्माण या औद्योगिक गतिविधियों के प्रदूषक भी पहुंच सकते हैं। नाइट्रोजन प्रदूषण की स्थितियों में सौर विकिरण प्रक्रिया से जमीन की सतह के पास ओजोन निर्माण के कारण धुंध भी बढ़ सकती है। ओजोन जनित प्रभाव भी कम गंभीर नहीं होते हैं। कुल मिला कर केवल पानी, हवा और सूर्य की किरणों पर प्रदूषण छितराने की निर्भरता रखना वैज्ञानिक दृष्टि से भी ठीक नहीं है। नवाचारी टेक्नोलॉजी और पद्धतियों के अनुसंधान पर काम करना ही होगा क्योंकि पानी, हवा और सूर्य किरणें कुछ रासायनिक प्रक्रियाओं के साथ जीव, वनस्पति जगत, प्राकृतिक व मानव संपदा पर वायुमंडल में मौजूद स्मॉग के कुप्रभावों को बढ़ा भी सकते हैं। खासकर जलवायु बदलाव के दौर में मौसम कब क्या करवट ले ले, यह कहा नहीं जा सकता है। साल में विभिन्न कारणों से स्थानीय स्तर पर घातक वायु प्रदूषण की स्थितियां कभी भी आ सकती हैं इसलिए हर समय न बारिश की अपेक्षा की जा सकती है, न तेज हवाओं या कुहासे को चीरने वाली सूरज की किरणों की जो प्रदूषण को कम कर दें या छितरा दें। आखिर वह प्रदूषण कहीं न कहीं तो जाएगा ही। यह तो कारपेट के नीचे धूल डाल कर साफ होने का भ्रम पालना हुआ।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App