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राजनीति: मुनाफे के जाल में सेहत

यह सच है कि भारत सरकार का स्वास्थ्य बजट बहुत कम है और इसे काफी बढ़ाने की जरूरत है। पर इसके साथ हमें स्वास्थ्य तंत्र पर छाई मुनाफे की व्यवस्था के स्थान पर एक जरूरत के अनुसार सही इलाज की व्यवस्था विकसित करनी होगी, तभी बढ़े हुए सरकारी बजट का सही उपयोग संभव होगा। शिक्षा और स्वास्थ्य ऐसे क्षेत्र हैं जिन्हें निजी मुनाफे के भरोसे छोड़ना उचित नहीं है।

Author October 24, 2018 1:28 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

भारत डोगरा

स्वास्थ्य के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण सुधार अधिकांश देशों के लिए बड़ी प्राथमिकता रहे हैं। लेकिन प्राय: उपलब्धियां आधी-अधूरी ही रही हैं। पश्चिम यूरोप के देशों को स्वास्थ्य में आगे बताया जाता है, पर बहुत खर्च करने के बाद भी दीर्घकालीन बीमारियों को कम करने में वहां भी सफलता प्राप्त नहीं हो रही है। ब्रिटेन के सामान्य परिवार सर्वेक्षण में पहली बार इक्कीस फीसद लोगों ने इन बीमारियों से प्रभावित होने की शिकायत की पर सोलह वर्ष बाद यह प्रश्न फिर से पूछा गया तो तैंतीस फीसद लोगों ने यह शिकायत की। दवा की पर्ची लिखवाने वालों में और अधिक वृद्धि हुई। यह हाल सबसे धनी देशों का है, पर दुनिया के अधिकांश देशों के पास तो बहुत महंगे इलाज के लिए वित्तीय संसाधन भी नहीं हैं। उन्हें तो ऐसे समाधान चाहिए जो उनकी स्थितियों के अनुकूल हों। अत: विभिन्न देशों के अनुभवों से सीखते हुए हमें अपने लिए सबसे उचित राह निकालनी होगी।

सबसे पहली जरूरत तो इस बात की है कि बीमारियों के जो कारण हैं, उन्हें न्यूनतम किया जाए। निर्धन परिवारों के बीच प्रतिबद्धता से कार्य करने वाले डाक्टर बताते हैं कि भूख, कुपोषण, रहन-सहन की तंगी, साफ पेयजल व स्वच्छता के अभाव और शिक्षा की कमी के कारण अधिकांश बीमारियां उत्पन्न होती हैं और फैलती हैं। इसका मुख्य कारण निर्धनता व विषमता है, जिनका चोली-दामन का साथ है। अत: निर्धनता व विषमता को न्यूनतम करना व सभी के लिए बुनियादी जरूरतों की आपूर्त्ति को सुनिश्चित करने को उच्चतम प्राथमिकता मिलनी चाहिए। इस तरह की मजबूत बुनियाद के बिना जो भी स्वास्थ्य सुधार होगा, वह अपूर्ण और अस्थिर होगा, वह टिकाऊ नहीं हो सकता है। इसके साथ यह बहुत जरूरी है कि हर तरह के नशे, हानिकारक खाद्यों और दुर्व्यसन को न्यूनतम किया जाए। अत्यधिक खानपान, भोग-विलास व आलस्य के विरुद्ध सावधानियां अपनाई जाएं। सभी तरह की दुर्घटनाओं और हिंसा को कम करने के प्रयास भी बहुत जरूरी हैं ताकि बीमारियों के प्रकोप को न्यूनतम करने के साथ गंभीर चोट लगने की संभावना को भी न्यूनतम किया जा सके। निजी संबंधों और कार्यस्थल के तनाव, अत्यधिक प्रतिस्पर्धा व होड़ के माहौल को कम करने से व नैतिक मूल्यों को बढ़ाने से भी स्वास्थ्य के अनुकूल स्थितियां तैयार करने में मदद मिलेगी।
यदि इस तरह की तैयारियों पर कोई समाज निरंतरता से अधिक ध्यान दे तो बीमार होने और घायल होने का खतरा पचास फीसद या उससे भी अधिक अपने आप कम हो जाएगा। यही

स्वास्थ्य सुधारने का सबसे सस्ता और असरदार उपाय है, पर यही सबसे उपेक्षित भी है। बीमारियों की रोकथाम की बात की जाए तो प्राय: टीका लगाने और कीटनाशक या मच्छरमार दवा छिड़कने तक ही यह बात सीमित रह जाती है, जबकि बीमारियों और चोटों को न्यूनतम करने की बहुत समग्र सोच चाहिए। इस तरह की सही सोच को अपनाने के बावजूद बहुत से लोगों को बीमारी और चोट का इलाज तो करवाना ही होगा। सवाल यह है कि किस तरह की चिकित्सा और स्वास्थ्य व्यवस्था बनाई जाए जो चिकित्सा विज्ञान के अनुसार सही इलाज सब लोगों तक इस तरह पहुंचा सके कि उन पर कोई असहनीय वित्तीय बोझ भी न पड़े। इसके लिए ऐसी चिकित्सा व्यवस्था जरूरी है जो मूल रूप से मुनाफे पर आधारित न हो, अपितु वास्तविक जरूरत पूरी करने पर आधारित हो। यह बार-बार देखा गया है कि स्वास्थ्य और चिकित्सा व्यवस्था में यदि मुनाफे की सोच हावी होती है तो खर्च बढ़ता जाता है, पर मरीजों को सही और विश्वसनीय इलाज मिलना कठिन होता है। दवा उद्योग हो या चिकित्सा के साज-सामान का उद्योग हो, या फिर स्वास्थ्य व चिकित्सा संबंधी विभिन्न जांचों का व्यवसाय हो या निजी अस्पताल हों या बीमा कंपनियां हों, प्राय: इनके संचालन में जब मुनाफे का मकसद हावी रहता है तो ये वास्तविक जरूरतों के अनुकूल उत्पाद और सेवाएं उपलब्ध नहीं करवा पाते हैं। इस तरह की मुनाफा आधारित व्यवस्था की पराकाष्ठा संयुक्त राज्य अमेरिका में देखी जाती है। वहां की एक संसदीय रिपोर्ट में बताया गया कि एक वर्ष में वहां चौबीस लाख गैर-जरूरी आपरेशन किए गए, जिन पर चार अरब डालर खर्च हुए और बारह हजार लोगों की मौत हुई। यह ऐसा चिकित्सक खर्च था, जिससे स्वास्थ्य में वास्तविक सुधार नहीं होता है। इंस्टीट्यूट आॅफ मेडिसिन के अनुसार संयुक्त राज्य अमेरिका में एक वर्ष में पिचहत्तर हजार करोड़ डालर इस तरह खर्च होते हैं। मेडीकेयर के तैंतीस फीसद मरीज अस्पताल से बाहर आने के तीन महीने के भीतर फिर अस्पताल में भर्ती होने के लिए मजबूर होते हैं। अधिकांश डाक्टरों का मनोबल गिरा हुआ है और वे खुद विभिन्न अनैतिक चिकित्सा व्यवस्था की प्रक्रियाओं से, बीमा कंपनियों के दबदबे से परेशान हैं। अमेरिका में विभिन्न व्यवसायों में डाक्टरों की आत्महत्या दर सबसे अधिक है। इसलिए इसके स्थान पर नीचे से ऊपर तक एक ऐसी चिकित्सा व्यवस्था की जिम्मेदारी सरकार को संभालनी चाहिए, जिसमें सभी नागरिकों को चिकित्सा विज्ञान के अनुकूल सही चिकित्सा अधिक वित्तीय बोझ के बिना उपलब्ध हो। यहां सभी नागरिकों को समानता के आधार पर चिकित्सा मिलनी चाहिए। सबसे निर्धन मरीजों को निशुल्क चिकित्सा उपलब्ध होनी चाहिए और अन्य मरीजों के लिए कम दर पर चिकित्सा होनी चाहिए।

एक निश्चित संख्या की आबादी के लिए ग्राम पंचायत व शहरी कालोनी स्तर पर प्राथमिक चिकित्सा केंद्र होना चाहिए जो बच्चे के जन्म, गर्भवती महिलाओं की देखभाल, टीकाकरण, सामान्य स्वास्थ्य जांच के साथ सभी सामान्य बीमारियों के इलाज में सक्षम हो। उम्मीद की जानी चाहिए कि लगभग सत्तर फीसद मरीजों का यहीं पर संतोषजनक ढंग से इलाज संभव होगा। इस प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को बीमारियों की रोकथाम संबंधी कार्यवाहियों की मुख्य जिम्मेदारी सौंपी जाएगी। इसके संचालन में स्थानीय स्वायत्त संस्थानों की भी जिम्मेदारी व भागीदारी होनी चाहिए। अधिक गंभीर मामलों के लिए अपेक्षाकृत बड़े अस्पताल होंगे। इसके अतिरिक्त कुछ बहुत विशिष्ट चिकित्सा की जरूरत वाले मरीजों को इन विशिष्ट समस्याओं के लिए अनुकूल चिकित्सा केंद्रों में भेजा जाएगा। इसे संभव बनाने के लिए सरकार के स्वास्थ्य बजट में लगभग तीन से चार गुना वृद्धि करनी होगी। पर यह वृद्धि तभी सार्थक होगी जब मौजूदा मोटे मुनाफे पर आधारित तंत्र को बदला जाएगा। यदि इस तंत्र को हटाए बिना ही सरकारी बजट बढ़ाया जाएगा तो यह तंत्र ही इस सरकारी खर्च की वृद्धि के बहुत बड़े हिस्से को निगलने के लिए तैयार बैठा है। इस समय तो स्थिति यह है कि टीकाकरण जैसे रोग से बचाने के कार्यक्रम पर भी मुनाफे की प्रवृत्तियां हावी हो रही हैं जिसके बहुत हानिकारक असर हो रहे हैं और जिन्हें छिपाने के भरपूर प्रयासों के बावजूद वे धीरे-धीरे सामने आ भी रहे हैं। यह सच है कि भारत सरकार का स्वास्थ्य बजट बहुत कम है और इसे काफी बढ़ाने की जरूरत है। पर इसके साथ हमें स्वास्थ्य तंत्र पर छाई मुनाफे की व्यवस्था के स्थान पर एक जरूरत के अनुसार सही इलाज की व्यवस्था विकसित करनी होगी, तभी बढ़े हुए सरकारी बजट का सही उपयोग संभव होगा। शिक्षा और स्वास्थ्य ऐसे क्षेत्र हैं जिन्हें निजी मुनाफे के भरोसे छोड़ना उचित नहीं है। इसके लिए पहला कदम तो सदा यही रहना चाहिए कि बीमार होने व गंभीर चोट लगने की संभावना न्यूनतम हो। दूसरा कदम यह है कि सारे प्रयासों के बावजूद जो लोग रोगग्रस्त व घायल होते हैं, उनकी आर्थिक स्थिति या वित्तीय क्षमता चाहे जैसी भी हो, उन्हें चिकित्सा विज्ञान के अनुकूल उचित इलाज उपलब्ध अवश्य होना चाहिए जिसकी जिम्मेदारी सरकार को स्वीकार करनी चाहिए। यह ऐसी चुनौती है जिसमें बेहद रचनात्मक कार्य की बहुत संभावनाएं हैं और सभी स्तरों पर सरकारों को नागरिकों व विशेषज्ञों दोनों का सहयोग इसमें प्राप्त करना चाहिए।

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