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राजनीति: आत्ममुग्धता के उपकरण

समाजशास्त्रियों के मुताबिक सेल्फियों और ट्विटर-फेसबुक के जरिए सतत संपर्क में रहने की सुविधा ने लोगों को एक तरह के आवेगपूर्ण जीवन में धकेल दिया है, जहां मानसिक शांति की कोई जगह नहीं हैं। वे कहते हैं कि आज फेसबुक-ट्विटर के रूप में सोशल मीडिया का पोस्ट बॉक्स हमारे साथ हमेशा चलता है, जिसने कोई बात कहने, उसे थोड़े इंतजार के बाद कहीं पहुंचने से मिलने वाले आनंद को खत्म कर दिया है।

Author November 7, 2018 2:28 AM
फीलिंग यूनीक डॉट कॉम नामक वेबसाइट ने किया है, जिसके अनुसार स्मार्टफोन की दीवानगी एक मानसिक विकार के रूप में सामने आ रही।

मोबाइल फोन के कई नकारात्मक पक्ष हैं। कैमरे वाले मोबाइल फोन यानी स्मार्टफोन ने दुनिया को इस कदर आत्ममुग्ध और आत्मकेंद्रित बना दिया है कि लोग अब यह तक नहीं देख पाते हैं कि जिस जगह वे मौजूद हैं, वहां आसपास क्या हो रहा है। अफसोस की बात है कि अमृतसर में दशहरे के दिन रेल पटरी के नजदीक रावण दहन देख रहे सैकड़ों लोग वहां तेज रफ्तार ट्रेन की चपेट में आ गए। इनमें से करीब साठ लोगों का कुचल कर मर जाना और छह दर्जन से ज्यादा लोगों का घायल हो जाना जहां प्रशासन की घोर लापरवाही का सबूत है, वहीं यह भी साबित करता है कि लोगों को स्मार्टफोनों ने अपने आसपास के माहौल से जानलेवा हद तक बेखबर बना दिया है। इनमें से ज्यादातर लोग अपने मोबाइल से रावण दहन का वीडियो बना और सेल्फी भी ले रहे थे। वे उस वक्त इस काम में इतने तल्लीन थे कि उन्हें आती हुई न तो ट्रेन दिखाई दी और न उसका हॉर्न सुनाई दिया। कुछ साल पहले स्पेन में एक भीषण ट्रेन हादसा इस वजह से हुआ था कि उसका ड्राइवर ट्रेन की स्पीड का फोटो सोशल मीडिया पर अपलोड करने में मशगूल था और वह सामने आते तीखे मोड़ की तरफ ध्यान नहीं दे पाया। इससे तेज गति से चल रही तेज रफ्तार ट्रेन पटरी से उतर कर नजदीकी इमारत से टकरा गई और दुर्घटना में अस्सी जानें चली गर्इं।

हमारे देश में स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते समय हुई दुर्घटनाओं की लंबी फेहरिस्त है। नौजवानों में किसी घटना या स्थान का वीडियो बनाने और सेल्फी लेने का शौक इतना अधिक जानलेवा हो गया है कि शायद ही अब कोई हफ्ता गुजरता हो जब इस कारण किसी दुर्घटना की खबर न आती हो। पर क्या इन्हें सिर्फ दुर्घटना माना जाए? असल में, ये सारी दुर्घटनाएं एक सामाजिक समस्या का संकेत दे रही हैं। समस्या आत्म-प्रदर्शन की है। दुनिया में जबसे मोबाइल क्रांति हुई है, जबसे फेसबुक-ट्विटर-इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया के तौर-तरीके अस्तित्व में आए हैं, लोगों में दिखावा करने की यह प्रवृत्ति आसमान पर पहुंच गई है। फ्रंट कैमरे से खुद की फोटो खींचने और वीडियो बनाने की सुविधा देने वाले स्मार्टफोनों के अस्तित्व में आने के बाद तो जैसे हर कोई बिना किसी औचित्य के ही वीडियो बनाना, फोटो खींचना और सोशल मीडिया पर उन्हें चस्पां करते हुए कमेंट करना और लाइक पाना जरूरी मानने लगा है। लोगों की दिखावा करने की आदत सेल्फी की खोज और चलन के बाद तो जैसे सनक में ही बदल गई है। अजीबोगरीब सेल्फी खींचने के लिए अपने ही सिर पर बंदूक तान लेना, किसी ऊंची इमारत पर जान हथेली पर लेकर चढ़ जाना या तेज गति से बाइक-कार चलाते हुए या ट्रेन की छत पर दौड़ते हुए सेल्फी लेना एक खतरनाक शौक में बदल चुका है।
किशोर और युवा लड़के-लड़कियों में स्टंट सेल्फी का चलन है, तो महिलाएं भी सेल्फी के इस अतिवाद में फंसी हुई हैं। ऐसा करते समय कई बार वे जरूरी सावधानियां नहीं बरततीं और सामान्य शिष्टाचार और शालीनता का ध्यान नहीं रख पाती हैं। कई बार तो मामला हिंसा और अश्लीलता तक पहुंच जाता है। खासकर सेल्फी से जुड़े अध्ययनों से पता चला है कि किशोरियां और युवतियां हर हफ्ते कम से कम पांच घंटे सेल्फी खींचने में बिताती हैं। पिछले साल हुए एक अध्ययन में शामिल सताईस फीसद लड़कियों ने स्वीकार किया कि अगर उन्हें सेल्फी पर तारीफ (लाइक) नहीं मिलती, तो वे उस सेल्फी को सोशल मीडिया से हटा देती हैं।

इसी तरह अमेरिका के हार्वर्ड बिजनेस स्कूल में किया गया एक अध्ययन बताता है कि सत्तर फीसद अमेरिकी सुबह उठ कर अपने परिजनों की खैर-खबर लेने के बजाय सबसे पहले अपने मोबाइल फोन पर देखते हैं कि सोशल मीडिया पर डाले गए वीडियो और फोटो पर क्या और कितनी प्रतिक्रियाएं आर्इं। इस बारे में एक सर्वेक्षण फीलिंग यूनीक डॉट कॉम नामक वेबसाइट ने किया है, जिसके अनुसार स्मार्टफोन की दीवानगी एक मानसिक विकार के रूप में सामने आ रही। अमेरिका की साइकेटिक एसोसिएशन ने तो वीडियो बनाने, फोटो या सेल्फी खींचने के चलन को मेंटल डिसआॅर्डर घोषित कर दिया है। भारतीय मनोवैज्ञानिकों ने भी इसे एक समस्या करार दिया है और सेल्फी खींचते रहने वालों को सचेत करते हुए उनमें मानसिक बीमारी के लक्षणों की मौजूदगी की बात कही है। विडंबना यह भी है कि आज जिस समाज में एक व्यक्ति अपने पड़ोसी को ही नहीं जानता-पहचानता, वहां हर व्यक्ति वाट्स-ऐप पर कोई फोटो, सेल्फी या वीडियो भेज कर दुनिया की तारीफ ‘लाइक्स’ के रूप में पा लेना चाहता है। लेकिन यह मामला सिर्फ झूठी तारीफ पाने या दिखावे का डिजिटल प्रबंध करने मात्र का नहीं है, बल्कि लोग चाहते हैं कि वाट्स-ऐप आदि पर डाली गई तस्वीरें और वीडियो आगे बढ़ाई जाएं, दूसरे लोग उसे साझा करें और झूठ ही सही, उसकी तारीफ करें। लड़कियां-महिलाएं अपनी सुंदरता की तारीफ में दो बोल सुनने के लिए सेल्फी का कुछ ज्यादा ही सहारा लेती हैं। उन्हें फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम पर यह देख कर अच्छा लगता है कि सैकड़ों-हजारों लोगों ने उन्हें पसंद (लाइक) और दूसरों से साझा किया है। उसी तरह अन्य लोग अपने बनाए वीडियो और खींचे गए फोटो को अपनी एक महान उपलब्धि साबित करते हुए उन पर दूसरों की प्रशंसा पाना चाहते हैं।

अब यह समझना जरूरी हो गया है कि मोबाइल फोन (स्मार्टफोन) के वीडियो-फोटो या सेल्फी हमें क्षणिक संतोष भले दें, लेकिन वे हमें एक ऐसे अनदेखे खतरे की तरफ भी धकेलते हैं, जो अक्सर जानलेवा साबित होता है। यह सही है कि स्मार्ट हो चुके मोबाइल फोन जब सतत इंटरनेट से जुड़े रहते हैं तो वह लोगों को इसके लिए प्रेरित करते हैं कि एक तरफ वे दुनिया को हर समय यह अपडेट देते रहें कि वे खुद इस वक्त क्या कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ यह जानने के इच्छुक भी रहते हैं कि दूसरे लोगों की इस समय क्या गतिविधि है। इसे तकनीकी भाषा में ‘कॉन्सटेंट कनेक्टिविटी’ कहते हैं। इसके कुछ फायदे हो सकते हैं, जैसे भारत जैसे देशों में, जहां घर से बाहर निकलती महिलाओं के लिए काफी ज्यादा खतरे हैं। पर यह ‘कॉन्सटेंट कनेक्टिविटी’ एक बुरी लत के रूप में भी सामने आ रही है। समाजशास्त्रियों के मुताबिक सेल्फियों और ट्विटर-फेसबुक के जरिए सतत संपर्क में रहने की सुविधा ने लोगों को एक तरह के आवेगपूर्ण जीवन में धकेल दिया है, जहां मानसिक शांति की कोई जगह नहीं हैं। वे कहते हैं कि आज फेसबुक-ट्विटर के रूप में सोशल मीडिया का पोस्ट बॉक्स हमारे साथ हमेशा चलता है, जिसने कोई बात कहने, उसे थोड़े इंतजार के बाद कहीं पहुंचने से मिलने वाले आनंद को खत्म कर दिया है। आपाधापी से भरे जीवन में व्हाट्सएप, फेसबुक के कमेंट और सेल्फियां कुछ सुकून पैदा करती हों या नहीं, लेकिन वे एक तरह की असुरक्षा की तरफ जरूर ले जाती हैं जिसमें कुछ नया जानने और बताने की इच्छा खतरनाक आवेग की तरह हम पर फट पड़ने को तैयार रहती है। इसलिए अच्छा यही होगा कि अब विज्ञान की इस देन के सर्जनात्मक और सकारात्मक पहलुओं की ओर ध्यान दिया जाए और इसके ठीक वैसे ही उपयोग खोजे जाएं, जैसे कि हरियाणा की एक पंचायत ने ‘सेल्फी विद डॉटर’ नामक अभियान के रूप में कुछ साल पहले खोजा था।

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