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राजनीति: पराली का हल और इच्छाशक्ति

हवा और पानी प्रकृति ने तो कभी प्रदूषित करके हमें नहीं दिए। हमने बिना सोचे-समझे जंगल उजाड़े, नदियों के प्राकृतिक मार्गों में व्यवधान डाले, उनके किनारे कारखाने लगा कर उनका उत्सर्जन बेहिचक नदियों में डाला, शहर दैत्याकर स्तर तक बढ़ चुके हैं, उनका सारा उत्सर्जन गंगा जैसी पवित्र नदी में बेशर्मी से आज भी डाल रहे हैं, दूसरी तरफ गंगा को निर्मल बनाने में हजारों करोड़ खर्च भी कर रहे हैं। इस दौड़ का परिणाम अब सामने आ रहा है।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

दिल्ली की हवा जहरीले स्तर तक प्रदूषित हो रही है। देश के हर बड़े और बढ़ते शहर की स्थिति यही है और ऐसा कई वर्षों से लगातार हो रहा है। संबंधित सरकारें हर बार अक्तूबर और अप्रैल में वायदे करती हैं कि बस, अब आगे से सब ठीक हो जाएगा। किसानों को धान और गेहूं की फसल की कटाई के बाद बचे हुए डंठलों यानी पराली को जलाना नहीं पड़ेगा। इसे काट कर अन्य उपयोग में लाने के लिए व्यवस्था सर्व-उपलब्ध होंगी और किसानों को इससे काफी आमदनी होने लगेगी। सुन कर कितना सुकून मिलता है! जब धान और गेहूं की फसलों की कटाई हाथों से होती थी, तब फसल जड़ के पास से काटी जाती थी। अनाज निकालने के बाद पराली के अन्य कई उपयोग किसान स्वयं करता था। अब हाथ से कटाई के लिए मजदूर नहीं मिलते हैं और मशीन से फसल की कटाई सस्ती पड़ती है। कटाई की मशीनें केवल ऊपर से काटती हैं, पूरा डंठल छोड़ देती हैं। पराली के परंपरागत उपयोग किसान जानता है। वह अब यह भी जानता है कि उसे खेत ही में दबा कर खाद के रूप में उपयोग हो सकता है। गत्ता, गैस और बिजली बनाने में भी इसका उपयोग किया जा सकता है। मगर यह सब वह स्वयं तो कर नहीं पाएगा।

प्रदूषण का मीडिया-शोर समाप्त होने के बाद सरकारी तंत्र हर साल सो जाता है। किसानों के लिए इतना तो किया ही जा सकता है कि उन्हें पराली को लेकर चिंता न करनी पड़े, उन्हें जेल और जुर्माने के आतंक में न जीना पड़े। वह तो पहले से ही कितनी ही अन्य समस्याओं से जूझ रहा है। सूखे और बाढ़ से प्रभावित होने पर उसे आज भी अपने भाग्य पर ही छोड़ दिया जाता है। सरकारें भूल जाती हैं कि वह हर प्रयास होना ही चाहिए जो उनकी आय को बढ़ा सके और पराली से ऐसा हो सकता है और वह उनकी अतिरिक्त आय का साधन बन सकती है। अपेक्षा तो यह थी कि इस वर्ष सितंबर महीने में संबंधित राज्य सरकारें घोषणा करतीं कि आगे से हर किसान को पराली काटने का सुविधाजनक विकल्प उपलब्ध होगा, सरकारी तंत्र उसे उठाएगा और किसान को उसके घर पर ही मुआवाज देगा। यह असंभव नहीं था, मगर इच्छाशक्ति, ईमानदारी और कर्मठता के सरकारी तंत्र के गिरते स्तर इसके आड़े आ जाते रहे हैं। सर्वोच्च न्यायलय का आदेश है कि पराली न जलाई जाए, अपनी स्थापित प्रकृति के अनुरूप सरकारों ने जुर्माना वसूलना प्रारंभ कर दिया है। मगर देश भर के किसानों के प्रति जिस संवेदना की दुहाई हर सरकार पिछले सत्तर सालों से देती आ रही है, वह तो कहीं रंचमात्र भी नजर नहीं आती है। समस्या यहीं पर है, किसान आज भी पंक्ति के अंतिम छोर पर ही खड़ा है। अपनी तकलीफें वह जाने, सरकारें बड़े कामों में व्यस्त हैं, उनके पास पुलिस है, जुर्माना है, जेल है! हर वर्ष खरीफ और रवी की फसल के काटने के बाद संचार माध्यम प्रतिदिन दिल्ली की हवा पर आंकड़े देते हैं, बच्चों, बड़ों और सांस के मरीजों, गर्भवती महिलाओं के प्रति चिंता भी व्यक्त की जाती है। ऐसे बयान निरंतरता से आते हैं कि समस्या का समाधान बस होने ही वाला है! पर, समस्या जहां की तहां बनी रहती है।

हवा और पानी के लगातार बढ़ते प्रदूषण में सरकारी तंत्र की असफलता के परिणाम हर तरफ दिखाई देते हैं। दिल्ली के स्कूलों में जाकर देखा जा सकता है कि वायु प्रदूषण का कितना खतरनाक प्रभाव बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ता है। वायु प्रदूषण का निमोनिया, ब्रांकाइटिस, अस्थमा और कई अन्य बीमारियों से सीधा संबंध है। यह फेफड़े और मष्तिष्क के विकास को भी प्रभावित करता है। बच्चों की रोग निरोधक क्षमता भी इससे प्रभावित होती है और प्रभाव जीवन भर बने रह सकते हैं। यह भी स्थापित हो चुका है कि बच्चे बहुत कम उम्र में अनेक प्रकार की एलर्जी से ग्रसित हो जाते हैं जिनमे कुछ तो जीवनभर तकलीफ देती हैं। बच्चों के स्वास्थ्य दुष्प्रभाव केवल पराली से प्रदूषित होने वाली हवा से ही नहीं, अन्य अनेक प्रकार से भी पड़ रहा है। चिंता तो इस तथ्य की है कि इसकी गहनता को अभी भी समुचित ध्यान नहीं दिया जा रहा है। गांधीजी के जन्म के एक सौ पचासवें वर्ष में ‘स्वच्छ भारत-स्वस्थ भारत’ का सपना पूरा करने के लिए केंद्र सरकार ने विस्तृत कार्यक्रम घोषित किया है। राज्य सरकारें भी यदि इसकी महत्ता को विस्तृत पटल पर परख सकें और उसमें सहयोग दे सकें, तो लक्ष्य प्राप्ति में अधिक सफलता मिल जाएगी। घरों में शौचालय अवश्य चाहिए, मगर जिन सार्थक परिणामों की अपेक्षा की जा रही है, वे वायु तथा जल के बढ़ते प्रदूषण के प्रभाव में कितने कारगर हो पाएंगे? यहां यह याद करना भी उचित होगा कि जिस विकास की अवधारणा को देश ने आजादी के बाद अपनाया और बापू के चिंतन और दर्शन को भुलाया, वह पश्चिम की नकल ही थी। भारत की आवश्यकताओं से वह आज भी जुड़ नहीं पाई है।

वर्ष 1909 में ही गांधीजी ने विकास की पश्चिमी अवधारणा का भविष्य देख लिया था और उसे आत्मघाती राक्षसी सभ्यता कहा था। आज इसी के कारण लाखों-करोड़ों लोगों का विस्थापन हो रहा है, प्रकृति का भीषण दोहन हो रहा है। हर तरफ मुनाफाखोरी की दौड़ चल रही है। पर्यावरण एक तरफ नष्ट किया जा रहा है और दूसरी तरफ खानापूरी के लिए उसे बचाने के उपाय बताए जा रहे हैं। मानव अपना मूल कर्तव्य ही भूल गया है कि इसे बनाए रखना उसी की जिम्मेवारी है और यदि वह इसमें असफल होगा तो पृथ्वी पर उसका अस्तित्व ही नष्ट हो जाएगा। हवा और पानी प्रकृति ने तो कभी प्रदूषित करके हमें नहीं दिए। हमने बिना सोचे-समझे जंगल उजाड़े, नदियों के प्राकृतिक मार्गों में व्यवधान डाले, उनके किनारे कारखाने लगा कर उनका उत्सर्जन बेहिचक नदियों में डाला, शहर दैत्याकर स्तर तक बढ़ चुके हैं, उनका सारा उत्सर्जन गंगा जैसी पवित्र नदी में बेशर्मी से आज भी डाल रहे हैं, दूसरी तरफ गंगा को निर्मल बनाने में हजारों करोड़ खर्च भी कर रहे हैं। इस दौड़ का परिणाम अब सामने आ रहा है।

मनुष्य की प्रकृति के प्रति ही नहीं, अपनों तक से संवेदानात्मक जुड़ाव टूटता जा रहा है। हर तरफ मानव मूल्यों का क्षरण हो रहा है, मानवीयता घट रही है, सामजिक व्यवस्था में भी अमानवीकरण तेजी से बढ़ता जा रहा है। हम मोबाइल, टीवी, सस्ती हवाई यात्रा, प्लास्टिक, अंग्रेजी माध्यम, ग्रीन कार्ड, गगनचुंबी इमारतों को विकास मान कर प्रसन्न हो रहे हैं। आज भी देश के अनेक छोटे-छोटे जिलों, कस्बों और गांव से रोजगार की तलाश में दिल्ली आने वाले परिवार मनुष्य के लिए अत्यंत ही अशोभनीय और अस्वीकार्य रिहायशी बस्तियों में रहने को मजबूर हैं। प्रदूषित हवा और पानी और अस्वच्छता ही उनकी भी नियति बन जाती है। प्रकृति मनुष्य को बार बार चेतावनी देती है, मगर उसे न समझना और हर प्राकृतिक नियम का उल्लंघन कर शोषण करनेवालों को यह भी याद रखना ही होगा कि ईश्वर माफ कर देता है, मगर प्रकृति माफ नहीं करती है। समाधान अनेक हैं। सरकार या कुछ बड़े कारपोरेट घराने, या दोनों मिलकर आगे आकर किसानों को आवश्यक उपकरण उपलब्ध करा दें तो करोड़ों बच्चे जहरीली हवा से बच जाएंगें, किसानों को जुर्माना नहीं देना पड़ेगा, अपमान नहीं सहना होगा और पराली उनका सरदर्द नहीं बनेगी, उसे जलाने के लिए उन्हें जेल नहीं जाना पड़ेगा! विश्व के धनी लोगों की सूची में नाम लिखा लेना एक पक्ष है मगर ‘सर्व भूत हिते रत:’ का तात्पर्य समझ पाकर धन का सदुपयोग का पाना विरले लोगों की नियति हो हो सकती है।

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