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राजनीति: स्कूली शिक्षा में बढ़ता वर्गभेद

यह विडंबना है कि 2010 में शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने बावजूद हमारी स्कूली शिक्षा में वर्गभेद बढ़ता जा रहा है और शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरत कारोबार बनती जा रही है। इधर सरकारी स्कूलों पर लोगों का भरोसा कम हुआ है और उनमें बच्चों की संख्या लगातार घट रही है जबकि निजी स्कूलों में इसका उलटा हो रहा है। पिछले कुछ दशकों के दौरान छोटे शहरों, कस्बों और गांवों तक में बड़ी संख्या में निजी स्कूल खुले हैं, हालांकि इनमें से ज्यादातर की हालत सरकारी स्कूलों से खराब है।

Author November 6, 2018 2:03 AM
आज शिक्षा अधिकार कानून लागू होने के आठ साल बाद भी चुनौतियां बरकरार हैं।

किसी भी प्रगतिशील राष्ट्र के लिए शिक्षा एक बुनियादी तत्त्व है। इसलिए जरूरी हो जाता है कि इसके महत्त्व को समझते हुए सुनिश्चित किया जाए कि समाज के सभी वर्गों के बच्चों को समान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अवसर मिल सके। यह बहुत अफसोसनाक है कि आजादी के सत्तर साल बीत जाने के बाद आज भी भारत अपने सभी बच्चों के स्कूलों में नामांकन को लेकर ही जूझ रहा है। इस दौरान हमारी सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को लेकर आ रही रिपोर्टें, खबरें अमूमन नकारात्मक ही होती हैं। विश्व बैंक की ‘वर्ल्ड डेवेलपमेंट रिपोर्ट 2018- लर्निंग टू रियलाइज एजूकेशंस प्रॉमिस’ में दुनिया के उन बारह देशों की सूची जारी की गई है जहां की शिक्षा व्यवस्था सबसे बदतर है। इस सूची में भारत का स्थान दूसरा है। रिपोर्ट के अनुसार यहां कई साल तक स्कूल जाने के बावजूद लाखों बच्चे न तो पढ़-लिख पाते हैं और न गणित के आसान सवाल हल कर पाते हैं। ज्ञान का यह संकट सामाजिक खाई को और गहरी कर रहा है। इससे गरीबी मिटाने और समाज में समृद्धि लाने के सपने को पूरा नहीं किया जा सकता है।

यह विडंबना है कि 2010 में शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने बावजूद हमारी स्कूली शिक्षा में वर्गभेद बढ़ता जा रहा है और शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरत कारोबार बनती जा रही है। इधर सरकारी स्कूलों पर लोगों का भरोसा लगातार कम हुआ है और उनमें बच्चों की संख्या लगातार घट रही है जबकि निजी स्कूलों में इसका उलटा हो रहा है। पिछले कुछ दशकों के दौरान छोटे शहरों, कस्बों और गांवों तक में बड़ी संख्या में निजी स्कूल खुले हैं, हालांकि इनमें से ज्यादातर निजी स्कूलों की हालत सरकारी स्कूलों से खराब है। इस साल एक अप्रैल को शिक्षा अधिकार कानून को लागू हुए आठ साल पूरे हो चुके हैं। इस कानून तक पहुंचने में हमें पूरे सौ साल का समय लगा है। गोपाल कृष्ण गोखले द्वारा 1910 में सभी बच्चों के लिए बुनियादी शिक्षा के अधिकार की मांग की गई थी मगर आजादी के बाद शिक्षा को संविधान के नीति निर्देशक तत्त्वों में ही स्थान मिल सका। 2002 में भारत की संसद में 86 वें संविधान संशोधन द्वारा इसे मूल अधिकार के रूप में शामिल कर लिया गया और 1 अप्रैल 2010 को ‘शिक्षा का अधिकार कानून 2009’ पूरे देश में लागू हुआ। इसके तहत राज्य सरकारों को सुनिश्चित करना है कि उनके यहां छह से चौदह साल के सभी बच्चों को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा के साथ-साथ अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध हों और इसके लिए उनसे किसी भी तरह का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष शुल्क नहीं लिया जा सकेगा।

आज शिक्षा अधिकार कानून लागू होने के आठ साल बाद भी चुनौतियां बरकरार हैं। पर्याप्त और प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी, शिक्षकों से दूसरे काम कराया जाना, नामांकन के बाद स्कूलों में बच्चों के रुकने और उनके बीच में पढ़ाई छोड़ने देने की दर और संसाधनों की कमी जैसी समस्याएं बनी हुई हैं। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने जुलाई 2017 में पेश अपनी रिपोर्ट में शिक्षा अधिकार कानून के क्रियान्वयन को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट के अनुसार अधिकतर राज्य सरकारों के पास यह भी जानकारी नहीं है कि उनके यहां 14 साल तक की उम्र के बच्चों की संख्या कितनी है। रिपोर्ट के अनुसार देश भर के स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है और बड़ी संख्या में स्कूल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। इन सबका असर शिक्षा की गुणवत्ता और स्कूलों में बच्चों के रुकने पर पड़ रहा है। खुद शिक्षा अधिकार कानून की कई ऐसी समस्याएं हैं जिनका दुष्प्रभाव आज हमें देखने को मिल रहा है। मसलन, यह कानून केवल 6 से 14 साल की उम्र के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देता है और इसमें छह वर्ष से कम आयु वर्ग के बच्चों की कोई बात नहीं की गई है। यानी कानून में बच्चों की स्कूल-पूर्व शिक्षा को नजरअंदाज किया गया है। इसी के साथ 15 से 18 साल आयु समूह के बच्चे भी कानून के दायरे से बाहर किए गए हैं। यानी कक्षा आठ से बारहवीं तक के बच्चों के लिए शिक्षा कोई गारंटी नहीं है जिसकी वजह से उनकी उच्च शिक्षा की संभावनाएं बहुत क्षीण हो जाती हैं। इसी तरह शिक्षा अधिकार कानून अपने मूल स्वरूप में ही दोहरी शिक्षा व्यवस्था को स्वीकार करता है जबकि इसे तोड़ने की जरूरत थी।

निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान मध्यवर्ग के बाद गरीब और वंचित वर्गों के लोगों का भी सरकारी स्कूलों से भरोसा तोड़ने वाला कदम साबित हो रहा है। यह एक तरह से गैर बराबरी और शिक्षा के बाजारीकरण को बढ़ावा देता है और सरकारी स्कूलों में पढ़ने वालों का भी पूरा जोर निजी स्कूलों की ओर हो जाता है। जो परिवार थोड़े-बहुत सक्षम हैं वे अपने बच्चों को पहले से ही निजी स्कूलों में भेज रहे हैं लेकिन जिन परिवारों की आर्थिक स्थिति कमजोर है, कानून द्वारा उन्हें भी इस ओर प्रेरित किया जा रहा है। लोगों का सरकारी स्कूलों के प्रति विश्वास लगातार कम होता जा रहा है जिसके चलते साल दर साल सरकारी स्कूलों में प्रवेश लेने वाले बच्चों की संख्या घटती जा रही है। ऐसा नहीं है कि इससे पहले अभिभावकों में निजी स्कूलों के प्रति आकर्षण नहीं था लेकिन उपरोक्त प्रावधान का सबसे बड़ा संदेश यह जा रहा है कि सरकारी स्कूलों से अच्छी शिक्षा निजी स्कूलों में दी जा रही है इसलिए सरकार भी बच्चों को वहां भेजने को प्रोत्साहित कर रही है। देखने में आ रहा है कि शिक्षातंत्र का ज्यादा जोर मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के तहत तय किए गए निजी स्कूलों की 25 फीसद सीटों पर दाखिले को लेकर है और वहां के शिक्षक इलाके के गरीब बच्चों के निजी स्कूलों में दाखिले के लिए ज्यादा दौड़ भाग कर रहे हैं। सरकारी स्कूलों के शिक्षक इस बात से हतोत्साहित भी हैं कि उन्हें अपने स्कूलों में बच्चों के दाखिले के बजाय निजी स्कूलों के लिए प्रयास करना पड़ रहा है। इस प्रकार पहले से कमतर शिक्षा का आरोप झेल रहे सरकारी स्कूलों पर स्वयं सरकार ने कमतरी की मुहर लगा दी है। यह प्रावधान सरकारी शिक्षा के लिए भस्मासुर बन चुका है।

यह एक गंभीर चुनौती है जिस पर ध्यान देने की जरूरत है क्योंकि अगर सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था ही धवस्त हो गई तो फिर शिक्षा का अधिकार की कोई प्रासंगिकता ही नहीं बचेगी। इधर सरकारी स्कूलों को कंपनियों को ठेके पर देने या ‘पीपीपी मोड’ पर चलाने की चर्चाएं जोरों पर हैं और कम छात्र संख्या के बहाने इन स्कूलों को बड़ी तादाद में बंद किया जा रहा है। निजी स्कूल मालिकों की लॉबी और नीति निर्धारकों का पूरा जोर इस बात पर है कि किसी तरह से सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को नाकारा साबित कर करते हुए इसे पूरी तरह ध्वस्त कर दिया जाए ताकि निजीकरण के लिए रास्ता बनाया जा सके। निजीकरण से भारत में शिक्षण के बीच खाई बढ़ेगी और गरीब और वंचित समुदायों के बच्चे शिक्षा से वंचित हो जाएंगे।
1964 में कोठारी आयोग ने प्राथमिक शिक्षा को लेकर कई ऐसे महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए थे जो आज भी लक्ष्य बने हुए हैं। आयोग का सुझाव था कि समाज के अंदर व्याप्त जड़ता सामाजिक भेद-भाव को समूल नष्ट करने के लिए समान स्कूल प्रणाली एक कारगर औजार होगी। समान स्कूल व्यवस्था के आधार पर ही सभी वर्गों और समुदायों के बच्चे एक साथ समान शिक्षा पा सकते हैं। अगर ऐसा नहीं हुआ तो समाज के उच्च कहे जाने वाले वर्गों के लोग सरकारी स्कूल से भागकर निजी स्कूलों का रुख करेंगे और पूरी प्रणाली ही छिन्न-भिन्न हो जाएगी। लोकतंत्र में राजनीति ही सब कुछ तय करती है लेकिन दुर्भाग्यवश शिक्षा का मुद्दा हमारी राजनीतिक पार्टियों के एजेंडे में नहीं है और न यह उनकी विकास की परिभाषा के दायरे में आता है। हमारे राजनेता नारे गढ़ने में बहुत माहिर हैं, अब देश के बच्चों के लिए भी उन्हें एक नारा गढ़ना चाहिए ‘सबके लिए समान, समावेशी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा’ का नारा।

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