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राजनीति: शहरीकरण से बढ़ते खतरे

जहां तक भारत में शहरी आबादी की हिस्सेदारी का सवाल है तो यह निश्चित रूप से विकसित देशों की तुलना में कम है। लेकिन अगर नगरों में निवास करने वाली कुल जनसंख्या पर नजर दौड़ाएं तो यह संख्या दुनिया के कई विकसित देशों की जनसंख्या की तुलना में अधिक है। मगर विडंबना यह है कि विकसित देशों की तुलना में भारत में रहने वाली शहरी आबादी को बुनियादी सुविधाओं का चौथाई फीसद भी हासिल नहीं है।

Author October 19, 2018 2:09 AM
अनुमान है कि 2050 तक भारत में 41.6 करोड़, चीन में 25.5 करोड़ और नाइजीरिया में 18.9 करोड़ शहरी आबादी बढ़ जाएगी।

दुनिया की तकरीबन पचपन फीसद आबादी शहरों में रह रही है। अगर शहरों में बसने की गति इसी तरह तेज बनी रही तो 2050 तक अड़सठ फीसद जनसंख्या शहरों में होगी। संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक शहरीकरण और बढ़ती जनसंख्या के चलते 2050 तक शहरों में ढाई अरब आबादी बढ़ जाएगी। चिंता की बात यह है कि इसमें से नब्बे फीसद वृद्धि अफ्रीका और एशिया में होगी। संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक व सामाजिक मामलों के विभाग का कहना है कि भविष्य में बढ़ने वाली आबादी कुछ खास देशों में होगी। संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक 2018 से 2050 के बीच बढ़ने वाली आबादी में पैंतीस फीसद हिस्सेदारी भारत, चीन और नाइजीरिया की होगी। अनुमान है कि 2050 तक भारत में 41.6 करोड़, चीन में 25.5 करोड़ और नाइजीरिया में 18.9 करोड़ शहरी आबादी बढ़ जाएगी।

मौजूदा समय में देश में कितना शहरीकरण हुआ है, इसका कोई स्पष्ट आंकड़ा नहीं है। इसलिए कि यह काफी कुछ शहरों की परिभाषा पर निर्भर करता है। जनगणना में दी गई परिभाषा के आधार पर देश एक-तिहाई शहरी है। यहां शहरी राज्य देश के अमीर दक्षिण व पश्चिमी हिस्सों में हैं। लेकिन अगर उपग्रह से मिली तस्वीरों को आधार बनाया जाए तो दो तिहाई यानी तिरसठ फीसद भारत शहरी नजर आएगा। गौर करने वाली बात यह है कि शहरी इलाके उत्तर भारत के गरीब क्षेत्रों में ज्यादा नजर आएंगे। हालांकि शहर की परिभाषा को लेकर अभी तक कोई स्पष्ट राय नहीं बन पाई है। वर्ष 1961 में तय की गई शहर की परिभाषा के मुताबिक कम से कम पांच हजार वासी हों और लोगों का घनत्व चार सौ लोग प्रति वर्ग किलोमीटर हो। इसके अलावा कम से कम पिचहत्तर फीसद पुरुष आबादी गैर-कृषि गतिविधियों से जुड़ी हो। गौर करें तो जनगणना की इस परिभाषा के अनुसार 2011 में देश की इकतीस फीसद आबादी शहरी इलाकों में रह रही थी। लेकिन वह आबादी जो शहरों और कस्बों में रह रही है और जिसे वाकई में शहरी कहा गया है और शहरी नगरपालिकाएं उसका संचालन करती हैं, वह मात्र छब्बीस फीसद है। अगर जनगणना की परिभाषा को थोड़ा लचीला बनाते हुए उन इलाकों को भी शहरों की परिभाषा में शामिल कर लें जहां पांच हजार लोग रहते हैं, तो कुल आबादी में शहरी आबादी की हिस्सेदारी सैंतालीस फीसद हो जाएगी।

सवाल है कि शहरों की नवीन परिभाषा क्यों नहीं तय की जा रही है? जब परिभाषा ही स्पष्ट नहीं होगी तो फिर शहरों की आबादी के अनुरूप सुविधाओं और अन्य समस्याओं पर विचार कैसे होगा। जहां तक भारत में शहरी आबादी की हिस्सेदारी का सवाल है तो यह निश्चित रूप से विकसित देशों की तुलना में कम है। लेकिन अगर नगरों में निवास करने वाली कुल जनसंख्या पर नजर दौड़ाएं तो यह संख्या दुनिया के कई विकसित देशों की जनसंख्या की तुलना में अधिक है। लेकिन विडंबना यह है कि विकसित देशों की तुलना में भारत में रहने वाली शहरी आबादी को बुनियादी सुविधाओं का चौथाई फीसद भी हासिल नहीं है। इसके बावजूद लोगों का गांवों से शहरों की ओर पलायन बढ़ता जा रहा है। शहरों में आबादी बढ़ने के कई कारण हैं। भारत के संदर्भ में 1990 के बाद निजी क्षेत्र में वृद्धि और ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में देश के आर्थिक विकास के लिए शहरीकरण पर जोर से लोगों का शहरों की ओर आकर्षण बढ़ा है। इसके अलावा शहरों में रोजगार के बेहतर अवसर, तकनीक से जुड़ाव, बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य की संभावना और नौकरियों की अधिक गुंजाइश ने लोगों को ग्रामीण क्षेत्रों व छोटे शहरों से बड़े शहरों की ओर पलायन करने पर मजबूर किया है। इसके अलावा सड़क निर्माण, बांध बनाने, निर्माण गतिविधियों में जमीन के टुकड़े बंट जाने से भी लोग शहरों की ओर रुख कर रहे हैं। इसका परिणाम यह हुआ है कि शहर जरूरत से ज्यादा भर गए और इतनी बड़ी आबादी के लिए रहने की व्यवस्था करना बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। आवास की कमी की वजह से लोग झुग्गी-झोपड़ियों में रहने को मजबूर हैं। अगर शहरों पर आबादी का बोझ बढ़ रहा है और लोग सड़कों के किनारे, मलिन बस्तियों और गंदगी भरे स्थानों पर रहने को मजबूर हैं तो इसके लिए सरकार की नीतियां ही जिम्मेदार हैं। यह त्रासदी है कि शहरों में झुग्गी-बस्तियों की संख्या में लगातार इजाफा होने से विकास प्रभावित हो रहा है। सरकार के पास झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले लोगों का जो आंकड़ा है, वह हकीकत में कई गुना ज्यादा है। इसलिए कि सरकार ने झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले लोगों की आबादी निर्धारण का जो पैमाना बनाया है, वह तर्कहीन है। सरकारी पैमाने के अनुसार बीस से पच्चीस डेरों का ऐसा समूह जिसमें छत या कंक्रीट की छत नहीं है और जिसमें पीने योग्य पानी, शौचालय या नाले इत्यादि का इंतजाम नहीं है, उन्हें झुग्गी माना गया है। लेकिन सरकार की परिभाषा में न समाने वाले बहुतायत लोगों की संख्या ऐसी भी है जिन्होंने जोड़-तोड़ कर छत की व्यवस्था तो कर ली है, लेकिन आज भी बुनियादी सुविधाओं मसलन- पानी, शौचालय और बिजली से वंचित हैं। अगर इन आंकड़ों को सरकारी आंकड़ों में शुमार कर लिया जाए तो झुग्गी-बस्तियों की तादाद बढ़ जाएगी।

दरअसल, बेतहाशा बढ़ती आबादी ने इन समस्याओं को जन्म दिया है। इसीलिए आदर्श शहरों की योजना ठप पड़ चुकी है। पिछले दिनों देखा भी गया कि तेज बारिश में केरल सहित देश के कई शहर बुरी तरह जलमग्न हो गए। शहरों पर न केवल आबादी का बोझ बढ़ रहा है, बल्कि इससे जनसंख्या वृद्धि, बेरोजगारी, गरीबी, अपराध, बाल अपराध, महिलाओं की समस्याएं, भीड़भाड़, गंदी बस्तियां, बिजली एवं जल आपूर्ति में कमी और प्रदूषण जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं। आबादी बढ़ने और औद्योगीकरण के कारण पर्यावरण प्रदूषण की कई समस्याएं उत्पन्न हो गई हैं। महानगरों में प्रदूषण का मुख्य कारण वाहनों और फैक्ट्रियों व कारखानों से निकलने वाले विषैले रसायन हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट पर गौर करें तो दुनिया के सबसे ज्यादा प्रदूषित बीस शहरों में शीर्ष चौदह शहर भारत के ही हैं। खतरनाक बात यह कि वायुमंडल में गैसों का अनुपात बिगड़ता जा रहा है। हाल के वर्षों में वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्रा घटी है और दूषित गैसों की मात्रा बढ़ी है। कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा में तकरीबन पच्चीस फीसद की वृद्धि हुई है। इसका मुख्य कारण कल-कारखानों और उद्योगों में कोयले व खनिज तेल का उपयोग है। इनके जलने से सल्फर डाई ऑक्साइड निकलती है जो मानव जीवन के लिए बेहद खतरनाक है। मसलन, सल्फर डाई ऑक्साइड से फेफड़ों के रोग, कैडमियम जैसे घातक पदार्थों से हृदय रोग, और कार्बन मोनोक्साइड से कैंसर और सांस संबंधी रोग होते हैं। प्रदूषण का दुष्प्रभाव शहरों की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासतों पर भी पड़ रहा है। पहले देश के उनतालीस शहरों के एक सौ अड़तीस विरासतीय स्मारकों पर प्रदूषण के घातक दुष्प्रभावों का अध्ययन किया गया। इसमें पाया गया था कि शिमला, हासन, मंगलौर, मैसूर, कोट्टायम और मदुरै जैसे शहरों में पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) की मात्रा राष्ट्रीय मानक साठ माइक्रोग्राम क्यूबिक मीटर से भी ज्यादा है। कुछ स्मारकों के निकट तो यह चार गुने से भी अधिक पाया गया। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि शहरों के स्मारकों के आसपास रासायनिक और धूल प्रदूषण की जानकारी के बाद भी उसके बचाव पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। आवास और पर्यावरण की समस्या से इतर और भी ढेरों समस्याएं हैं जो किसी खतरे से कम नहीं हैं।

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