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राजनीति: मुकदमों के बोझ से दबता न्याय

मुवक्किलों के प्रति वकीलों में जवाबदेही के अभाव के कारण अदालतों पर लंबित मुकदमों का बोझ बढ़ रहा है। गौर करें तो अदालतों में छोटे-बड़े लाखों ऐसे मामले होते हैं जिन्हें आसानी से समझौते के आधार पर निपटाया जा सकता है। लेकिन पता नहीं क्यों इस दिशा में ठोस पहल नहीं हो रही है। अदालतों पर बोझ का एक बड़ा कारण यह भी है कि जमानत राशि के अभाव में लोग जमानत से वंचित रह जाते हैं और मुकदमा निपटने में दशकों लग जाते हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

कुछ समय पहले नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड (एनजेडीजी) ने यह खुलासा किया था कि देश भर की निचली अदालतों में ढाई करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित हैं, जिन्हें निपटाने में वर्षों लग जाएंगे। यह चिंताजनक स्थिति है। एनजेडीजी की इस रिपोर्ट में अदालतों में पिछले दस साल या उससे अधिक समय से लंबित मामलों का भी जिक्र किया गया है जिनकी संख्या बाईस लाख नब्बे हजार तीन सौ चौंसठ है। गौर करें, तो यह संख्या कुल लंबित मुकदमों का तकरीबन 8.29 फीसद है। रिपोर्ट के मुताबिक दस साल या उससे अधिक समय से लंबित कुल मामलों में करीब छह लाख दीवानी और सोलह लाख से ज्यादा आपराधिक मुकदमे हैं। अगर राज्यवार आंकड़ों पर गौर करें तो इसमें उत्तर प्रदेश सबसे ज्यादा यानी नौ लाख तेईस हजार तीन सौ चौंसठ लंबित मुकदमों के साथ शीर्ष पर है। इसी तरह बिहार में दो लाख सतहत्तर हजार सात सौ इक्यासी, महाराष्ट्र में दो लाख इकसठ हजार तीन सौ निन्यानवे, पश्चिम बंगाल में दो लाख इकतालीस हजार अट्ठासी, ओड़िशा में एक लाख इक्यासी हजार दो सौ उन्नीस, गुजरात में एक लाख चौहत्तर हजार छह सौ छियानवे, राजस्थान में उनहत्तर हजार पांच सौ आठ, तमिलनाडु में बयालीस हजार एक सौ पच्चीस, कर्नाटक में तैंतीस हजार आठ सौ बावन और मध्यप्रदेश में पंद्रह हजार से ज्यादा मुकदमे लंबित हैं। यानी सभी राज्यों की अदालतों के सिर पर मुकदमों का बोझ एक जैसा है।

उल्लेखनीय है कि न्यायिक व्यवस्था में पारदर्शिता लाने और न्याय वितरण प्रणाली में शामिल पक्षों तक सूचना पहुंचाने के लिए सर्वोच्च अदालत की ई-कमेटी ने नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड पोर्टल की शुरुआत की थी, जिसके जरिए एक क्लिक पर देश भर के सभी राज्यों की जिला अदालतों में लंबित मामलों का डाटा उपलब्ध हो सका है। ऐसा नहीं है कि लंबित मुकदमों का यह आंकड़ा पहली बार सामने आया है। पहले भी इस तरह के आंकड़े सामने आ चुके हैं। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि इन लंबित मुकदमों को निपटाने की दिशा में कोई ठोस पहल होती नहीं दिख रही है। गौर करें तो इतनी बड़ी संख्या में लंबित मुकदमों के कई कारण हैं। इनमें से एक प्रमुख कारण अदालतों में न्यायाधीशों के पदों का रिक्त होना है। अगर देश भर के उच्च न्यायालयों की ही बात करें तो न्यायाधीशों के तकरीबन चवालीस फीसद पद खाली हैं। इसी तरह सर्वोच्च अदालत में भी न्यायाधीशों के कई पद रिक्त हैं। कुछ समय पहले एक न्यायिक कार्यकर्ता ने खुलासा किया था कि उचित प्रबंधन के अभाव में देश की अदालतों में तीन करोड़ से अधिक मुकदमें लंबित हैं, जिन्हें निपटाने में कई दशक लग जाएंगे। इन लंबित मुकदमों के पीछे न्यायधीशों की कमी ही एकमात्र कारण नहीं, बल्कि सुनवाई को बार-बार स्थगित किया जाना भी एक बड़ा कारण है। यदि न्यायिक समय की पचास फीसद भी बर्बादी होती है तो उसकी भरपाई के लिए वर्तमान न्यायाधीशों की संख्या को दोगुना करना होगा। यहां ध्यान देना होगा कि अदालतों में लंबित मुकदमों के लिए न्यायाधीशों की कमी और उचित प्रबंधन का अभाव तो एक प्रमुख कारण है ही, साथ ही लंबित प्रकरणों की बढ़ती तादाद, मुकदमों के निपटान में लगने वाला लंबा समय, बुनियादी सुविधाओं का अभाव और न्यायधीशों की नियुक्ति में देरी भी महत्त्वपूर्ण कारण है।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 31 दिसंबर, 2015 तक सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों सहित देश की सभी अदालतों में दो करोड़ चौंसठ लाख मुकदमे लंबित थे। तीन वर्ष बाद यह संख्या बढ़ कर तीन करोड़ के आसपास पहुंच चुकी है। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि जितने मुकदमों का निपटारा नहीं हुआ, उससे कहीं ज्यादा बोझ अदालतों के सिर बढ़ता गया। मुवक्किलों के प्रति वकीलों में जवाबदेही के अभाव के कारण अदालतों पर लंबित मुकदमों का बोझ बढ़ रहा है। गौर करें तो अदालतों में छोटे-बड़े लाखों ऐसे मामले होते हैं जिन्हें आसानी से समझौते के आधार पर निपटाया जा सकता है। लेकिन पता नहीं क्यों इस दिशा में ठोस पहल नहीं हो रही है। अदालतों पर बोझ का एक बड़ा कारण यह भी है कि जमानत राशि के अभाव में लोग जमानत से वंचित रह जाते हैं और मुकदमा निपटने में दशकों लग जाते हैं। जमानत न मिलने के कारण जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों की संख्या में तेजी से बढ़ रही है। बेहतर होगा कि राज्य सरकारें जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों की जमानत की व्यवस्था करें और उन्हें मुक्त करें। इसमें कोई संदेह नहीं कि देश में न्याय की प्रक्रिया अत्यंत धीमी है और उसका खमियाजा सबसे अधिक गरीब मुवक्किलों को भुगतना पड़ रहा है। इसी को ध्यान में रखते हुए देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस आरएम लोढ़ा ने सुझाव दिया था कि अदालतों को साल में तीन सौ पैंसठ दिन खुलना चाहिए। मुकदमों का बोझ घटाने के लिए इससे बेहतर तरीका कोई और नहीं हो सकता। इसी तरह पूर्व प्रधान न्यायाधीश अल्तमस कबीर ने सभी उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को सुझाव दिया था कि वे अपनी राज्य सरकारों से अधीनस्थ अदालतों में जजों की संख्या दोगुनी करने को कहें। लेकिन विडंबना है कि इस दिशा में अभी तक ठोस व सकारात्मक पहल नहीं हुई है।

विधि आयोग ने 1987 में कहा था कि दस लाख लोगों पर कम से कम पचास न्यायाधीश होने चाहिए। लेकिन आज भी दस लाख लोगों पर न्यायाधीशों की संख्या महज पंद्रह से बीस के आसपास है। गौरतलब है कि 2011 तक न्यायाधीशों के कुल अठारह हजार आठ सौ इकहत्तर पद सृजित थे। आज जब देश की जनसंख्या सवा अरब के पार पहुंच चुकी है तो उचित होगा कि उस अनुपात में न्यायाधीशों और अदालतों की संख्या में भी वृद्धि की जाए। इलाहाबाद उच्च न्यायालय को उत्तर प्रदेश सरकार को ताकीद करना पड़ा था कि राज्य में चौदह हजार सत्ताईस अदालतों का गठन किया जाए। बेंच ने अदालतों के गठन की कार्यवाही का समय भी तीन माह मुकर्रर किया था। बता दें कि उसने यह आदेश एक याचिका पर दिया था, जिसमें महिलाओं पर हो रहे अपराधों की सुनवाई में न्यायाधीशों की कमी के कारण हो रही देरी और परेशानी की बात उठाई गई थी। लेकिन अभी तक अदालतों के गठन का लक्ष्य साधा नहीं जा सका है। जबकि उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक मुकदमें लंबित हैं। अगर उत्तर प्रदेश सरकार अदालतों के गठन की दिशा में कदम उठाती है तो उसे सत्तर हजार से अधिक कर्मचारियों और तकरीबन चौदह हजार न्यायाधीशों की नियुक्ति करनी होगी। लंबित मुकदमों के निस्तारण के लिए त्वरित न्यायालय के गठन की भी आवश्यकता है। सन 2000 में पांच सौ दो करोड़ रुपए की लागत से एक हजार सात सौ चौंतीस फास्ट ट्रैक अदालतों की घोषणा हुई थी। उसके अपेक्षित परिणाम भी देखने को मिले। लेकिन विडंबना यह कि धन के अभाव में इन अदालतों को बंद कर देना पड़ा। लंबित मामलों को निपटाने के लिए अन्य तरीकों पर भी विचार किया जा सकता है। उदाहरण के लिए अमेरिका के पेंसिलवेनिया में देर रात्रि तक न्यायालय चलते हैं। हालांकि भारत के लिए यह विचार कोई नया नहीं है। 2006 में गुजरात में इस तरह का प्रयोग हो चुका है। अमदाबाद में आयोजित सत्रह सांध्यकालीन अदालतों में महज पैंतालीस दिनों में ही सोलह हजार से अधिक मामलों की सुनवाई हुई। अगर पूरे देश में यह व्यवस्था लागू हो तो बेहतर परिणाम आ सकते हैं। लंबित मामलों को निपटारे के लिए दिसंबर 2007 में पंचायत स्तर पर मोबाइल अदालतों की भी स्थापना हुई। पहली मोबाइल अदालत हरियाणा के मेवात जिले में गठित हुई थी। अगर इस पहल को व्यापक आयाम दिया जाए तो निस्संदेह इसके बेहतर परिणाम देखने को मिलेंगे। उचित होगा कि न्यायपालिका और कार्यपालिका दोनों ही जनता को शीघ्र व सस्ता न्याय दिलाने के लिए ठोस पहल करें।

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