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राजनीति: मानव विकास सूचकांक में पिछड़ता भारत

मानव विकास सूचकांक में पिछले साल के मुकाबले भारत एक पायदान और नीचे फिसल गया है। इसमें स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों की अनदेखी के परिणामों से अवगत कराया गया है। साथ ही इस तथ्य पर भी प्रकाश डाला गया है कि व्यक्ति का मानव पूंजी के रूप में निर्माण सड़क, पुल और भौतिक पूंजी बनाने जितना ही जरूरी है और ये दोनों मिल कर ही आर्थिक विकास को गति दे सकते हैं।

तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है।

यह चिंताजनक है कि मानव विकास सूचकांक में भारत लगातार पिछड़ रहा है। इस खराब प्रदर्शन को लेकर देश के भीतर ही सूचकांक के मानकों पर विमर्श खड़ा हो गया है। हाल ही में विश्व बैंक द्वारा जारी मानव विकास सूचकांक में शामिल कुल एक सौ सत्तावन देशों में भारत एक सौ पंद्रहवें पायदान पर है। सूचकांक में पहला स्थान सिंगापुर का है और अंतिम पायदान पर मध्य अफ्रीकी देश चाड है। गौरतलब है कि मानव विकास सूचकांक में पिछले साल के मुकाबले भारत एक पायदान और नीचे फिसल गया है। इसमें स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों की अनदेखी के परिणामों से अवगत कराया गया है। साथ ही इस तथ्य पर भी प्रकाश डाला गया है कि व्यक्ति का मानव पूंजी के रूप में निर्माण सड़क, पुल और भौतिक पूंजी बनाने जितना ही जरूरी है और ये दोनों मिल कर ही आर्थिक विकास को गति दे सकते हैं।

हालांकि भारत में मानव विकास सूचकांक को लेकर सरकारी महकमे में नाराजगी है। वित्त मंत्रालय का तर्क है कि इस सूचकांक को मापने के मानक बहुत धीमी गति से परिणाम दिखाने और हतोत्साहित करने वाले हैं। पर अर्थशास्त्रियों की मानें तो भारत, जो विश्व बैंक की ‘ईज ऑफ डूइंग रिपोर्ट’ रैंकिंग में सुधार पर गर्व करता है, उसके सिर्फ रैंकिंग में पीछे रहने के कारण इस सूचकांक को खारिज करना अच्छी बात नहीं है। यहां यह भी ध्यान देना होगा कि यह रिपोर्ट जारी होने से पहले संयुक्त राष्ट्र के मानव विकास सूचकांक यानी एचडीआई 2018 में भारत एक सौ नवासी देशों की सूची में एक सौ तीसवें स्थान पर था। ऐसे में उचित होगा कि भारत रैंकिंग में अपने गरीब पड़ोसियों से भी निचले पायदान पर होने के कारणों का संज्ञान लेते हुए अपनी प्राथमिकता तय करे। पर यह तभी संभव होगा जब सरकार द्वारा शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, उद्योग-धंधे और रोजगार के मामले में सकारात्मक कदम उठाए जाएंगे।
आंकड़ों पर गौर करें तो दुनिया में युवाओं की आबादी एक अरब अस्सी करोड़ है, जिसमें साढ़े चौंतीस करोड़ भारतीय हैं। इन साढ़े चौंतीस करोड़ में पंद्रह से तीस साल की उम्र के युवाओं की संख्या सबसे अधिक है। लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मसलों पर तस्वीर भयावह है। सूचकांक में शिक्षा के अवसर की उपलब्धता के मामले में भारत को एक सौ बत्तीसवां स्थान मिला है। शिक्षा में सुधार की रफ्तार इसी तरह रही तो भारत को शिक्षा के स्तर को शीर्ष पर ले जाने में सवा सौ साल से ज्यादा लग जाएंगे। अगर भविष्य में भारत को सकल दाखिला अनुपात का लक्ष्य हासिल करना है तो शोध छात्रों की संख्या बढ़ाने के साथ आने वाले वर्षों में विश्वविद्यालयों में बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करना होगा। मौजूदा समय में देश में तकरीबन पांच सौ विश्वविद्यालय और बाईस हजार कॉलेज हैं। लेकिन इनसे उच्च शिक्षा की सुलभता साकार नहीं हो रही है। अध्यापकों की भी भारी कमी है। एक आंकड़े के मुताबिक हर विश्वविद्यालय में तकरीबन पैंतालीस से बावन फीसद शिक्षकों के पद रिक्त हैं। इनमें पैंतालीस फीसद प्रोफेसरों के और इक्यावन फीसद रीडरों के पद रिक्त हैं। एक आंकड़े के मुताबिक अड़तालीस से अड़सठ फीसद शिक्षकों के सहारे पठन-पाठन का काम चलाया जा रहा है।

कुछ ऐसा ही बुरा हाल सेहत और स्वास्थ्य के मोर्चे पर भी है। वैश्विक युवा सूचकांक में भारत को स्वास्थ्य की बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने के मामले में एक सौ सोलहवां स्थान मिला है। इस मामले में हालात किस कदर बदतर हैं, यह इसी से समझा जा सकता है कि भारत विश्व की सर्वाधिक बीमारियों का बोझ उठाने वाला देश बन चुका है। भारत लाख प्रयासों के बावजूद गैर-संक्रामक रोगों से निपटने में विफल है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े पर विश्वास करें तो भारत में गैर-संक्रामक रोगों से मरने वाले लोगों की आशंका 26.1 से बढ़ कर 26.2 फीसद तक पहुंच गई है। इनमें युवाओं की तादाद सर्वाधिक है। भारत के महापंजीयक द्वारा जारी रिपोर्ट में भी कहा जा चुका है कि देश के पैंतीस से चौंसठ वर्ष आयु वर्ग के लोगों में बयालीस फीसद मौतों की वजह गैर-संक्रामक रोग हैं। हालांकि भारत सरकार गैर-संक्रामक रोगों से निपटने के लिए भारी धनराशि खर्च कर रही है, लेकिन उसके अपेक्षित परिणाम देखने को नहीं मिल रहे हैं। स्वास्थ्य और सेहत के मोर्चे पर विफलता का एक अन्य कारण युवाओं में बढ़ती नशाखोरी की प्रवृत्ति भी है। भारत में यह कुप्रवृत्ति अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों से भी अधिक है। भारत में नशाखोरी की वजह से हर वर्ष तकरीबन छह लाख से अधिक लोगों की मौत होती है जिनमें दो लाख से ज्यादा युवा होते हैं। अगर नशाखोरी पर नियंत्रण लगता है तो निस्संदेह सेहत और स्वास्थ्य के मोर्चे पर स्थिति सुधरेगी।

सूचकांक में नौकरी और रोजगार के मामले में भारत को एक सौ बावनवां स्थान मिला है। गौर करें तो इसके कई कारण हैं। एक तो युवाओं की आबादी के लिहाज से सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र में नौकरियों की कमी है, वहीं दूसरी ओर शिक्षा भी रोजगारपरक नहीं है। एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में हर दस युवाओं में से महज एक युवा को किसी तरह का कारोबारी प्रशिक्षण हासिल है। यानी पंद्रह से उनसठ आयु वर्ग के सिर्फ 2.2 फीसद लोगों ने औपचारिक और 8.6 फीसद लोगों ने अनौपचारिक रूप कारोबारी प्रशिक्षण हासिल किया है। अगर दोनों को जोड़ दें तो यह आंकड़ा 10.8 फीसद ठहरता है। लेकिन जिस गति से देश में बेरोजगारी की दर में वृद्धि हो रही है, उस हिसाब से कारोबारी प्रशिक्षण की यह उपलब्धि ऊंट के मुंह में जीरा समान है। इस समय देश में नौजवानों का रुझान मेडिकल और इंजीनियर क्षेत्रों को लेकर ज्यादा है। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि इस क्षेत्र में भी रोजगार हासिल करने के लिए सिर्फ ढाई फीसद नौजवानों के पास शैक्षिक योग्यता है।

हाल ही में श्रम मंत्रालय की इकाई श्रम ब्यूरो की रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि देश में बेरोजगारी दर 2015-16 में पांच फीसद पर पहुंच गई थी, जो पांच साल का सबसे उच्चतम स्तर है। रिपोर्ट के मुताबिक महिलाओं के मामले में बेरोजगारी दर 8.7 फीसद के ऊंचे स्तर पर है, जबकि पुरुषों के सदर्भ में यह 4.3 फीसद है। अखिल भारतीय स्तर पर पांचवें सालाना रोजगार-बेरोजगारी सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक तकरीबन 77 फीसद परिवारों में कोई नियमित आय या वेतन भोगी व्यक्ति नहीं है। रिपोर्ट में पुरुषों की तुलना में महिलाओं के बीच बेरोजगारी दर ज्यादा बताई गई है। शहरी इलाकों में महिलाओं के बीच यह दर 12.1 फीसद है जबकि पुरुषों में 3.3 फीसद और किन्नरों में 10.3 फीसद है। यह स्थिति तब है जब सरकार द्वारा समावेशी विकास के लिए रोजगार सृजन के लिए ‘मेक इन इंडिया’ और ‘स्किल इंडिया’ जैसे कई अभियान चलाए जा रहे हैं। सीआइआइ की इंडिया स्किल रिपोर्ट-2015 बताती है कि भारत में हर साल तकरीबन सवा करोड़ शिक्षित युवा तैयार होते हैं। ये नौजवान रोजगार के लिए सरकारी और निजी क्षेत्र सभी जगह अपनी किस्मत आजमाते हैं। लेकिन सिर्फ सैंतीस फीसद कामयाब हो पाते हैं। इसके दो कारण हैं। एक, यह कि सरकारी क्षेत्र में नौकरियां तेजी घट रही हैं और दूसरा यह कि निजी क्षेत्र में सिर्फ उन्हीं लोगों को रोजगार मिल रहा है जिन्हें कारोबारी प्रशिक्षण हासिल है। अगर भारत को मानव विकास सूचकांक में अपनी स्थिति सुधारनी है तो उसे शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सुरक्षा और रोजगार पर विशेष रूप से फोकस करना होगा।

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